धर्मराजेश्वर मंदिर तथा बौद्ध गुफाओं का शिल्प और सौंदर्य
कुछ दिन पहले सैर सपाटे के दौरान हमने मंदसौर जिले में स्थित धर्मराजेश्वर मंदिर और बौद्ध गुफाओं का अवलोकन किया। सचमुच ये न सिर्फ दर्शनीय और आस्था के केंद्र हैं बल्कि प्राचीन भारतीय वास्तुकला के अनूठे संगम हैं। घने वन क्षेत्र में चट्टानों को काट कर बनाए गये मंदिरों और शिल्प की तत्कालीन इंजीनियरिंग और शिल्पकारों के लंबे परिश्रम के बेमिसाल प्रमाण हैं। इसके साथ ही इतिहास और कला के प्रेमियों के लिए भी एक खुला संग्रहालय है।
भारत में कई प्रमुख रॉक कट मंदिर हैं, जो अपनी अद्वितीय वास्तुकला और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध हैं। इनमें से कुछ प्रमुख रॉक कट मंदिर पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहे हैं। हिमाचल प्रदेश का मसरूर रॉक कट मंदिर, मंदिर 8वीं शताब्दी में बनाया गया था और हिमालयन पिरामिड के नाम से भी जाना जाता है। एलोरा महाराष्ट्र का प्रसिद्ध कैलाशनाथ मंदिर भी 8वीं शताब्दी में राष्ट्रकूट शासकों द्वारा बनाया गया था और आज यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों में शामिल है। तमिलनाडु के महाबलीपुरम का रॉक कट मंदिर पंचरथ 7वीं शताब्दी में पल्लव राजाओं द्वारा बनाए गए थे और ये भी यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है।
कर्नाटक में बादामी गुफा मंदिर 6वीं शताब्दी में चालुक्य राजाओं द्वारा बनाए गए थे। विरुपाक्ष मंदिर हम्पी कर्नाटक में है जो 14वीं शताब्दी में विजयनगर राजाओं द्वारा बनाया गया था। उदयगिरि गुफाएं मध्य प्रदेश में 5वीं शताब्दी में गुप्त राजाओं द्वारा बनाई गई थीं।
रॉक कट मंदिरों की श्रृंखला में मध्यप्रदेश का धर्मराजेश्वर मंदिर (Dharmarajeshwar Temple) मंदसौर जिले की शामगढ़ तहसील से लगभग 22 किमी दूर स्थित है। शांत और प्रकृति की गोद में स्थित इस स्थल की पत्थर की नक्काशी और वातावरण फोटोग्राफी के शौकीनों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है। यहाँ की सैर के लिए सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च के बीच होता है। महाशिवरात्रि के दौरान यहाँ विशाल मेला लगता है। धर्मराजेश्वर को आमतौर पर मध्य प्रदेश के एलोरा की तरह माना जाता है क्योंकि इसकी निर्माण तकनीक एलोरा के प्रसिद्ध कैलाश मंदिर से काफी मिलती-जुलती है। उत्तर भारत के सबसे महत्वपूर्ण और दुर्लभ मंदिरों में से एक इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे एलोरा के कैलाश मंदिर की तरह एक ही विशाल चट्टान को काटकर (Monolithic) बनाया गया है। यह मंदिर 9वीं शताब्दी का माना जाता है तथा उत्तर भारतीय "नागर शैली" में निर्मित है। इसे ऊपर से नीचे की ओर तराशा गया है। मुख्य मंदिर के चारों ओर सात छोटे मंदिर बने हुए हैं। मंदिर की नक्काशी और इसके शिखर की बनावट अद्भुत है। और यह सारी संरचनाएं आसपास के धरातल से नीचे स्थित है। चट्टानों में खुदे इसके परिसर प्रांगण में एक छोटी सी सजल कुइया (कुँआ) और तुलसी के पौधे की घनी पत्तियां अचरज में डाल देती हैं।
मुख्य मंदिर में एक शिवलिंग और भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित है, जो शैव और वैष्णव मतों के समन्वय को दर्शाता है। इसे 'धर्मराजेश्वर' इसलिए कहा जाता है क्योंकि पांडव पुत्र युधिष्ठिर (धर्मराज) से इसकी कई दंत कथाएं प्रचलित रही हैं।
मंदिर के ठीक पास ही अनेक बौद्ध गुफाएं स्थित हैं, जो इस क्षेत्र की प्राचीन धार्मिक विविधता को दर्शाती हैं। ये गुफाएं मंदिर से भी पुरानी हैं, जिनका निर्माण लगभग 7वीं-8वीं शताब्दी के आसपास माना जाता है। इन गुफाओं में 'विहार' (भिक्षुओं के रहने का स्थान) और 'चैत्य' (प्रार्थना कक्ष) शामिल हैं। यहाँ भगवान बुद्ध की विशाल मूर्तियाँ और स्तूप खुदे हुए हैं। एक गुफा में भगवान बुद्ध की महापरिनिर्वाण मुद्रा (लेटी हुई प्रतिमा) विशेष रूप से दर्शनीय है।
यद्यपि इन स्मारकों की खोज को लेकर कोई एक निश्चित खोजकर्ता का नाम चर्चित नहीं है, क्योंकि ये स्थानीय रूप से हमेशा ज्ञात थे। हालांकि, पुरातात्विक दृष्टि से इनका दस्तावेजीकरण और संरक्षण 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ब्रिटिश पुरातत्वविदों द्वारा किया गया था। जेम्स बर्गेस जैसे विद्वानों ने इन गुफाओं और मंदिर की वास्तुकला पर विस्तृत शोध कार्य किया, जिसके बाद ये विश्व पटल पर आए। वर्तमान में यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अधीन एक संरक्षित स्मारक है।
बौद्ध गुफाओं के निर्माण को लेकर आज के इस आधुनिक और उन्नत तकनीक में सक्षम समय में हमारे मन में सहज ही जिज्ञासा और कुतुहल पैदा हो जाते हैं। दरअसल, बौद्ध गुफाओं (जिन्हें 'शैलकृत वास्तुकला' या Rock-cut Architecture कहा जाता है) का निर्माण केवल कला प्रदर्शन के लिए नहीं, बल्कि एक गहरी आध्यात्मिक और व्यावहारिक आवश्यकता के कारण हुआ था।
बौद्ध धर्म में गुफाओं का निर्माण दो मुख्य उद्देश्यों के लिए किया जाता था, विहार और चैत्य। विहार (Viharas) बौद्ध भिक्षुओं के रहने के स्थान या आवास थे जिन्हें वर्षा ऋतु के दौरान (जिसे 'वस्सवास' कहा जाता है), जब भिक्षु यात्रा नहीं कर सकते थे, तब वे यहाँ शरण लेते थे। चैत्य (Chaityas), प्रार्थना कक्ष या उपासना स्थल होते थे। इनके केंद्र में एक स्तूप होता था, जिसकी परिक्रमा करके भिक्षु ध्यान और पूजा करते थे। बौद्ध गुफाएं (जैसे अजंता, एलोरा, या मंदसौर की गुफाएं) प्रायः एकांत और प्राकृतिक स्थानों पर मिलने के पीछे ठोस तर्क थे। बौद्ध धर्म में 'निर्वाण' की प्राप्ति के लिए गहन ध्यान (Meditation) आवश्यक है। शहर के शोर-शराबे से दूर घने जंगल और पहाड़ मानसिक शांति के लिए ये आदर्श थे। एक रोचक तथ्य यह भी है कि ये गुफाएं जंगल में तो थीं, लेकिन अक्सर प्रमुख व्यापारिक मार्गों के पास स्थित थीं। इससे भिक्षुओं को व्यापारियों से भिक्षा आसानी से मिल जाती थी और व्यापारियों को आराम करने के लिए सुरक्षित स्थान मिल जाता था। पहाड़ों को काटकर बनाई गई गुफाएं स्थायी होती थीं। ये भीषण गर्मी, बारिश और जंगली जानवरों से सुरक्षा प्रदान करती थीं। पत्थर की दीवारें तापमान को भी नियंत्रित रखती थीं।
इन गुफाओं का निर्माण कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक पूरा समुदाय मिलकर करता था। राजाओं (जैसे सातवाहन, वाकाटक, गुप्त शासक) के अलावा, धनी व्यापारियों, शाही महिलाओं और कारीगरों की श्रेणियों (Guilds) ने इनके निर्माण के लिए दान दिया जाता था। गुफाओं के शिलालेखों पर कहीं कहीं अक्सर दानदाताओं के नाम खुदे मिलते हैं। उस समय के कुशल शिल्पी और पत्थर तराशने वाले (Stone Carvers) ऊपर से नीचे की ओर (Top-down approach) पहाड़ को तराशते थे। यह काम इतना सटीक होता था कि एक भी गलती पूरे निर्माण को खराब कर सकती थी। भारत में बौद्ध गुफाओं का निर्माण ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से शुरू होकर 10वीं शताब्दी तक चला। जैसे-जैसे बौद्ध धर्म का विस्तार हुआ, भिक्षुओं की संख्या बढ़ी। मौर्य काल (अशोक के समय) के बाद पत्थर को तराशने की कला चरम पर पहुँची, जिससे लकड़ी के ढांचों के स्थान पर स्थायी पत्थर की गुफाएं बनने लगीं। कालांतर में ये गुफाएं केवल रहने की जगह नहीं रहीं, बल्कि विश्वविद्यालयों के रूप में विकसित हुईं, जहाँ दर्शन, कला और धर्म की शिक्षा दी जाती थी।
धर्मराजेश्वर मंदिर और बौद्ध गुफाओं जैसे स्थलों को देखकर हमारे भीतर तत्कालीन लोगों की वैचारिक, आध्यात्मिक चेतना के साथ मनुष्य के तकनीकी कौशल, उसके धैर्य और निरंतर श्रम और जुझारूपन के प्रति असीम सम्मान की भावना जाग जाना स्वाभाविक है।
ब्रजेश कानूनगो
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