Sunday, 22 March 2026

बोझिल भविष्य में सुख देंगी कलाएं

बोझिल भविष्य में सुख देंगी कलाएं

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और प्रौद्योगिकी में हम जिस तेजी से आगे बढ़ रहे हैं इससे लगता है कि दुनिया भर के,हर क्षेत्र और हर विषय के ज्ञान से हम कुछ समय बाद लबालब भरे होंगे। बल्कि हमारा ज्ञान छलक छलक कर बाहर आने को बेताब होगा। यह एक नई ऊब हमारे जीवन मे ला सकती है। कुछ पाने के लिए हमारे पास करने को कुछ नहीं होगा जिससे जीवन मे प्रवाह,उमंग और उत्साह बढ़ता रहे। ऐसे में मुझे लगता है हमारे संतोष और खुशी मे केवल उन कलाओं की भूमिका ही रह जाएगी जो हमारी आदिम सभ्यता का हिस्सा रहीं हैं। जो हमारे मनुष्य होने से संभव हुईं हैं।  जिन्हें हम प्रदर्शन कलाओं और ललित कलाओं के नाम से पुकारते हैं।

ललित कला (Fine Arts) और प्रदर्शन कला  (Performing Arts) मानवीय अभिव्यक्ति के दो सबसे सुंदर स्तंभ हैं। जहाँ ललित कला को हम देख और महसूस कर सकते हैं, वहीं प्रदर्शन कला (परफॉर्मिंग आर्ट) को समय और गति के माध्यम से जिया जाता है। ललित कला का मुख्य उद्देश्य सौंदर्य और दृश्य आनंद पैदा करना है। यह अक्सर "स्थिर" होती है और इसे भौतिक माध्यमों (जैसे रंग, मिट्टी या पत्थर) से बनाया जाता है। जैसे चित्रकला,मूर्तिकला,वास्तुकला,,रेखांकन आदि जिनमें कलाकार स्वयं रचनात्मक रूप से सक्रिय रहता है। वहीं प्रदर्शन कला (परफॉर्मिंग आर्ट) में कलाकार अपने शरीर, आवाज और चेहरे के हाव-भाव का उपयोग करके कला का प्रदर्शन करते हैं। यह 'क्षणभंगुर' होती है—यानी यह प्रदर्शन के साथ ही घटित होती है और समाप्त हो जाती है। इन कलाओं में संगीत, नृत्य, नाटक और कुछ हद तक मार्शल आर्ट को शामिल किया जा सकता है।

जब मनुष्य के पास सब कुछ होगा तो वह अपनी खुशी के लिए चित्र बनाएगा, धातुओं,काष्ठ में मूर्ति या चट्टानों में शिल्प गढ़ेगा या फिर गाने, बजाने और शारीरिक प्रस्तुतियों से खुद को और समाज को आनंदित होने का अवसर देगा। नृत्य करेगा, अभिनय के माध्यम से लोक कथाएं या कहानियां देखी सुनी जाएंगी। दरअसल, एक ट्रैवल वीडियो में  पश्चिम अफ्रीका के आइवरी कोस्ट (Ivory Coast) के गौरो (Guro) समुदाय के प्रसिद्ध 'ज़ौली' (Zaouli) नृत्य को देखते हुए जो खुशी और आनंद की अनुभूति हुई उसने हमारा विश्वास दृढ़ किया कि चाहे जितना हम विकास कर लें, प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बौद्धिकता से सब कुछ पा लें लेकिन हमारी प्राचीन कलाएं सदैव हमारे साथ बनी रहेंगीं। हमारे जीवन में रस घोलती रहेंगी।

ज़ौली' (Zaouli) नृत्य अपनी अविश्वसनीय गति और जटिल फुटवर्क के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। ज़ौली (Zaouli) नृत्य की सबसे बड़ी विशेषता इसकी लय और ताल है, जिसे विशिष्ट पारंपरिक वाद्ययंत्रों के माध्यम से जीवंत किया जाता है। संगीत और नर्तक के पैरों की गति के बीच का तालमेल ही इस प्रदर्शन को जादुई बनाता है। ज़ौली में संगीत केवल बैकग्राउंड में नहीं बजता, बल्कि यह नर्तक के लिए एक 'चुनौती' की तरह होता है। ड्रमर एक जटिल ताल बजाता है, और नर्तक को अपने पैरों से ठीक उसी ताल को दोहराना होता है। जैसे-जैसे ड्रम की गति बढ़ती है, नर्तक को अपनी शारीरिक क्षमता की सीमाओं को पार करते हुए और भी तेज़ी से थिरकना पड़ता है। संगीत में अचानक आने वाले ठहराव (Breaks) पर नर्तक को बिल्कुल स्थिर हो जाना पड़ता है, जो दर्शकों के लिए सबसे रोमांचक क्षण होता है।

इस नृत्य की शुरुआत 1950 के दशक में हुई थी। माना जाता है कि यह एक सुंदर लड़की 'ज़ौली' (Zaouli) से प्रेरित है। यह नृत्य स्त्री सौंदर्य और अनुग्रह (Grace) का सम्मान करने के लिए किया जाता है, हालांकि इसे पारंपरिक रूप से पुरुषों द्वारा ही प्रदर्शित किया जाता है। 2017 में, इस नृत्य को इसकी सांस्कृतिक विशिष्टता के कारण यूनेस्को (UNESCO) की 'अमूर्त सांस्कृतिक विरासत' (Intangible Cultural Heritage) की सूची में शामिल किया गया था।  हमने वीडियो के जरिए आभासी आनंद लेते हुए देखा कि इसमें नर्तक एक चमकीले रंग का लकड़ी का मुखौटा पहनता है, जो अक्सर किसी जानवर या सुंदर महिला के चेहरे को दर्शाता है। यह मुखौटा गौरो शिल्पकारों की बेहतरीन कला का नमूना होता है। नर्तक शरीर पर रंगीन बुने हुए कपड़े और पैरों में घंटियाँ पहनता है। हाथों में अक्सर पूंछ के बालों से बने 'फ्लाइविस्क' (Fly-whisks) होते हैं, जो नृत्य के दौरान हवा में लहराते हैं। यह नृत्य दुनिया के सबसे चुनौतीपूर्ण नृत्यों में से एक माना जाता है क्योंकि नर्तक के पैर इतनी तेज़ी से चलते हैं कि वे आंखों से धुंधले दिखने लगते हैं। यह शरीर के ऊपरी हिस्से को स्थिर रखते हुए किया जाता है। नृत्य पूरी तरह से ड्रम और बांसुरी की थाप पर आधारित होता है। नर्तक और ड्रमर के बीच एक गहरा संवाद होता है; हर कदम ड्रम की एक विशिष्ट बीट के साथ मेल खाता है। यह शारीरिक रूप से बहुत थका देने वाला होता है, इसलिए एक प्रदर्शन के लिए नर्तक को बहुत अभ्यास और ताकत की आवश्यकता होती है। ट्रैवलर को स्थानीय निवासी बताते हैं कि यह नृत्य केवल मनोरंजन नहीं है, बल्कि यह गांवों के बीच एकता का प्रतीक भी है। इसे शादी, उत्सवों और कभी-कभी अंतिम संस्कार के समय भी प्रदर्शित किया जाता है ताकि समुदाय के बीच भाईचारा बढ़े।

यदि अपने देश के संदर्भ में बात करें तो भारत में शास्त्रीय नृत्य कलाएं और लोक नृत्य कलाएं दोनों ही अपनी अनूठी शैली और सांस्कृतिक महत्व के लिए प्रसिद्ध हैं।तमिलनाडु का भरतनाट्यम नृत्य अपनी भावपूर्ण भंगिमाओं और जटिल पदचाप के लिए जाना जाता है।उत्तर प्रदेश का कथक नृत्य तेज़ ताल और पैरों की जटिल तकनीक के लिए प्रसिद्ध है। केरलम का कथकली नृत्य रंगीन मेकअप, वेशभूषा और नाटकीय अभिव्यक्ति के लिए प्रसिद्ध है। आंध्र प्रदेश का कुचिपुड़ी नृत्य नाटक और नृत्य का सुंदर संगम है। मणिपुर का मणिपुरी नृत्य अपनी कोमलता और लयबद्धता के लिए जाना जाता है। केरलम का मोहिनीअट्टम नृत्य स्त्रीत्व और लालित्य का प्रतीक है। ओडिशा का ओडिसी नृत्य मंदिरों से जुड़ा है और भक्ति भावनाओं से ओतप्रोत है। असम का सत्रिया नृत्य अपनी अनूठी शैली और सांस्कृतिक महत्व के लिए जाना जाता है। इन शास्त्रीय नृत्यों के अलावा हमारे देश में अनेक लोक नृत्य कलाएं भी बहुत प्रसिद्ध और लोकप्रिय हैं असम का बिहू अपनी ऊर्जा और उत्साह के लिए जाना जाता है। पंजाब का भांगड़ा अपनी जोशीली और उत्साही शैली के लिए प्रसिद्ध है। गुजरात का गरबा अपनी अनूठी शैली और सांस्कृतिक महत्व के लिए जाना जाता है। महाराष्ट्र की लावणी अपनी भावपूर्ण और आकर्षक शैली के लिए प्रसिद्ध है। राजस्थान का घूमर नृत्य अपनी अनूठी शैली और सांस्कृतिक महत्व के लिए जाना जाता है।

इन विविध नृत्य कलाओं से समृद्ध देश होने के कारण हम आश्वस्त हो सकते हैं कि भविष्य में सब कुछ पा लेने के भारी बोझ के बीच भी हमारे लिए अपने आनंद की राह निकाल लेना कठिन नहीं होगा।

ब्रजेश कानूनगो









Tuesday, 17 March 2026

ग्रामीणों के लिए पेड़ों के आबंटन की व्यवस्था कुछ दिनों पूर्व हमने एक विश्व यात्री और यूट्यूबर

ग्रामीणों के लिए पेड़ों के आबंटन की व्यवस्था

कुछ दिनों पूर्व हमने एक विश्व यात्री और यूट्यूबर के जरिए रूस के एक गांव की आभासी सैर की थी। हमने देखा कि प्रत्येक घर के परिसर में एक ऐसा स्टोरेज था जिसमें कटी हुई लकड़ियों के गुल्ले बड़ी व्यवस्थित रूप से जमाकर रखे हुए थे। निश्चित रूप से ये उस घर में रहने वाले परिवार की ऊर्जा का इंतजाम था और वह उनको सालभर आग और गर्मी का प्रबंध करने के लिए काम आने वाली थी।

जब ट्रैवलर ने अपने होस्ट से इस बारे में जानकारी मांगी तो उसने बताया कि वहां का प्रशासन गांव के हर परिवार को इस हेतु एक वृक्ष का आबंटन करता है, उसी की लकड़ियां काट कर सालभर की जरूरत के लिए सहेज कर रखी जाती हैं। हमारे लिए खासकर मेरे लिए यह बहुत न सिर्फ चौंकाने वाली बात थी बल्कि एक नई जिज्ञासा भी पैदा कर दी। साथ ही कुछ और जानकारी जुटाने के लिए प्रेरित किया। 

दरअसल, रूस के ग्रामीण क्षेत्रों में लकड़ी (wood) का आवंटन वहां की संस्कृति और कानून की एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात है जो  "रूसी वन संहिता" (Forest Code of the Russian Federation) के तहत मिलने वाली सुविधाओं को उपलब्ध कराती है। रूस में आज भी करोड़ों लोग लकड़ी के चूल्हों और 'बन्या' (पारंपरिक रूसी सौना) पर निर्भर हैं, इसलिए सरकार वहां के नागरिकों को मुफ्त या बहुत ही मामूली दाम पर लकड़ी काटने का अधिकार देती है।

रूसी कानून के अनुसार, हर नागरिक को अपनी व्यक्तिगत जरूरतों के लिए "मुफ्त" (या बहुत कम प्रशासनिक शुल्क पर) लकड़ी प्राप्त करने का अधिकार है। इस अधिकार के तहत सर्दियों में अपने ​घर को गर्म करने के लिए जलावन या हीटिंगअलाव के लिए हर साल एक निश्चित मात्रा दी जाती है। नया घर बनाने या पुराने की मरम्मत के लिए आमतौर पर हर 10-25 साल में एक बार लकड़ी का एक बड़ा हिस्सा आवंटित किया जाता है। प्रशासन पेड़ों को ऐसे ही नहीं काटने देता, इसके पीछे एक व्यवस्थित प्रक्रिया होती है। पहले ग्रामीण व्यक्ति स्थानीय वन विभाग (Lesnichestvo) में आवेदन करता है। वन अधिकारी जंगल के एक विशेष हिस्से में जाते हैं और उन पेड़ों पर निशान (Marking) लगाते हैं जिन्हें काटा जा सकता है। अक्सर ये वो पेड़ होते हैं जो बूढ़े हो गए हैं या जिन्हें हटाने से जंगल का स्वास्थ्य बेहतर हो सकता है। सरकार केवल पेड़ की 'लकड़ी' आवंटित करती है, उसे काटने और घर तक लाने की जिम्मेदारी ग्रामीण की होती है। उन्हें खुद आरी (Chainsaw) और ट्रैक्टर या घोड़ों का इंतजाम करना पड़ता है। सबसे चुनौतीपूर्ण यही काम होता है। लकड़ी की मात्रा क्षेत्र (Region) और जरूरत के आधार पर अलग-अलग होती है। जैसे ​साइबेरिया जैसे ठंडे इलाकों में जलावन के लिए प्रति परिवार सालाना 15 से 30 क्यूबिक मीटर तक लकड़ी मिल सकती है। ​घर बनाने के लिए यह मात्रा 50 से 100 क्यूबिक मीटर तक हो सकती है। ग्रामीण इस लकड़ी को बेच नहीं सकते। अगर कोई इस आवंटित लकड़ी को बेचते हुए पकड़ा जाता है, तो उसे भारी जुर्माना भरना पड़ता है। रूस का एक बड़ा हिस्सा गैस पाइपलाइनों से नहीं जुड़ा है, और वहां की सर्दियां -30°C से -50°C तक जा सकती हैं। ऐसे में लकड़ी ही जीवन बचाने का एकमात्र साधन है। यह परंपरा सदियों पुरानी है और आज भी वहां के ग्रामीण जीवन का आधार है।

रूस जैसी व्यवस्था दुनिया के कई अन्य देशों और भारत में भी मौजूद है, हालांकि इनके नियम और उद्देश्य स्थानीय जरूरतों और जलवायु के हिसाब से अलग-अलग हैं। रूस में मुख्य जोर "सर्दियों में बचने (Heating)" पर है, जबकि अन्य देशों में यह "आजीविका और पारंपरिक अधिकारों" से अधिक जुड़ा है। स्कैंडिनेवियाई देशो में (जैसे फिनलैंड, स्वीडन और नॉर्वे) रूस जैसी ही ठंड पड़ती है, इसलिए यहाँ "Everyman's Right" (सबका अधिकार) जैसा कानून है। ​यहाँ कोई भी व्यक्ति जंगल से सूखी लकड़ी इकट्ठा कर सकता है। ​हालांकि, अगर किसी को निर्माण के लिए जीवित पेड़ काटना है, तो उसे 'वन प्रबंधन योजना' के तहत अनुमति लेनी पड़ती है। यहाँ के लोग अक्सर निजी वनों के मालिक होते हैं, लेकिन उन पर भी नए पेड़ लगाने की सख्त कानूनी जिम्मेदारी होती है। इसके अलावा कनाडा में स्वदेशी समुदायों (First Nations) के पास पारंपरिक भूमि पर लकड़ी काटने के विशेष अधिकार हैं। वे अपनी सांस्कृतिक जरूरतों और घरों के निर्माण के लिए लकड़ी ले सकते हैं।अलास्का (यूएसए) जैसे क्षेत्रों में आम नागरिकों को "Personal Use Timber Permit" दिया जाता है, जिससे वे अपने घर के उपयोग के लिए एक निश्चित मात्रा में पेड़ काट सकते हैं।

​भारत में भी वनाधिकार अधिनियम (FRA) और 'निस्तार' अधिकार के तहत ग्रामीण और आदिवासी समुदायों के लिए जंगलों से संसाधन प्राप्त करने के कानूनी अधिकार हैं। ​वनाधिकार अधिनियम, 2006 (Forest Rights Act) कानून उन लोगों को अधिकार देता है जो पीढ़ियों से जंगलों में रह रहे हैं। इसके तहत ग्रामीण "लघु वन उपज" (Minor Forest Produce) जैसे बांस, जलावन लकड़ी और फल इकट्ठा कर सकते हैं। निस्तार (Nistar) अधिकार के रूप में भारत के कई राज्यों (जैसे मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़) में 'निस्तार' की पुरानी व्यवस्था है। इसके तहत ग्रामीणों को घर बनाने, खेती के औजार बनाने या अंतिम संस्कार के लिए रियायती दरों पर या मुफ्त में सरकारी डिपो से लकड़ी (Timber) आवंटित की जाती रही है। भारतीय वन अधिनियम के तहत कुछ जंगलों को "ग्राम वन" घोषित किया जाता है, जिनका प्रबंधन ग्राम सभा करती है। यहाँ ग्रामीण अपनी सामूहिक जरूरतों के लिए लकड़ी काट सकते हैं।

यह देखना भी गौरतलब होगा कि पेड़ और वनों से निकलने वाली लकड़ी के युक्तियुक्त प्रबंधन से ग्रामीणों और वहां के निवासियों को इन नीतियों का कितना लाभ मिलता है। निश्चित ही अध्ययन का यह एक अलग विषय हो सकता है।


ब्रजेश कानूनगो 

 

Monday, 16 March 2026

किराए पर पेड़ : पसीना नहीं पैसा मिठास घर तक पहुंचाता है

किराए पर पेड़  : पसीना नहीं पैसा मिठास घर तक पहुंचाता  है

खेती में बटाईदार किसान (Sharecropper) वह व्यक्ति होता है जो किसी दूसरे व्यक्ति की जमीन पर खेती करता है और फसल तैयार होने पर उसका एक निश्चित हिस्सा (बटाई) जमीन के मालिक को देता है। यह व्यवस्था भारत के ग्रामीण इलाकों में सदियों से चली आ रही है लेकिन इन दिनों फलों की फसल के लिए पेड़ किराए पर लेने का नया चलन काफी लोकप्रिय हो रहा है। इसे आमतौर पर 'ट्री एडॉप्शन' (Tree Adoption) या 'पेड़ लीज पर लेना' कहा जाता है। इसमें आप एक निश्चित समय या एक सीजन के लिए पेड़ का किराया देते हैं और उस पेड़ पर लगने वाले सभी फल आपके होते हैं।

परम्परागत बटाईदारी में आमतौर पर जमीन मालिक का निवेश (बीज, खाद) और किसान की मेहनत का एक तालमेल होता है।एक बटाईदार की प्राथमिक जिम्मेदारी जमीन की उत्पादकता बनाए रखना और फसल की सुरक्षा करना होती है।​खेती का सारा प्रबंधन याने जुताई, बुवाई, सिंचाई और निराई-गुड़ाई का पूरा जिम्मा बटाईदार का होता है। लागत की भी बटाई होती है।  क्षेत्र के रिवाजों के अनुसार, बीज, खाद और कीटनाशकों का खर्च या तो बटाईदार उठाता है या मालिक के साथ आधा-आधा बांटता है।​फसल की सुरक्षा हेतु आवारा पशुओं या चोरी से फसल को बचाना बटाईदार का कर्तव्य है। ईमानदारी पूर्ण बंटवारा करना जरूरी होता है।  फसल कटने के बाद तय समझौते (जैसे आधा-आधा या एक-तिहाई) के अनुसार बटाईदार को मालिक का हिस्सा सौंपना होता है।

इसके अलावा कानूनी और सामाजिक रूप से बटाईदारों के कुछ महत्वपूर्ण अधिकार होते हैं, हालांकि ये अलग-अलग राज्यों के भूमि सुधार कानूनों (Land Reform Laws) पर निर्भर करते हैं। ​फसल पर अधिकार के तहत तैयार फसल का एक बड़ा हिस्सा (समझौते के अनुसार) बटाईदार का होता है। मालिक उसे पूरी फसल से बेदखल नहीं कर सकता। उसे ​खेती का अधिकार होता है, यदि कोई लिखित या मौखिक समझौता है, तो मालिक बीच सीजन में किसान को खेत से नहीं हटा सकता। कई राज्यों में 'बटाईदार पंजीकरण' की सुविधा है, जिससे उन्हें किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) या फसल बीमा का लाभ मिल सकता है। यदि फसल खराब होती है, तो बटाईदार को यह अधिकार है कि वह नुकसान के आधार पर मालिक से लगान या हिस्सेदारी में छूट की बात करे।

हाल ही की एक खबर के अनुसार पेड़ किराए पर लेकर हम कम से कम 81% सस्ते ताजा अलफांसो आम प्राप्त कर सकते हैं। यह सेवा किराए पर एक पेड़ (Rent a Tree) नामक एक कृषि-स्टार्टअप द्वारा प्रदान की जा रही है, जो कोची में स्थित है। वे महाराष्ट्र, तमिलनाडु और केरल में 250 एकड़ अलफांसो आम के बागानों का प्रबंधन करते हैं और देश भर में 160 से अधिक ग्राहकों को सेवा प्रदान करते हैं। योजना में अपनी पसंद के अनुसार पेड़ चुन सकते हैं। योजना में तीन श्रेणियों में पेड़ उपलब्ध हैं, जिनकी कीमतें 10,300 रुपये से शुरू होती है। यह सेवा उन लोगों के लिए उपयुक्त है जो आम का आनंद लेना चाहते हैं लेकिन पेड़ की देखभाल करने में असमर्थ हैं। किराए पर एक पेड़( Rent a Tree) संस्थान पेड़ की देखभाल और आम की कटाई का काम संभालता है, जिससे ग्राहकों को ताजा और स्वादिष्ट आम मिलता है ।

दरअसल फलों की फसल के लिए पेड़ या बगीचा किराए पर लेने का चलन हमारे यहां रहा है। इसे आमतौर 'पेड़ लीज पर लेना' कहा जाता है। इसमें आप एक निश्चित समय या एक सीजन के लिए पेड़ या बाग का किराया देते हैं और पेड़ों पर लगने वाले सभी फल आपके होते हैं। ऐसे अनेक फल हैं जिनके पेड़ आमतौर पर  किराए पर मिल जाते हैं। मैंगो याने आम भारत में यह सबसे लोकप्रिय फल है। उत्तर प्रदेश (मलीहाबाद), महाराष्ट्र (रत्नागिरी) और गुजरात के कई बागान मालिक सीजन की शुरुआत में ही पेड़ों की नीलामी करते हैं या उन्हें किराए पर देते हैं। आप एक पेड़ चुन सकते हैं और सीजन खत्म होने तक उसके सारे फल आपके होंगे। ​हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में कई 'ऑर्किड' (फलों के बाग) पर्यटकों और स्थानीय लोगों को सेब के पेड़ किराए पर देते हैं। आप साल भर के लिए पेड़ गोद ले सकते हैं और फसल तैयार होने पर खुद जाकर तोड़ सकते हैं या उन्हें पैक करवाकर मंगवा सकते हैं। महाराष्ट्र और गुजरात के तटीय इलाकों में चीकू और नारियल के बागान अक्सर लंबी अवधि के लिए किराए पर दिए जाते हैं। नागपुर और राजस्थान के कुछ हिस्सों में संतरे के पेड़ों को कॉन्ट्रैक्ट पर लिया जा सकता है। इसमें अक्सर व्यापारी पूरे बाग का ठेका लेते हैं, लेकिन अब व्यक्तिगत स्तर पर भी एक-दो पेड़ किराए पर लेने की सुविधा कुछ फार्महाउस देने लगे हैं। बिहार (मुजफ्फरपुर) और उत्तराखंड में लीची के सीजन (मई-जून) के दौरान पेड़ों को किराए पर लेने का काफी चलन है।

​इस प्रक्रिया में एक ​समझौता (Agreement) किया जाता है जिसमें मालिक को एक निश्चित राशि (Rent) देना होती है। आमतौर पर पेड़ की देखभाल, खाद और पानी की जिम्मेदारी बागान मालिक की ही होती है, लेकिन अनुबंध के आधार पर यह बदल भी सकता है। लीज होल्डर को शुद्ध और ऑर्गेनिक फल मिलते हैं, और यदि अच्छा उत्पादन हो तो अक्सर यह बाजार भाव से सस्ता पड़ता है।  यदि प्राकृतिक आपदा (जैसे ओले या भारी बारिश) से फसल खराब होती है, तो नुकसान किराएदार का होता है।

आम खाने से मतलब जैसी संकुचित बातें भूलकर अब वह समय आ गया है जब हम फलों के उत्पादन, खेती, किसानी, बागवानी और उसके व्यवसाय के बारे में भी थोड़ी सी जानकारी प्राप्त कर उनकी मिठास को और अधिक संतुष्टिदायक बना लें तो कुछ गलत नहीं होगा।


ब्रजेश कानूनगो




Thursday, 12 March 2026

हॉर्मुज जैसे संकरे जलमार्ग सुरक्षित रहना जरूरी

 हॉर्मुज जैसे संकरे जलमार्ग सुरक्षित रहना जरूरी


विश्व में कई महत्वपूर्ण जलडमरूमध्य (Straits) हैं, जो न केवल भौगोलिक दृष्टि से बल्कि सामरिक और व्यापारिक दृष्टिकोण से भी अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। जलडमरूमध्य पानी का वह संकरा मार्ग होता है जो दो बड़े जल निकायों (जैसे समुद्र या महासागर) को जोड़ता है और दो भू-भागों को अलग करता है। जलडमरूमध्यों का विश्व की अर्थ व्यवस्था, यातायात, माल परिवहन, ऊर्जा सुरक्षा और सामरिक दृष्टि से बहुत महत्व होता है।  ये मार्ग वैश्विक समुद्री व्यापार के लिए 'शॉर्टकट' का काम करते हैं। उदाहरण के लिए, मलक्का जलसंधि के बिना जहाजों को हजारों मील का अतिरिक्त चक्कर लगाना पड़ेगा।  हॉर्मुज जैसे जलडमरूमध्य से दुनिया का लगभग 20-30% कच्चा तेल गुजरता है। इनका बंद होना वैश्विक तेल कीमतों में भारी उछाल ला सकता है।  युद्ध की स्थिति में इन संकरे रास्तों पर नियंत्रण रखने वाला देश दुश्मन की आपूर्ति लाइन को काट सकता है। इन्हें वैश्विक अर्थव्यवस्था के 'गले' की तरह देखा जाता है; यहाँ छोटी सी रुकावट भी पूरी दुनिया में मंदी ला सकती है।


इन दिनों ऐसा ही एक जलडमरूमध्य (Straits) हॉर्मुज जलडमरूमध्य वर्तमान में एक बड़े भू-राजनीतिक तनाव के संदर्भ में बहुत चर्चित हुआ है। मार्च 2026 की खबरों के अनुसार, ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने इस मार्ग को असुरक्षित बना दिया है। ईरान ने स्पष्ट किया  कि इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों को ईरानी नौसेना के साथ समन्वय (coordination) करना होगा। ईरान ने अमेरिका और इजरायल समर्थित जहाजों को रोकने या उन पर कड़ी निगरानी रखने की चेतावनी दी है। इसके जवाब में अमेरिका ने इस क्षेत्र में अपने सैन्य अभियान तेज कर दिए हैं।  भारत के लिए भी यह मार्ग अत्यंत संवेदनशील है क्योंकि भारत का अधिकांश तेल आयात यहीं से होता है। हाल ही में भारत सरकार और ईरान के बीच बातचीत हुई है ताकि वहां फंसे भारतीय तेल टैंकरों को सुरक्षित निकाला जा सके। हॉर्मुज से भारत के पश्चिमी तट (जैसे मुंबई या कांडला) तक पहुँचने में जहाजों को औसतन 2 से 3 दिन का समय लगता है। इस विवाद के कारण कच्चे तेल की कीमतें अंतर्राष्ट्रीय बाजार में 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुँच गई , जिसका लाभ रूस जैसे वैकल्पिक निर्यातकों को मिल रहा है।


दरअसल,विश्व के महत्वपूर्ण जलडमरूमध्य (Straits) संकरे समुद्री मार्गों में से मलक्का, हॉर्मुज, बाब-अल-मंडेब और जिब्राल्टर सबसे प्रमुख हैं। ये वैश्विक तेल और वस्तु व्यापार (लगभग 25% मलक्का से) को नियंत्रित करते हैं और समुद्री यात्रा का समय कम करते हैं। भारत के लिए अन्य वैकल्पिक समुद्री मार्गों की बात करें तो मलक्का जलडमरूमध्य इंडोनेशिया और मलेशिया के बीच स्थित है, जो अंडमान सागर और दक्षिण चीन सागर को जोड़ता है। यह दुनिया के सबसे व्यस्त शिपिंग मार्गों में से एक है, जहां से लगभग 25% अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार होता है। सुएज नहर जलमार्ग मिस्र में स्थित है, जो भूमध्य सागर और हिंद महासागर को जोड़ता है। यह भारत के लिए एक महत्वपूर्ण जलमार्ग है, खासकर यूरोप और मध्य पूर्व के साथ व्यापार के लिए। केप ऑफ गुड होप जलमार्ग दक्षिण अफ्रीका में स्थित है, जो अटलांटिक महासागर और हिंद महासागर को जोड़ता है। यह जलमार्ग हार्मुज के अलावा एक वैकल्पिक मार्ग है, लेकिन यह अधिक लंबा और महंगा है। लोम्बोक जलडमरूमध्य इंडोनेशिया में स्थित है, जो जावा सागर और हिंद महासागर को जोड़ता है। यह जलमार्ग मलक्का जलडमरूमध्य के अलावा एक वैकल्पिक मार्ग है। लागत की दृष्टि से ये जलमार्ग हार्मुज की तुलना में अत्यंत महंगे और अधिक दूरी और लंबी यात्रा वाले हैं।


व्यापार और परिवहन के लिए हमेशा छोटे जलमार्ग सुविधाजनक और सस्ते रहते आए हैं। लंबी यात्राओं में समय और दुर्घटनाओं का खतरा हमेशा बना रहता है। मनुष्य ने अपने संघर्षों से इन प्राकृतिक जलडमरूमध्य मार्गों के अलावा पनामा नहर जैसे नए मनुष्य निर्मित जलडमरूमध्य मार्गों का निर्माण किया है। पनामा नहर दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण जलमार्गों में से एक है, जो अटलांटिक महासागर और प्रशांत महासागर को जोड़ती है। यह नहर पनामा देश में स्थित है।  पनामा नहर के निर्माण से पहले, पोत परिवहन में कई दिक्कतें आती थीं। अटलांटिक महासागर से प्रशांत महासागर तक जाने के लिए जहाजों को दक्षिण अमेरिका के दक्षिणी सिरे के चारों ओर जाना पड़ता था, जिसे केप हॉर्न कहा जाता है। यह रास्ता बहुत लंबा और खतरनाक था। इस लंबे रास्ते के कारण, जहाजों को अधिक समय और ईंधन की आवश्यकता होती थी, जिससे परिवहन की लागत बढ़ जाती थी। केप हॉर्न के आसपास का समुद्र बहुत अशांत और खतरनाक था, जिससे जहाजों को दुर्घटना का खतरा रहता था। पनामा नहर बन जाने से अमेरिका के पूर्वी और पश्चिमी तटों के बीच की दूरी इस नहर से होकर गुजरने पर तकरीबन 8000 मील (12,875 कि॰मी॰) घट जाती है क्योंकि इसके न होने की स्थिति में जलपोतों को दक्षिण अमेरिका के हॉर्न अंतरीप से होकर चक्कर लगाते हुए जाना पड़ता था। पनामा नहर को पार करने में जलयानों को अब 8 घंटे का समय लगता है। नहर के माध्यम से जहाजों की आवाजाही से समय और ईंधन की बचत होती है, जिससे परिवहन की लागत कम हो जाती है। जहाजों की आवाजाही अधिक सुरक्षित हुई है, क्योंकि यह रास्ता खतरनाक समुद्रों की हलचलों से भी बचाता है। इसके साथ ही जहाजों की जल्दी आवाजाही से व्यापार और वाणिज्य में वृद्धि हुई है, क्योंकि यह माध्यम दुनिया के विभिन्न हिस्सों के बीच कम समय में सीधा संपर्क प्रदान करता है।


वर्तमान परिस्थितियों में हमारे देश के संदर्भ में हॉर्मुज जलडमरू मध्य जलमार्ग का तेल, गैस आपूर्ति और क्रूड ऑयल आयात में महत्व बहुत बढ़ गया है। खाड़ी देशों  की अशांति न सिर्फ उनके लिए बल्कि संपूर्ण विश्व की अर्थव्यवस्था और आम जनजीवन के लिए चिंताजनक है। 


ब्रजेश कानूनगो


Wednesday, 11 March 2026

जापान की शिंकानसेन और समुद्री सुरंग की सैर

जापान की शिंकानसेन और समुद्री सुरंग की सैर

दुनियाभर की सैर करने वाले घुमक्कड़ जब जापान जाते हैं तो उनके लिए वहां की रेलों के संचालन को देखने,समझने और उनमें यात्रा करने का भी एक बड़ा आकर्षण होता है। खासतौर से जापान की शिंकानसेन (Shinkansen), जिसे दुनिया 'बुलेट ट्रेन' के नाम से जानती है जो केवल अपनी गति के लिए नहीं बल्कि अपनी सुरक्षा और समय की पाबंदी (Punctuality) के लिए भी प्रसिद्ध है, इसमें यात्रा करने का सुख अद्भुत होता है। अनेक यूट्यूबर अपने ट्रेवल वीडियोस में इन पर अपनी बात कहते हुए हमे भी रोमांचित कर देते हैं। 

शिंकानसेन याने बुलेट ट्रेन का चलना विज्ञान और इंजीनियरिंग के कई उन्नत सिद्धांतों पर आधारित है। ​इसकी डिजाइन खास एयरोडायनामिक (Aerodynamics) के अनुसार विकसित की गई है। सामने का हिस्सा (Nose) बहुत लंबा और नुकीला होता है। यह केवल स्टाइल के लिए नहीं है, बल्कि 'पिस्टन इफेक्ट' को कम करने के लिए है। जब ट्रेन संकरी सुरंगों में तेज गति से प्रवेश करती है, तो हवा का दबाव एक तेज़ धमाका (Sonic Boom) पैदा कर सकता है। यह लंबा नाक वाला डिजाइन उस हवा को चीर देता है और शोर को कम करता है। इस ट्रेन से जापान की अंडरवाटर टनल से होकर यात्रा करते हुए किसी भी व्यक्ति का चकित हो जाना स्वाभाविक है। जापान जाने वाले हर ट्रैवलर की विश लिस्ट में यह टनल प्राथमिकता में होती है। दरअसल,जापान की सेइकान टनल (Seikan Tunnel) दुनिया की सबसे गहरी और सबसे लंबी अंडरवाटर रेल सुरंगों में से एक है। यह केवल इंजीनियरिंग का चमत्कार नहीं है, बल्कि इसके पीछे मानवीय संकल्प, बलिदान और विज्ञान की एक अद्भुत गाथा छिपी है।

​1950 के दशक तक, जापान के मुख्य द्वीप होंशू (Honshu) और उत्तरी द्वीप होक्काइडो (Hokkaido) के बीच यात्रा का एकमात्र साधन समुद्री जहाज (Ferry) थे। वर्ष 1954 की एक त्रासदी में 'टोया मारू' (Toya Maru) नाम का एक समुद्री जहाज तूफान में फंसकर डूब गया, जिसमें 1,400 से अधिक लोगों की जान चली गई। इस बड़ी दुर्घटना ने जापानी सरकार को एक ऐसे विकल्प पर विचार करने के लिए मजबूर किया जो मौसम की मार से सुरक्षित हो। इसी के बाद समुद्र के नीचे सुरंग बनाने की योजना ने जन्म लिया। कठिन श्रम और संघर्ष से भरे संकल्प से सेइकान टनल का निर्माण 1964 में शुरू हुआ और इसे पूरा होने में लगभग 24 साल लगे। ​निर्माण के दौरान कठिन परिस्थितियाँ आईं।  खुदाई के दौरान इंजीनियरों को ऐसी चट्टानों का सामना करना पड़ा जो ज्वालामुखी से बनी थीं और बहुत ही अस्थिर थीं। भीतर काम करते हुए समुद्र के पानी का रिसाव एक निरंतर खतरा बना रहता था। इसके बावजूद इस प्रोजेक्ट में हजारों मजदूरों और इंजीनियरों ने दिन-रात काम किया। निर्माण के दौरान कठिन परिस्थितियों और दुर्घटनाओं के कारण 34 श्रमिकों को अपनी जान भी गंवानी पड़ी। अंत में जापानियों ने अपने संकल्प को पूरा कर लिया। 

समुद्र के नीचे ट्रेन चलाना कोई साधारण बात नहीं थी। इसके लिए उस समय की सबसे उन्नत तकनीक का उपयोग किया गया जो इस सुरंग की विशेषताओं के रूप में रिकॉर्ड हो गईं।सुरंग की कुल लंबाई 53.85 किमी है, जिसमें से 23.3 किमी का हिस्सा समुद्र तल के नीचे है। यह समुद्र की सतह से लगभग 240 मीटर नीचे स्थित है। शॉट्रीट तकनीक (Shotcrete) से पानी के रिसाव को रोका गया है, दीवारों पर भारी दबाव के साथ कंक्रीट का छिड़काव किया गया है। जापान एक भूकंप संभावित क्षेत्र है। सुरंग को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह बड़े झटकों को सहन कर सके और पानी का दबाव दीवार को नुकसान न पहुँचाए।

इस सुरंग में 'शिंकानसेन' (बुलेट ट्रेन) और मालगाड़ी दोनों के लिए ट्रैक बिछाए गए हैं। सुरंग के अंदर दो विशेष स्टेशन (तप्पी-कैतेई और योशिओका-कैतेई) बनाए गए हैं। ये स्टेशन यात्रियों के सुरक्षित निकलने के लिए दुनिया के पहले अंडरवाटर स्टेशन रहे। सुरंग के अंदर आर्द्रता और तापमान को नियंत्रित करने के लिए विशाल वेंटिलेशन सिस्टम लगाया गया है। आज यह टनल जापान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। यह होंशू और होक्काइडो के बीच निर्बाध परिवहन सुनिश्चित करती है, जिससे व्यापार और पर्यटन को बढ़ावा मिलता है। 1988 में इसके उद्घाटन के बाद से, इसने जापानी रेलवे को एक नई पहचान दी है। शिंकानसेन सामान्य ट्रेनों के साथ ट्रैक साझा नहीं करती। इसके लिए स्टैंडर्ड गेज (1435 mm) के अलग ट्रैक होते हैं। पटरियों के बीच कोई गैप नहीं होता, जिससे कंपन (Vibration) कम होता है और ट्रेन बिना शोर के 320 किमी/घंटा की रफ्तार पकड़ पाती है। मोड़ों पर पटरियों को एक तरफ थोड़ा झुकाया जाता है (Banking), ताकि ट्रेन बिना गति कम किए सुरक्षित रूप से मुड़ सके। ट्रेन को 25,000 वोल्ट की ओवरहेड लाइनों से बिजली मिलती है। जब ड्राइवर ब्रेक लगाता है, तो मोटरें जनरेटर की तरह काम करने लगती हैं और बिजली पैदा करती हैं, जो वापस ग्रिड में भेज दी जाती है। जापान में भूकंप का खतरा हमेशा रहता है। शिंकानसेन में एक विशेष सेंसर सिस्टम लगा है जो भूकंप के शुरुआती झटकों (P-waves) को महसूस करते ही पूरी बिजली काट देता है और ट्रेनों में ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेक लगा देता है।

एक जानकारी के अनुसार निर्माणाधीन ​भारत का मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल (MAHSR) प्रोजेक्ट काफी हद तक जापान की शिंकानसेन तकनीक पर ही आधारित है।भारत इस प्रोजेक्ट के लिए जापान की 'E5 सीरीज' शिंकानसेन तकनीक का उपयोग कर रहा है। भारत में भी वही भूकंप सुरक्षा और ऑटोमैटिक ट्रेन कंट्रोल सिस्टम (ATC) लागू किया जा रहा है जो जापान में है।ट्रेनों का लुक और उनकी आंतरिक संरचना लगभग जापान की बुलेट ट्रेनों जैसी ही होगी। भारत के इस 508 किमी लंबे रूट में ठाणे के पास समुद्र के नीचे 21 किमी लंबी सुरंग बनाई जा रही है, जो जापान की सेइकान टनल जैसी इंजीनियरिंग का उदाहरण होगी। भारत में पहली बार 'जे-स्लैब' (J-Slab) ट्रैक सिस्टम का उपयोग हो रहा है, जिसमें पत्थर (Ballast) नहीं होते, बल्कि कंक्रीट के स्लैब पर पटरी बिछाई जाती है। भारत की गर्मी और धूल भरी परिस्थितियों को देखते हुए  तदनुसार ट्रेनों के एयर कंडीशनिंग और वेंटिलेशन सिस्टम में भी विशेष बदलाव किए जा रहे हैं।

बुलेट ट्रेन तकनीक को अपनाने के साथ संकल्पों को पूरा करने में जापानियों के संघर्ष, लगन और जुझारूपन को भी निश्चित ही आत्मसात करना हमारे लिए कम महत्वपूर्ण नहीं होगा। 


ब्रजेश कानूनगो 




Monday, 9 March 2026

डीसैलिनेशन प्लांट : जो समुद्र के पानी को पेयजल में बदलते हैं

डीसैलिनेशन प्लांट : जो समुद्र के पानी को पेयजल में बदलते हैं

जब ईरान के खिलाफ इजरायल और अमेरिका की जंग लगातार बढ़ती गई तो दोनों ही खेमों का निशाना तेल और मिसाइल से आगे बढ़कर पानी तक पहुंच गया। ऐसे में डीसैलिनेशन प्लांट  (विलवणीकरण संयंत्र) यानी जल शुद्धिकरण संयंत्र को टार्गेट किया जाने लगा तो हमारा ध्यान इस बात की ओर गया कि विश्व के अनेक देशों में जहां शुद्ध पेयजल की कमी है वहां बड़े पैमाने पर समुद्र के खारे जल को परिष्कृत करने के लिए पीने के पानी में बदला जा रहा है।

समुद्र के खारे पानी को पीने योग्य बनाना (Desalination) आज के समय में जल संकट से निपटने का एक क्रांतिकारी तरीका बन गया है। दुनिया के कई देश अपनी पानी की जरूरत का एक बड़ा हिस्सा इसी तकनीक से पूरा कर रहे हैं। वर्तमान में दुनिया भर में हजारों डिसेलिनेशन प्लांट काम कर रहे हैं। कुछ प्रमुख देशों ने बड़े पैमाने पर यह तकनीक अपनाई है। सऊदी अरब दुनिया का सबसे बड़ा समुद्री जल शोधक देश है। यहाँ के पानी की लगभग 50% से अधिक आपूर्ति इसी माध्यम से होती है। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के दुबई और अबू धाबी जैसे शहर लगभग पूरी तरह से शोधित समुद्री पानी पर निर्भर हैं। ​इजराइल अपनी उन्नत तकनीक के कारण इजराइल अपनी घरेलू पानी की जरूरत का करीब 75% हिस्सा समुद्र से प्राप्त करता है। कुवैत, कतर, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका (विशेषकर कैलिफोर्निया) और भारत (चेन्नई और गुजरात में कुछ बड़े प्लांट) भी इस तकनीक का बड़े पैमाने पर उपयोग कर रहे हैं।

एक खबर के अनुसार युद्ध के दौरान अमेरिका ने ईरान के केश्म द्वीप के वॉटर प्लांट पर हमला करके उसके 30 गांवों को प्यासा कर दिया। जवाब में ईरान ने भी टार्गेट बदलते हुए बहरीन में वॉटर डिसेलिनेशन प्लांट को निशाना बनाया। विशेषज्ञों और समाजशास्त्रियों का  मानना है कि ये प्लांट्स यहां के जनजीवन के लिए सर्वोच्च महत्व के संयंत्र हैं।  इनके ऊपर हमला होना इस पूरे क्षेत्र के जीवन के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। अगर इन प्लांट्स पर आगे भी हमला जारी रहे या साइबर अटैक हो या पानी दूषित कर दिया जाए तो यह सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं होगा बल्कि इससे पूरे खाड़ी क्षेत्र में मानव सुरक्षा का गंभीर संकट संभावित हो सकता है। इसका मतलब है कि अगर इन प्लांट्स को नुकसान हुआ तो शहरों की रोजमर्रा की जिंदगी तुरंत ठप हो सकती है।

बहरहाल, अब समझते हैं कि वाटर डीसैलिनेशन प्लांट कैसे काम करते हैं। दरअसल ​समुद्र के पानी से नमक अलग करने की मुख्य रूप से दो वैज्ञानिक विधियां सबसे अधिक प्रचलित हैं। जिनमें से पहली है रिवर्स ऑस्मोसिस (Reverse Osmosis - RO) जो सबसे आधुनिक और ऊर्जा-कुशल तकनीक है। इसमें समुद्र के पानी को बहुत उच्च दबाव (High Pressure) पर एक 'अर्ध-पारगम्य झिल्ली' (Semi-permeable Membrane) से गुजारा जाता है। यह झिल्ली इतनी सूक्ष्म होती है कि इसमें से पानी के अणु तो निकल जाते हैं, लेकिन नमक और अन्य अशुद्धियाँ पीछे रह जाती हैं।

डिसेलिनेशन की दूसरी विधि है थर्मल डिसेलिनेशन (Thermal Desalination) ​इसमें 'वाष्पीकरण' (Evaporation) के सिद्धांत पर काम होता है। पानी को गर्म करके भाप बनाई जाती है, जिससे नमक नीचे बैठ जाता है। फिर उस भाप को ठंडा (Condensation) करके शुद्ध पानी के रूप में इकट्ठा कर लिया जाता है। मध्य पूर्व के देशों में, जहाँ ऊर्जा सस्ती है, वहां इस तकनीक का काफी उपयोग होता है।

​डीसैलिनेशन प्रक्रिया केवल नमक हटाने तक सीमित नहीं है, इसमें कई महत्वपूर्ण चरण होते हैं। ​प्री-ट्रीटमेंट (Pre-treatment) के तहत समुद्र से लिए गए पानी से पहले कचरा, रेत और शैवाल (Algae) को छाना जाता है ताकि मुख्य झिल्ली (Membrane) खराब न हो। फिर होता है ​डिसेलिनेशन (Desalination) जिसके अंतर्गत  RO या थर्मल तकनीक के जरिए नमक को अलग किया जाता है। बाद में ​पोस्ट-ट्रीटमेंट (Post-treatment) में शुद्ध किए गए पानी का स्वाद बेहतर करने और उसे स्वास्थ्यवर्धक बनाने के लिए इसमें जरूरी खनिज (Minerals) जैसे कैल्शियम और मैग्नीशियम मिलाए जाते हैं। तत्पश्चात ​अपशिष्ट निपटान (Brine Disposal) के दौरान बचा हुआ अत्यधिक खारा पानी (Brine) वापस समुद्र में सावधानीपूर्वक विसर्जित किया जाता है।

एक भारतीय व्यक्ति होने के नाते आम जिज्ञासा सहज है कि अपने देश में समुद्र के पानी से पेय जल बनाने की दिशा में क्या कुछ कार्य किया गया है। ​भारत में मुख्य रूप से तमिलनाडु और गुजरात में सबसे बड़े और प्रभावी प्लांट स्थित हैं। यहाँ के पानी का उपयोग और वितरण (Usage and Distribution) मुख्य रूप से दो श्रेणियों में किया जाता है।  घरेलू और औद्योगिक क्षेत्रों के लिए।  चेन्नई में CMWSSB(Metrowatrer) पाइपलाइनों के माध्यम से इस पानी को घरों तक पहुँचाता है।  दक्षिण और उत्तर चेन्नई के लगभग 30-40 लाख लोग अपनी दैनिक जरूरतों के लिए इसी पर निर्भर हैं। भविष्य में 'पेरूर प्लांट' के पूरा होने पर यह संख्या और बढ़ जाएगी। ​लक्षद्वीप में छोटे LTTD (Low Temperature Thermal Desalination) प्लांट लगे हैं, जो द्वीपों पर रहने वाले समुदायों को मीठा पानी प्रदान करते हैं।

औद्योगिक उपयोग (Industrial Water) के अंतर्गत ​गुजरात के दहेज (Dahej) और जामनगर जैसे क्षेत्रों में पानी का उपयोग बड़ी कंपनियों द्वारा किया जाता है।  गुजरात औद्योगिक विकास निगम (GIDC) दहेज में स्थित पेट्रोलियम और केमिकल कंपनियों को पानी की आपूर्ति करता है। यह बहुत महत्वपूर्ण पक्ष है कि उद्योगों को समुद्र का पानी देने से खेती और पीने के लिए इस्तेमाल होने वाले ताजे पानी यानि नदियों के पानी की  बचत होती है।

डीसैलिनेशन प्रक्रिया को भारत के राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान (NIOT) ने भी विकसित किया है। यह तकनीक समुद्र की सतह और गहराई के पानी के तापमान के अंतर का उपयोग करती है। यह लक्षद्वीप के लिए वरदान साबित हुई है।

भारत जैसे देश के लिए  डीसैलिनेशन  के क्षेत्र में ​कुछ चुनौतियां भी हैं इस प्रक्रिया में मसलन इसकी लागत बहुत अधिक होती है, पाइपलाइन से आने वाले साधारण पानी की तुलना में डिसेलिनेशन का पानी 3 से 4 गुना महंगा हो जाता है।

इसके अलावा पर्यावरणीय दृष्टि से समुद्र से पानी निकालने के बाद बचा हुआ ब्राइन (अत्यधिक खारा घोल) वापस समुद्र में डालने से समुद्री जीवों को नुकसान पहुँच सकता है, जिसे कम करने के लिए भारत में 'मल्टी-डिस्कस' तकनीक पर काम किया जा रहा है। ​महाराष्ट्र (मुंबई के मनोरी में प्रस्तावित) और आंध्र प्रदेश जैसे राज्य भी अब इस दिशा में बड़े कदम उठा रहे हैं।

ब्रजेश कानूनगो 


Monday, 23 February 2026

चिचेन इत्ज़ा : जहाँ माया सभ्यता का पक्षी चहचहाता है

चिचेन इत्ज़ा : जहाँ माया सभ्यता का पक्षी चहचहाता है

वर्ष 2007 में जब आधुनिक विश्व के 7 अजूबे (New 7 Wonders) चुने गए, उनमें चीन की महान दीवार, पेट्रा (जॉर्डन), कोलोसियम (इटली), चिचेन इत्ज़ा (मेक्सिको), माचू पिचू (पेरू), ताजमहल (भारत) और क्राइस्ट द रिडीमर (ब्राजील) शामिल किया गया। ये अद्भुत संरचनाएं मानव कला और इतिहास का समुचित प्रतिनिधित्व करती हैं।

दुनिया घूमने निकले हर घुमक्कड़ की यह ख्वाहिश होती है कि वह इन अद्भुत स्थलों और धरोहरों की सैर करके कीर्तिमान बनाए और गौरवान्वित हो सके। हमने भी दुनिया की आभासी सैर के क्रम में कई ट्रेवलरों के वीडियोस में इन स्थलों के नजारे देखे हैं और उन संरचनाओं के इतिहास, समाज और इनके पीछे के विज्ञान को समझने की कोशिश की है। 

पिछले दिनों हमने इंडोट्रेकर यूट्यूब चैनल के कैलाश मीणा के साथ मेक्सिको के इन क्षेत्रों की आभासी यात्रा की और चिचेन इत्ज़ा को नजदीक से देखा समझा। एल कास्टिलो (कुल्कुलकन का पिरामिड)  चिचेन इत्ज़ा की सबसे प्रसिद्ध संरचना है। यह एक विशाल सीढ़ीदार पिरामिड है जो माया सभ्यता के देवता 'कुल्कुलकन' (पंखों वाले सांप) को समर्पित है। यह स्थापत्य  ​गणित के एक चमत्कार जैसा है। पिरामिड के चारों तरफ 91 सीढ़ियाँ हैं। अगर हम चारों तरफ की सीढ़ियों को जोड़ें और ऊपर के चबूतरे को मिलाएँ, तो कुल 365 का योग होता है। जो एक सौर वर्ष के बराबर हो जाता है। हर साल वसंत (March) और शरद (September) के दौरान, डूबते सूरज की रोशनी पिरामिड की सीढ़ियों पर एक ऐसी छाया बनाती है जो नीचे की ओर रेंगते हुए सांप जैसी दिखती है। यह अद्भुत  छाया का खेल (Equinox) माया लोगों के सटीक खगोल विज्ञान का प्रमाण है।

सबसे मजेदार बात हमने यह देखी कि चिचेन इत्ज़ा के कुकुलकन पिरामिड (El Castillo) के सामने खड़े होकर ताली बजाने पर 'क्विज़टल' (Quetzal) पक्षी जैसी चहचहाहट की आवाज आती है। इसके पीछे का वैज्ञानिक कारण समझने पर पता चलता है कि ध्वनि विवर्तन (Sound Diffraction) और प्रतिध्वनि (Echoes) के कारण ऐसा होता है। पिरामिड की 91 सीढ़ियों की ज्यामिति के कारण ताली की ध्वनि अलग-अलग समय पर परावर्तित होकर एक उच्च-आवृत्ति (high-frequency) चहचहाहट में बदल जाती है। 

दरअसल, पिरामिड की सीढ़ियाँ एक विवर्तन ग्रेटिंग की तरह काम करती हैं, जो ध्वनि तरंगों को फैलाती हैं, जब ताली बजाई जाती है, तो ध्वनि की लहरें हर सीढ़ी से टकराकर वापस आती हैं। चूँकि सीढ़ियाँ नीचे से ऊपर की ओर समान दूरी पर हैं, इसलिए ध्वनि तरंगों को वापस लौटने में थोड़ा अलग समय लगता है, जिससे यह एक चहचहाहट की तरह सुनाई देती है। यह गूंज माया सभ्यता के पवित्र 'क्विज़टल' पक्षी की आवाज से मिलती-जुलती है, जो शायद माया इंजीनियरों द्वारा जानबूझकर बनाई गई थी।यद्यपि पर्यटकों को सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर जाने की इजाजत नहीं है लेकिन बताया जाता है कि सीढ़ियों पर चढ़ने से होने वाली आवाज पानी से भरी बाल्टी में बारिश की बूंदें गिरने जैसी सुनाई देती है। यह कोई जादुई घटना नहीं, बल्कि प्राचीन माया सभ्यता की उन्नत इंजीनियरिंग और ध्वनि विज्ञान (Acoustics) का एक अद्भुत उदाहरण है। 

​​माया सभ्यता केवल एक साम्राज्य नहीं थी, बल्कि स्वतंत्र नगर-राज्यों का एक समूह थी जो मुख्य रूप से दक्षिणी मेक्सिको, ग्वाटेमाला और बेलीज के क्षेत्रों में फैली हुई थी। सभ्यता के ​स्वर्ण युग (250 ईस्वी - 900 ईस्वी) के दौरान माया लोगों ने गणित, खगोल विज्ञान और वास्तुकला में महारत हासिल कर ली थी ।  कहा जाता है कि अंक गणित में शून्य का आविष्कार भारत में हुआ,  5 वीं शताब्दी में महान भारतीय गणितज्ञ आर्यभट्ट ने इसका उपयोग किया और 7 वीं शताब्दी में ब्रह्मगुप्त ने इसे एक संख्या के रूप में परिभाषित किया।  बाद में शून्य की अवधारणा भारत से अरब और फिर यूरोप तक फैलती गई। माया सभ्यता ने भी स्वतंत्र रूप से शून्य को एक स्थान-धारक (placeholder) के रूप में प्रयोग किया था, लेकिन उनका उपयोग मुख्य रूप से कैलेंडर और ज्योतिष के लिए था, न कि आधुनिक अंकगणित के लिए।  माया लोगों ने इस पर आधारित एक सटीक कैलेंडर भी बनाया। 10 वीं शताब्दी के आसपास, माया लोगों ने अपने बड़े शहरों (जैसे टिकल और पलाेंके) को छोड़ दिया। इसके पीछे सूखे, युद्ध या संसाधनों की कमी जैसे कारण माने जाते हैं।  16वीं शताब्दी में स्पेनिश आक्रमणकारियों के आने से मेक्सिको के इतिहास का रुख बदल गया, जिससे स्वदेशी और यूरोपीय संस्कृतियों का मिश्रण हुआ।

​माया लोगों की जीवनशैली प्रकृति और आध्यात्मिकता से गहराई से जुड़ी थी। मक्का (Corn) उनकी जीवनरेखा थी। वे मानते थे कि देवताओं ने मनुष्य को मक्के से बनाया है। टॉरटिला, बीन्स, मिर्च और चॉकलेट (जिसे वे 'देवताओं का पेय' मानते थे) आज भी मेक्सिको के मुख्य भोजन हैं।

माया लोग कुशल खगोलशास्त्री थे। उनके मंदिर और पिरामिड सितारों और ग्रहों की स्थिति के अनुसार बनाए गए थे। उनकी बुनाई की कला (Huipil), मिट्टी के बर्तन और पत्थर की नक्काशी आज भी मेक्सिको के बाजारों में खूब देखी जा सकती है।

​पर्यटन की दृष्टि से, मेक्सिको "टाइम ट्रैवल" जैसा अनुभव देता है। प्राचीन समय के जीवन दर्शन और इतिहास की खुशबू यहाँ महसूस की जा सकती है। चिचेन इत्ज़ा (Chichen Itza) के पिरामिड के अलावा  ​ग्रेट बॉल कोर्ट (The Great Ball Court) प्राचीन मेसोअमेरिका का सबसे बड़ा खेल का मैदान है। यहाँ 'पोक-ता-पोक' (Pok-ta-pok) खेल खेला जाता था। आश्चर्य की बात यह है कि यहाँ की ध्वनिकी (Acoustics) इतनी सटीक है कि कोर्ट के एक छोर पर की गई फुसफुसाहट दूसरे छोर पर साफ सुनी जा सकती है।​ एल काराकोल (The Observatory), गोल गुंबद वाली वेधशाला है, माया खगोल शास्त्री यहाँ से शुक्र और चंद्रमा की गति पर नज़र रखते थे।​ योद्धाओं का मंदिर (Temple of the Warriors) में सैकड़ों स्तंभ हैं जिन पर योद्धाओं की नक्काशी की गई है।  पवित्र सेनोट (Sacred Cenote) ​चिचेन इत्ज़ा के पास एक विशाल प्राकृतिक चूना पत्थर का जलकुंड है। माया लोग इसे वर्षा के देवता 'चाक' (Chaac) का निवास स्थान मानते थे। सूखे के समय यहाँ देवताओं को खुश करने के लिए कीमती वस्तुओं (सोना, जेड) और कभी-कभी प्राणियों की बलि भी भेंट दी जाती थी।

मेक्सिको का इतिहास और माया सभ्यता (Maya Civilization) दुनिया की सबसे समृद्ध और रहस्यमयी विरासतों में से एक है। यह केवल प्राचीन खंडहरों के बारे में नहीं है, बल्कि एक जीवित संस्कृति है जो आज भी आधुनिक मेक्सिको की धड़कन में महसूस की जा सकती है।


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