Monday, 30 March 2026

युद्ध विरोध में शामिल तितलियाँ

युद्ध विरोध में शामिल तितलियाँ 

कल्पना कीजिए कि आपके घर के छोटे से बगीचे में, 'मिल्कवीड' के पौधे पर एक नन्हा-सा अंडा है। एक दिन, उस अंडे से एक छोटी सी जान बाहर आती है और फिर एक दिन, उसे पता चलता है कि उसकी मंजिल यहाँ से हजारों किलोमीटर दूर, एक अंजाना पहाड़ है। वह नन्हीं जान, एक मोनार्क तितली, अपनी इस यात्रा की कहानी पूरी नहीं करेगी; बल्कि उसकी आने वाली पीढ़ी करेगी, फिर उसकी पीढ़ी, और फिर उसकी पीढ़ी। यह 'पंखों वाली परिक्रमा' एक अद्भुत घुमक्कड़ी है, जो किसी नक्शे से नहीं, बल्कि एक अदम्य वृत्ति (instinct) और प्रकृति के अटूट विश्वास से चलती है। यह एक ऐसी यात्रा है, जो घर बैठे हमें सिखाती है कि घुमक्कड़ी सिर्फ पैरों से नहीं, बल्कि दिल से होती है। हम बात कर रहे हैं मोनार्क तितलियों (Monarch Butterflies) के बारे में। 

अमेरिका में हाल के वर्षों में मोनार्क तितलियों (Monarch Butterflies) का इस्तेमाल न केवल पर्यावरण संरक्षण के लिए, बल्कि नागरिक अधिकारों, प्रवासन (Migration) और युद्ध विरोधी प्रदर्शनों में एक शक्तिशाली प्रतीक के रूप में किया गया है।

हाल ही में ( 2026) अमेरिका में हुए "No Kings" जैसे राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों में  मोनार्क तितलियों के पोस्टर्स देखे गए हैं।​यहाँ 'Monarch' शब्द का दोहरा अर्थ (Double Meaning) निकाला गया है। एक तरफ तितली जैसा सुंदर जीव है, तो दूसरी तरफ 'Monarch' का अर्थ 'तानाशाह' या 'राजा' भी होता है। ​प्रदर्शनकारियों ने नारों का इस्तेमाल करते हुए कहा 'हमें केवल तितली वाला मोनार्क/राजा चाहिए, तानाशाह नहीं'। यह लोकतंत्र के समर्थन और युद्ध या निरंकुश सत्ता के विरोध का एक रचनात्मक तरीका माना जा सकता है।

जावेद अख्तर साहब का एक बड़ा लोकप्रिय गीत है, पंछी नदियां पवन के झोंके कोई सरहद न इन्हें रोके। इन सबका प्रवास सीमाओं से परे स्वतंत्रता (Migration without Borders) का संदेश देता है। ​मोनार्क तितलियाँ भी हर साल बिना किसी पासपोर्ट या कानूनी बाधा के कनाडा,अमेरिका और मैक्सिको की सीमाएं पार करती हैं। युद्ध और संघर्ष के कारण विस्थापित होने वाले शरणार्थियों (Refugees) के समर्थन में होने वाले प्रदर्शनों में इनका उपयोग यह दर्शाने के लिए किया जाता है कि "प्रवासन एक प्राकृतिक अधिकार है"। ​प्रदर्शनकारी अक्सर "Mariposas Sin Fronteras" (बिना सीमाओं वाली तितलियाँ) जैसे नारों का उपयोग करते हैं, जो युद्धग्रस्त क्षेत्रों से भाग रहे लोगों की सुरक्षा और उनके स्वागत का प्रतीक है। अमेरिका के विश्वविद्यालयों और शहरों में हुए युद्ध विरोधी प्रदर्शनों (Gaza War Protests) में भी तितलियों के प्रतीकों का प्रयोग देखा गया है। मैक्सिकन संस्कृति में तितलियों को पूर्वजों की आत्माओं का रूप माना जाता है। युद्ध विरोधी प्रदर्शनों में इन्हें उन निर्दोष लोगों की याद में इस्तेमाल किया गया है जिन्होंने संघर्ष में अपनी जान गंवाई है।

​कल्पना कीजिए, सर्दियों की एक सुबह जब सूरज की पहली किरणें मैक्सिको के ऊंचे पहाड़ों पर पड़ती हैं, तो पेड़ों की टहनियाँ अचानक हिलने लगती हैं। वे टहनियाँ फूलों से नहीं, बल्कि लाखों मोनार्क तितलियों से ढकी होती हैं। जब वे एक साथ उड़ती हैं, तो ऐसा लगता है मानो आसमान में नारंगी और काले रंग का कोई जीवित कालीन बिछ गया हो। पंखों की फड़फड़ाहट से एक धीमी संगीत जैसी सरसराहट पैदा होती है। मैक्सिको के 'ओयामेल फर' (Oyamel Fir) के जंगलों में लाखों तितलियाँ पेड़ों पर चिपकी हुई हैं। कनाडा से मैक्सिको की 4,000 किलोमीटर की यात्रा  तितलियों की 4 से 5 पीढ़ियों में पूरी होती है। एक नन्हीं तितली को पता होता है कि उसे उसी पेड़ पर जाना है जहाँ उसके परदादा-परदादी पिछले साल रुके थे? यह प्रकृति की वो वसीयत है जो नक्शों में नहीं, बल्कि उनके DNA में लिखी होती है। ​

तितलियों का अस्तित्व एक साधारण से पौधे 'मिल्कवीड' पर टिका है। दरअसल, मोनार्क तितली (Monarch Butterfly) दुनिया की सबसे प्रसिद्ध और सुंदर तितलियों में से एक है। इसे वैज्ञानिक रूप से Danaus plexippus कहा जाता है। अपनी लंबी यात्राओं और सुंदर पंखों के कारण यह पूरी दुनिया में आकर्षण का केंद्र बनी रहती है। इनके पंखों का रंग गहरा नारंगी (Deep Orange) होता है, जिस पर काली नसें (Black Veins) और किनारों पर सफेद धब्बे होते हैं। पंखों का फैलाव लगभग 7 से 10 सेंटीमीटर तक होता है। नर मोनार्क के पिछले पंखों पर काले रंग के दो छोटे धब्बे होते हैं, जो मादा में नहीं पाए जाते। ​मोनार्क तितली की सबसे बड़ी विशेषता इसकी लंबी दूरी की यात्रा है। ​उत्तरी अमेरिका में रहने वाली मोनार्क तितलियाँ हर साल सर्दियों से बचने के लिए कनाडा और अमेरिका से लगभग 4,000 किलोमीटर की यात्रा करके मैक्सिको के जंगलों में जाती हैं।​आश्चर्य की बात यह है कि एक अकेली तितली इस पूरी यात्रा को पूरा नहीं करती, बल्कि यह यात्रा कई पीढ़ियों में पूरी होती है।

​इन तितलियों का जीवन चक्र चार चरणों में पूरा होता है। मादा तितली 'मिल्कवीड' (Milkweed) के पत्तों पर अंडे देती है।अंडों से निकलने वाले कैटरपिलर केवल मिल्कवीड के पत्ते खाते हैं। ​प्यूपा (Chrysalis) अवस्था में यह एक हरे रंग के खोल के अंदर खुद को बदल लेती है।  अंत में एक सुंदर तितली बाहर आती है।

मिल्कवीड का पौधा खाने के कारण इनके शरीर में एक प्रकार का जहर (Cardenolides) जमा हो जाता है। इस वजह से पक्षी और अन्य शिकारी इन्हें नहीं खाते। इनका चमकीला नारंगी रंग शिकारियों के लिए एक चेतावनी की तरह काम करता है।

वस्तुतः वैज्ञानिक आज भी इस बात पर शोध कर रहे हैं कि ये तितलियाँ बिना किसी मैप के हजारों किलोमीटर दूर बिल्कुल सही जगह पर कैसे पहुँच जाती हैं। माना जाता है कि ये सूरज की स्थिति और पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का उपयोग करती हैं।आम तौर पर एक मोनार्क तितली का जीवनकाल 2 से 6 हफ्ते का होता है, लेकिन जो पीढ़ी प्रवास (Migrate) करती है, वह 8 से 9 महीने तक जीवित रह सकती है। 

​तितली जितनी नाजुक दिखती है, उतनी ही साहसी होती है जो हजारों मील का सफर तय करती है। यही वजह है कि युद्ध विरोधी कार्यकर्ता इसका इस्तेमाल यह संदेश देने के लिए करते हैं कि शांति की आवाज़, भले ही कोमल लगे, लेकिन वह बड़े बदलाव लाने की ताकत रखती है।


ब्रजेश कानूनगो 


Sunday, 29 March 2026

पानी में लकड़ियों पर वर्षों से खड़ी बस्तियाँ

पानी में लकड़ियों पर वर्षों से खड़ी बस्तियाँ 

दुनिया में कई ऐसे शहर और बस्तियाँ हैं जो दलदली इलाकों (Swamplands) या पानी के ऊपर बहुत ही खूबसूरती से बसाई गई हैं। इन जगहों की अनूठी वास्तुकला और जीवनशैली पर्यटकों और घुमक्कड़ों को हमेशा अपनी ओर आकर्षित करती है। जब ऐसी बस्तियों और अनोखी संरचनाओं की बात होती है तो सबसे पहले इटली के खूबसूरत वेनिस का नाम ही याद आता है। दरअसल इस शहर की नींव वास्तव में लकड़ी के लाखों खंभों (Piles) पर टिकी है, जिनमें से अधिकांश ओक (Oak) और लार्च (Larch) प्रजाति के पेड़ों से बने हैं। वेनिस एक दलदली लैगून पर बसा है जहाँ की ज़मीन बहुत नरम थी। मिट्टी को मज़बूत बनाने के लिए, लकड़ी के खंभों को कीचड़ और रेत की गहरी परतों के नीचे तब तक धंसाया गया जब तक कि वे नीचे मौजूद सख्त मिट्टी (Caranto) तक न पहुँच जाएँ।यह लकड़ी सदियों से पानी में होने के बावजूद नहीं सड़ती। 

इन बस्तियों के निर्माण में प्रयुक्त ओक लकड़ी के पेड़ों की बात करें तो ओक के पेड़ों के लिए मुख्य वन दुनिया में सबसे ज्यादा मेक्सिको (164 प्रजातियों के साथ) और अमेरिका (91 प्रजातियों के साथ) में पाए जाते हैं। इसके अलावा, चीन और वियतनाम में भी ओक प्रजातियों की अच्छी खासी संख्या है। पश्चिमी भूमध्यसागरीय क्षेत्र (पुर्तगाल, स्पेन) में कॉर्क ओक के घने जंगल हैं, जबकि हिमालयी क्षेत्रों में भी यह एक मुख्य प्रजाति है।

ओक की लकड़ी पर पानी और नमी का प्रभाव नहीं पड़ता और वह सड़ती या गलती नहीं है। पानी और नमी से इस लकड़ी के क्षरण नहीं हो पाने के कुछ वैज्ञानिक कारण हैं। लकड़ी के सड़ने के लिए फंगस और बैक्टीरिया का होना ज़रूरी है, और उन्हें जीवित रहने के लिए ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। वेनिस के ये खंभे गहरे पानी के नीचे और नमक युक्त गाद (Silt) में पूरी तरह दबे हुए हैं। वहाँ ऑक्सीजन न पहुँच पाने के कारण लकड़ी को सड़ाने वाले सूक्ष्मजीव पनप नहीं पाते। खंभे जिस पानी में डूबे रहते हैं, उसमें खनिजों (Minerals) और नमक की मात्रा बहुत अधिक है। समय के साथ, ये खनिज लकड़ी के रेशों के अंदर समा जाते हैं। इस निरंतर प्रवाह और दबाव के कारण लकड़ी धीरे-धीरे पत्थर जैसी सख्त हो जाती है। इसे 'पेट्रिफिकेशन' की प्रक्रिया कहते हैं, जिससे लकड़ी और भी मज़बूत हो जाती है। इस्तेमाल की गई ओक और लार्च जैसी लकड़ियाँ अपने आप में बहुत सघन (Dense) और रालदार (Resinous) होती हैं। इनमें प्राकृतिक तेल और रेजिन्स होते हैं जो पानी के प्रति प्रतिरोध पैदा करते हैं।

वेनिस की इमारतों का निर्माण एक अद्भुत इंजीनियरिंग नमूना है। पानी के ऊपर भारी पत्थर की इमारतें खड़ी करने के लिए एक विशेष 'लेयरिंग' तकनीक का उपयोग किया गया। सबसे पहले, समुद्र की तलहटी में ओक और लार्च की लकड़ी के हजारों खंभों को पास-पास धंसाया जाता था। ये खंभे लगभग 25 सेंटीमीटर मोटे और 3.5 मीटर लंबे होते थे। इन्हें तब तक ठोका जाता था जब तक वे मिट्टी की सख्त परत (Caranto) तक न पहुँच जाएँ। एक बार जब खंभे मजबूती से धंस जाते थे, तो उनके ऊपरी सिरों को पानी के स्तर पर एक समान काटा जाता था ताकि एक समतल आधार (Level Platform) तैयार हो सके। इन खंभों के ठीक ऊपर लकड़ी के मोटे तख्तों (Planks) की दो परतें बिछाई जाती थीं। यह एक तरह का 'लकड़ी का फर्श' होता था जो पूरी इमारत के भार को सभी खंभों पर समान रूप से बांट देता था। लकड़ी के तख्तों के ऊपर इस्तियाई पत्थर (Istrian Stone) की परतें रखी जाती थीं। यह पत्थर वेनिस की इंजीनियरिंग का असली घटक है। यह एक विशेष प्रकार का वाटरप्रूफ चूना पत्थर (Limestone) है जो बहुत कम पानी सोखता है। इसे नींव और पानी के स्तर के बीच रखा जाता था ताकि समुद्र का खारा पानी ऊपर की ईंटों तक न पहुँच सके। जब पत्थर का मजबूत और वॉटरप्रूफ आधार तैयार हो जाता था, तब उसके ऊपर ईंटों की दीवारें और बाकी की इमारत बनाई जाती रही। एक दिलचस्प बात और तथ्य यह है कि वेनिस का प्रसिद्ध 'सांता मारिया डेला सैल्यूट' (Santa Maria della Salute) चर्च इतना भारी है कि उसे सहारा देने के लिए उसके नीचे 1,106,657 लकड़ी के खंभे गाड़े गए थे!

वेनिस के अलावा दुनिया में और भी कई ऐसे शहर और बस्तियाँ हैं जो दलदली इलाकों (Swamplands) या पानी के ऊपर बहुत ही खूबसूरती से बसाई गई हैं। अनेक विश्व यात्रियों के ट्रेवल वीडियोस में हमने कई ऐसी बस्तियों की आभासी सैर करते हुए रोमांच और कुतुहल को महसूस किया है।  रूस का सेंट पीटर्सबर्ग (St. Petersburg, Russia)जिसे 'उत्तर का वेनिस' कहा जाता है, ज़ार पीटर द ग्रेट ने इस शहर को नेवा नदी के मुहाने पर बसे एक विशाल दलदल को सुखाकर बनाया था। वेनिस की तरह ही यहाँ की बड़ी इमारतों की नींव के नीचे भी हज़ारों लकड़ी के खंभे गाड़े गए हैं। यहाँ की नहरें और शाही महल देखने लायक होते हैं। मेक्सिको का आधुनिक मेक्सिको सिटी (Mexico City, Mexico) मूल रूप से टेक्सकोको झील (Lake Texcoco) के बीच एक द्वीप पर बसी थी। एज़्टेक साम्राज्य ने 'चिनाम्पा' (Chinampas) नामक तैरते हुए बगीचों और कृत्रिम द्वीपों का उपयोग करके इस शहर का विस्तार किया था। आज भी 'ज़ोचिमिलको' (Xochimilco) नामक क्षेत्र में इन प्राचीन नहरों और रंगीन नावों का आनंद लिया जा  सकता है। चीन का सुझोऊ अपनी सुंदर नहरों, पत्थर के पुलों और क्लासिकल उद्यानों के लिए 'पूर्व का वेनिस' के रूप में प्रसिद्ध है। कहा जाता है। यह शहर यांग्त्ज़ी नदी के डेल्टा में स्थित एक आर्द्रभूमि (Wetland) पर बना है। यहाँ की 'वाटर टाउन्स' जैसे झोउज़ुआंग (Zhouzhuang) पर्यटकों के बीच बहुत लोकप्रिय हैं। नीदरलैंड का गेथूर्न (Giethoorn, Netherlands)छोटा सा यह गाँव पूरी तरह से दलदली ज़मीन पर बना है। यहाँ सड़कों के नाम पर केवल नहरें हैं। लोग एक घर से दूसरे घर जाने के लिए नावों या लकड़ी के ऊंचे पुलों का उपयोग करते हैं। यहाँ की शांति और हरियाली घुमक्कड़ों के लिए स्वर्ग जैसी है। अफ्रीका के बेनिन में स्थित गनविए बस्ती 'नोकोउए झील' (Lake Nokoué) के बीचों-बीच पानी पर बसी है। इसे 'अफ्रीका का वेनिस' भी कहा जाता है। यहाँ के सभी घर बाँस और लकड़ी के खंभों (Stilts) पर टिके हैं। यहाँ तक कि यहाँ के बाज़ार भी नावों पर ही लगते हैं। म्यांमार की इले झील म्यांमार (Inle Lake, Myanmar) के ऊपर यहाँ की 'इनथा' जनजाति के लोग खंभों पर बने घरों में रहते हैं। ये लोग तैरते हुए खेतों (Floating Gardens) में सब्जियां उगाते हैं और पैर से नाव चलाने की अपनी अनोखी कला के लिए जाने जाते हैं।

​हमारे देश भारत के मणिपुर में स्थित लोकतक झील अपनी 'फुमडी' (Phumdis) के लिए विश्व प्रसिद्ध है। ये सड़ती हुई वनस्पतियों और मिट्टी से बने तैरते हुए द्वीप हैं। इन द्वीपों पर मछुआरे अपनी झोपड़ियाँ बनाकर रहते हैं। यहाँ दुनिया का एकमात्र तैरता हुआ राष्ट्रीय उद्यान 'केइबुल लामजाओ' भी स्थित है। दलदल और पानी में बसी लकड़ियों पर खड़ी बस्तियों में यात्रा करना न केवल रोमांचक है, बल्कि यह यह भी सिखाता है कि कैसे मनुष्य ने कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बिठाकर अद्भुत सभ्यताओं का निर्माण किया है।

ब्रजेश कानूनगो 

Thursday, 26 March 2026

चिली, शुष्क मिर्च में डेजर्ट का आकर्षण

चिली, शुष्क मिर्च में डेजर्ट का आकर्षण  

विश्व मानचित्र को देखने पर रचनात्मक दृष्टि संपन्न लोगों ने उसमें पृथ्वी के समस्त भूभाग में फुटबॉल खेलती एक मासूम बिल्ली की आकृति की कल्पना की है। गौर से देखने पर यह दिखाई भी देता है। भारत के नक्शे में हम भारत माता को तिरंगा थामे खड़े अनुभव करते हैं। अनेक देश प्रदेशों ने अपने भूभाग में किसी न किसी चीज या प्रिय के प्रतीकात्मक आकार महसूस किया है।चिली देश के मानचित्र में मिर्च की कल्पना की गई है, जो दुनिया का सबसे बड़ा मिर्च उत्पादक देशों में से एक है। इसी तरह, अन्य देशों के मानचित्र में भी विभिन्न वस्तुओं, प्राणियों या प्रतीकों की कल्पना की गई है। 

इटली का मानचित्र एक बूट की तरह दिखता है। ऑट्रेलिया का मानचित्र एक हाथी की तरह, फ्रांस का मानचित्र एक षट्भुज की तरह ,श्रीलंका का मानचित्र आंसू की एक बूंद की तरह, जापान का मानचित्र एक ड्रैगन की तरह दिखता है। कोस्टारिका का मानचित्र एक पेंसिल की तरह दिखता है। क्यूबा का मानचित्र मगरमच्छ की तरह, आइसलैंड का मानचित्र एक बड़े पत्थर की तरह और ग्रीस का मानचित्र एक हाथ की तरह दिखाई देता है। 

इसी तरह दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर स्थित चिली भी अपनी अनोखी भौगोलिक स्थिति और बनावट में एक मिर्ची के रूप में दिखाई देता है। जो दुनिया का सबसे बड़े मिर्च उत्पादक देशों में से भी एक है। यह देश अपनी विविधता के लिए जाना जाता है। यह दुनिया का सबसे लंबा देश है, जो 4,300 किलोमीटर से अधिक लंबा है, लेकिन इसकी औसत चौड़ाई केवल 180 किलोमीटर है। 

एक बड़ी पतली मिर्च के आकार वाले देश चिली के नाम के पीछे कई कहानियां और सिद्धांत प्रचलित हैं, लेकिन सबसे लोकप्रिय कहानी यह है कि देश का नाम चिली शब्द से आया है, जो कि मैपुचे भाषा से लिया गया है। मैपुचे दक्षिणी चिली में रहने वाले स्वदेशी समुदाय हैं। एक सिद्धांत के अनुसार, चिली शब्द का अर्थ है "जहां पृथ्वी समाप्त होती है "या "पृथ्वी का अंत"। यह नाम संभवतः मैपुचे लोगों द्वारा दिया गया था, जो चिली को अपनी पृथ्वी की सीमा मानते थे। एक अन्य कहानी के अनुसार, चिली का नाम चिली पेप्पर से आया है, जो कि देश में पाया जाने वाला एक प्रकार की मिर्च है। स्पेनिश विजेताओं ने इस मिर्च को चिली कहा, और बाद में यह नाम पूरे देश के लिए उपयोग किया जाने लगा। एक अन्य सिद्धांत के अनुसार, चिली का नाम इंका भाषा के शब्द चिली से आया है, जिसका अर्थ है ठंड या बर्फ। यह नाम संभवतः इंका साम्राज्य के दौरान दिया गया था, जब उन्होंने चिली को अपने साम्राज्य का हिस्सा बनाया था । वस्तुतः इन सब कहानियों से उसके अनोखे मिर्ची आकार के कारण ही मान्यता मिलती है।

चिली में तीन मुख्य भौगोलिक क्षेत्र हैं, अटाकामा डेसर्ट (उत्तर), सेंट्रल वैली (मध्य), और पैटागोनिया (दक्षिण)। देश में कई सक्रिय ज्वालामुखी और भूकंप-प्रवण क्षेत्र हैं। चिली की राजधानी सैंटियागो है, जो सेंट्रल वैली में स्थित है। चिली एक उच्च-आय वाली अर्थव्यवस्था है, जो मुख्य रूप से तांबे के निर्यात पर निर्भर है। देश में लिथियम, सोना और अन्य खनिजों के भंडार भी हैं। चिली की अर्थव्यवस्था 2024 में 2.6% की दर से बढ़ी है। चिली की आबादी लगभग 18.66 मिलियन है, जिसमें से 88% लोग शहरी क्षेत्रों में रहते हैं।यहां उच्च जीवन प्रत्याशा (80.3 वर्ष) और उच्च साक्षरता दर है। चिली में एक मजबूत मध्यम वर्ग है, लेकिन अभी भी आय असमानता एक समस्या है।

पर्यटनीय दृष्टि से चिली में कई प्राकृतिक आकर्षण हैं। अटाकामा डेसर्ट, पैटागोनिया, और ईस्टर द्वीप और कई राष्ट्रीय उद्यान और संरक्षित क्षेत्र भी हैं जिनमें पर्यटक निरंतर आते रहते हैं। राजधानी सैंटियागो स्वयं एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है, जो अपने सांस्कृतिक और ऐतिहासिक आकर्षणों के लिए जाना जाता है ।

विश्व साइकिल यात्री साइकिल बाबा के डॉ राज और नोमेडिक टूर के तौरवशु के ट्रैवल वीडियोस के जरिए हमने चिली की आभासी यात्रा में यहां के प्रमुख स्थलों और विशेषताओं को देखने समझने की कोशिश की। खासतौर से चिली में स्थित अटाकामा रेगिस्तान के प्रमुख स्थल बहुत प्रभावित करते हैं। 

दुनिया भर में फैले रेगिस्तान पृथ्वी के सबसे रहस्यमयी और अद्भुत हिस्सों में से हैं। ये केवल रेत के ढेर नहीं हैं, बल्कि अपनी भौगोलिक बनावट और जलवायु के कारण एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं। उत्तरी अफ्रीका का सहारा दुनिया का सबसे बड़ा गर्म रेगिस्तान है, चीन और मंगोलिया में फैला गोबी रेगिस्तान बेहद ठंडा और ऊंचे पहाड़ों और बर्फीली सर्दियों के लिए प्रसिद्ध है। दुनिया का सबसे बड़ा और ठंडा ध्रुवीय रेगिस्तान अंटार्कटिक है जो दक्षिण ध्रुव पर स्थित है। हमारे भारत और पाकिस्तान में स्थित थार मरुस्थल सबसे अधिक जनसंख्या वाला रेगिस्तान है। 

चिली में स्थित अटाकामा रेगिस्तान को दुनिया का सबसे सूखा (Non-polar) स्थान माना जाता है। इसकी कुछ अनूठी विशेषताएं इसे अन्य रेगिस्तानों से बिल्कुल अलग बनाती हैं। अत्यधिक शुष्क इस रेगिस्तान के कुछ हिस्सों में सैकड़ों सालों से एक बूंद बारिश भी नहीं हुई है। यहाँ की मिट्टी इतनी सूखी है कि इसकी तुलना मंगल ग्रह (Mars) की मिट्टी से की जाती है। यही कारण है कि नासा (NASA) यहाँ अपने मार्स रोवर का परीक्षण करता है।

यह एंडीज पर्वतमाला और चिली कोस्ट रेंज के बीच स्थित है। एंडीज पर्वत पूर्व से आने वाली नमी को रोक देते हैं (Rain Shadow Effect), जिससे यहाँ बारिश की संभावना लगभग शून्य हो जाती है।बारिश न होने के बावजूद, समुद्र की ओर से आने वाला घना कोहरा (जिसे स्थानीय भाषा में 'कैमंचका' कहते हैं) यहाँ के जीवन का आधार है। यहाँ के लोग और कुछ विशेष पौधे 'फॉग हार्वेस्टर' जालों के जरिए इस कोहरे से पानी इकट्ठा करते हैं। सहारा जैसे रेगिस्तान दिन में बहुत गर्म होते हैं, लेकिन अटाकामा का तापमान साल भर काफी सुहावना (औसतन 18°C से 22°C) रहता है, हालांकि रातें बहुत ठंडी होती हैं।  यह दुनिया के सबसे बड़े तांबे और लिथियम के भंडारों में से एक है। अत्यधिक सूखे के कारण, यहाँ के कुछ हिस्सों में बैक्टीरिया तक जीवित नहीं रह पाते, जो इसे सहारा या थार की तुलना में अधिक बंजर बनाता है।

​अटाकामा अपनी 'परग्रही' (Alien-like) बनावट के कारण पर्यटकों और वैज्ञानिकों के लिए स्वर्ग के समान है। हमारे प्रिय ब्लॉगरों के वीडियोस के जरिए हमने कई स्थलों को देखा। ​वैली ऑफ द मून (Valle de la Luna) की चट्टानें और नमक के ऊँचे टीले बिल्कुल चंद्रमा की सतह जैसे दिखते हैं। सूर्यास्त के समय यहाँ का नजारा अद्भुत होता है। ​एल टाटियो गीजर (El Tatio Geysers) दुनिया के सबसे ऊँचे गीजर क्षेत्रों में से एक है, जहाँ सुबह-सवेरे जमीन से गर्म पानी के फव्वारे निकलते हैं। ​तारामंडल और खगोल विज्ञान के लिए उपयुक्त साफ़ आसमान और प्रदूषण मुक्त वातावरण के कारण अटाकामा स्टारगेजिंग (Stargazing) के लिए दुनिया की सबसे अच्छी जगह है। यहाँ दुनिया की सबसे बड़ी दूरबीनें (जैसे ALMA) स्थित हैं। ​हाथ की विशाल आकृति (Mano del Desierto) जो रेगिस्तान के बीचों-बीच बनी हुई है पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। साइकिल बाबा डॉ राज यहां अपनी साइकिल को इसी मूर्ति के पास खड़ा कर कैंप लगाकर पूरी रात इस निर्जन स्थल पर बिताते हैं और सुबह की किरणों के साथ सुंदर सूर्योदय के दर्शन करा देते हैं। 

ये सच है कि चिली जैसे दूरस्थ देश तक पहुंचना ही किसी भारतीय आम पर्यटक के लिए बहुत कठिन और खर्चीला होता है। लेकिन घुमक्कड़ों के माध्यम से यहां की आभासी सैर भी बहुत कुछ जानने समझने का अवसर तो दे ही देती है। 

ब्रजेश कानूनगो 



Wednesday, 25 March 2026

जिधर दम उधर हम : दमदार है सूरजमुखी

जिधर दम उधर हम : दमदार है सूरजमुखी


जिस तरह हजारों खिले हुए ट्यूलिप के रंगबिरंगे पुष्प हमारा मन मोह लेते हैं उसी तरह खिले हुए सुन्दर पीले सूरजमुखी के बगीचे या खेत अनोखी छटा बिखेर देते हैं।  सूरजमुखी के फूलों का एक विशेष गुण इन्हें अन्य पुष्पों से एक अलग श्रेणी में रखता है।  यह फूल प्रायः अपना मुख सूर्य की ओर बनाए रखता है। जिधर दम उधर हम वाली उक्ति इस फूल पर बहुत हद तक लागू होती है। सूरजमुखी स्वयं भी अपने आप में बड़ा दमदार फूल होता है,  इसकी खेती न केवल सुंदर दृश्यों के लिए, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह एक ऐसी फसल है जो कम पानी और विभिन्न जलवायु परिस्थितियों में जीवित रहने की क्षमता रखती है। सूरजमुखी का एक बड़ा फूल वास्तव में हजारों छोटे-छोटे फूलों का एक समूह होता है? जिन्हें 'डिस्क फ्लोरेट्स' कहा जाता है।

दिन चढ़ते ही सूर्य के साथ साथ यह मुड़ता जाता है।  सूरजमुखी (Sunflower) का सूर्य की ओर मुड़ना प्रकृति की एक अद्भुत घटना है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में हेलियोट्रोपिज्म (Heliotropism) कहा जाता है। यह प्रक्रिया मुख्य रूप से पौधे के विकास और उसकी जैविक घड़ी (Circadian Rhythm) से जुड़ी होती है। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण हैं।  सूरजमुखी के तने में ऑक्सिन (Auxin) नाम का एक प्लांट हार्मोन पाया जाता है। यह हार्मोन सूर्य के प्रकाश के प्रति बहुत संवेदनशील होता है। जब सूरज की रोशनी तने के एक हिस्से पर पड़ती है, तो ऑक्सिन हार्मोन तने के छाया वाले हिस्से में जाकर जमा हो जाता है। हार्मोन की अधिकता के कारण छाया वाला हिस्सा तेजी से बढ़ता है, जिससे तना सूर्य की दिशा में झुक जाता है। इंसानों की तरह पौधों में भी एक आंतरिक जैविक घड़ी होती है। सूरजमुखी को पता होता है कि सूरज कब और कहाँ से उगने वाला है। दिन के समय फूल पूर्व से पश्चिम की ओर सूरज का पीछा करता रहता है। रात के समय: रात में यह अपनी घड़ी के अनुसार धीरे-धीरे वापस पूर्व की ओर मुड़ जाता है ताकि अगली सुबह की पहली किरण का स्वागत कर सके।  सूरजमुखी के फूल का सूर्य की ओर मुख रखने का एक बड़ा घटक 'गर्मी' है। गर्म फूल मधुमक्खियों और अन्य परागण करने वाले कीटों को अपनी ओर अधिक आकर्षित करते हैं। वैज्ञानिक शोधों के अनुसार, गर्म फूलों पर बैठने वाले कीट ठंडे फूलों की तुलना में अधिक सक्रिय रहते हैं, जिससे पौधे के प्रजनन में मदद मिलती है। यह भी दिलचस्प है कि सूरज के साथ मुड़ने की यह प्रक्रिया केवल युवा सूरजमुखी के पौधों में देखी जाती है। जब सूरजमुखी का फूल पूरी तरह खिल जाता है और परिपक्व (Mature) हो जाता है, तो उसका तना सख्त हो जाता है और वह स्थायी रूप से पूर्व दिशा की ओर मुख करके स्थिर हो जाता है।

औषधीय और रसोईघर की जरूरतों के लिए भी सूरजमुखी कम महत्वपूर्ण नहीं है। सूरजमुखी के बीज और तेल में विटामिन ई, मैग्नीशियम, सेलेनियम और लिनोलेइक फैटी एसिड प्रचुर मात्रा में होते हैं। इसमें मौजूद 'मोनो-अनसैचुरेटेड' और 'पॉली-अनसैचुरेटेड' फैट्स खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) को कम करने में मदद करते हैं, जिससे दिल की बीमारियों का खतरा कम होता है। विटामिन ई E एक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट है। सूरजमुखी के तेल का उपयोग त्वचा को सूरज की अल्ट्रावायलेट (UV) किरणों से बचाने और घावों को जल्दी भरने में मदद करता है। इसके बीजों का सेवन गठिया (Arthritis) और जोड़ों के दर्द में सूजन कम करने में सहायक हो सकता है। इसके बीजों में फाइबर अच्छी मात्रा में होता है, जो पाचन तंत्र को ठीक रखता है और तुरंत ऊर्जा प्रदान करता है। तेल में मौजूद ओमेगा-6 फैटी एसिड बालों के झड़ने को कम करने और उन्हें चमकदार बनाने में मदद करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अत्यधिक मात्रा में सूरजमुखी के तेल का उपयोग 'ओमेगा-6' की अधिकता कर सकता है, इसलिए इसे अन्य तेलों (जैसे जैतून या सरसों का तेल) के साथ बदलकर इस्तेमाल करना सबसे बेहतर रहता है।

वस्तुतः सूरजमुखी मूल रूप से उत्तरी अमेरिका का पौधा है, लेकिन आज यह पूरी दुनिया में उगाया जाता है। यूक्रेन और रूस दुनिया के सबसे बड़े सूरजमुखी तेल उत्पादक देश हैं। वैश्विक आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा यहीं से आता है। यूरोपीय संघ के अर्जेंटीना, बुल्गारिया और रोमानिया भी बड़े उत्पादक हैं। भारत में कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार मुख्य उत्पादक राज्य हैं। यहाँ इसे रबी (सर्दियों) और खरीफ (मानसून) दोनों सीजन में उगाया जा सकता है। प्रायः लगभग हर तरह की मिट्टी में उग सकता है, लेकिन अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टी (Loamy Soil) इसके लिए सर्वोत्तम है। अंकुरण के लिए 15 डिग्री सेल्सियस और विकास के लिए 20 से 25 डिग्री सेल्सियस का तापमान आदर्श माना जाता है । इसकी फसल साल में कभी भी ली जा सकती है, बशर्ते पकने के समय बहुत अधिक बारिश न हो। सूरजमुखी का पौधा "शून्य अपशिष्ट" (Zero Waste) की श्रेणी में आता है क्योंकि इसके हर हिस्से का कुछ न कुछ उपयोग हो जाता है. इसका तेल हल्का होता है और इसमें विटामिन E की प्रचुर मात्रा होती है, जो हृदय स्वास्थ्य के लिए अच्छा माना जाता है। तेल निकालने के बाद बची हुई 'खली' (Oil Cake) पशुओं के लिए प्रोटीन का बेहतरीन स्रोत है। भुने हुए बीज प्रोटीन और फाइबर का अच्छा स्रोत हैं, जिन्हें लोग पौष्टिकता के कारण बादाम की तरह खाते हैं। यह मिट्टी से भारी धातुओं (जैसे लेड और आर्सेनिक) को सोखने की क्षमता रखता है, जिससे भूमि सुधार होता है. इसके तेल का उपयोग बायो-डीजल बनाने में भी किया जाने लगा  है।

एक और विशेष गुण  जिसने इस  ख़ूबसूरत फूल का नाम  "फाइटोरेमेडिएशन" के क्षेत्र में दर्ज करवा दिया है, सूरजमुखी का पौधा मिट्टी से जहरीले तत्वों (जैसे यूरेनियम, स्ट्रोंटियम और सीसा) को सोखने की अद्भुत क्षमता रखता है। 1986 में चेरनोबिल परमाणु दुर्घटना के बाद, वहां की मिट्टी और पानी से रेडियोधर्मी विकिरण को कम करने के लिए बड़े पैमाने पर सूरजमुखी उगाए गए थे। सच तो यह है कि पुष्पों के संसार में सूरजमुखी किसी सूरज की तरह ही सम्माननीय होने की पात्रता रखता है। 


ब्रजेश कानूनगो


 


Sunday, 22 March 2026

बोझिल भविष्य में सुख देंगी कलाएं

बोझिल भविष्य में सुख देंगी कलाएं

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और प्रौद्योगिकी में हम जिस तेजी से आगे बढ़ रहे हैं इससे लगता है कि दुनिया भर के,हर क्षेत्र और हर विषय के ज्ञान से हम कुछ समय बाद लबालब भरे होंगे। बल्कि हमारा ज्ञान छलक छलक कर बाहर आने को बेताब होगा। यह एक नई ऊब हमारे जीवन मे ला सकती है। कुछ पाने के लिए हमारे पास करने को कुछ नहीं होगा जिससे जीवन मे प्रवाह,उमंग और उत्साह बढ़ता रहे। ऐसे में मुझे लगता है हमारे संतोष और खुशी मे केवल उन कलाओं की भूमिका ही रह जाएगी जो हमारी आदिम सभ्यता का हिस्सा रहीं हैं। जो हमारे मनुष्य होने से संभव हुईं हैं।  जिन्हें हम प्रदर्शन कलाओं और ललित कलाओं के नाम से पुकारते हैं।

ललित कला (Fine Arts) और प्रदर्शन कला  (Performing Arts) मानवीय अभिव्यक्ति के दो सबसे सुंदर स्तंभ हैं। जहाँ ललित कला को हम देख और महसूस कर सकते हैं, वहीं प्रदर्शन कला (परफॉर्मिंग आर्ट) को समय और गति के माध्यम से जिया जाता है। ललित कला का मुख्य उद्देश्य सौंदर्य और दृश्य आनंद पैदा करना है। यह अक्सर "स्थिर" होती है और इसे भौतिक माध्यमों (जैसे रंग, मिट्टी या पत्थर) से बनाया जाता है। जैसे चित्रकला,मूर्तिकला,वास्तुकला,,रेखांकन आदि जिनमें कलाकार स्वयं रचनात्मक रूप से सक्रिय रहता है। वहीं प्रदर्शन कला (परफॉर्मिंग आर्ट) में कलाकार अपने शरीर, आवाज और चेहरे के हाव-भाव का उपयोग करके कला का प्रदर्शन करते हैं। यह 'क्षणभंगुर' होती है—यानी यह प्रदर्शन के साथ ही घटित होती है और समाप्त हो जाती है। इन कलाओं में संगीत, नृत्य, नाटक और कुछ हद तक मार्शल आर्ट को शामिल किया जा सकता है।

जब मनुष्य के पास सब कुछ होगा तो वह अपनी खुशी के लिए चित्र बनाएगा, धातुओं,काष्ठ में मूर्ति या चट्टानों में शिल्प गढ़ेगा या फिर गाने, बजाने और शारीरिक प्रस्तुतियों से खुद को और समाज को आनंदित होने का अवसर देगा। नृत्य करेगा, अभिनय के माध्यम से लोक कथाएं या कहानियां देखी सुनी जाएंगी। दरअसल, एक ट्रैवल वीडियो में  पश्चिम अफ्रीका के आइवरी कोस्ट (Ivory Coast) के गौरो (Guro) समुदाय के प्रसिद्ध 'ज़ौली' (Zaouli) नृत्य को देखते हुए जो खुशी और आनंद की अनुभूति हुई उसने हमारा विश्वास दृढ़ किया कि चाहे जितना हम विकास कर लें, प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बौद्धिकता से सब कुछ पा लें लेकिन हमारी प्राचीन कलाएं सदैव हमारे साथ बनी रहेंगीं। हमारे जीवन में रस घोलती रहेंगी।

ज़ौली' (Zaouli) नृत्य अपनी अविश्वसनीय गति और जटिल फुटवर्क के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। ज़ौली (Zaouli) नृत्य की सबसे बड़ी विशेषता इसकी लय और ताल है, जिसे विशिष्ट पारंपरिक वाद्ययंत्रों के माध्यम से जीवंत किया जाता है। संगीत और नर्तक के पैरों की गति के बीच का तालमेल ही इस प्रदर्शन को जादुई बनाता है। ज़ौली में संगीत केवल बैकग्राउंड में नहीं बजता, बल्कि यह नर्तक के लिए एक 'चुनौती' की तरह होता है। ड्रमर एक जटिल ताल बजाता है, और नर्तक को अपने पैरों से ठीक उसी ताल को दोहराना होता है। जैसे-जैसे ड्रम की गति बढ़ती है, नर्तक को अपनी शारीरिक क्षमता की सीमाओं को पार करते हुए और भी तेज़ी से थिरकना पड़ता है। संगीत में अचानक आने वाले ठहराव (Breaks) पर नर्तक को बिल्कुल स्थिर हो जाना पड़ता है, जो दर्शकों के लिए सबसे रोमांचक क्षण होता है।

इस नृत्य की शुरुआत 1950 के दशक में हुई थी। माना जाता है कि यह एक सुंदर लड़की 'ज़ौली' (Zaouli) से प्रेरित है। यह नृत्य स्त्री सौंदर्य और अनुग्रह (Grace) का सम्मान करने के लिए किया जाता है, हालांकि इसे पारंपरिक रूप से पुरुषों द्वारा ही प्रदर्शित किया जाता है। 2017 में, इस नृत्य को इसकी सांस्कृतिक विशिष्टता के कारण यूनेस्को (UNESCO) की 'अमूर्त सांस्कृतिक विरासत' (Intangible Cultural Heritage) की सूची में शामिल किया गया था।  हमने वीडियो के जरिए आभासी आनंद लेते हुए देखा कि इसमें नर्तक एक चमकीले रंग का लकड़ी का मुखौटा पहनता है, जो अक्सर किसी जानवर या सुंदर महिला के चेहरे को दर्शाता है। यह मुखौटा गौरो शिल्पकारों की बेहतरीन कला का नमूना होता है। नर्तक शरीर पर रंगीन बुने हुए कपड़े और पैरों में घंटियाँ पहनता है। हाथों में अक्सर पूंछ के बालों से बने 'फ्लाइविस्क' (Fly-whisks) होते हैं, जो नृत्य के दौरान हवा में लहराते हैं। यह नृत्य दुनिया के सबसे चुनौतीपूर्ण नृत्यों में से एक माना जाता है क्योंकि नर्तक के पैर इतनी तेज़ी से चलते हैं कि वे आंखों से धुंधले दिखने लगते हैं। यह शरीर के ऊपरी हिस्से को स्थिर रखते हुए किया जाता है। नृत्य पूरी तरह से ड्रम और बांसुरी की थाप पर आधारित होता है। नर्तक और ड्रमर के बीच एक गहरा संवाद होता है; हर कदम ड्रम की एक विशिष्ट बीट के साथ मेल खाता है। यह शारीरिक रूप से बहुत थका देने वाला होता है, इसलिए एक प्रदर्शन के लिए नर्तक को बहुत अभ्यास और ताकत की आवश्यकता होती है। ट्रैवलर को स्थानीय निवासी बताते हैं कि यह नृत्य केवल मनोरंजन नहीं है, बल्कि यह गांवों के बीच एकता का प्रतीक भी है। इसे शादी, उत्सवों और कभी-कभी अंतिम संस्कार के समय भी प्रदर्शित किया जाता है ताकि समुदाय के बीच भाईचारा बढ़े।

यदि अपने देश के संदर्भ में बात करें तो भारत में शास्त्रीय नृत्य कलाएं और लोक नृत्य कलाएं दोनों ही अपनी अनूठी शैली और सांस्कृतिक महत्व के लिए प्रसिद्ध हैं।तमिलनाडु का भरतनाट्यम नृत्य अपनी भावपूर्ण भंगिमाओं और जटिल पदचाप के लिए जाना जाता है।उत्तर प्रदेश का कथक नृत्य तेज़ ताल और पैरों की जटिल तकनीक के लिए प्रसिद्ध है। केरलम का कथकली नृत्य रंगीन मेकअप, वेशभूषा और नाटकीय अभिव्यक्ति के लिए प्रसिद्ध है। आंध्र प्रदेश का कुचिपुड़ी नृत्य नाटक और नृत्य का सुंदर संगम है। मणिपुर का मणिपुरी नृत्य अपनी कोमलता और लयबद्धता के लिए जाना जाता है। केरलम का मोहिनीअट्टम नृत्य स्त्रीत्व और लालित्य का प्रतीक है। ओडिशा का ओडिसी नृत्य मंदिरों से जुड़ा है और भक्ति भावनाओं से ओतप्रोत है। असम का सत्रिया नृत्य अपनी अनूठी शैली और सांस्कृतिक महत्व के लिए जाना जाता है। इन शास्त्रीय नृत्यों के अलावा हमारे देश में अनेक लोक नृत्य कलाएं भी बहुत प्रसिद्ध और लोकप्रिय हैं असम का बिहू अपनी ऊर्जा और उत्साह के लिए जाना जाता है। पंजाब का भांगड़ा अपनी जोशीली और उत्साही शैली के लिए प्रसिद्ध है। गुजरात का गरबा अपनी अनूठी शैली और सांस्कृतिक महत्व के लिए जाना जाता है। महाराष्ट्र की लावणी अपनी भावपूर्ण और आकर्षक शैली के लिए प्रसिद्ध है। राजस्थान का घूमर नृत्य अपनी अनूठी शैली और सांस्कृतिक महत्व के लिए जाना जाता है।

इन विविध नृत्य कलाओं से समृद्ध देश होने के कारण हम आश्वस्त हो सकते हैं कि भविष्य में सब कुछ पा लेने के भारी बोझ के बीच भी हमारे लिए अपने आनंद की राह निकाल लेना कठिन नहीं होगा।

ब्रजेश कानूनगो









Tuesday, 17 March 2026

ग्रामीणों के लिए पेड़ों के आबंटन की व्यवस्था कुछ दिनों पूर्व हमने एक विश्व यात्री और यूट्यूबर

ग्रामीणों के लिए पेड़ों के आबंटन की व्यवस्था

कुछ दिनों पूर्व हमने एक विश्व यात्री और यूट्यूबर के जरिए रूस के एक गांव की आभासी सैर की थी। हमने देखा कि प्रत्येक घर के परिसर में एक ऐसा स्टोरेज था जिसमें कटी हुई लकड़ियों के गुल्ले बड़ी व्यवस्थित रूप से जमाकर रखे हुए थे। निश्चित रूप से ये उस घर में रहने वाले परिवार की ऊर्जा का इंतजाम था और वह उनको सालभर आग और गर्मी का प्रबंध करने के लिए काम आने वाली थी।

जब ट्रैवलर ने अपने होस्ट से इस बारे में जानकारी मांगी तो उसने बताया कि वहां का प्रशासन गांव के हर परिवार को इस हेतु एक वृक्ष का आबंटन करता है, उसी की लकड़ियां काट कर सालभर की जरूरत के लिए सहेज कर रखी जाती हैं। हमारे लिए खासकर मेरे लिए यह बहुत न सिर्फ चौंकाने वाली बात थी बल्कि एक नई जिज्ञासा भी पैदा कर दी। साथ ही कुछ और जानकारी जुटाने के लिए प्रेरित किया। 

दरअसल, रूस के ग्रामीण क्षेत्रों में लकड़ी (wood) का आवंटन वहां की संस्कृति और कानून की एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात है जो  "रूसी वन संहिता" (Forest Code of the Russian Federation) के तहत मिलने वाली सुविधाओं को उपलब्ध कराती है। रूस में आज भी करोड़ों लोग लकड़ी के चूल्हों और 'बन्या' (पारंपरिक रूसी सौना) पर निर्भर हैं, इसलिए सरकार वहां के नागरिकों को मुफ्त या बहुत ही मामूली दाम पर लकड़ी काटने का अधिकार देती है।

रूसी कानून के अनुसार, हर नागरिक को अपनी व्यक्तिगत जरूरतों के लिए "मुफ्त" (या बहुत कम प्रशासनिक शुल्क पर) लकड़ी प्राप्त करने का अधिकार है। इस अधिकार के तहत सर्दियों में अपने ​घर को गर्म करने के लिए जलावन या हीटिंगअलाव के लिए हर साल एक निश्चित मात्रा दी जाती है। नया घर बनाने या पुराने की मरम्मत के लिए आमतौर पर हर 10-25 साल में एक बार लकड़ी का एक बड़ा हिस्सा आवंटित किया जाता है। प्रशासन पेड़ों को ऐसे ही नहीं काटने देता, इसके पीछे एक व्यवस्थित प्रक्रिया होती है। पहले ग्रामीण व्यक्ति स्थानीय वन विभाग (Lesnichestvo) में आवेदन करता है। वन अधिकारी जंगल के एक विशेष हिस्से में जाते हैं और उन पेड़ों पर निशान (Marking) लगाते हैं जिन्हें काटा जा सकता है। अक्सर ये वो पेड़ होते हैं जो बूढ़े हो गए हैं या जिन्हें हटाने से जंगल का स्वास्थ्य बेहतर हो सकता है। सरकार केवल पेड़ की 'लकड़ी' आवंटित करती है, उसे काटने और घर तक लाने की जिम्मेदारी ग्रामीण की होती है। उन्हें खुद आरी (Chainsaw) और ट्रैक्टर या घोड़ों का इंतजाम करना पड़ता है। सबसे चुनौतीपूर्ण यही काम होता है। लकड़ी की मात्रा क्षेत्र (Region) और जरूरत के आधार पर अलग-अलग होती है। जैसे ​साइबेरिया जैसे ठंडे इलाकों में जलावन के लिए प्रति परिवार सालाना 15 से 30 क्यूबिक मीटर तक लकड़ी मिल सकती है। ​घर बनाने के लिए यह मात्रा 50 से 100 क्यूबिक मीटर तक हो सकती है। ग्रामीण इस लकड़ी को बेच नहीं सकते। अगर कोई इस आवंटित लकड़ी को बेचते हुए पकड़ा जाता है, तो उसे भारी जुर्माना भरना पड़ता है। रूस का एक बड़ा हिस्सा गैस पाइपलाइनों से नहीं जुड़ा है, और वहां की सर्दियां -30°C से -50°C तक जा सकती हैं। ऐसे में लकड़ी ही जीवन बचाने का एकमात्र साधन है। यह परंपरा सदियों पुरानी है और आज भी वहां के ग्रामीण जीवन का आधार है।

रूस जैसी व्यवस्था दुनिया के कई अन्य देशों और भारत में भी मौजूद है, हालांकि इनके नियम और उद्देश्य स्थानीय जरूरतों और जलवायु के हिसाब से अलग-अलग हैं। रूस में मुख्य जोर "सर्दियों में बचने (Heating)" पर है, जबकि अन्य देशों में यह "आजीविका और पारंपरिक अधिकारों" से अधिक जुड़ा है। स्कैंडिनेवियाई देशो में (जैसे फिनलैंड, स्वीडन और नॉर्वे) रूस जैसी ही ठंड पड़ती है, इसलिए यहाँ "Everyman's Right" (सबका अधिकार) जैसा कानून है। ​यहाँ कोई भी व्यक्ति जंगल से सूखी लकड़ी इकट्ठा कर सकता है। ​हालांकि, अगर किसी को निर्माण के लिए जीवित पेड़ काटना है, तो उसे 'वन प्रबंधन योजना' के तहत अनुमति लेनी पड़ती है। यहाँ के लोग अक्सर निजी वनों के मालिक होते हैं, लेकिन उन पर भी नए पेड़ लगाने की सख्त कानूनी जिम्मेदारी होती है। इसके अलावा कनाडा में स्वदेशी समुदायों (First Nations) के पास पारंपरिक भूमि पर लकड़ी काटने के विशेष अधिकार हैं। वे अपनी सांस्कृतिक जरूरतों और घरों के निर्माण के लिए लकड़ी ले सकते हैं।अलास्का (यूएसए) जैसे क्षेत्रों में आम नागरिकों को "Personal Use Timber Permit" दिया जाता है, जिससे वे अपने घर के उपयोग के लिए एक निश्चित मात्रा में पेड़ काट सकते हैं।

​भारत में भी वनाधिकार अधिनियम (FRA) और 'निस्तार' अधिकार के तहत ग्रामीण और आदिवासी समुदायों के लिए जंगलों से संसाधन प्राप्त करने के कानूनी अधिकार हैं। ​वनाधिकार अधिनियम, 2006 (Forest Rights Act) कानून उन लोगों को अधिकार देता है जो पीढ़ियों से जंगलों में रह रहे हैं। इसके तहत ग्रामीण "लघु वन उपज" (Minor Forest Produce) जैसे बांस, जलावन लकड़ी और फल इकट्ठा कर सकते हैं। निस्तार (Nistar) अधिकार के रूप में भारत के कई राज्यों (जैसे मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़) में 'निस्तार' की पुरानी व्यवस्था है। इसके तहत ग्रामीणों को घर बनाने, खेती के औजार बनाने या अंतिम संस्कार के लिए रियायती दरों पर या मुफ्त में सरकारी डिपो से लकड़ी (Timber) आवंटित की जाती रही है। भारतीय वन अधिनियम के तहत कुछ जंगलों को "ग्राम वन" घोषित किया जाता है, जिनका प्रबंधन ग्राम सभा करती है। यहाँ ग्रामीण अपनी सामूहिक जरूरतों के लिए लकड़ी काट सकते हैं।

यह देखना भी गौरतलब होगा कि पेड़ और वनों से निकलने वाली लकड़ी के युक्तियुक्त प्रबंधन से ग्रामीणों और वहां के निवासियों को इन नीतियों का कितना लाभ मिलता है। निश्चित ही अध्ययन का यह एक अलग विषय हो सकता है।


ब्रजेश कानूनगो 

 

Monday, 16 March 2026

किराए पर पेड़ : पसीना नहीं पैसा मिठास घर तक पहुंचाता है

किराए पर पेड़  : पसीना नहीं पैसा मिठास घर तक पहुंचाता  है

खेती में बटाईदार किसान (Sharecropper) वह व्यक्ति होता है जो किसी दूसरे व्यक्ति की जमीन पर खेती करता है और फसल तैयार होने पर उसका एक निश्चित हिस्सा (बटाई) जमीन के मालिक को देता है। यह व्यवस्था भारत के ग्रामीण इलाकों में सदियों से चली आ रही है लेकिन इन दिनों फलों की फसल के लिए पेड़ किराए पर लेने का नया चलन काफी लोकप्रिय हो रहा है। इसे आमतौर पर 'ट्री एडॉप्शन' (Tree Adoption) या 'पेड़ लीज पर लेना' कहा जाता है। इसमें आप एक निश्चित समय या एक सीजन के लिए पेड़ का किराया देते हैं और उस पेड़ पर लगने वाले सभी फल आपके होते हैं।

परम्परागत बटाईदारी में आमतौर पर जमीन मालिक का निवेश (बीज, खाद) और किसान की मेहनत का एक तालमेल होता है।एक बटाईदार की प्राथमिक जिम्मेदारी जमीन की उत्पादकता बनाए रखना और फसल की सुरक्षा करना होती है।​खेती का सारा प्रबंधन याने जुताई, बुवाई, सिंचाई और निराई-गुड़ाई का पूरा जिम्मा बटाईदार का होता है। लागत की भी बटाई होती है।  क्षेत्र के रिवाजों के अनुसार, बीज, खाद और कीटनाशकों का खर्च या तो बटाईदार उठाता है या मालिक के साथ आधा-आधा बांटता है।​फसल की सुरक्षा हेतु आवारा पशुओं या चोरी से फसल को बचाना बटाईदार का कर्तव्य है। ईमानदारी पूर्ण बंटवारा करना जरूरी होता है।  फसल कटने के बाद तय समझौते (जैसे आधा-आधा या एक-तिहाई) के अनुसार बटाईदार को मालिक का हिस्सा सौंपना होता है।

इसके अलावा कानूनी और सामाजिक रूप से बटाईदारों के कुछ महत्वपूर्ण अधिकार होते हैं, हालांकि ये अलग-अलग राज्यों के भूमि सुधार कानूनों (Land Reform Laws) पर निर्भर करते हैं। ​फसल पर अधिकार के तहत तैयार फसल का एक बड़ा हिस्सा (समझौते के अनुसार) बटाईदार का होता है। मालिक उसे पूरी फसल से बेदखल नहीं कर सकता। उसे ​खेती का अधिकार होता है, यदि कोई लिखित या मौखिक समझौता है, तो मालिक बीच सीजन में किसान को खेत से नहीं हटा सकता। कई राज्यों में 'बटाईदार पंजीकरण' की सुविधा है, जिससे उन्हें किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) या फसल बीमा का लाभ मिल सकता है। यदि फसल खराब होती है, तो बटाईदार को यह अधिकार है कि वह नुकसान के आधार पर मालिक से लगान या हिस्सेदारी में छूट की बात करे।

हाल ही की एक खबर के अनुसार पेड़ किराए पर लेकर हम कम से कम 81% सस्ते ताजा अलफांसो आम प्राप्त कर सकते हैं। यह सेवा किराए पर एक पेड़ (Rent a Tree) नामक एक कृषि-स्टार्टअप द्वारा प्रदान की जा रही है, जो कोची में स्थित है। वे महाराष्ट्र, तमिलनाडु और केरल में 250 एकड़ अलफांसो आम के बागानों का प्रबंधन करते हैं और देश भर में 160 से अधिक ग्राहकों को सेवा प्रदान करते हैं। योजना में अपनी पसंद के अनुसार पेड़ चुन सकते हैं। योजना में तीन श्रेणियों में पेड़ उपलब्ध हैं, जिनकी कीमतें 10,300 रुपये से शुरू होती है। यह सेवा उन लोगों के लिए उपयुक्त है जो आम का आनंद लेना चाहते हैं लेकिन पेड़ की देखभाल करने में असमर्थ हैं। किराए पर एक पेड़( Rent a Tree) संस्थान पेड़ की देखभाल और आम की कटाई का काम संभालता है, जिससे ग्राहकों को ताजा और स्वादिष्ट आम मिलता है ।

दरअसल फलों की फसल के लिए पेड़ या बगीचा किराए पर लेने का चलन हमारे यहां रहा है। इसे आमतौर 'पेड़ लीज पर लेना' कहा जाता है। इसमें आप एक निश्चित समय या एक सीजन के लिए पेड़ या बाग का किराया देते हैं और पेड़ों पर लगने वाले सभी फल आपके होते हैं। ऐसे अनेक फल हैं जिनके पेड़ आमतौर पर  किराए पर मिल जाते हैं। मैंगो याने आम भारत में यह सबसे लोकप्रिय फल है। उत्तर प्रदेश (मलीहाबाद), महाराष्ट्र (रत्नागिरी) और गुजरात के कई बागान मालिक सीजन की शुरुआत में ही पेड़ों की नीलामी करते हैं या उन्हें किराए पर देते हैं। आप एक पेड़ चुन सकते हैं और सीजन खत्म होने तक उसके सारे फल आपके होंगे। ​हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में कई 'ऑर्किड' (फलों के बाग) पर्यटकों और स्थानीय लोगों को सेब के पेड़ किराए पर देते हैं। आप साल भर के लिए पेड़ गोद ले सकते हैं और फसल तैयार होने पर खुद जाकर तोड़ सकते हैं या उन्हें पैक करवाकर मंगवा सकते हैं। महाराष्ट्र और गुजरात के तटीय इलाकों में चीकू और नारियल के बागान अक्सर लंबी अवधि के लिए किराए पर दिए जाते हैं। नागपुर और राजस्थान के कुछ हिस्सों में संतरे के पेड़ों को कॉन्ट्रैक्ट पर लिया जा सकता है। इसमें अक्सर व्यापारी पूरे बाग का ठेका लेते हैं, लेकिन अब व्यक्तिगत स्तर पर भी एक-दो पेड़ किराए पर लेने की सुविधा कुछ फार्महाउस देने लगे हैं। बिहार (मुजफ्फरपुर) और उत्तराखंड में लीची के सीजन (मई-जून) के दौरान पेड़ों को किराए पर लेने का काफी चलन है।

​इस प्रक्रिया में एक ​समझौता (Agreement) किया जाता है जिसमें मालिक को एक निश्चित राशि (Rent) देना होती है। आमतौर पर पेड़ की देखभाल, खाद और पानी की जिम्मेदारी बागान मालिक की ही होती है, लेकिन अनुबंध के आधार पर यह बदल भी सकता है। लीज होल्डर को शुद्ध और ऑर्गेनिक फल मिलते हैं, और यदि अच्छा उत्पादन हो तो अक्सर यह बाजार भाव से सस्ता पड़ता है।  यदि प्राकृतिक आपदा (जैसे ओले या भारी बारिश) से फसल खराब होती है, तो नुकसान किराएदार का होता है।

आम खाने से मतलब जैसी संकुचित बातें भूलकर अब वह समय आ गया है जब हम फलों के उत्पादन, खेती, किसानी, बागवानी और उसके व्यवसाय के बारे में भी थोड़ी सी जानकारी प्राप्त कर उनकी मिठास को और अधिक संतुष्टिदायक बना लें तो कुछ गलत नहीं होगा।


ब्रजेश कानूनगो




युद्ध विरोध में शामिल तितलियाँ

युद्ध विरोध में शामिल तितलियाँ  कल्पना कीजिए कि आपके घर के छोटे से बगीचे में, 'मिल्कवीड' के पौधे पर एक नन्हा-सा अंडा है। एक दिन, उस ...