ईरान की भूमिगत प्राचीन कनात जल प्रणाली
हम सब जानते हैं कि ईरान दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है।
भारत और ईरान के संबंध सदियों पुराने और बहुआयामी हैं, जिनमें गहरा ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध है।यह सहयोग ऊर्जा, व्यापार, कनेक्टिविटी (जैसे चाबहार बंदरगाह), और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे क्षेत्रों में फैला हुआ रहा है। हालाँकि, कुछ राजनीतिक मतभेद और वैश्विक दबावों के कारण संबंधों में चुनौतियाँ भी आई हैं।दोनों देशों में भाषा, कला, वास्तुकला और परंपराओं में कई समानताएं हैं। ईरान भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों में से एक रहा है। भारत ईरान को चावल, चाय, चीनी, और दवाइयाँ जैसे उत्पादों का निर्यात करता है। ईरान से भारत को कच्चा तेल, रसायन, फल और मेवे जैसे उत्पादों का आयात होता है। ईरान में चाबहार बंदरगाह का विकास भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक परियोजना है, जो इसे मध्य एशिया और अफगानिस्तान से जोड़ता है। ईरान कभी भारत के लिए कच्चे तेल के महत्वपूर्ण और विश्वसनीय आपूर्तिकर्ताओं में से एक था।अमेरिका द्वारा ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों ने भारत के तेल आयात को प्रभावित किया है।
इज़राइल के साथ भारत के बढ़ते संबंधों और कश्मीर जैसे मुद्दों पर ईरान की कुछ प्रतिक्रियाओं ने संबंधों में तनाव पैदा किया है। हाल ही में, भारत के लिए ईरान की वीजा-फ्री एंट्री सुविधा को निलंबित कर दिया गया है।
इस्लामी क्रांति के बाद ईरान को 1979 में इस्लाम गणराज्य घोषित किया गया था। आज, ईरान एक इस्लामी गणराज्य तथा धर्मतंत्र है।
छठी शताब्दी ईसा पूर्व में साइरस महान ने ईरान में हख़ामनी साम्राज्य की स्थापना की थी जो इतिहास के सबसे बड़े साम्राज्यों में से एक बना। चौथी शताब्दी ईसा पूर्व सिकंदर ने इस साम्राज्य को परास्त कर दिया था। यूनानी राज के बाद इस पर पहलवी तथा सासानी साम्राज्यों का राज रहा। अरब मुसलमानों ने सातवीं शताब्दी ईस्वी में इस क्षेत्र पर विजय प्राप्त की और इसका इस्लामीकरण किया। आगे चल कर यह इस्लामी संस्कृति और शिक्षा का एक प्रमुख और महत्वपूर्ण केंद्र बन गया। इसकी कला, साहित्य, दर्शन और वास्तुकला इस्लामी स्वर्ण युग के दौरान इस्लामी दुनिया में और उससे आगे तक फैलती गई। तुर्क और मंगोल शासन के बाद पंद्रहवीं शताब्दी में ईरान फिर से एकजुट हुआ। उन्नीसवीं सदी तक इसने अपनी काफ़ी ज़मीन खो दी थी। 1953 के तख्तापलट ने शासक मोहम्मद रज़ा पहलवी को और ताकतवर बना दिया जिसने दूरगामी सुधारों की एक श्रृंखला शुरू की।
तेहरान, इस्फ़हान, तबरेज़, मशहद इत्यादि इसके कुछ प्रमुख शहर हैं। राजधानी तेहरान में देश की 15 प्रतिशत जनता वास करती है। ईरान की अर्थव्यवस्था मुख्यतः तेल और प्राकृतिक गैस निर्यात पर निर्भर है। फ़ारसी यहाँ की मुख्य भाषा है। फ़ारसी लोगों के बाद अज़रबैजानी, कुर्द और लुर यहाँ की सबसे बड़े जातीय समूह हैं।
पिछले दिनों हमने ट्रैवल ब्लॉगर बंशी बिश्नोई के यूट्यूब विडियोज के माध्यम से ईरान की कुछ विशेषताओं को टीवी स्क्रीन पर साक्षात देखने समझने का प्रयास किया।
ईरान एक ऐसा मुल्क है, जहां पर नदियां, तालाब और झरने नहीं हैं, मतलब जमीन के ऊपर पानी की बड़ी किल्लत है। लेकिन जमीन के नीचे पानी की कोई कमी नहीं है। एक जानकारी के मुताबिक आज से करीब तीन हजार साल पहले ही ईरानियों ने जमीन से पानी निकालने की तरकीब खोज निकाली थी, जिसकी मदद से ईरान में कई बगीचे पुराने समय से ही लहलहाते रहे।
जमीन के अंदर से पानी निकालने की पद्धति ईरान के इस्फान और याज्द समेत कई इलाकों में देखने को मिलती हैं। पानी सप्लाई की इस शानदार इंजीनियरिंग को फारसी भाषा में 'कारिज' कहा जाता हैं, लेकिन इसका अरबी नाम 'कनात' ज्यादा चलन में है। रिपोर्ट के मुताबिक कुछ इलाकों में पहाड़ों की तलहटी से पानी निकालने की पद्धति आज भी चलन में है। साल 2016 में यूनेस्को ने इसे वर्ल्ड हेरिटेज साइट में शामिल कर लिया है।
बताया जाता है कि कनात बनाने के लिए पहले ऐसे पहाड़ों की पहचान की जाती थी, जहां जमीन के अंदर गाद वाली मिट्टी हो। फिर ऐसी जगहों पर खुदाई करके बेहतरीन इंजीनियरिंग के तहत पानी की निकासी की जाती थी और दूर तक इस पानी को ले जाया जाता था। गहरी खुदाई के दौरान ऑक्सीजन पहुंचाने के लिए भी रास्ते बनाए जाते थे। इसी पद्धति से ठंडी के महीनों में बर्फ भी जमाने का काम किया जाता था, जिससे गर्मी के महीनों में इसका इस्तेमाल किया जा सके. साथ ही कनात के पास वातानुकूलित घर भी बनाए जाते थे, जो गर्मी के महीनों में काफी ठंडा रहते थे।
ट्रैवलर बंशी बिश्नोई ने न सिर्फ ईरान के याज्द शहर में स्थित इन जल संरचनाओं के धरातल पर स्थित बस्तियों,घरों और वास्तुशिल्प से परिचित कराया बल्कि जमीन के तीस, चालीस मीटर नीचे बनाई गई नहरों,जल धाराओं, कूपों, ऑक्सीजन खिड़कियों, वातावरण को ठंडा बनाए रखने और अन्य तकनीकों को भी बहुत सहजता से वीडियो में दिखाया, समझाया। इन ऐतिहासिक संरचनाओं को देखने के लिए अनेक पर्यटकों के अलावा स्थानीय लोग भी बड़ी संख्या में यहां आते हैं। कई तंग सुरंगों में तो बहुत कठिनाई से प्रवेश करना पड़ता है।
बंशी बिश्नोई के ट्रैवलॉग वीडियो देखते हुए हमें बुरहानपुर मध्यप्रदेश की प्राचीन भूमिगत जल प्रणाली का स्मरण सहज ही हो जाता है, जोकि आज भी हमारी धरोहर है और प्रेरित करती है। यह प्रणाली कनात प्रणाली का ही एक उदाहरण है, जिसमें भूमिगत सुरंगों के माध्यम से पानी को लंबी दूरी तक ले जाया जाता है। इसे खूनी भंडारा या कुंडी भंडारा के रूप में जाना जाता है, यह प्रणाली भूमिगत सुरंगों और दीर्घाओं का उपयोग करके सतपुड़ा की पहाड़ियों से भूमिगत झरनों से पानी एकत्र करती है और गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध लगभग 80 फीट की गहराई से बहने वाले पानी की आपूर्ति करती है। इसका निर्माण 1615 ईस्वी के आसपास फारसी भू-वैज्ञानिक की मदद से मुगल सूबेदार अब्दुल रहीम खानखाना के संरक्षण में किया गया था। इस प्रणाली में पानी 101 कुंडलियों में घूमता है और माना जाता है कि, यहां का पानी शुद्धता और स्वच्छता के मामले में मिनरल वाटर से कई गुना बेहतर है। इस भूमिगत जल प्रणाली को देखने बड़ी संख्या में पर्यटक यहां भी यहां आते हैं। खास बात ये है कि, कई लोग तो यहां से पानी भरकर अपने साथ भी ले जाते हैं।
ईरान की कनात भूमिगत जल प्रणाली वहीं जाकर बहुत अच्छे से देखी जा सकती है किंतु ट्रैवलॉग और ट्रैवल वीडियो के माध्यम से हमने इसका थोड़ा अनुभव घर बैठे बंशी बिश्नोई के जरिए ले लिया, आभार है इन ट्यूबर ब्लॉगरों का। जहां तक बुरहानपुर की प्रणाली के दीदार की बात है, वहां जाने का कार्यक्रम तो कभी भी बनाया जा सकता है।
ब्रजेश कानूनगो