Wednesday, 18 February 2026

बादलों की तरह आकृतियां बनाती चोटियाँ

बादलों की तरह आकृतियां बनाती चोटियाँ

बचपन के दिनों में गर्मियों की रात को जब हम खुली छत पर सोने जाते तो दिन अस्त होने के पहले आकाश में छाए बादलों में अनेक आकृतियों की कल्पना करके असीम आनंद से भर जाते थे। बादलों में कभी कोई पक्षी दिखता तो कभी हाथी, बंदर या मनुष्य की छवि नजर आती थी। हम सब के लिए यह बहुत रोमांच और कुतुहल के दृश्य होते थे। ऐसी ही कुछ अनुभूति अफ्रीका के बुर्किना फासो के लेराबा प्रांत में स्थित सिंदौ की चोटियाँ (Peaks of Sindou) देखकर होने लगती है। ट्रैवलर दाऊद अखुनजादा के वीडियो के जरिए हमने इस इलाके की आभासी सैर करते हुए महसूस किया कि ​देखने में ये किसी "पत्थरों के जंगल" या किसी काल्पनिक शहर की मीनारों जैसी लगती हैं। किंतु जब हम इन चोटियों को देखने में अपनी कल्पनाशीलता को भी जोड़ लेते हैं तो इनमें कई मानव आकृतियां दिखाई देने लगती हैं। किसी चोटी में हैट लगाए कोई पुरुष दिखता है तो किसी में शिशु को उठाए कोई माँ दिखाई देने लगती है। 

सिंदौ की चोटियाँ (Peaks of Sindou) दुनिया के सबसे अद्भुत और सुंदर भूवैज्ञानिक संरचनाओं में से एक हैं। यह स्थान न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इसका सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व भी बहुत गहरा है।ये चोटियाँ मुख्य रूप से बलुआ पत्थर (Sandstone) से बनी हैं। लाखों वर्षों तक हवा और बारिश के कारण हुए कटाव (Erosion) ने इन चट्टानों को नुकीले स्तंभों, गुंबदों और अजीबोगरीब आकृतियों में बदल दिया है।​ इनका रंग समय और धूप के अनुसार बदलता रहता है, जिससे भिन्न समय में भिन्न कोण से इनका अलग सौंदर्य नजर आने लगता है। 

दरअसल ,प्रकृति एक अद्भुत कलाकार है, जो हवा, पानी और समय के मेल से पत्थरों को तराश कर ऐसी कृतियाँ बना देती है जिन्हें देखकर मानवीय वास्तुकला भी फीकी लगने लगती है। भौगोलिक रूप से इस प्रक्रिया को अपक्षय (Weathering) और अपरदन (Erosion) कहा जाता है। दुनिया में ऐसी कुछ प्रमुख  संरचनाओं पर नजर डालें तो इनमें अमेरिका के एरिजोना (संयुक्त राज्य अमेरिका)  में ग्रैंड कैनयन, नदी द्वारा किए गए कटाव का सबसे भव्य उदाहरण है। करोड़ों वर्षों तक कोलोराडो नदी के बहाव ने चट्टानों को काटकर इस दर्शनीय और अद्भुत विशाल घाटी का निर्माण किया है। यहाँ की चट्टानें पृथ्वी के भूगर्भीय इतिहास के लगभग 2 अरब साल पुराने रहस्यों को संजोए हुए हैं। इसकी गहराई 1.8 किमी तक है। यह अपनी अद्भुत लाल परतों और विशालता के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ हाइकिंग और रिवर राफ्टिंग काफी लोकप्रिय है। इसी तरह तुर्की के  अनातोलिया स्थित कप्पाडोसिया(Cappadocia) के अजीबोगरीब 'फेयरी चिमनी' (Fairy Chimneys) और गुफाएँ ज्वालामुखी विस्फोट के बाद हवा और बारिश के कटाव से बनी हैं। यहाँ की नरम 'टफ' चट्टानें आसानी से कट जाती हैं।यह ज्वालामुखी राख (Soft Tuff) और ऊपर की कठोर चट्टानों के असमान कटाव का परिणाम है।यह जगह अपने हॉट एयर बैलून राइड और जमीन के नीचे बसे प्राचीन शहरों के लिए मशहूर है। एरिजोना-यूटा सीमा, अमेरिका में  द वेव (The Wave) लहरों के आकार की अद्भुत चट्टानी संरचना है जो सैंडस्टोन (बलुआ पत्थर) पर हवा के कटाव (Wind Erosion) के कारण बनी है। यहाँ की धारियां जुरासिक काल के दौरान रेत के टीलों के जमा होने और फिर हवा द्वारा उन्हें तराशने से बनी हैं।इसकी संवेदनशीलता के कारण यहाँ जाने के लिए लॉटरी सिस्टम से बहुत कम परमिट दिए जाते हैं। चीन के हुनान प्रांत में स्थित जांगजियाजी नेशनल फॉरेस्ट पार्क (Zhangjiajie) जिससे ​प्रसिद्ध फिल्म 'अवतार' के पहाड़ों की प्रेरणा से ली गई है। ये ऊंचे स्तंभ जैसे पहाड़ पानी के कटाव और पौधों की जड़ों के फैलाव के कारण बने हैं। ये क्वार्ट्ज सैंडस्टोन के स्तंभ लाखों वर्षों के भौतिक कटाव का परिणाम हैं। यहाँ दुनिया का सबसे ऊंचा आउटडोर लिफ्ट और कांच का पुल सैलानियों के आकर्षण का केंद्र है। उत्तरी आयरलैंड में जाइंट्स कॉजवे (Giant's Causeway) पर ​समुद्र की लहरों और ज्वालामुखी क्रिया के मेल से यहाँ लगभग 40,000 षट्कोणीय (Hexagonal) बेसाल्ट स्तंभ बने हैं। यह ज्वालामुखी फटने के बाद लावा के तेजी से ठंडा होकर सिकुड़ने से बनी अनोखी ज्यामितीय संरचनाएं हैं।इसे यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा प्राप्त है और यह अपनी रहस्यमयी सुंदरता के लिए जाना जाता है।

इन्हीं अनोखी प्राकृतिक संरचनाओं के क्रम में ​सिंदौ की चोटियाँ भी अपना बहुत महत्व रखती हैं। बुर्किना फासो के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से यह एक है। ​स्थानीय सेनुफो (Senufo) लोगों के लिए यह स्थान अत्यंत पवित्र है। प्राचीन काल में, ये ऊँची और टेढ़ी-मेढ़ी चोटियाँ आक्रमणकारियों से बचने के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा दीवार का काम करती थीं।आज भी, स्थानीय लोग यहाँ अपने पूर्वजों का सम्मान करने और विशेष धार्मिक अनुष्ठान करने के लिए आते हैं। गाँव के कुछ हिस्से पर्यटकों के लिए प्रतिबंधित हैं क्योंकि वे पवित्र माने जाते हैं। 

बुर्किना फासो के सिंदौ शहर के बहुत करीब और 'बन्फोरा' (Banfora) शहर से लगभग 50 किमी की दूरी पर स्थित  इस जगह पर्यटकों के लिए पैदल चलने के रास्ते बने हुए हैं। ट्रैवलर के वीडियो में हमने देखा कि चोटियों के बीच से गुजरना एक भूलभुलैया में चलने जैसा अनुभव देता है। यहाँ से सूर्यास्त का नजारा अद्भुत होता है, जब ढलती धूप चट्टानों को सुनहरा और नारंगी रंग देती है।  स्थानीय कहानियों के अनुसार, ये चट्टानें आज भी "जीवित" मानी जाती हैं और विश्वास किया जाता है कि ये अनोखी चोटियाँ गांव की रक्षा करती हैं। ये ऐसी रोमांचक और अद्भुत चट्टाने हैं जिन्हें देखकर बादलों की तरह ही भिन्न आकृतियां इनमें खोजी जा सकती हैं। 

ब्रजेश कानूनगो 





Tuesday, 17 February 2026

कम कर सकते हैं इलेक्ट्रॉनिक कचरे का उत्पादन

 कम कर सकते हैं इलेक्ट्रॉनिक कचरे का उत्पादन 

दुनिया भर में इस वक्त इलेक्ट्रॉनिक कचरा (ई-वेस्ट) एक बहुत बड़ी पर्यावरणीय समस्या बन चुकी है। इस कचरे में पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जैसे मोबाइल फोन, कंप्यूटर, टीवी, फ्रिज और आधुनिक मोटर बाइक और कारों में प्रयुक्त इलेक्ट्रॉनिक प्रिंटेड बोर्ड और वायर आदि शामिल हैं। 

यूट्यूब पर एक ट्रैवलर ब्लॉगर के वीडियो में घाना की ऐसी बस्तियों को हमने नजदीक से देखा जहाँ बेहद प्रदूषित वातावरण में उनका जीवन गुजरता है। वहीं पर नदी के दूसरे किनारे पर कचरे के पहाड़ के पास ई-वेस्ट रिसाइक्लिंग की प्रक्रिया में इलेक्ट्रॉनिक कचरे को जलाकर मजदूरों द्वारा तांबा निकाला जा रहा था।

इस प्रक्रिया में पहले ई-वेस्ट को इकट्ठा किया जाता है और उसे जलाने के लिए तैयार किया जाता है। वेस्ट को टुकड़ों में काटकर, छांटकर अलग अलग किया जाता है फिर खुली आग में जलाया जाता है, जिससे तांबा और अन्य धातुएं पिघल जाती हैं। प्लास्टिक आदि जल जाते हैं और तांबा व अन्य धातु अलग हो जाते हैं। ई-वेस्ट में सोना, चांदी, तांबा और पैलेडियम जैसी कीमती धातु होती हैं। इनकी वैल्यू मार्केट में बहुत ज्यादा होती है। पिघली हुई धातुओं को ठंडा किया जाता है। तांबा को फिर से उपयोग करने के लिए पिघलाया जाता है। लेकिन इस प्रक्रिया में प्रदूषण बहुत तीव्रता से पर्यावरण में घुल मिल जाता है। 

जलने की प्रक्रिया से जहरीले धुएं और गैसें निकलती हैं, जो वायु प्रदूषण का कारण बनती हैं। प्रक्रिया से निकलने वाले रसायन जल स्रोतों में मिल जाते हैं, जिससे जल प्रदूषित होता है।  निकलने वाले रसायन मृदा याने मिट्टी में भी मिल जाते हैं, जिससे मिट्टी प्रदूषित होती है तथा भूमि की उर्वरता खत्म हो जाती है। ज्वलन और रसायनों से निकलने वाले धुएं और गैसें मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती हैं, जिससे श्वसन समस्याएं, कैंसर आदि के खतरे पैदा हो सकते हैं। 

भारत में भी ई-वेस्ट की मात्रा तेजी से बढ़ रही है, ऐसे में इसका उचित रिसाइक्लिंग करना बहुत जरूरी हो जाता है। एक जानकारी के अनुसार 2023-24 में भारत में 17.78 लाख मीट्रिक टन ई-वेस्ट उत्पन्न हुआ, जो 2017-18 की तुलना में 151.03% अधिक रहा है। 2023-24 में केवल 43% ई-वेस्ट का पुनर्चक्रण हुआ, जबकि 57% अनौपचारिक क्षेत्र में पहुंच गया। मुंबई, दिल्ली, बैंगलोर, चेन्नई और कोलकाता जैसे 65 शहरों से देश का 60% ई-वेस्ट निकलता है। 

इलेक्ट्रॉनिक कचरे के पुनर्चक्रण हेतु सरकारों द्वारा कुछ नियम और प्रक्रिया निर्धारित अवश्य की है लेकिन कचरे का लगभग आधा हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्रों में पहुंचना चिंता की बात होना चाहिए। दरअसल, ई-वेस्ट का सुरक्षित रिसाइक्लिंग करना जरूरी है, जिसमें जलने की प्रक्रिया का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। लोगों को ई-वेस्ट के खतरों के बारे में शिक्षित करना और सुरक्षित रिसाइक्लिंग के तरीकों के बारे में प्रशिक्षण देना भी बहुत जरूरी होगा। 

यद्यपि सरकार ने ई-वेस्ट रीसाइक्लिंग के लिए  ई-वेस्ट रीसाइक्लिंग पार्क और ई-वेस्ट मैनेजमेंट सेंटर जैसी कई योजनाएं अपनाई हैं, साथ ही ई-वेस्ट के निष्पादन के लिए कई जागरूकता अभियान भी चलाए हैं। ई-वेस्ट (मैनेजमेंट) नियम, 2022 के तहत, उत्पादकों, आयातकों और ब्रांड मालिकों को अपने उत्पादों के जीवन-चक्र के अंत में उत्पन्न कचरे के प्रबंधन की जिम्मेदारी दी गई है तथापि ई-वेस्ट रिसाइक्लिंग के लिए मात्र नियमन और कानून बना देने से ज्यादा जरूरी है कि सुरक्षित रिसाइक्लिंग को बढ़ावा दिया जाए।

इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट (E-waste) का कारोबार आज के डिजिटल युग में 'सोने की खान' और 'पर्यावरण की चुनौती' दोनों है। जैसे-जैसे हम पुराने फोन और लैपटॉप बदलकर नए गैजेट्स अपना रहे हैं, ई-वेस्ट का मैनेजमेंट भी एक बड़ा बिजनेस सेक्टर बन चुका है। लेकिन हमारा उद्देश्य तो यही होना चाहिए कि कम से कम मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक कचरा हमारे घर से निकले। इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट (E-waste) को कम करना न केवल पर्यावरण के लिए जरूरी है, बल्कि यह हमारी जेब के लिए भी फायदेमंद है। इसे कम करने के लिए हम '3R' (Reduce, Reuse, Recycle) के सिद्धांत को अपना सकते हैं।

​ई-वेस्ट पर रोकथाम के लिए सबसे पहला कदम खरीदारी के समय ही उठाया जा सकता है, नया गैजेट खरीदने से पहले खुद से पूछें, "क्या मुझे वाकई इसकी जरूरत है?" सिर्फ ट्रेंडी दिखने के लिए नया फोन लेना कचरा बढ़ाता है। ऐसी कंपनियाँ और उत्पाद चुनें जो अपनी लंबी उम्र और मजबूती के लिए जाने जाते हैं। एनर्जी स्टार (Energy Star) रेटिंग वाले या रिसाइकिल किए गए मटेरियल से बने उपकरणों को प्राथमिकता दें। ​जितना लंबा आप एक डिवाइस का उपयोग करेंगे, उतना ही कम ई-वेस्ट पैदा होगा,अगर लैपटॉप धीमा हो गया है, तो उसे फेंकने के बजाय RAM अपग्रेड करें या बैटरी बदलें। "Right to Repair" का समर्थन करें। गैजेट्स को साफ रखें, ओवरचार्जिंग से बचें और उन्हें अत्यधिक गर्मी से बचाएं। पुराने हार्डवेयर पर हल्का सॉफ्टवेयर इस्तेमाल करें ताकि वह लंबे समय तक काम कर सके। ​जो डिवाइस आपके काम का नहीं है, वह किसी और के लिए कीमती हो सकता है, उसे उपयुक्त व्यक्ति या संस्था को दान करने का प्रयास करें। पुराने कंप्यूटर या गैजेट्स स्कूलों, एनजीओ (NGOs) या उन लोगों को दें जिन्हें उनकी जरूरत है। मुफ़्त नहीं देना चाहते तो पुराने फोन या टैबलेट को रिसेल प्लेटफॉर्म्स (जैसे OLX, Cashify) पर बेच दें।

पुराने स्मार्टफोन को 'सिक्योरिटी कैमरा', 'म्यूजिक प्लेयर' या 'डिजिटल फोटो फ्रेम' के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। जब कोई उपकरण बिल्कुल खराब हो जाए, तो उसे साधारण कचरे में न  फेंकते हुए​ अपने शहर के अधिकृत ई-वेस्ट सेंटर्स का पता लगाएं। वहां कचरा देने पर पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुँचता। कई कंपनियाँ (जैसे Apple, Samsung, Dell) पुराने डिवाइस के बदले नए पर डिस्काउंट देती हैं। कचरे के उत्पादन को समाप्त करना भले ही हमारे बस में नहीं है लेकिन अपने विवेक और कुछ उपायों से इसकी वृद्धि को नियंत्रित करके हम पर्यावरण और समूचे प्राणियों के स्वास्थ्य की रक्षा अवश्य कर सकते हैं। 


ब्रजेश कानूनगो




 





Sunday, 15 February 2026

आत्मीय और आस्था के पात्र खतरनाक मगरमच्छ

आत्मीय और आस्था के पात्र  खतरनाक मगरमच्छ

हम लोग इतना अवश्य जानते हैं कि मगरमच्छ जैसे खरनाक प्राणी की त्वचा (स्किन) मुख्य रूप से महंगे हैंडबैग, जूते, बेल्ट, वॉलेट और फर्नीचर जैसे लक्ज़री सामान बनाने के लिए उपयोग की जाती है। इनकी त्वचा बेहद टिकाऊ और कीमती होती है।  मगरमच्छ के शरीर के अन्य अंगों (दांत, हड्डी) का उपयोग पारंपरिक वस्तुओं में किया जाता है। लेकिन  कुछ दिनों पहले जब हमने घुमक्कड़ और हमारे प्रिय यूट्यूबर दावूद अखुंदाज़ा के साथ पश्चिम अफ्रीका के बर्किना फासो देश के वीडियो को देखा तो मालूम हुआ कि जहां के लोग खतरनाक मगरमच्छों के साथ बहुत मित्रवत व्यवहार करते हैं। 

यहाँ के लोग मगरमच्छों के साथ तालाब में नहाते हैं और बच्चे उनकी पीठ पर बैठते हैं। ट्रैवलर जब स्थानीय नागरिकों से उनके इस रिश्ते के बारे में पूछते हैं तो वे बताते हैं कि यहां के ग्रामीणों का मानना है कि मगरमच्छ उनके पूर्वजों की आत्माएं हैं और गाँव की रक्षा करते हैं। जब किसी मगरमच्छ की मृत्यु होती है, तो उसे इंसानों की तरह सम्मान के साथ दफनाया जाता है। खासतौर से पश्चिम अफ्रीका के इस देश में साबू (Sabou) और बाज़ौले (Bazoulé) नामक गाँवों में यह दृश्य सहजता से देखा जा सकता है।

आइए पहले थोड़ा इस खतरनाक प्राणी के बारे में जानलें। मगरमच्छ बड़े, अर्द्ध-जलीय सरीसृप हैं जो मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों की नदियों और झीलों में पाए जाते हैं। ये मांसाहारी होते हैं और इनका काटना सबसे मजबूत होता है। खारे पानी के मगरमच्छ सबसे बड़े होते हैं, जो 7 मीटर से अधिक लंबे हो सकते हैं। ये ठंडे खून वाले, अत्यधिक  शिकारी होते हैं जो डायनासोर के करीबी रिश्तेदार माने जा सकते हैं। 
मगरमच्छ अधिकतर उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं, जहां ये पानी में रहने के साथ-साथ धूप सेंकने के लिए किनारे पर भी आते हैं। इनके पास मोटी, पपड़ीदार त्वचा, शक्तिशाली जबड़े और 60-100 से अधिक शंक्वाकार दांत होते हैं। ये कुशल शिकारी होते हैं जो मछली, स्तनधारी, पक्षी और कछुए खाते हैं। पानी में अपने शिकार को घेरकर या छिपकर घात लगाकर हमला करते हैं। मादा मगरमच्छ छेद या टीलों में अंडे देती हैं। बच्चों के निकलने के बाद, वे लगभग एक साल तक उनकी रक्षा करती हैं। मगरमच्छों की लगभग 20 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं। सबसे बड़ा 'खारे पानी का मगरमच्छ' है, जबकि 'बौना मगरमच्छ' सबसे छोटा होता है। ये लगभग 50-80 वर्ष तक जीवित रह सकते हैं। यह माना जाता है कि ये पूर्व-ऐतिहासिक काल के डायनासोरनुमा प्राणियों की अंतिम जीवित कड़ी हैं, जिन्हें "जीवित जीवाश्म" भी कहा जाता है। 

घाना और बुर्किना फासो सहित मगरमच्छ को दुनिया के कई हिस्सों में केवल एक खतरनाक शिकारी ही नहीं, बल्कि शक्ति, उर्वरता और सुरक्षा का प्रतीक माना गया है। प्राचीन सभ्यताओं से लेकर आज के कुछ आधुनिक समुदायों तक, इसकी पूजा की परंपरा रही है। विश्व में मगरमच्छ की पूजा को लेकर बहुत सारे तथ्य और  दिलचस्प जानकारियां मिलती हैं।
प्राचीन मिस्रवासी 'सोबेक' नामक देवता की पूजा करते थे, जिनका सिर मगरमच्छ का और शरीर इंसान का था।उन्हें नील नदी का रक्षक और प्रजनन क्षमता (Fertility) का देवता माना जाता था। कोम ओम्बो (Kom Ombo) में सोबेक का एक विशाल मंदिर है। वहाँ मगरमच्छों को पालतू बनाकर रखा जाता था और उनकी मृत्यु के बाद उन्हें ममी बनाकर सम्मान के साथ दफनाया जाता था। ​भारत के कुछ हिस्सों में मगरमच्छों के गहरे धार्मिक जुड़ाव के बारे में भी संदर्भ मिलते हैं। गुजरात के कई समुदायों में 'खोदियार माता' की पूजा होती है, जिनका वाहन मगरमच्छ है। वहाँ मगरमच्छ को पवित्र माना जाता है और उसे नुकसान पहुँचाना पाप माना है। पाकिस्तान और भारत सीमा पर कराची (पाकिस्तान) में 'मगर पीर' नाम की एक दरगाह है जहाँ मगरमच्छों को सूफी संत का आशीर्वाद प्राप्त माना जाता है। श्रद्धालु उन्हें बड़े चाव से खाना खिलाते हैं।केरल के 'अन्नतपुरा झील मंदिर' में 'बब्बरिया' नाम का एक शाकाहारी मगरमच्छ प्रसिद्ध था (जिसकी हाल ही में मृत्यु हुई), जिसे मंदिर का रक्षक माना जाता था। पापुआ न्यू गिनी (Papua New Guinea) की सेपिक नदी (Sepik River) के किनारे रहने वाली जनजातियों में मगरमच्छ का स्थान सर्वोपरि है। यहाँ के लोग मानते हैं कि उनके पूर्वज पुरुष मगरमच्छ थे। युवाओं के शरीर पर विशेष रूप से पीठ पर ऐसे निशान (Scarification) बनाए जाते हैं जो मगरमच्छ की खाल जैसे दिखें। यह उनके वयस्क होने की एक महत्वपूर्ण और पवित्र रस्म है।​माया और एज़्टेक सभ्यता (मेक्सिको) की प्राचीन सभ्यताओं में मगरमच्छ को 'पृथ्वी का आधार' माना जाता था। उनके कैलेंडर और निर्माण की कहानियों में मगरमच्छ का विशेष महत्व है।​  तिमोर-लेस्ते (Timor-Leste) देश के लोग अपने द्वीप के आकार को एक सोए हुए मगरमच्छ जैसा मानते हैं और उसे 'दादा' (Grandfather) कहकर पुकारते हैं।

मगरमच्छों की पूजा करने का तरीका भले ही अलग अलग समुदायों में भिन्न हो किंतु यह अवश्य है कि उनके प्रति बहुत से समुदायों में बहुत सम्मान व्यक्त किया जाता है।  कुछ लोग मंदिर बनाकर या मूर्तियों के रूप में पूजा करते हैं। कुछ समुदायों में जीवित मगरमच्छों को पवित्र मानकर उन्हें विशेष भोजन (मांस, मुर्गे आदि) अर्पित किया जाता है। ​टोटम (Totem) जैसी कई जनजातियाँ इसे अपना कुल-देवता मानती हैं और मगरमच्छों का शिकार वर्जित होता है। ये संस्कृतियाँ मगरमच्छों को उनके खतरों के बावजूद सम्मानित करती हैं, जिससे उनके प्रति डर को आस्था में बदला जा सके। 

ब्रजेश कानूनगो

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Monday, 9 February 2026

प्राचीन शैलकृत वास्तुकला और धर्मराजेश्वर मंदिर

प्राचीन शैलकृत वास्तुकला और धर्मराजेश्वर मंदिर

कुछ दिन पहले सैर सपाटे के दौरान हमने मंदसौर जिले में स्थित धर्मराजेश्वर मंदिर और बौद्ध गुफाओं का अवलोकन किया। सचमुच ये न सिर्फ दर्शनीय और आस्था के केंद्र हैं बल्कि प्राचीन भारतीय वास्तुकला के अनूठे संगम हैं। घने वन क्षेत्र में चट्टानों को काट कर बनाए गये मंदिरों और शिल्प की तत्कालीन इंजीनियरिंग और शिल्पकारों के लंबे परिश्रम के बेमिसाल प्रमाण हैं। इसके साथ ही इतिहास और कला के प्रेमियों के लिए भी एक खुला संग्रहालय है।

भारत में कई प्रमुख रॉक कट मंदिर हैं, जो अपनी अद्वितीय वास्तुकला और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध हैं। इनमें से कुछ प्रमुख रॉक कट मंदिर पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहे हैं। हिमाचल प्रदेश का मसरूर रॉक कट मंदिर, मंदिर 8वीं शताब्दी में बनाया गया था और हिमालयन पिरामिड के नाम से भी जाना जाता है। एलोरा महाराष्ट्र का प्रसिद्ध कैलाशनाथ मंदिर भी 8वीं शताब्दी में राष्ट्रकूट शासकों द्वारा बनाया गया था और आज यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों में शामिल है। तमिलनाडु के महाबलीपुरम का रॉक कट मंदिर पंचरथ 7वीं शताब्दी में पल्लव राजाओं द्वारा बनाए गए थे और ये भी  यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है।

कर्नाटक में बादामी गुफा मंदिर 6वीं शताब्दी में चालुक्य राजाओं द्वारा बनाए गए थे। विरुपाक्ष मंदिर हम्पी कर्नाटक में है जो 14वीं शताब्दी में विजयनगर राजाओं द्वारा बनाया गया था। उदयगिरि गुफाएं मध्य प्रदेश में 5वीं शताब्दी में गुप्त राजाओं द्वारा बनाई गई थीं।

रॉक कट मंदिरों की श्रृंखला में मध्यप्रदेश का धर्मराजेश्वर मंदिर (Dharmarajeshwar Temple) मंदसौर जिले की शामगढ़ तहसील से लगभग 22 किमी दूर स्थित है।  शांत और प्रकृति की गोद में स्थित इस स्थल की पत्थर की नक्काशी और वातावरण  फोटोग्राफी के शौकीनों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है।  यहाँ की सैर के लिए सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च के बीच होता है। महाशिवरात्रि के दौरान यहाँ विशाल मेला लगता है। धर्मराजेश्वर को आमतौर पर मध्य प्रदेश के एलोरा की तरह माना जाता है क्योंकि इसकी निर्माण तकनीक एलोरा के प्रसिद्ध कैलाश मंदिर से काफी मिलती-जुलती है। उत्तर भारत के सबसे महत्वपूर्ण और दुर्लभ मंदिरों में से एक इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे एलोरा के कैलाश मंदिर की तरह एक ही विशाल चट्टान को काटकर (Monolithic) बनाया गया है। यह मंदिर 9वीं शताब्दी का माना जाता है तथा उत्तर भारतीय "नागर शैली" में निर्मित है। इसे ऊपर से नीचे की ओर तराशा गया है। मुख्य मंदिर के चारों ओर सात छोटे मंदिर बने हुए हैं। मंदिर की नक्काशी और इसके शिखर की बनावट अद्भुत है। और यह सारी संरचनाएं आसपास के धरातल से नीचे स्थित है। चट्टानों में खुदे इसके परिसर प्रांगण में एक छोटी सी सजल कुइया (कुँआ) और तुलसी के पौधे की घनी पत्तियां अचरज में डाल देती हैं।

मुख्य मंदिर में एक शिवलिंग और भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित है, जो शैव और वैष्णव मतों के समन्वय को दर्शाता है। इसे 'धर्मराजेश्वर' इसलिए कहा जाता है क्योंकि पांडव पुत्र युधिष्ठिर (धर्मराज) से इसकी कई दंत कथाएं प्रचलित रही हैं।

​मंदिर के ठीक पास ही अनेक बौद्ध गुफाएं स्थित हैं, जो इस क्षेत्र की प्राचीन धार्मिक विविधता को दर्शाती हैं। ये गुफाएं मंदिर से भी पुरानी हैं, जिनका निर्माण लगभग 7वीं-8वीं शताब्दी के आसपास माना जाता है। इन गुफाओं में 'विहार' (भिक्षुओं के रहने का स्थान) और 'चैत्य' (प्रार्थना कक्ष) शामिल हैं। यहाँ भगवान बुद्ध की विशाल मूर्तियाँ और स्तूप खुदे हुए हैं। एक गुफा में भगवान बुद्ध की महापरिनिर्वाण मुद्रा (लेटी हुई प्रतिमा) विशेष रूप से दर्शनीय है।

​यद्यपि ​इन स्मारकों की खोज को लेकर कोई एक निश्चित खोजकर्ता का नाम चर्चित नहीं है, क्योंकि ये स्थानीय रूप से हमेशा ज्ञात थे। हालांकि, पुरातात्विक दृष्टि से इनका दस्तावेजीकरण और संरक्षण ​19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ब्रिटिश पुरातत्वविदों द्वारा किया गया था। ​जेम्स बर्गेस जैसे विद्वानों ने इन गुफाओं और मंदिर की वास्तुकला पर विस्तृत शोध कार्य किया, जिसके बाद ये विश्व पटल पर आए। ​वर्तमान में यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अधीन एक संरक्षित स्मारक है।

बौद्ध गुफाओं के निर्माण को लेकर आज के इस आधुनिक और उन्नत तकनीक में सक्षम समय में  हमारे मन में सहज ही जिज्ञासा और कुतुहल पैदा हो जाते हैं। दरअसल, ​बौद्ध गुफाओं (जिन्हें 'शैलकृत वास्तुकला' या Rock-cut Architecture कहा जाता है) का निर्माण केवल कला प्रदर्शन के लिए नहीं, बल्कि एक गहरी आध्यात्मिक और व्यावहारिक आवश्यकता के कारण हुआ था।

बौद्ध धर्म में गुफाओं का निर्माण दो मुख्य उद्देश्यों के लिए किया जाता था, विहार और चैत्य। ​विहार (Viharas) बौद्ध भिक्षुओं के रहने के स्थान या आवास थे जिन्हें वर्षा ऋतु के दौरान (जिसे 'वस्सवास' कहा जाता है), जब भिक्षु यात्रा नहीं कर सकते थे, तब वे यहाँ शरण लेते थे। ​चैत्य (Chaityas), प्रार्थना कक्ष या उपासना स्थल होते थे। इनके केंद्र में एक स्तूप होता था, जिसकी परिक्रमा करके भिक्षु ध्यान और पूजा करते थे। बौद्ध गुफाएं (जैसे अजंता, एलोरा, या मंदसौर की गुफाएं) प्रायः एकांत और प्राकृतिक स्थानों पर मिलने के पीछे ठोस तर्क थे।  बौद्ध धर्म में 'निर्वाण' की प्राप्ति के लिए गहन ध्यान (Meditation) आवश्यक है। शहर के शोर-शराबे से दूर घने जंगल और पहाड़ मानसिक शांति के लिए ये आदर्श थे। एक रोचक तथ्य यह भी है कि ये गुफाएं जंगल में तो थीं, लेकिन अक्सर प्रमुख व्यापारिक मार्गों के पास स्थित थीं। इससे भिक्षुओं को व्यापारियों से भिक्षा आसानी से मिल जाती थी और व्यापारियों को आराम करने के लिए सुरक्षित स्थान मिल जाता था। पहाड़ों को काटकर बनाई गई गुफाएं स्थायी होती थीं। ये भीषण गर्मी, बारिश और जंगली जानवरों से सुरक्षा प्रदान करती थीं। पत्थर की दीवारें तापमान को भी नियंत्रित रखती थीं।

​इन गुफाओं का निर्माण कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक पूरा समुदाय मिलकर करता था।  राजाओं (जैसे सातवाहन, वाकाटक, गुप्त शासक) के अलावा, धनी व्यापारियों, शाही महिलाओं और कारीगरों की श्रेणियों (Guilds) ने इनके निर्माण के लिए दान दिया जाता था। गुफाओं के शिलालेखों पर कहीं कहीं अक्सर दानदाताओं के नाम खुदे मिलते हैं। उस समय के कुशल शिल्पी और पत्थर तराशने वाले (Stone Carvers) ऊपर से नीचे की ओर (Top-down approach) पहाड़ को तराशते थे। यह काम इतना सटीक होता था कि एक भी गलती पूरे निर्माण को खराब कर सकती थी। भारत में बौद्ध गुफाओं का निर्माण ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से शुरू होकर 10वीं शताब्दी तक चला। जैसे-जैसे बौद्ध धर्म का विस्तार हुआ, भिक्षुओं की संख्या बढ़ी। मौर्य काल (अशोक के समय) के बाद पत्थर को तराशने की कला चरम पर पहुँची, जिससे लकड़ी के ढांचों के स्थान पर स्थायी पत्थर की गुफाएं बनने लगीं। कालांतर में ये गुफाएं केवल रहने की जगह नहीं रहीं, बल्कि विश्वविद्यालयों के रूप में विकसित हुईं, जहाँ दर्शन, कला और धर्म की शिक्षा दी जाती थी।

धर्मराजेश्वर मंदिर और बौद्ध गुफाओं जैसे स्थलों को देखकर हमारे भीतर तत्कालीन लोगों की  वैचारिक, आध्यात्मिक चेतना के साथ मनुष्य के तकनीकी कौशल, उसके धैर्य और निरंतर श्रम और जुझारूपन के प्रति असीम सम्मान की भावना जाग जाना स्वाभाविक है।

ब्रजेश कानूनगो






 


Saturday, 7 February 2026

टमाटर हो या टेसू, रंग तो मस्ती का होता है

टमाटर हो या टेसू, रंग तो मस्ती का होता है 

होली का पर्व हमारे तन मन को उमंग और उत्साह से भर देता है। हमारे देश के विभिन्न अंचलों में रंगों का यह त्योहार लगभग पंद्रह दिनों तक मनाया जाता है। होलिका दहन के बाद दूसरे दिन धुलेंडी, पांचवे दिन रंग पंचमी और तेरहवें दिन रंग तेरस या नहान के दिन इस पर्व पर अलग ही जोश और रंग बिखर जाते हैं। वैसे समूचे विश्व में इसी तरह के रंगभीगे त्योहार अलग अलग दिनों में मनाए जाने की परंपरा रही है।

घुम tvक्कड़ों के ट्रैवल वीडियो देखते रहने के क्रम में हमने नोमेडिक शुभम चैनल के ख्यात भारतीय यूट्यूबर शुभम् के साथ स्पेन के वेलेंसिया शहर के पास स्थित बुनयोल गांव की आभासी यात्रा की। यह गांव टमाटरों के साथ खेले जाने वाले सबसे प्रसिद्ध उत्सव 'ला टोमाटिना' (La Tomatina)  के लिए प्रसिद्ध है। यह दुनिया की सबसे बड़ी 'फूड फाइट' मानी जाती है। इस दिलचस्प और लाल-रंग के उत्सव को स्पेन के वैलेंसिया शहर के पास स्थित बुनयोल (Buñol) नाम के गाँव में  हर साल अगस्त के आखिरी बुधवार को मनाए जाने की शुरुआत 1945 में हुई थी। कहा जाता है कि एक परेड के दौरान कुछ युवाओं के बीच झगड़ा हो गया और पास में टमाटर की रेहड़ी देखकर उन्होंने एक-दूसरे पर टमाटर फेंकने शुरू कर दिए। अगले साल फिर उन्हीं युवाओं ने घर से टमाटर लाकर लड़ाई की, और धीरे-धीरे यह एक परंपरा बन गई।

वीडियो में ट्रैवलर शुभम और उनके साथियों ने अपने यहां की होली जैसा भरपूर मजा लिया और टमाटरों से सराबोर होते गए। स्थानीय नागरिकों के साथ साथ उनका आनंद और उल्लास भी देखने लायक था। टमाटरों से खेली जाने वाली इस होली के कुछ खास नियम भी होते हैं मसलन ​टमाटर फेंकने से पहले उन्हें हाथ से कुचलना जरूरी है ताकि किसी को चोट न लगे। ​केवल टमाटर ही फेंके जा सकते हैं। ​उत्सव शुरू होने और खत्म होने की सूचना एक खास 'पटाखे' (Carcasa) से दी जाती है।

उत्सव की शुरुआत 'पालो जाबोन' (Palo Jabón) से होती है, जिसमें एक चिकने खंभे के ऊपर रखे 'हैम' (Ham) को उतारने की कोशिश की जाती है। जैसे ही कोई उसे उतार लेता है, टमाटर की जंग शुरू हो जाती है।

​स्पेन की लोकप्रियता को देखते हुए दुनिया के कई अन्य देशों ने भी अपने यहाँ 'टोमाटिना' जैसे उत्सव शुरू किए हैं। कोलंबिया के सुतामार्चन (Sutamarchán) में जून के महीने में टमाटर उत्सव मनाया जाता है। यहाँ टमाटर की अधिक पैदावार का जश्न मनाने के लिए लोग सड़कों पर उतरते हैं। 

कोस्टा रिका (La Tomatina in Costa Rica) के वल्र्वर्डे वेगा (Valverde Vega) क्षेत्र में फसल उत्सव के दौरान टमाटर की लड़ाई आयोजित की जाती है। चीन के ग्वांगडोंग प्रांत में भी स्पेन की तर्ज पर टमाटर उत्सव आयोजित किया गया है, हालांकि यह मुख्य रूप से पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए है। यद्यपि भारत में भी बैंगलोर और दिल्ली जैसे शहरों में 'ला टोमाटिना' आयोजित करने की कोशिश की गई थी, लेकिन भोजन की बर्बादी को लेकर होने वाले विरोध और सामाजिक संवेदनशीलता के कारण इसे बड़े स्तर पर बढ़ावा नहीं मिल सका।

उल्लेखनीय है कि उत्सव खत्म होने के एक घंटे के भीतर, दमकल की गाड़ियाँ सड़कों को धो देती हैं। टमाटर में मौजूद सिट्रिक एसिड (Citric Acid) सड़कों की सफाई के लिए एक प्राकृतिक क्लीनर का काम करता है, जिससे सड़कें पहले से कहीं ज्यादा चमक उठती हैं। अनेकों घुमक्कड़ और पर्यटक विश्वभर के देशों से इसमें शामिल होने आते हैं और अपने कैमरों से यहां के इस उत्सव को सहेज लेते हैं।

स्पेन के इस उत्सव को देखकर हमारे जैसे ठेठ मालवी व्यक्ति के मन में मध्यप्रदेश के इंदौर की रंगपंचमी जैसे रंगारंग उत्सव का चित्र उभर आना स्वाभाविक है। इन्दौर की रंगपंचमी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि इस शहर की धड़कन और पहचान है। होली के पांच दिन बाद चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की पंचमी को मनाई जाने वाली यह परंपरा आज एक वैश्विक आयोजन का रूप ले चुकी है।

​इन्दौर की रंगपंचमी का इतिहास लगभग 300 साल पुराना है, जिसकी जड़ें होल्कर राजवंश से जुड़ी हैं।  होल्कर राजाओं के समय इसकी शुरुआत हुई थी। उस दौर में राजा स्वयं अपनी प्रजा के साथ होली खेलने के लिए निकलते थे। पुराने समय में बैलगाड़ियों में फूलों से बने प्राकृतिक रंग और टेसू के फूलों का पानी भरा जाता था। राजपरिवार के सदस्य जनता पर रंग छिड़कते थे, जिससे ऊंच-नीच का भेद मिट जाता था।

​रंगपंचमी पर निकलने वाले जुलूस को स्थानीय भाषा में 'गेर' कहा जाता है। यह इन्दौर की सबसे बड़ी विशेषता है।  शहर के राजवाड़ा क्षेत्र से विभिन्न संस्थाओं द्वारा गेर निकाली जाती है। इसमें बड़े-बड़े मिसाइल नुमा पंपों से हवा में 50-60 फीट की ऊंचाई तक गुलाल और रंगीन पानी उछाला जाता है। पूरा आसमान रंगों से ढक जाता है। लोग ढोल-ताशों की थाप पर नाचते हुए चलते हैं।

​इन्दौर की रंगपंचमी की सबसे खास बात इसकी सामूहिकता है।  राजवाड़ा के आसपास के 3/4 किलोमीटर के दायरे में एक साथ 5 से 7 लाख लोग जमा होते हैं। इसमें अमीर-गरीब, जाति-धर्म का कोई बंधन नहीं होता। हर कोई रंगों में सराबोर होकर 'इन्दौरी मस्ती' में डूबा रहता है। इतनी विशाल भीड़ होने के बावजूद इन्दौर के लोग अनुशासित रहते हैं, जो यहाँ की नागरिक चेतना को दर्शाता है।

​इन्दौर की रंगपंचमी अब केवल मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं है।  इन्दौर की गेर को यूनेस्को की सांस्कृतिक विरासत सूची (Intangible Cultural Heritage) में शामिल करने के प्रयास किए गए हैं, जिससे इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है।  अब विदेशों से भी फोटोग्राफर्स और पर्यटक विशेष रूप से इस नजारे को देखने और कैद करने इन्दौर आते हैं। 

स्पेन की टमाटर वाली लाल रंगी होली से बहुत सारी समानता के बावजूद कुछ तो अलग है जो इंदौर की रंगपंचमी को खास बनाता है। इन्दौर की रंगपंचमी "अतिथि देवो भव:" और "मिलनसारिता" का जीवंत उदाहरण है। यहाँ की हवा में उड़ने वाला गुलाल प्रेम और भाईचारे का संदेश देता है। यहां की मस्ती में संस्कृति और आध्यात्म की बांसुरी सुनाई देती है।


ब्रजेश कानूनगो 















Monday, 2 February 2026

वेनेजुएला : तेल ही नहीं सबसे ऊंचे जलप्रपात के लिए भी प्रसिद्ध है

वेनेजुएला : तेल ही नहीं सबसे ऊंचे जलप्रपात के लिए भी प्रसिद्ध है 

हाल ही में भारत से बहुप्रतीक्षित अमेरिका से सशर्त ट्रेड डील हो जाने का समाचार आया है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कथित रूप से दावा किया है कि भारत रूस की बजाए अब वेनेजुएला से कच्चा तेल लेगा। 

वेनेजुएला, दक्षिण अमेरिका के उत्तरी तट पर स्थित एक ऐसा देश है जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता और विशाल तेल भंडार के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। वर्तमान में (फरवरी 2026), यह देश एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील ऐतिहासिक मोड़ से गुजर रहा है। जनवरी 2026 में, अमेरिकी सैन्य अभियान "ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व" के तहत राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हिरासत में लेकर अमेरिका ले जाया गया । वर्तमान में देश एक संक्रमणकालीन दौर में है। डेल्सी रोड्रिगेज ने कुछ समय के लिए जिम्मेदारी संभाली है, लेकिन राजनीतिक अस्थिरता बनी हुई है। देश में लंबे समय से "बोलिवेरियन क्रांति" (समाजवाद) और विपक्षी ताकतों के बीच संघर्ष रहा है।

राजनीतिक संदर्भों और आग्रहों से अलग हटकर देखें तो जानने को मिलता है कि वेनेजुएला का तेल और रूस या अरब देशों का तेल रासायनिक रूप से एक-दूसरे से काफी अलग होते हैं। इसे समझने के लिए हमें तेल की "क्वालिटी" (Quality) और "निकालने की प्रक्रिया" (Extraction) पर ध्यान देना होगा।

वेनेजुएला में मुख्य रूप से 'अति-भारी कच्चा तेल' (Extra-Heavy Crude) पाया जाता है। यह कोलतार (tar) जैसा गाढ़ा और चिपचिपा होता है। इसे पाइपलाइनों में बहाने के लिए इसमें हल्का तेल या केमिकल मिलाना पड़ता है। जबकि ​रूस/सऊदी अरब का तेल आमतौर पर 'हल्का' (Light) या 'मीडियम' (Medium) होता है। यह पानी की तरह पतला होता है और इसे आसानी से निकाला और ट्रांसपोर्ट किया जा सकता है। ​वेनेजुएला का तेल 'सोर' (Sour) होता है, जिसका अर्थ है कि इसमें सल्फर (गंधक) की मात्रा बहुत अधिक होती है। इसे रिफाइन करना कठिन और महंगा होता है क्योंकि सल्फर निकालने के लिए जटिल तकनीक चाहिए। ​रूस (Urals): रूस का तेल 'मीडियम सोर' होता है। ​सऊदी अरब  का तेल काफी हद तक 'स्वीट' (Sweet) होता है, जिसमें सल्फर कम होता है और इसे रिफाइन करना सबसे आसान होता है।

​वेनेजुएला के भारी तेल से डीजल या गैसोलीन बनाने के लिए बहुत ही आधुनिक और विशेष 'कॉम्प्लेक्स रिफाइनरीज' की आवश्यकता होती है। दुनिया की बहुत कम रिफाइनरियाँ ही (मुख्यतः अमेरिका और भारत में) इसे कुशलता से प्रोसेस कर सकती हैं। जबकि​रूस या अरब देशों के तेल को साधारण रिफाइनरियों में भी आसानी से प्रोसेस किया जा सकता है। 

दरअसल वेनेजुएला का तेल "मात्रा" में तो सबसे ज्यादा है, लेकिन "गुणवत्ता" के मामले में यह रूस और सऊदी अरब के मुकाबले काफी कठिन और महंगा हो जाता है। यही कारण है कि भारी तेल होने के बावजूद वेनेजुएला अपनी अर्थव्यवस्था को उतनी तेजी से नहीं संभाल पाया, क्योंकि इसे बेचने के लिए उसे विदेशी तकनीक और विशेष रिफाइनरियों पर निर्भर रहना पड़ता है।

वेनेजुएला की तेल प्रधान देश होने जैसी विशेषता के अलावा इसका पर्यटनीय महत्व भी कम नहीं है। वेनेजुएला को "लैंड ऑफ ग्रेस" कहा जाता है। यहाँ एंडीज पर्वत, अमेज़न वर्षावन, विशाल घास के मैदान (Llanos) और कैरेबियन तट रेखा का अनूठा संगम मिलता है। दुनिया का सबसे ऊँचा निर्बाध जलप्रपात 'एंजेल फॉल्स' स्थित है, जिसकी ऊँचाई लगभग 979 मीटर है। ​लेक मार्काइबो दक्षिण अमेरिका की सबसे बड़ी और दुनिया की सबसे पुरानी झीलों में से एक है, जिसके नीचे तेल के विशाल भंडार हैं। यहाँ मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय (Tropical) जलवायु रहती है, लेकिन ऊँचाई के साथ तापमान में बदलाव आता है। यद्यपि फिलहाल यहां की यात्राओं के लिए विशेष एडवाइजरी जारी की गई है तथापि वेनेजुएला के प्राकृतिक दृश्यों और जनजीवन ने पर्यटकों और घुमक्कड़ों को सदैव आकर्षित किया है।

ब्रजेश कानूनगो 


गाम्बिया : जहाँ पत्थरों से मतदान होता है

गाम्बिया : जहाँ पत्थरों से मतदान होता है

दुनिया के अधिकांश देशों में चुनाव या तो इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन से करवाए जाते हैं या फिर बेलेट पेपर याने मतपत्र द्वारा नागरिक अपने नेतृत्व या सरकार को चुनते रहे हैं। जिस दौर में हमारे यहां ईवीएम को लेकर कई सवाल खड़े होते रहे हैं और चुनावों में कागजी मतपत्रों के उपयोग की ओर लौटने की आवाजें सुनाई दे रहीं हैं उसी समय एक गणराज्य ऐसा भी है जहाँ अब तक पत्थरों द्वारा अपने नेतृत्व और सरकार को चुना जाता रहा है। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं अफ्रीका के गाम्बिया देश की ।

गांबिया (The Gambia) पश्चिम अफ्रीका में स्थित एक छोटा लेकिन सांस्कृतिक रूप से समृद्ध देश है।  इसके दोस्ताना लोगों और भौगोलिक बनावट के कारण  इसे "The Smiling Coast of Africa" कहा जाता है।  गांबिया एक बहुदलीय लोकतांत्रिक गणराज्य (Democratic Republic) है। यहाँ राष्ट्रपति शासन प्रणाली है, जहाँ राष्ट्रपति ही राष्ट्र और सरकार दोनों का प्रमुख होता है। बांजुल (Banjul) यहाँ की राजधानी है, जबकि सेरीकुंडा (Serrekunda) सबसे बड़ा शहर और आर्थिक केंद्र है। गाम्बिया 18 फरवरी 1965 को ब्रिटेन से स्वतंत्र हुआ था। 2017 में लंबे समय तक रहे तानाशाह याह्या जाम्मेह के शासन के अंत के बाद यहाँ लोकतंत्र मज़बूत हुआ है।

गांबिया (The Gambia) दुनिया का संभवतः इकलौता ऐसा देश है जहाँ चुनावों में कागजी मतपत्रों (ballots) के बजाय पत्थरों या कंचों (marbles) का उपयोग किया जाता है। यह व्यवस्था काफी अनोखी है और इसके पीछे कुछ दिलचस्प कारण हैं।  हर पोलिंग बूथ पर उम्मीदवारों के नाम और फोटो वाले अलग-अलग रंग के लोहे के ड्रम (Ballot Boxes) रखे होते हैं। मतदाता को मतपत्र की जगह एक पारदर्शी कांच का कंचा या पत्थर जैसा गोला दिया जाता है। वह अपनी पसंद के उम्मीदवार के ड्रम में उसे डाल देता है। ड्रम के अंदर एक धातु की नली लगी होती है। जब कंचा उसमें गिरता है, तो साइकिल की घंटी जैसी आवाज आती है। इससे चुनाव अधिकारियों को पता चल जाता है कि मतदाता ने वोट डाल दिया है और यह भी सुनिश्चित होता है कि किसी ने एक बार में एक से ज्यादा कंचे तो नहीं डाले।

​दरअसल जब यह सिस्टम 1960 के दशक में शुरू किया गया था, तब गांबिया में साक्षरता दर बहुत कम थी। कंचों और रंगों वाले ड्रमों की मदद से उन लोगों के लिए भी वोट देना आसान हो गया जो पढ़-लिख नहीं सकते थे। ​इस प्रक्रिया में धोखाधड़ी की संभावना कम हो जाती है, ड्रमों को सील कर दिया जाता है और कंचों को गिनना काफी पारदर्शी प्रक्रिया मानी जाती है।

​इसके अलावा यह भी माना गया है कि कागजी मतपत्रों की छपाई और उन्हें सुरक्षित रखने के मुकाबले यह व्यवस्था काफी सस्ती पड़ती है क्योंकि ड्रम और कंचों का दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। यह प्रक्रिया पर्यावरण अनुकूल है क्योंकि मार्बल और ड्रम को कई बार इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे कागज की भी बचत होती है।

​हाल के वर्षों में गांबिया में इस सिस्टम को बदलने और आधुनिक पेपर बैलेट लाने पर चर्चा हुई है, क्योंकि उम्मीदवारों की संख्या बढ़ने पर इतने सारे ड्रम रखना मुश्किल हो जाता है। हालांकि, 2021 के राष्ट्रपति चुनाव में भी इसी 'कंचा पद्धति' का इस्तेमाल किया गया था क्योंकि जनता इस पर बहुत भरोसा करती है। अब गांबिया ने 2026 के राष्ट्रपति चुनाव से पेपर बैलेट सिस्टम अपनाने का फैसला किया है, क्योंकि मार्बल सिस्टम अब संभवतः लंबे समय तक नहीं चलाया जा सकता। 

​इस लोकतांत्रिक देश की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से तीन स्तंभों पर टिकी है कृषि,पुनर्नियात व्यापार और पर्यटन। लगभग 75% आबादी कृषि पर निर्भर है। मूंगफली (Peanuts) यहाँ की मुख्य नकदी फसल है और निर्यात का बड़ा हिस्सा है। समुद्र तट पर स्थित होने के कारण यह पड़ोसी देशों के लिए एक व्यापारिक केंद्र के रूप में कार्य करता है।अपने खूबसूरत समुद्र तटों (Beaches) और पक्षी दर्शन (Bird watching) के लिए प्रसिद्ध होने के कारण यहाँ पर्यटन विदेशी मुद्रा का बड़ा स्रोत है।

गांबिया अपनी सुंदर तटरेखाओं और उभरती अर्थव्यवस्था के कारण पर्यटकों और निवेशकों दोनों के लिए आकर्षण का केंद्र बनता जा रहा है। कोलोली और कोटू जैसे प्रमुख बीच (Kololi & Kotu Beach) गांबिया के सबसे प्रसिद्ध समुद्र तट हैं। यहाँ की सफेद रेत और ताड़ के पेड़ पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। यहाँ कई लग्जरी रिसॉर्ट्स और स्थानीय हस्तशिल्प बाज़ार हैं। यहां का ​कुंटा किन्ते द्वीप (Kunta Kinteh Island) एक UNESCO विश्व धरोहर स्थल है। यह प्रसिद्ध उपन्यास और टीवी सीरीज़ 'रूट्स' (Roots) से जुड़ा है और दास व्यापार के इतिहास की मार्मिक झलक पेश करता है। ​अबूको नेचर रिजर्व (Abuko Nature Reserve) पार्क वन्यजीव प्रेमियों और पक्षी विशेषज्ञों (Bird watchers) के लिए स्वर्ग के समान है। यहाँ बंदरों, मगरमच्छों और सैकड़ों प्रजातियों के पक्षियों को देखा जा सकता है। ​काचिकाली क्रोकोडाइल पूल (Kachikally Crocodile Pool) बाकाऊ में स्थित है और यह एक पवित्र स्थान माना जाता है, जहाँ आप पालतू मगरमच्छों को छू सकते हैं और उनके साथ फोटो खिंचवा सकते हैं। ​वासु स्टोन सर्कल्स (Wassu Stone Circles) एक और UNESCO धरोहर स्थल है, जो रहस्यमयी प्राचीन पत्थर के घेरों के लिए जाना जाता है। इन्हें अफ्रीका के 'स्टोनहेंज' के रूप में देखा जाता है। इसके अलावा राजधानी बांजुल का अल्बर्ट मुख्य बाज़ार जहाँ आप अफ्रीकी संस्कृति, कपड़े, मसालों और शोर-शराबे वाली स्थानीय जिंदगी का अनुभव कर सकते हैं।

मुस्लिम बहुल (90%) 24 लाख आबादी वाले इस देश की आधिकारिक भाषा अंग्रेजी है, लेकिन स्थानीय स्तर पर मंडिंका (Mandinka), वोलोफ (Wolof) और फुला (Fula) जैसी भाषाएँ प्रमुखता से बोली जाती हैं। बड़े संयुक्त परिवारों (Compounds) में रहने वाले यहां के लोग मिलनसार और मेहमाननवाज होते हैं।

वर्तमान में ऊर्जा, कृषि, प्रसंस्करण,डिजिटलाइजेशन, फिशरीज और किफायती आवास और व्यावसायिक भवनों के निर्माण के क्षेत्रों में आगे बढ़ते हुए

गांबिया अपनी 'उदार बाजार व्यवस्था' और 'वेस्ट अफ्रीकी बाज़ार' (ECOWAS) के प्रवेश द्वार के रूप में निवेशकों को आकर्षित कर रहा है। पर्यटन (Tourism) के क्षेत्र में  यहाँ इको-टूरिज्म, बुटीक होटल और क्रूज़ सेवाओं में निवेश की बहुत संभावना है। सरकार पर्यटन के बुनियादी ढांचे को आधुनिक बनाने पर ध्यान दे रही है।


ब्रजेश कानूनगो







 

बादलों की तरह आकृतियां बनाती चोटियाँ

बादलों की तरह आकृतियां बनाती चोटियाँ बचपन के दिनों में गर्मियों की रात को जब हम खुली छत पर सोने जाते तो दिन अस्त होने के पहले आकाश में छाए ब...