डिका जनजाति : गायों में निहित हैं उनके सुख दुख
सुबह की सुनहरी लालिमा अभी छंटी भी नहीं थी कि दक्षिण सूडान की डिका जनजाति की बस्ती में हलचल शुरू हो गई। यह बस्ती, खुले मैदान में फैली हुई थी और चारों तरफ से ऊँचे-ऊँचे घास के मैदानों और पेड़ों से घिरी हुई थी। मैदान के बीचोबीच, जहाँ तक नज़र जाती थी, वहाँ सैंकड़ों गायों को बांधने के लिए खूंटे गड़े हुए थे। अलावों से उठता हुआ धुआँ, हवा में मिलकर एक अनोखी गंध फैला रहा था। यह गंध, गोबर के जलने की गंध थी, जो डिका जनजाति के लोगों के लिए पवित्र थी। वे मानते थे कि यह धुआँ, उन्हें बुरी आत्माओं से बचाता है। खूंटों के पास ही, लोगों ने अपने सोने-बैठने के लिए लकड़ी के ढांचे बना रखे थे। ये ढांचे, खटियाओं की तरह दिखते थे और उन पर चमड़े या कपड़े बिछाए हुए थे। कुछ लोग, इन ढाँचों पर बैठे हुए थे, जबकि कुछ लोग, आग के पास बैठकर गपशप कर रहे थे।
सूरज ढलने लगा था और आसमान में लाल, नारंगी और बैंगनी रंग की छटा बिखरने लगी थी। तभी, अचानक एक आवाज़ गूंजी। यह आवाज़, गाय के सींग से बनाए गए एक वाद्य यंत्र की थी। यह आवाज़, गायों के लिए वापस लौटने का संकेत थी। जैसे ही यह आवाज़ सुनाई दी, सैंकड़ों गायें, जंगल से लौटकर मैदान में आने लगीं। ये गायें, डिका जनजाति के लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण थीं। वे उन्हें दूध, मांस और चमड़ा प्रदान करती थीं। इसके अलावा, वे उनकी धन और सामाजिक प्रतिष्ठा का भी प्रतीक थीं। गायों के सींग, बहुत ही अनोखे और विशाल थे। कुछ सींग, इतने बड़े थे कि वे गायों के सिर से भी ऊँचे थे। ये सींग, गायों को एक भव्य और डरावना रूप प्रदान कर रहे थे।
गायें, बिना किसी हिचकिचाहट के, सीधे अपने निर्धारित खूंटों पर पहुँच गईं। यह देखकर, ऐसा लग रहा था कि वे अपने खूंटों को पहले से ही जानती थीं। डिका जनजाति के लोग, गायों को बांधने के लिए आगे बढ़े। जैसे-जैसे शाम गहराती गई, अलावों से उठता हुआ धुआँ और भी घना होता गया। यह धुआँ, गायों के सींगों और लोगों के चेहरों पर एक रहस्यमयी आभा फैला रहा था। यह दृश्य, किसी ज्योग्राफिकल चैनल की फिल्म की तरह लग रहा था। यह अनोखा सुंदर दृश्य दक्षिण सूडान की यात्रा करते यूट्यूबर और विश्व यात्री दावूद अखुंदजादा अपने कैमरे से हम तक पहुंचाते हैं तो जैसे हम दर्शक भी उसका हिस्सा बन जाते हैं।
दरअसल डिका जनजाति की बस्ती, एक ऐसी जगह है जहाँ परंपरा और आधुनिकता, एक साथ मौजूद होती हैं। यहाँ के लोग, अपनी संस्कृति और परंपराओं को बहुत महत्व देते रहे हैं। वे अपनी गायों से प्यार करते हैं और उनके साथ एक गहरा रिश्ता रखते रहे हैं।
दक्षिण सूडान की डिंका जनजाति के लिए गाय सिर्फ जानवर नहीं, धन, धर्म, पहचान और जिंदगी, सबकुछ है। इन्हें दुनिया की सबसे बड़ी पशुपालक जनजातियों में गिना जाता है। डिंका के पास खेती कम है। गाय ही इनकी बचत, बीमा और निवेश है। परिवार कितना अमीर है ये गायों की संख्या से तय होता है। चीजें खरीदने-बेचने के लिए भी गायें दी जाती हैं। बीमारी, सूखा या युद्ध में गायें बेचकर ही गुजारा होता है।
शादी और रिश्ते गायों पर टिके हैं, लड़के को शादी के लिए लड़की के परिवार को 20 से 200 गायें तक देनी पड़ती हैं। गाय जितनी ज्यादा, दुल्हन का परिवार उतना खुश। शादी के बाद दोनों परिवार गायों के लेन-देन से हमेशा के लिए जुड़ जाते हैं। तलाक हुआ तो गायें वापस करनी पड़ती हैं। यह भी मजेदार है कि जिसके पास ज्यादा गायें होंगी उसकी बेटी की शादी बड़े घर में होगी। कम गाय वाला लड़का अक्सर अविवाहित रह जाता है।
धर्म और पहचान में यहां गाय एक पवित्र पशु है। डिंका एनिमिस्ट और ईसाई परंपराओं को मिलाकर चलते हैं। गाय को न्हियालिक नाम के ईश्वर का उपहार माना जाता है। डिंका पुरुष अक्सर अपना नाम अपनी पसंदीदा गाय के रंग-रूप पर रखते हैं। जैसे “मचार” मतलब सफेद बैल वाला। युवा चरवाहे अपनी गायों के लिए गीत लिखते हैं, उनकी तारीफ में नाचते हैं। ये “ऑक्स-सॉन्ग” उनकी संस्कृति का अहम हिस्सा है। डिंका के लिए सींग का तुरही सिर्फ म्यूजिक नहीं, वॉकी-टॉकी, अलार्म और पहचान तीनों है। गाय उनकी जिंदगी है, तो गाय का सींग उनकी आवाज बन जाता है।
जनजाति में 8-10 साल की उम्र से ही लड़के पशु बाड़ा (कैटल कैंप) में रहने लगते हैं। पूरा दिन गाय चराना, उनकी रक्षा करना, दूध निकालना इनकी दिनचर्या होती है। दूध मुख्य भोजन है। गाय का मूत्र सिर धोने और राख से दांत साफ करने में इस्तेमाल होता है। गोबर से घर लीपते हैं और मच्छर भगाने के लिए जलाते हैं। बछड़ों के सींग को गर्म लोहे से मनचाहा आकार दिया जाता है। टेढ़े-मेढ़े सींग सुंदरता और मालिक की शान माने जाते हैं।
यहां गायों की अहमियत इतनी है कि इन्हें पाने के लिए मवेशी छापे आम हैं। खासकर नुएर और मुर्ले जनजाति से लड़ाइयां होती रहती हैं। दशकों के गृहयुद्ध से एके 47 जैसी बंदूकें हर चरवाहे के पास आ गई हैं, जिससे संघर्ष और अधिक खूनी हो गया है।वस्तुतः डिंका लोगों के लिए गाय खोना मतलब सबकुछ खोना है। शादी नहीं होगी, इज्जत नहीं होगी, भगवान नाराज होगा। इसलिए वो गाय के लिए जीते हैं और मरते भी हैं।
दक्षिण सूडान की उन जनजातियों (जैसे मुंडारी या डिंका) का जीवन वास्तव में किसी महाकाव्य जैसा प्रतीत होता है। धूल, धुआं और उन विशाल सींगों वाली अंकोले-वातुसी गायों के बीच का वह सामंजस्य प्रकृति और मनुष्य के प्राचीन जुड़ाव की याद दिलाता है।
ब्रजेश कानूनगो
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