Wednesday, 11 March 2026

जापान की शिंकानसेन और समुद्री सुरंग की सैर

जापान की शिंकानसेन और समुद्री सुरंग की सैर

दुनियाभर की सैर करने वाले घुमक्कड़ जब जापान जाते हैं तो उनके लिए वहां की रेलों के संचालन को देखने,समझने और उनमें यात्रा करने का भी एक बड़ा आकर्षण होता है। खासतौर से जापान की शिंकानसेन (Shinkansen), जिसे दुनिया 'बुलेट ट्रेन' के नाम से जानती है जो केवल अपनी गति के लिए नहीं बल्कि अपनी सुरक्षा और समय की पाबंदी (Punctuality) के लिए भी प्रसिद्ध है, इसमें यात्रा करने का सुख अद्भुत होता है। अनेक यूट्यूबर अपने ट्रेवल वीडियोस में इन पर अपनी बात कहते हुए हमे भी रोमांचित कर देते हैं। 

शिंकानसेन याने बुलेट ट्रेन का चलना विज्ञान और इंजीनियरिंग के कई उन्नत सिद्धांतों पर आधारित है। ​इसकी डिजाइन खास एयरोडायनामिक (Aerodynamics) के अनुसार विकसित की गई है। सामने का हिस्सा (Nose) बहुत लंबा और नुकीला होता है। यह केवल स्टाइल के लिए नहीं है, बल्कि 'पिस्टन इफेक्ट' को कम करने के लिए है। जब ट्रेन संकरी सुरंगों में तेज गति से प्रवेश करती है, तो हवा का दबाव एक तेज़ धमाका (Sonic Boom) पैदा कर सकता है। यह लंबा नाक वाला डिजाइन उस हवा को चीर देता है और शोर को कम करता है। इस ट्रेन से जापान की अंडरवाटर टनल से होकर यात्रा करते हुए किसी भी व्यक्ति का चकित हो जाना स्वाभाविक है। जापान जाने वाले हर ट्रैवलर की विश लिस्ट में यह टनल प्राथमिकता में होती है। दरअसल,जापान की सेइकान टनल (Seikan Tunnel) दुनिया की सबसे गहरी और सबसे लंबी अंडरवाटर रेल सुरंगों में से एक है। यह केवल इंजीनियरिंग का चमत्कार नहीं है, बल्कि इसके पीछे मानवीय संकल्प, बलिदान और विज्ञान की एक अद्भुत गाथा छिपी है।

​1950 के दशक तक, जापान के मुख्य द्वीप होंशू (Honshu) और उत्तरी द्वीप होक्काइडो (Hokkaido) के बीच यात्रा का एकमात्र साधन समुद्री जहाज (Ferry) थे। वर्ष 1954 की एक त्रासदी में 'टोया मारू' (Toya Maru) नाम का एक समुद्री जहाज तूफान में फंसकर डूब गया, जिसमें 1,400 से अधिक लोगों की जान चली गई। इस बड़ी दुर्घटना ने जापानी सरकार को एक ऐसे विकल्प पर विचार करने के लिए मजबूर किया जो मौसम की मार से सुरक्षित हो। इसी के बाद समुद्र के नीचे सुरंग बनाने की योजना ने जन्म लिया। कठिन श्रम और संघर्ष से भरे संकल्प से सेइकान टनल का निर्माण 1964 में शुरू हुआ और इसे पूरा होने में लगभग 24 साल लगे। ​निर्माण के दौरान कठिन परिस्थितियाँ आईं।  खुदाई के दौरान इंजीनियरों को ऐसी चट्टानों का सामना करना पड़ा जो ज्वालामुखी से बनी थीं और बहुत ही अस्थिर थीं। भीतर काम करते हुए समुद्र के पानी का रिसाव एक निरंतर खतरा बना रहता था। इसके बावजूद इस प्रोजेक्ट में हजारों मजदूरों और इंजीनियरों ने दिन-रात काम किया। निर्माण के दौरान कठिन परिस्थितियों और दुर्घटनाओं के कारण 34 श्रमिकों को अपनी जान भी गंवानी पड़ी। अंत में जापानियों ने अपने संकल्प को पूरा कर लिया। 

समुद्र के नीचे ट्रेन चलाना कोई साधारण बात नहीं थी। इसके लिए उस समय की सबसे उन्नत तकनीक का उपयोग किया गया जो इस सुरंग की विशेषताओं के रूप में रिकॉर्ड हो गईं।सुरंग की कुल लंबाई 53.85 किमी है, जिसमें से 23.3 किमी का हिस्सा समुद्र तल के नीचे है। यह समुद्र की सतह से लगभग 240 मीटर नीचे स्थित है। शॉट्रीट तकनीक (Shotcrete) से पानी के रिसाव को रोका गया है, दीवारों पर भारी दबाव के साथ कंक्रीट का छिड़काव किया गया है। जापान एक भूकंप संभावित क्षेत्र है। सुरंग को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह बड़े झटकों को सहन कर सके और पानी का दबाव दीवार को नुकसान न पहुँचाए।

इस सुरंग में 'शिंकानसेन' (बुलेट ट्रेन) और मालगाड़ी दोनों के लिए ट्रैक बिछाए गए हैं। सुरंग के अंदर दो विशेष स्टेशन (तप्पी-कैतेई और योशिओका-कैतेई) बनाए गए हैं। ये स्टेशन यात्रियों के सुरक्षित निकलने के लिए दुनिया के पहले अंडरवाटर स्टेशन रहे। सुरंग के अंदर आर्द्रता और तापमान को नियंत्रित करने के लिए विशाल वेंटिलेशन सिस्टम लगाया गया है। आज यह टनल जापान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। यह होंशू और होक्काइडो के बीच निर्बाध परिवहन सुनिश्चित करती है, जिससे व्यापार और पर्यटन को बढ़ावा मिलता है। 1988 में इसके उद्घाटन के बाद से, इसने जापानी रेलवे को एक नई पहचान दी है। शिंकानसेन सामान्य ट्रेनों के साथ ट्रैक साझा नहीं करती। इसके लिए स्टैंडर्ड गेज (1435 mm) के अलग ट्रैक होते हैं। पटरियों के बीच कोई गैप नहीं होता, जिससे कंपन (Vibration) कम होता है और ट्रेन बिना शोर के 320 किमी/घंटा की रफ्तार पकड़ पाती है। मोड़ों पर पटरियों को एक तरफ थोड़ा झुकाया जाता है (Banking), ताकि ट्रेन बिना गति कम किए सुरक्षित रूप से मुड़ सके। ट्रेन को 25,000 वोल्ट की ओवरहेड लाइनों से बिजली मिलती है। जब ड्राइवर ब्रेक लगाता है, तो मोटरें जनरेटर की तरह काम करने लगती हैं और बिजली पैदा करती हैं, जो वापस ग्रिड में भेज दी जाती है। जापान में भूकंप का खतरा हमेशा रहता है। शिंकानसेन में एक विशेष सेंसर सिस्टम लगा है जो भूकंप के शुरुआती झटकों (P-waves) को महसूस करते ही पूरी बिजली काट देता है और ट्रेनों में ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेक लगा देता है।

एक जानकारी के अनुसार निर्माणाधीन ​भारत का मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल (MAHSR) प्रोजेक्ट काफी हद तक जापान की शिंकानसेन तकनीक पर ही आधारित है।भारत इस प्रोजेक्ट के लिए जापान की 'E5 सीरीज' शिंकानसेन तकनीक का उपयोग कर रहा है। भारत में भी वही भूकंप सुरक्षा और ऑटोमैटिक ट्रेन कंट्रोल सिस्टम (ATC) लागू किया जा रहा है जो जापान में है।ट्रेनों का लुक और उनकी आंतरिक संरचना लगभग जापान की बुलेट ट्रेनों जैसी ही होगी। भारत के इस 508 किमी लंबे रूट में ठाणे के पास समुद्र के नीचे 21 किमी लंबी सुरंग बनाई जा रही है, जो जापान की सेइकान टनल जैसी इंजीनियरिंग का उदाहरण होगी। भारत में पहली बार 'जे-स्लैब' (J-Slab) ट्रैक सिस्टम का उपयोग हो रहा है, जिसमें पत्थर (Ballast) नहीं होते, बल्कि कंक्रीट के स्लैब पर पटरी बिछाई जाती है। भारत की गर्मी और धूल भरी परिस्थितियों को देखते हुए  तदनुसार ट्रेनों के एयर कंडीशनिंग और वेंटिलेशन सिस्टम में भी विशेष बदलाव किए जा रहे हैं।

बुलेट ट्रेन तकनीक को अपनाने के साथ संकल्पों को पूरा करने में जापानियों के संघर्ष, लगन और जुझारूपन को भी निश्चित ही आत्मसात करना हमारे लिए कम महत्वपूर्ण नहीं होगा। 


ब्रजेश कानूनगो 




Monday, 9 March 2026

डीसैलिनेशन प्लांट : जो समुद्र के पानी को पेयजल में बदलते हैं

डीसैलिनेशन प्लांट : जो समुद्र के पानी को पेयजल में बदलते हैं

जब ईरान के खिलाफ इजरायल और अमेरिका की जंग लगातार बढ़ती गई तो दोनों ही खेमों का निशाना तेल और मिसाइल से आगे बढ़कर पानी तक पहुंच गया। ऐसे में डीसैलिनेशन प्लांट  (विलवणीकरण संयंत्र) यानी जल शुद्धिकरण संयंत्र को टार्गेट किया जाने लगा तो हमारा ध्यान इस बात की ओर गया कि विश्व के अनेक देशों में जहां शुद्ध पेयजल की कमी है वहां बड़े पैमाने पर समुद्र के खारे जल को परिष्कृत करने के लिए पीने के पानी में बदला जा रहा है।

समुद्र के खारे पानी को पीने योग्य बनाना (Desalination) आज के समय में जल संकट से निपटने का एक क्रांतिकारी तरीका बन गया है। दुनिया के कई देश अपनी पानी की जरूरत का एक बड़ा हिस्सा इसी तकनीक से पूरा कर रहे हैं। वर्तमान में दुनिया भर में हजारों डिसेलिनेशन प्लांट काम कर रहे हैं। कुछ प्रमुख देशों ने बड़े पैमाने पर यह तकनीक अपनाई है। सऊदी अरब दुनिया का सबसे बड़ा समुद्री जल शोधक देश है। यहाँ के पानी की लगभग 50% से अधिक आपूर्ति इसी माध्यम से होती है। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के दुबई और अबू धाबी जैसे शहर लगभग पूरी तरह से शोधित समुद्री पानी पर निर्भर हैं। ​इजराइल अपनी उन्नत तकनीक के कारण इजराइल अपनी घरेलू पानी की जरूरत का करीब 75% हिस्सा समुद्र से प्राप्त करता है। कुवैत, कतर, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका (विशेषकर कैलिफोर्निया) और भारत (चेन्नई और गुजरात में कुछ बड़े प्लांट) भी इस तकनीक का बड़े पैमाने पर उपयोग कर रहे हैं।

एक खबर के अनुसार युद्ध के दौरान अमेरिका ने ईरान के केश्म द्वीप के वॉटर प्लांट पर हमला करके उसके 30 गांवों को प्यासा कर दिया। जवाब में ईरान ने भी टार्गेट बदलते हुए बहरीन में वॉटर डिसेलिनेशन प्लांट को निशाना बनाया। विशेषज्ञों और समाजशास्त्रियों का  मानना है कि ये प्लांट्स यहां के जनजीवन के लिए सर्वोच्च महत्व के संयंत्र हैं।  इनके ऊपर हमला होना इस पूरे क्षेत्र के जीवन के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। अगर इन प्लांट्स पर आगे भी हमला जारी रहे या साइबर अटैक हो या पानी दूषित कर दिया जाए तो यह सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं होगा बल्कि इससे पूरे खाड़ी क्षेत्र में मानव सुरक्षा का गंभीर संकट संभावित हो सकता है। इसका मतलब है कि अगर इन प्लांट्स को नुकसान हुआ तो शहरों की रोजमर्रा की जिंदगी तुरंत ठप हो सकती है।

बहरहाल, अब समझते हैं कि वाटर डीसैलिनेशन प्लांट कैसे काम करते हैं। दरअसल ​समुद्र के पानी से नमक अलग करने की मुख्य रूप से दो वैज्ञानिक विधियां सबसे अधिक प्रचलित हैं। जिनमें से पहली है रिवर्स ऑस्मोसिस (Reverse Osmosis - RO) जो सबसे आधुनिक और ऊर्जा-कुशल तकनीक है। इसमें समुद्र के पानी को बहुत उच्च दबाव (High Pressure) पर एक 'अर्ध-पारगम्य झिल्ली' (Semi-permeable Membrane) से गुजारा जाता है। यह झिल्ली इतनी सूक्ष्म होती है कि इसमें से पानी के अणु तो निकल जाते हैं, लेकिन नमक और अन्य अशुद्धियाँ पीछे रह जाती हैं।

डिसेलिनेशन की दूसरी विधि है थर्मल डिसेलिनेशन (Thermal Desalination) ​इसमें 'वाष्पीकरण' (Evaporation) के सिद्धांत पर काम होता है। पानी को गर्म करके भाप बनाई जाती है, जिससे नमक नीचे बैठ जाता है। फिर उस भाप को ठंडा (Condensation) करके शुद्ध पानी के रूप में इकट्ठा कर लिया जाता है। मध्य पूर्व के देशों में, जहाँ ऊर्जा सस्ती है, वहां इस तकनीक का काफी उपयोग होता है।

​डीसैलिनेशन प्रक्रिया केवल नमक हटाने तक सीमित नहीं है, इसमें कई महत्वपूर्ण चरण होते हैं। ​प्री-ट्रीटमेंट (Pre-treatment) के तहत समुद्र से लिए गए पानी से पहले कचरा, रेत और शैवाल (Algae) को छाना जाता है ताकि मुख्य झिल्ली (Membrane) खराब न हो। फिर होता है ​डिसेलिनेशन (Desalination) जिसके अंतर्गत  RO या थर्मल तकनीक के जरिए नमक को अलग किया जाता है। बाद में ​पोस्ट-ट्रीटमेंट (Post-treatment) में शुद्ध किए गए पानी का स्वाद बेहतर करने और उसे स्वास्थ्यवर्धक बनाने के लिए इसमें जरूरी खनिज (Minerals) जैसे कैल्शियम और मैग्नीशियम मिलाए जाते हैं। तत्पश्चात ​अपशिष्ट निपटान (Brine Disposal) के दौरान बचा हुआ अत्यधिक खारा पानी (Brine) वापस समुद्र में सावधानीपूर्वक विसर्जित किया जाता है।

एक भारतीय व्यक्ति होने के नाते आम जिज्ञासा सहज है कि अपने देश में समुद्र के पानी से पेय जल बनाने की दिशा में क्या कुछ कार्य किया गया है। ​भारत में मुख्य रूप से तमिलनाडु और गुजरात में सबसे बड़े और प्रभावी प्लांट स्थित हैं। यहाँ के पानी का उपयोग और वितरण (Usage and Distribution) मुख्य रूप से दो श्रेणियों में किया जाता है।  घरेलू और औद्योगिक क्षेत्रों के लिए।  चेन्नई में CMWSSB(Metrowatrer) पाइपलाइनों के माध्यम से इस पानी को घरों तक पहुँचाता है।  दक्षिण और उत्तर चेन्नई के लगभग 30-40 लाख लोग अपनी दैनिक जरूरतों के लिए इसी पर निर्भर हैं। भविष्य में 'पेरूर प्लांट' के पूरा होने पर यह संख्या और बढ़ जाएगी। ​लक्षद्वीप में छोटे LTTD (Low Temperature Thermal Desalination) प्लांट लगे हैं, जो द्वीपों पर रहने वाले समुदायों को मीठा पानी प्रदान करते हैं।

औद्योगिक उपयोग (Industrial Water) के अंतर्गत ​गुजरात के दहेज (Dahej) और जामनगर जैसे क्षेत्रों में पानी का उपयोग बड़ी कंपनियों द्वारा किया जाता है।  गुजरात औद्योगिक विकास निगम (GIDC) दहेज में स्थित पेट्रोलियम और केमिकल कंपनियों को पानी की आपूर्ति करता है। यह बहुत महत्वपूर्ण पक्ष है कि उद्योगों को समुद्र का पानी देने से खेती और पीने के लिए इस्तेमाल होने वाले ताजे पानी यानि नदियों के पानी की  बचत होती है।

डीसैलिनेशन प्रक्रिया को भारत के राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान (NIOT) ने भी विकसित किया है। यह तकनीक समुद्र की सतह और गहराई के पानी के तापमान के अंतर का उपयोग करती है। यह लक्षद्वीप के लिए वरदान साबित हुई है।

भारत जैसे देश के लिए  डीसैलिनेशन  के क्षेत्र में ​कुछ चुनौतियां भी हैं इस प्रक्रिया में मसलन इसकी लागत बहुत अधिक होती है, पाइपलाइन से आने वाले साधारण पानी की तुलना में डिसेलिनेशन का पानी 3 से 4 गुना महंगा हो जाता है।

इसके अलावा पर्यावरणीय दृष्टि से समुद्र से पानी निकालने के बाद बचा हुआ ब्राइन (अत्यधिक खारा घोल) वापस समुद्र में डालने से समुद्री जीवों को नुकसान पहुँच सकता है, जिसे कम करने के लिए भारत में 'मल्टी-डिस्कस' तकनीक पर काम किया जा रहा है। ​महाराष्ट्र (मुंबई के मनोरी में प्रस्तावित) और आंध्र प्रदेश जैसे राज्य भी अब इस दिशा में बड़े कदम उठा रहे हैं।

ब्रजेश कानूनगो 


Monday, 23 February 2026

चिचेन इत्ज़ा : जहाँ माया सभ्यता का पक्षी चहचहाता है

चिचेन इत्ज़ा : जहाँ माया सभ्यता का पक्षी चहचहाता है

वर्ष 2007 में जब आधुनिक विश्व के 7 अजूबे (New 7 Wonders) चुने गए, उनमें चीन की महान दीवार, पेट्रा (जॉर्डन), कोलोसियम (इटली), चिचेन इत्ज़ा (मेक्सिको), माचू पिचू (पेरू), ताजमहल (भारत) और क्राइस्ट द रिडीमर (ब्राजील) शामिल किया गया। ये अद्भुत संरचनाएं मानव कला और इतिहास का समुचित प्रतिनिधित्व करती हैं।

दुनिया घूमने निकले हर घुमक्कड़ की यह ख्वाहिश होती है कि वह इन अद्भुत स्थलों और धरोहरों की सैर करके कीर्तिमान बनाए और गौरवान्वित हो सके। हमने भी दुनिया की आभासी सैर के क्रम में कई ट्रेवलरों के वीडियोस में इन स्थलों के नजारे देखे हैं और उन संरचनाओं के इतिहास, समाज और इनके पीछे के विज्ञान को समझने की कोशिश की है। 

पिछले दिनों हमने इंडोट्रेकर यूट्यूब चैनल के कैलाश मीणा के साथ मेक्सिको के इन क्षेत्रों की आभासी यात्रा की और चिचेन इत्ज़ा को नजदीक से देखा समझा। एल कास्टिलो (कुल्कुलकन का पिरामिड)  चिचेन इत्ज़ा की सबसे प्रसिद्ध संरचना है। यह एक विशाल सीढ़ीदार पिरामिड है जो माया सभ्यता के देवता 'कुल्कुलकन' (पंखों वाले सांप) को समर्पित है। यह स्थापत्य  ​गणित के एक चमत्कार जैसा है। पिरामिड के चारों तरफ 91 सीढ़ियाँ हैं। अगर हम चारों तरफ की सीढ़ियों को जोड़ें और ऊपर के चबूतरे को मिलाएँ, तो कुल 365 का योग होता है। जो एक सौर वर्ष के बराबर हो जाता है। हर साल वसंत (March) और शरद (September) के दौरान, डूबते सूरज की रोशनी पिरामिड की सीढ़ियों पर एक ऐसी छाया बनाती है जो नीचे की ओर रेंगते हुए सांप जैसी दिखती है। यह अद्भुत  छाया का खेल (Equinox) माया लोगों के सटीक खगोल विज्ञान का प्रमाण है।

सबसे मजेदार बात हमने यह देखी कि चिचेन इत्ज़ा के कुकुलकन पिरामिड (El Castillo) के सामने खड़े होकर ताली बजाने पर 'क्विज़टल' (Quetzal) पक्षी जैसी चहचहाहट की आवाज आती है। इसके पीछे का वैज्ञानिक कारण समझने पर पता चलता है कि ध्वनि विवर्तन (Sound Diffraction) और प्रतिध्वनि (Echoes) के कारण ऐसा होता है। पिरामिड की 91 सीढ़ियों की ज्यामिति के कारण ताली की ध्वनि अलग-अलग समय पर परावर्तित होकर एक उच्च-आवृत्ति (high-frequency) चहचहाहट में बदल जाती है। 

दरअसल, पिरामिड की सीढ़ियाँ एक विवर्तन ग्रेटिंग की तरह काम करती हैं, जो ध्वनि तरंगों को फैलाती हैं, जब ताली बजाई जाती है, तो ध्वनि की लहरें हर सीढ़ी से टकराकर वापस आती हैं। चूँकि सीढ़ियाँ नीचे से ऊपर की ओर समान दूरी पर हैं, इसलिए ध्वनि तरंगों को वापस लौटने में थोड़ा अलग समय लगता है, जिससे यह एक चहचहाहट की तरह सुनाई देती है। यह गूंज माया सभ्यता के पवित्र 'क्विज़टल' पक्षी की आवाज से मिलती-जुलती है, जो शायद माया इंजीनियरों द्वारा जानबूझकर बनाई गई थी।यद्यपि पर्यटकों को सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर जाने की इजाजत नहीं है लेकिन बताया जाता है कि सीढ़ियों पर चढ़ने से होने वाली आवाज पानी से भरी बाल्टी में बारिश की बूंदें गिरने जैसी सुनाई देती है। यह कोई जादुई घटना नहीं, बल्कि प्राचीन माया सभ्यता की उन्नत इंजीनियरिंग और ध्वनि विज्ञान (Acoustics) का एक अद्भुत उदाहरण है। 

​​माया सभ्यता केवल एक साम्राज्य नहीं थी, बल्कि स्वतंत्र नगर-राज्यों का एक समूह थी जो मुख्य रूप से दक्षिणी मेक्सिको, ग्वाटेमाला और बेलीज के क्षेत्रों में फैली हुई थी। सभ्यता के ​स्वर्ण युग (250 ईस्वी - 900 ईस्वी) के दौरान माया लोगों ने गणित, खगोल विज्ञान और वास्तुकला में महारत हासिल कर ली थी ।  कहा जाता है कि अंक गणित में शून्य का आविष्कार भारत में हुआ,  5 वीं शताब्दी में महान भारतीय गणितज्ञ आर्यभट्ट ने इसका उपयोग किया और 7 वीं शताब्दी में ब्रह्मगुप्त ने इसे एक संख्या के रूप में परिभाषित किया।  बाद में शून्य की अवधारणा भारत से अरब और फिर यूरोप तक फैलती गई। माया सभ्यता ने भी स्वतंत्र रूप से शून्य को एक स्थान-धारक (placeholder) के रूप में प्रयोग किया था, लेकिन उनका उपयोग मुख्य रूप से कैलेंडर और ज्योतिष के लिए था, न कि आधुनिक अंकगणित के लिए।  माया लोगों ने इस पर आधारित एक सटीक कैलेंडर भी बनाया। 10 वीं शताब्दी के आसपास, माया लोगों ने अपने बड़े शहरों (जैसे टिकल और पलाेंके) को छोड़ दिया। इसके पीछे सूखे, युद्ध या संसाधनों की कमी जैसे कारण माने जाते हैं।  16वीं शताब्दी में स्पेनिश आक्रमणकारियों के आने से मेक्सिको के इतिहास का रुख बदल गया, जिससे स्वदेशी और यूरोपीय संस्कृतियों का मिश्रण हुआ।

​माया लोगों की जीवनशैली प्रकृति और आध्यात्मिकता से गहराई से जुड़ी थी। मक्का (Corn) उनकी जीवनरेखा थी। वे मानते थे कि देवताओं ने मनुष्य को मक्के से बनाया है। टॉरटिला, बीन्स, मिर्च और चॉकलेट (जिसे वे 'देवताओं का पेय' मानते थे) आज भी मेक्सिको के मुख्य भोजन हैं।

माया लोग कुशल खगोलशास्त्री थे। उनके मंदिर और पिरामिड सितारों और ग्रहों की स्थिति के अनुसार बनाए गए थे। उनकी बुनाई की कला (Huipil), मिट्टी के बर्तन और पत्थर की नक्काशी आज भी मेक्सिको के बाजारों में खूब देखी जा सकती है।

​पर्यटन की दृष्टि से, मेक्सिको "टाइम ट्रैवल" जैसा अनुभव देता है। प्राचीन समय के जीवन दर्शन और इतिहास की खुशबू यहाँ महसूस की जा सकती है। चिचेन इत्ज़ा (Chichen Itza) के पिरामिड के अलावा  ​ग्रेट बॉल कोर्ट (The Great Ball Court) प्राचीन मेसोअमेरिका का सबसे बड़ा खेल का मैदान है। यहाँ 'पोक-ता-पोक' (Pok-ta-pok) खेल खेला जाता था। आश्चर्य की बात यह है कि यहाँ की ध्वनिकी (Acoustics) इतनी सटीक है कि कोर्ट के एक छोर पर की गई फुसफुसाहट दूसरे छोर पर साफ सुनी जा सकती है।​ एल काराकोल (The Observatory), गोल गुंबद वाली वेधशाला है, माया खगोल शास्त्री यहाँ से शुक्र और चंद्रमा की गति पर नज़र रखते थे।​ योद्धाओं का मंदिर (Temple of the Warriors) में सैकड़ों स्तंभ हैं जिन पर योद्धाओं की नक्काशी की गई है।  पवित्र सेनोट (Sacred Cenote) ​चिचेन इत्ज़ा के पास एक विशाल प्राकृतिक चूना पत्थर का जलकुंड है। माया लोग इसे वर्षा के देवता 'चाक' (Chaac) का निवास स्थान मानते थे। सूखे के समय यहाँ देवताओं को खुश करने के लिए कीमती वस्तुओं (सोना, जेड) और कभी-कभी प्राणियों की बलि भी भेंट दी जाती थी।

मेक्सिको का इतिहास और माया सभ्यता (Maya Civilization) दुनिया की सबसे समृद्ध और रहस्यमयी विरासतों में से एक है। यह केवल प्राचीन खंडहरों के बारे में नहीं है, बल्कि एक जीवित संस्कृति है जो आज भी आधुनिक मेक्सिको की धड़कन में महसूस की जा सकती है।


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Wednesday, 18 February 2026

बादलों की तरह आकृतियां बनाती चोटियाँ

बादलों की तरह आकृतियां बनाती चोटियाँ

बचपन के दिनों में गर्मियों की रात को जब हम खुली छत पर सोने जाते तो दिन अस्त होने के पहले आकाश में छाए बादलों में अनेक आकृतियों की कल्पना करके असीम आनंद से भर जाते थे। बादलों में कभी कोई पक्षी दिखता तो कभी हाथी, बंदर या मनुष्य की छवि नजर आती थी। हम सब के लिए यह बहुत रोमांच और कुतुहल के दृश्य होते थे। ऐसी ही कुछ अनुभूति अफ्रीका के बुर्किना फासो के लेराबा प्रांत में स्थित सिंदौ की चोटियाँ (Peaks of Sindou) देखकर होने लगती है। ट्रैवलर दाऊद अखुनजादा के वीडियो के जरिए हमने इस इलाके की आभासी सैर करते हुए महसूस किया कि ​देखने में ये किसी "पत्थरों के जंगल" या किसी काल्पनिक शहर की मीनारों जैसी लगती हैं। किंतु जब हम इन चोटियों को देखने में अपनी कल्पनाशीलता को भी जोड़ लेते हैं तो इनमें कई मानव आकृतियां दिखाई देने लगती हैं। किसी चोटी में हैट लगाए कोई पुरुष दिखता है तो किसी में शिशु को उठाए कोई माँ दिखाई देने लगती है। 

सिंदौ की चोटियाँ (Peaks of Sindou) दुनिया के सबसे अद्भुत और सुंदर भूवैज्ञानिक संरचनाओं में से एक हैं। यह स्थान न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इसका सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व भी बहुत गहरा है।ये चोटियाँ मुख्य रूप से बलुआ पत्थर (Sandstone) से बनी हैं। लाखों वर्षों तक हवा और बारिश के कारण हुए कटाव (Erosion) ने इन चट्टानों को नुकीले स्तंभों, गुंबदों और अजीबोगरीब आकृतियों में बदल दिया है।​ इनका रंग समय और धूप के अनुसार बदलता रहता है, जिससे भिन्न समय में भिन्न कोण से इनका अलग सौंदर्य नजर आने लगता है। 

दरअसल ,प्रकृति एक अद्भुत कलाकार है, जो हवा, पानी और समय के मेल से पत्थरों को तराश कर ऐसी कृतियाँ बना देती है जिन्हें देखकर मानवीय वास्तुकला भी फीकी लगने लगती है। भौगोलिक रूप से इस प्रक्रिया को अपक्षय (Weathering) और अपरदन (Erosion) कहा जाता है। दुनिया में ऐसी कुछ प्रमुख  संरचनाओं पर नजर डालें तो इनमें अमेरिका के एरिजोना (संयुक्त राज्य अमेरिका)  में ग्रैंड कैनयन, नदी द्वारा किए गए कटाव का सबसे भव्य उदाहरण है। करोड़ों वर्षों तक कोलोराडो नदी के बहाव ने चट्टानों को काटकर इस दर्शनीय और अद्भुत विशाल घाटी का निर्माण किया है। यहाँ की चट्टानें पृथ्वी के भूगर्भीय इतिहास के लगभग 2 अरब साल पुराने रहस्यों को संजोए हुए हैं। इसकी गहराई 1.8 किमी तक है। यह अपनी अद्भुत लाल परतों और विशालता के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ हाइकिंग और रिवर राफ्टिंग काफी लोकप्रिय है। इसी तरह तुर्की के  अनातोलिया स्थित कप्पाडोसिया(Cappadocia) के अजीबोगरीब 'फेयरी चिमनी' (Fairy Chimneys) और गुफाएँ ज्वालामुखी विस्फोट के बाद हवा और बारिश के कटाव से बनी हैं। यहाँ की नरम 'टफ' चट्टानें आसानी से कट जाती हैं।यह ज्वालामुखी राख (Soft Tuff) और ऊपर की कठोर चट्टानों के असमान कटाव का परिणाम है।यह जगह अपने हॉट एयर बैलून राइड और जमीन के नीचे बसे प्राचीन शहरों के लिए मशहूर है। एरिजोना-यूटा सीमा, अमेरिका में  द वेव (The Wave) लहरों के आकार की अद्भुत चट्टानी संरचना है जो सैंडस्टोन (बलुआ पत्थर) पर हवा के कटाव (Wind Erosion) के कारण बनी है। यहाँ की धारियां जुरासिक काल के दौरान रेत के टीलों के जमा होने और फिर हवा द्वारा उन्हें तराशने से बनी हैं।इसकी संवेदनशीलता के कारण यहाँ जाने के लिए लॉटरी सिस्टम से बहुत कम परमिट दिए जाते हैं। चीन के हुनान प्रांत में स्थित जांगजियाजी नेशनल फॉरेस्ट पार्क (Zhangjiajie) जिससे ​प्रसिद्ध फिल्म 'अवतार' के पहाड़ों की प्रेरणा से ली गई है। ये ऊंचे स्तंभ जैसे पहाड़ पानी के कटाव और पौधों की जड़ों के फैलाव के कारण बने हैं। ये क्वार्ट्ज सैंडस्टोन के स्तंभ लाखों वर्षों के भौतिक कटाव का परिणाम हैं। यहाँ दुनिया का सबसे ऊंचा आउटडोर लिफ्ट और कांच का पुल सैलानियों के आकर्षण का केंद्र है। उत्तरी आयरलैंड में जाइंट्स कॉजवे (Giant's Causeway) पर ​समुद्र की लहरों और ज्वालामुखी क्रिया के मेल से यहाँ लगभग 40,000 षट्कोणीय (Hexagonal) बेसाल्ट स्तंभ बने हैं। यह ज्वालामुखी फटने के बाद लावा के तेजी से ठंडा होकर सिकुड़ने से बनी अनोखी ज्यामितीय संरचनाएं हैं।इसे यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा प्राप्त है और यह अपनी रहस्यमयी सुंदरता के लिए जाना जाता है।

इन्हीं अनोखी प्राकृतिक संरचनाओं के क्रम में ​सिंदौ की चोटियाँ भी अपना बहुत महत्व रखती हैं। बुर्किना फासो के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से यह एक है। ​स्थानीय सेनुफो (Senufo) लोगों के लिए यह स्थान अत्यंत पवित्र है। प्राचीन काल में, ये ऊँची और टेढ़ी-मेढ़ी चोटियाँ आक्रमणकारियों से बचने के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा दीवार का काम करती थीं।आज भी, स्थानीय लोग यहाँ अपने पूर्वजों का सम्मान करने और विशेष धार्मिक अनुष्ठान करने के लिए आते हैं। गाँव के कुछ हिस्से पर्यटकों के लिए प्रतिबंधित हैं क्योंकि वे पवित्र माने जाते हैं। 

बुर्किना फासो के सिंदौ शहर के बहुत करीब और 'बन्फोरा' (Banfora) शहर से लगभग 50 किमी की दूरी पर स्थित  इस जगह पर्यटकों के लिए पैदल चलने के रास्ते बने हुए हैं। ट्रैवलर के वीडियो में हमने देखा कि चोटियों के बीच से गुजरना एक भूलभुलैया में चलने जैसा अनुभव देता है। यहाँ से सूर्यास्त का नजारा अद्भुत होता है, जब ढलती धूप चट्टानों को सुनहरा और नारंगी रंग देती है।  स्थानीय कहानियों के अनुसार, ये चट्टानें आज भी "जीवित" मानी जाती हैं और विश्वास किया जाता है कि ये अनोखी चोटियाँ गांव की रक्षा करती हैं। ये ऐसी रोमांचक और अद्भुत चट्टाने हैं जिन्हें देखकर बादलों की तरह ही भिन्न आकृतियां इनमें खोजी जा सकती हैं। 

ब्रजेश कानूनगो 





Tuesday, 17 February 2026

कम कर सकते हैं इलेक्ट्रॉनिक कचरे का उत्पादन

 कम कर सकते हैं इलेक्ट्रॉनिक कचरे का उत्पादन 

दुनिया भर में इस वक्त इलेक्ट्रॉनिक कचरा (ई-वेस्ट) एक बहुत बड़ी पर्यावरणीय समस्या बन चुकी है। इस कचरे में पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जैसे मोबाइल फोन, कंप्यूटर, टीवी, फ्रिज और आधुनिक मोटर बाइक और कारों में प्रयुक्त इलेक्ट्रॉनिक प्रिंटेड बोर्ड और वायर आदि शामिल हैं। 

यूट्यूब पर एक ट्रैवलर ब्लॉगर के वीडियो में घाना की ऐसी बस्तियों को हमने नजदीक से देखा जहाँ बेहद प्रदूषित वातावरण में उनका जीवन गुजरता है। वहीं पर नदी के दूसरे किनारे पर कचरे के पहाड़ के पास ई-वेस्ट रिसाइक्लिंग की प्रक्रिया में इलेक्ट्रॉनिक कचरे को जलाकर मजदूरों द्वारा तांबा निकाला जा रहा था।

इस प्रक्रिया में पहले ई-वेस्ट को इकट्ठा किया जाता है और उसे जलाने के लिए तैयार किया जाता है। वेस्ट को टुकड़ों में काटकर, छांटकर अलग अलग किया जाता है फिर खुली आग में जलाया जाता है, जिससे तांबा और अन्य धातुएं पिघल जाती हैं। प्लास्टिक आदि जल जाते हैं और तांबा व अन्य धातु अलग हो जाते हैं। ई-वेस्ट में सोना, चांदी, तांबा और पैलेडियम जैसी कीमती धातु होती हैं। इनकी वैल्यू मार्केट में बहुत ज्यादा होती है। पिघली हुई धातुओं को ठंडा किया जाता है। तांबा को फिर से उपयोग करने के लिए पिघलाया जाता है। लेकिन इस प्रक्रिया में प्रदूषण बहुत तीव्रता से पर्यावरण में घुल मिल जाता है। 

जलने की प्रक्रिया से जहरीले धुएं और गैसें निकलती हैं, जो वायु प्रदूषण का कारण बनती हैं। प्रक्रिया से निकलने वाले रसायन जल स्रोतों में मिल जाते हैं, जिससे जल प्रदूषित होता है।  निकलने वाले रसायन मृदा याने मिट्टी में भी मिल जाते हैं, जिससे मिट्टी प्रदूषित होती है तथा भूमि की उर्वरता खत्म हो जाती है। ज्वलन और रसायनों से निकलने वाले धुएं और गैसें मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती हैं, जिससे श्वसन समस्याएं, कैंसर आदि के खतरे पैदा हो सकते हैं। 

भारत में भी ई-वेस्ट की मात्रा तेजी से बढ़ रही है, ऐसे में इसका उचित रिसाइक्लिंग करना बहुत जरूरी हो जाता है। एक जानकारी के अनुसार 2023-24 में भारत में 17.78 लाख मीट्रिक टन ई-वेस्ट उत्पन्न हुआ, जो 2017-18 की तुलना में 151.03% अधिक रहा है। 2023-24 में केवल 43% ई-वेस्ट का पुनर्चक्रण हुआ, जबकि 57% अनौपचारिक क्षेत्र में पहुंच गया। मुंबई, दिल्ली, बैंगलोर, चेन्नई और कोलकाता जैसे 65 शहरों से देश का 60% ई-वेस्ट निकलता है। 

इलेक्ट्रॉनिक कचरे के पुनर्चक्रण हेतु सरकारों द्वारा कुछ नियम और प्रक्रिया निर्धारित अवश्य की है लेकिन कचरे का लगभग आधा हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्रों में पहुंचना चिंता की बात होना चाहिए। दरअसल, ई-वेस्ट का सुरक्षित रिसाइक्लिंग करना जरूरी है, जिसमें जलने की प्रक्रिया का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। लोगों को ई-वेस्ट के खतरों के बारे में शिक्षित करना और सुरक्षित रिसाइक्लिंग के तरीकों के बारे में प्रशिक्षण देना भी बहुत जरूरी होगा। 

यद्यपि सरकार ने ई-वेस्ट रीसाइक्लिंग के लिए  ई-वेस्ट रीसाइक्लिंग पार्क और ई-वेस्ट मैनेजमेंट सेंटर जैसी कई योजनाएं अपनाई हैं, साथ ही ई-वेस्ट के निष्पादन के लिए कई जागरूकता अभियान भी चलाए हैं। ई-वेस्ट (मैनेजमेंट) नियम, 2022 के तहत, उत्पादकों, आयातकों और ब्रांड मालिकों को अपने उत्पादों के जीवन-चक्र के अंत में उत्पन्न कचरे के प्रबंधन की जिम्मेदारी दी गई है तथापि ई-वेस्ट रिसाइक्लिंग के लिए मात्र नियमन और कानून बना देने से ज्यादा जरूरी है कि सुरक्षित रिसाइक्लिंग को बढ़ावा दिया जाए।

इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट (E-waste) का कारोबार आज के डिजिटल युग में 'सोने की खान' और 'पर्यावरण की चुनौती' दोनों है। जैसे-जैसे हम पुराने फोन और लैपटॉप बदलकर नए गैजेट्स अपना रहे हैं, ई-वेस्ट का मैनेजमेंट भी एक बड़ा बिजनेस सेक्टर बन चुका है। लेकिन हमारा उद्देश्य तो यही होना चाहिए कि कम से कम मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक कचरा हमारे घर से निकले। इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट (E-waste) को कम करना न केवल पर्यावरण के लिए जरूरी है, बल्कि यह हमारी जेब के लिए भी फायदेमंद है। इसे कम करने के लिए हम '3R' (Reduce, Reuse, Recycle) के सिद्धांत को अपना सकते हैं।

​ई-वेस्ट पर रोकथाम के लिए सबसे पहला कदम खरीदारी के समय ही उठाया जा सकता है, नया गैजेट खरीदने से पहले खुद से पूछें, "क्या मुझे वाकई इसकी जरूरत है?" सिर्फ ट्रेंडी दिखने के लिए नया फोन लेना कचरा बढ़ाता है। ऐसी कंपनियाँ और उत्पाद चुनें जो अपनी लंबी उम्र और मजबूती के लिए जाने जाते हैं। एनर्जी स्टार (Energy Star) रेटिंग वाले या रिसाइकिल किए गए मटेरियल से बने उपकरणों को प्राथमिकता दें। ​जितना लंबा आप एक डिवाइस का उपयोग करेंगे, उतना ही कम ई-वेस्ट पैदा होगा,अगर लैपटॉप धीमा हो गया है, तो उसे फेंकने के बजाय RAM अपग्रेड करें या बैटरी बदलें। "Right to Repair" का समर्थन करें। गैजेट्स को साफ रखें, ओवरचार्जिंग से बचें और उन्हें अत्यधिक गर्मी से बचाएं। पुराने हार्डवेयर पर हल्का सॉफ्टवेयर इस्तेमाल करें ताकि वह लंबे समय तक काम कर सके। ​जो डिवाइस आपके काम का नहीं है, वह किसी और के लिए कीमती हो सकता है, उसे उपयुक्त व्यक्ति या संस्था को दान करने का प्रयास करें। पुराने कंप्यूटर या गैजेट्स स्कूलों, एनजीओ (NGOs) या उन लोगों को दें जिन्हें उनकी जरूरत है। मुफ़्त नहीं देना चाहते तो पुराने फोन या टैबलेट को रिसेल प्लेटफॉर्म्स (जैसे OLX, Cashify) पर बेच दें।

पुराने स्मार्टफोन को 'सिक्योरिटी कैमरा', 'म्यूजिक प्लेयर' या 'डिजिटल फोटो फ्रेम' के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। जब कोई उपकरण बिल्कुल खराब हो जाए, तो उसे साधारण कचरे में न  फेंकते हुए​ अपने शहर के अधिकृत ई-वेस्ट सेंटर्स का पता लगाएं। वहां कचरा देने पर पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुँचता। कई कंपनियाँ (जैसे Apple, Samsung, Dell) पुराने डिवाइस के बदले नए पर डिस्काउंट देती हैं। कचरे के उत्पादन को समाप्त करना भले ही हमारे बस में नहीं है लेकिन अपने विवेक और कुछ उपायों से इसकी वृद्धि को नियंत्रित करके हम पर्यावरण और समूचे प्राणियों के स्वास्थ्य की रक्षा अवश्य कर सकते हैं। 


ब्रजेश कानूनगो




 





Sunday, 15 February 2026

आत्मीय और आस्था के पात्र खतरनाक मगरमच्छ

आत्मीय और आस्था के पात्र  खतरनाक मगरमच्छ

हम लोग इतना अवश्य जानते हैं कि मगरमच्छ जैसे खरनाक प्राणी की त्वचा (स्किन) मुख्य रूप से महंगे हैंडबैग, जूते, बेल्ट, वॉलेट और फर्नीचर जैसे लक्ज़री सामान बनाने के लिए उपयोग की जाती है। इनकी त्वचा बेहद टिकाऊ और कीमती होती है।  मगरमच्छ के शरीर के अन्य अंगों (दांत, हड्डी) का उपयोग पारंपरिक वस्तुओं में किया जाता है। लेकिन  कुछ दिनों पहले जब हमने घुमक्कड़ और हमारे प्रिय यूट्यूबर दावूद अखुंदाज़ा के साथ पश्चिम अफ्रीका के बर्किना फासो देश के वीडियो को देखा तो मालूम हुआ कि जहां के लोग खतरनाक मगरमच्छों के साथ बहुत मित्रवत व्यवहार करते हैं। 

यहाँ के लोग मगरमच्छों के साथ तालाब में नहाते हैं और बच्चे उनकी पीठ पर बैठते हैं। ट्रैवलर जब स्थानीय नागरिकों से उनके इस रिश्ते के बारे में पूछते हैं तो वे बताते हैं कि यहां के ग्रामीणों का मानना है कि मगरमच्छ उनके पूर्वजों की आत्माएं हैं और गाँव की रक्षा करते हैं। जब किसी मगरमच्छ की मृत्यु होती है, तो उसे इंसानों की तरह सम्मान के साथ दफनाया जाता है। खासतौर से पश्चिम अफ्रीका के इस देश में साबू (Sabou) और बाज़ौले (Bazoulé) नामक गाँवों में यह दृश्य सहजता से देखा जा सकता है।

आइए पहले थोड़ा इस खतरनाक प्राणी के बारे में जानलें। मगरमच्छ बड़े, अर्द्ध-जलीय सरीसृप हैं जो मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों की नदियों और झीलों में पाए जाते हैं। ये मांसाहारी होते हैं और इनका काटना सबसे मजबूत होता है। खारे पानी के मगरमच्छ सबसे बड़े होते हैं, जो 7 मीटर से अधिक लंबे हो सकते हैं। ये ठंडे खून वाले, अत्यधिक  शिकारी होते हैं जो डायनासोर के करीबी रिश्तेदार माने जा सकते हैं। 
मगरमच्छ अधिकतर उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं, जहां ये पानी में रहने के साथ-साथ धूप सेंकने के लिए किनारे पर भी आते हैं। इनके पास मोटी, पपड़ीदार त्वचा, शक्तिशाली जबड़े और 60-100 से अधिक शंक्वाकार दांत होते हैं। ये कुशल शिकारी होते हैं जो मछली, स्तनधारी, पक्षी और कछुए खाते हैं। पानी में अपने शिकार को घेरकर या छिपकर घात लगाकर हमला करते हैं। मादा मगरमच्छ छेद या टीलों में अंडे देती हैं। बच्चों के निकलने के बाद, वे लगभग एक साल तक उनकी रक्षा करती हैं। मगरमच्छों की लगभग 20 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं। सबसे बड़ा 'खारे पानी का मगरमच्छ' है, जबकि 'बौना मगरमच्छ' सबसे छोटा होता है। ये लगभग 50-80 वर्ष तक जीवित रह सकते हैं। यह माना जाता है कि ये पूर्व-ऐतिहासिक काल के डायनासोरनुमा प्राणियों की अंतिम जीवित कड़ी हैं, जिन्हें "जीवित जीवाश्म" भी कहा जाता है। 

घाना और बुर्किना फासो सहित मगरमच्छ को दुनिया के कई हिस्सों में केवल एक खतरनाक शिकारी ही नहीं, बल्कि शक्ति, उर्वरता और सुरक्षा का प्रतीक माना गया है। प्राचीन सभ्यताओं से लेकर आज के कुछ आधुनिक समुदायों तक, इसकी पूजा की परंपरा रही है। विश्व में मगरमच्छ की पूजा को लेकर बहुत सारे तथ्य और  दिलचस्प जानकारियां मिलती हैं।
प्राचीन मिस्रवासी 'सोबेक' नामक देवता की पूजा करते थे, जिनका सिर मगरमच्छ का और शरीर इंसान का था।उन्हें नील नदी का रक्षक और प्रजनन क्षमता (Fertility) का देवता माना जाता था। कोम ओम्बो (Kom Ombo) में सोबेक का एक विशाल मंदिर है। वहाँ मगरमच्छों को पालतू बनाकर रखा जाता था और उनकी मृत्यु के बाद उन्हें ममी बनाकर सम्मान के साथ दफनाया जाता था। ​भारत के कुछ हिस्सों में मगरमच्छों के गहरे धार्मिक जुड़ाव के बारे में भी संदर्भ मिलते हैं। गुजरात के कई समुदायों में 'खोदियार माता' की पूजा होती है, जिनका वाहन मगरमच्छ है। वहाँ मगरमच्छ को पवित्र माना जाता है और उसे नुकसान पहुँचाना पाप माना है। पाकिस्तान और भारत सीमा पर कराची (पाकिस्तान) में 'मगर पीर' नाम की एक दरगाह है जहाँ मगरमच्छों को सूफी संत का आशीर्वाद प्राप्त माना जाता है। श्रद्धालु उन्हें बड़े चाव से खाना खिलाते हैं।केरल के 'अन्नतपुरा झील मंदिर' में 'बब्बरिया' नाम का एक शाकाहारी मगरमच्छ प्रसिद्ध था (जिसकी हाल ही में मृत्यु हुई), जिसे मंदिर का रक्षक माना जाता था। पापुआ न्यू गिनी (Papua New Guinea) की सेपिक नदी (Sepik River) के किनारे रहने वाली जनजातियों में मगरमच्छ का स्थान सर्वोपरि है। यहाँ के लोग मानते हैं कि उनके पूर्वज पुरुष मगरमच्छ थे। युवाओं के शरीर पर विशेष रूप से पीठ पर ऐसे निशान (Scarification) बनाए जाते हैं जो मगरमच्छ की खाल जैसे दिखें। यह उनके वयस्क होने की एक महत्वपूर्ण और पवित्र रस्म है।​माया और एज़्टेक सभ्यता (मेक्सिको) की प्राचीन सभ्यताओं में मगरमच्छ को 'पृथ्वी का आधार' माना जाता था। उनके कैलेंडर और निर्माण की कहानियों में मगरमच्छ का विशेष महत्व है।​  तिमोर-लेस्ते (Timor-Leste) देश के लोग अपने द्वीप के आकार को एक सोए हुए मगरमच्छ जैसा मानते हैं और उसे 'दादा' (Grandfather) कहकर पुकारते हैं।

मगरमच्छों की पूजा करने का तरीका भले ही अलग अलग समुदायों में भिन्न हो किंतु यह अवश्य है कि उनके प्रति बहुत से समुदायों में बहुत सम्मान व्यक्त किया जाता है।  कुछ लोग मंदिर बनाकर या मूर्तियों के रूप में पूजा करते हैं। कुछ समुदायों में जीवित मगरमच्छों को पवित्र मानकर उन्हें विशेष भोजन (मांस, मुर्गे आदि) अर्पित किया जाता है। ​टोटम (Totem) जैसी कई जनजातियाँ इसे अपना कुल-देवता मानती हैं और मगरमच्छों का शिकार वर्जित होता है। ये संस्कृतियाँ मगरमच्छों को उनके खतरों के बावजूद सम्मानित करती हैं, जिससे उनके प्रति डर को आस्था में बदला जा सके। 

ब्रजेश कानूनगो

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Monday, 9 February 2026

प्राचीन शैलकृत वास्तुकला और धर्मराजेश्वर मंदिर

प्राचीन शैलकृत वास्तुकला और धर्मराजेश्वर मंदिर

कुछ दिन पहले सैर सपाटे के दौरान हमने मंदसौर जिले में स्थित धर्मराजेश्वर मंदिर और बौद्ध गुफाओं का अवलोकन किया। सचमुच ये न सिर्फ दर्शनीय और आस्था के केंद्र हैं बल्कि प्राचीन भारतीय वास्तुकला के अनूठे संगम हैं। घने वन क्षेत्र में चट्टानों को काट कर बनाए गये मंदिरों और शिल्प की तत्कालीन इंजीनियरिंग और शिल्पकारों के लंबे परिश्रम के बेमिसाल प्रमाण हैं। इसके साथ ही इतिहास और कला के प्रेमियों के लिए भी एक खुला संग्रहालय है।

भारत में कई प्रमुख रॉक कट मंदिर हैं, जो अपनी अद्वितीय वास्तुकला और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध हैं। इनमें से कुछ प्रमुख रॉक कट मंदिर पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहे हैं। हिमाचल प्रदेश का मसरूर रॉक कट मंदिर, मंदिर 8वीं शताब्दी में बनाया गया था और हिमालयन पिरामिड के नाम से भी जाना जाता है। एलोरा महाराष्ट्र का प्रसिद्ध कैलाशनाथ मंदिर भी 8वीं शताब्दी में राष्ट्रकूट शासकों द्वारा बनाया गया था और आज यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों में शामिल है। तमिलनाडु के महाबलीपुरम का रॉक कट मंदिर पंचरथ 7वीं शताब्दी में पल्लव राजाओं द्वारा बनाए गए थे और ये भी  यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है।

कर्नाटक में बादामी गुफा मंदिर 6वीं शताब्दी में चालुक्य राजाओं द्वारा बनाए गए थे। विरुपाक्ष मंदिर हम्पी कर्नाटक में है जो 14वीं शताब्दी में विजयनगर राजाओं द्वारा बनाया गया था। उदयगिरि गुफाएं मध्य प्रदेश में 5वीं शताब्दी में गुप्त राजाओं द्वारा बनाई गई थीं।

रॉक कट मंदिरों की श्रृंखला में मध्यप्रदेश का धर्मराजेश्वर मंदिर (Dharmarajeshwar Temple) मंदसौर जिले की शामगढ़ तहसील से लगभग 22 किमी दूर स्थित है।  शांत और प्रकृति की गोद में स्थित इस स्थल की पत्थर की नक्काशी और वातावरण  फोटोग्राफी के शौकीनों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है।  यहाँ की सैर के लिए सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च के बीच होता है। महाशिवरात्रि के दौरान यहाँ विशाल मेला लगता है। धर्मराजेश्वर को आमतौर पर मध्य प्रदेश के एलोरा की तरह माना जाता है क्योंकि इसकी निर्माण तकनीक एलोरा के प्रसिद्ध कैलाश मंदिर से काफी मिलती-जुलती है। उत्तर भारत के सबसे महत्वपूर्ण और दुर्लभ मंदिरों में से एक इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे एलोरा के कैलाश मंदिर की तरह एक ही विशाल चट्टान को काटकर (Monolithic) बनाया गया है। यह मंदिर 9वीं शताब्दी का माना जाता है तथा उत्तर भारतीय "नागर शैली" में निर्मित है। इसे ऊपर से नीचे की ओर तराशा गया है। मुख्य मंदिर के चारों ओर सात छोटे मंदिर बने हुए हैं। मंदिर की नक्काशी और इसके शिखर की बनावट अद्भुत है। और यह सारी संरचनाएं आसपास के धरातल से नीचे स्थित है। चट्टानों में खुदे इसके परिसर प्रांगण में एक छोटी सी सजल कुइया (कुँआ) और तुलसी के पौधे की घनी पत्तियां अचरज में डाल देती हैं।

मुख्य मंदिर में एक शिवलिंग और भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित है, जो शैव और वैष्णव मतों के समन्वय को दर्शाता है। इसे 'धर्मराजेश्वर' इसलिए कहा जाता है क्योंकि पांडव पुत्र युधिष्ठिर (धर्मराज) से इसकी कई दंत कथाएं प्रचलित रही हैं।

​मंदिर के ठीक पास ही अनेक बौद्ध गुफाएं स्थित हैं, जो इस क्षेत्र की प्राचीन धार्मिक विविधता को दर्शाती हैं। ये गुफाएं मंदिर से भी पुरानी हैं, जिनका निर्माण लगभग 7वीं-8वीं शताब्दी के आसपास माना जाता है। इन गुफाओं में 'विहार' (भिक्षुओं के रहने का स्थान) और 'चैत्य' (प्रार्थना कक्ष) शामिल हैं। यहाँ भगवान बुद्ध की विशाल मूर्तियाँ और स्तूप खुदे हुए हैं। एक गुफा में भगवान बुद्ध की महापरिनिर्वाण मुद्रा (लेटी हुई प्रतिमा) विशेष रूप से दर्शनीय है।

​यद्यपि ​इन स्मारकों की खोज को लेकर कोई एक निश्चित खोजकर्ता का नाम चर्चित नहीं है, क्योंकि ये स्थानीय रूप से हमेशा ज्ञात थे। हालांकि, पुरातात्विक दृष्टि से इनका दस्तावेजीकरण और संरक्षण ​19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ब्रिटिश पुरातत्वविदों द्वारा किया गया था। ​जेम्स बर्गेस जैसे विद्वानों ने इन गुफाओं और मंदिर की वास्तुकला पर विस्तृत शोध कार्य किया, जिसके बाद ये विश्व पटल पर आए। ​वर्तमान में यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अधीन एक संरक्षित स्मारक है।

बौद्ध गुफाओं के निर्माण को लेकर आज के इस आधुनिक और उन्नत तकनीक में सक्षम समय में  हमारे मन में सहज ही जिज्ञासा और कुतुहल पैदा हो जाते हैं। दरअसल, ​बौद्ध गुफाओं (जिन्हें 'शैलकृत वास्तुकला' या Rock-cut Architecture कहा जाता है) का निर्माण केवल कला प्रदर्शन के लिए नहीं, बल्कि एक गहरी आध्यात्मिक और व्यावहारिक आवश्यकता के कारण हुआ था।

बौद्ध धर्म में गुफाओं का निर्माण दो मुख्य उद्देश्यों के लिए किया जाता था, विहार और चैत्य। ​विहार (Viharas) बौद्ध भिक्षुओं के रहने के स्थान या आवास थे जिन्हें वर्षा ऋतु के दौरान (जिसे 'वस्सवास' कहा जाता है), जब भिक्षु यात्रा नहीं कर सकते थे, तब वे यहाँ शरण लेते थे। ​चैत्य (Chaityas), प्रार्थना कक्ष या उपासना स्थल होते थे। इनके केंद्र में एक स्तूप होता था, जिसकी परिक्रमा करके भिक्षु ध्यान और पूजा करते थे। बौद्ध गुफाएं (जैसे अजंता, एलोरा, या मंदसौर की गुफाएं) प्रायः एकांत और प्राकृतिक स्थानों पर मिलने के पीछे ठोस तर्क थे।  बौद्ध धर्म में 'निर्वाण' की प्राप्ति के लिए गहन ध्यान (Meditation) आवश्यक है। शहर के शोर-शराबे से दूर घने जंगल और पहाड़ मानसिक शांति के लिए ये आदर्श थे। एक रोचक तथ्य यह भी है कि ये गुफाएं जंगल में तो थीं, लेकिन अक्सर प्रमुख व्यापारिक मार्गों के पास स्थित थीं। इससे भिक्षुओं को व्यापारियों से भिक्षा आसानी से मिल जाती थी और व्यापारियों को आराम करने के लिए सुरक्षित स्थान मिल जाता था। पहाड़ों को काटकर बनाई गई गुफाएं स्थायी होती थीं। ये भीषण गर्मी, बारिश और जंगली जानवरों से सुरक्षा प्रदान करती थीं। पत्थर की दीवारें तापमान को भी नियंत्रित रखती थीं।

​इन गुफाओं का निर्माण कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक पूरा समुदाय मिलकर करता था।  राजाओं (जैसे सातवाहन, वाकाटक, गुप्त शासक) के अलावा, धनी व्यापारियों, शाही महिलाओं और कारीगरों की श्रेणियों (Guilds) ने इनके निर्माण के लिए दान दिया जाता था। गुफाओं के शिलालेखों पर कहीं कहीं अक्सर दानदाताओं के नाम खुदे मिलते हैं। उस समय के कुशल शिल्पी और पत्थर तराशने वाले (Stone Carvers) ऊपर से नीचे की ओर (Top-down approach) पहाड़ को तराशते थे। यह काम इतना सटीक होता था कि एक भी गलती पूरे निर्माण को खराब कर सकती थी। भारत में बौद्ध गुफाओं का निर्माण ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से शुरू होकर 10वीं शताब्दी तक चला। जैसे-जैसे बौद्ध धर्म का विस्तार हुआ, भिक्षुओं की संख्या बढ़ी। मौर्य काल (अशोक के समय) के बाद पत्थर को तराशने की कला चरम पर पहुँची, जिससे लकड़ी के ढांचों के स्थान पर स्थायी पत्थर की गुफाएं बनने लगीं। कालांतर में ये गुफाएं केवल रहने की जगह नहीं रहीं, बल्कि विश्वविद्यालयों के रूप में विकसित हुईं, जहाँ दर्शन, कला और धर्म की शिक्षा दी जाती थी।

धर्मराजेश्वर मंदिर और बौद्ध गुफाओं जैसे स्थलों को देखकर हमारे भीतर तत्कालीन लोगों की  वैचारिक, आध्यात्मिक चेतना के साथ मनुष्य के तकनीकी कौशल, उसके धैर्य और निरंतर श्रम और जुझारूपन के प्रति असीम सम्मान की भावना जाग जाना स्वाभाविक है।

ब्रजेश कानूनगो






 


जापान की शिंकानसेन और समुद्री सुरंग की सैर

जापान की शिंकानसेन और समुद्री सुरंग की सैर दुनियाभर की सैर करने वाले घुमक्कड़ जब जापान जाते हैं तो उनके लिए वहां की रेलों के संचालन को देखने...