Friday, 25 April 2025

इथियोपिया की अनोखी जनजातियाँ

 इथियोपिया की अनोखी जनजातियाँ 

गत दिनों हमने इथियोपिया के जनजातीय क्षेत्रों की मानस यात्रा की। यूट्यूब के कुछ ट्रैवल विडियोज हमारी इस यात्रा के माध्यम बने। 

दक्षिण अफ्रीका का इथियोपिया काफी जैसे लोकप्रिय पेय पदार्थ का जनक रहा है। यहां काफी सेवन को आमतौर पर परंपरागत रूप से सेलिब्रेट भी किया जाता है। ट्रैवलर दावूद अखुंदजादा Davud Akhundzada  के साथ हमने सड़क किनारे इथोपियाई महिलाओं द्वारा संचालित स्टाल पर इसकी संपूर्ण प्रक्रिया या रस्म को कुतुहल से देखा। कॉफी बीजों को तवे पर सेका जाना, उसको मूसल से कूटकर पावडर बनाना, परंपरागत केतली में काफी को धीरे धीरे उबाला जाना, कॉफी बीज की धूप देकर उसके धुएं से वातावरण को महकाना, फिर परंपरागत चीनी प्याले में गर्म कॉफी में खुशबूदार वनस्पति डाल के पेश करना। यह सब देखना अद्भुत आनंद और जायके से भर देता है। शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में दावूद के संग वहां के जीवन का डिजिटल आनंद लेना सचमुच इथियोपिया पहुंच जाने जैसा ही था। हमने विकसित होते आधुनिक इलाकों, परंपरागत छोटे बड़े बाजारों के अलावा इथियोपिया के जनजातीय क्षेत्रों की भी मानस यात्रा की। दावूद के विडियोज के अलावा एक और प्रिय ट्रैवलर बंसी विश्नोई Bansi Bishnoi vlog के भी कुछ विडियोज का अवलोकन किया। बात आज इथियोपिया की जनजातियां की कर लेते हैं, जो हमने अनेक ट्रैवल विडियोज और इंटरनेट की कुछ वेबसाइटों से जुटाई है। 


विश्वभर में जनजातियां पर्यटकों को सदैव आकर्षित करती रहीं हैं। जनजाति पर्यटन, संस्कृति और इतिहास के प्रति जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा देता है।  कई जगहें और बस्तियों को विशेष रूप से इस विशेष पर्यटन के लिए विकसित किया गया है, जहाँ पर्यटक जनजातीय जीवनशैली, कला, नृत्य, संगीत और रीति-रिवाजों का अनुभव कर सकते हैं। 


इथियोपिया इस जनजातीय दृष्टिकोण से भी अनुभवों और सांस्कृतिक परंपराओं का खजाना है। यह दुनिया के सबसे पुराने देशों में से एक है, जहाँ मानव गतिविधि लाखों साल पुरानी है। जहां अभी भी बड़ी संख्या जनजातियां अपनी पुरानी परंपराओं और परंपरागत जीवनशैली में निवास करती हैं। जनजातियाँ सदियों से इथियोपियाई परिदृश्य का हिस्सा रही हैं, जहाँ उन्होंने अपने चुनौतीपूर्ण परिवेश के अनुकूल ढलने के लिए अपने साधन और उपाय विकसित किए हैं।

इथियोपिया में 80 से अधिक अलग-अलग जातीय समूह हैं, जो विभिन्न जनजातियों के रूप में जाने जाते हैं। अनेक पर्यटन कंपनियों, टूर एजेंसियों सहित स्थानीय स्तर पर भी अनेक गाइड पर्यटकों को इस लोक संस्कृति और इस परिदृश्य से रूबरू करवाने में संलग्न हैं। 

खासतौर से ओमो घाटी की गहराई में ये परंपराएँ और समुदाय जीवंत हो उठते हैं। रंग-बिरंगी पृष्ठभूमि, आदिवासी समारोह और कुछ शानदार कला रूपों ने इथियोपिया के इस महत्वपूर्ण क्षेत्र को आकर्षक बना दिया है। मुर्सी, बोडी,सूरी,हमार,दासानाच,कारा आदि कई ऐसी जनजातियां हैं जिनकी अपनी अनूठी संस्कृति और जीवन शैली है। लगभग सभी जनजातियाँ भाषा, कपड़े, भोजन और परंपराओं में भिन्न हैं, जो इथियोपिया में कई सदियों से विद्यमान हैं। 

मुर्सी ओमो घाटी की सबसे प्रसिद्ध जनजातियों में से एक है, जिसकी आबादी लगभग 8,000 है। उन्हें पारंपरिक रूप से प्रवासी या घुमंतू समुदाय के रूप में जाना जाता है, ये केवल शुष्क मौसम में ओमो के किनारों को छोड़कर बरसात के मौसम में घास के मैदानों में जाते हैं। मुर्सी मवेशियों को काफी महत्व देते हैं, जिनकी संख्या के आधार पर संपन्नता और आदान-प्रदान से अधिकांश रिश्ते, जैसे विवाह, आदि निर्धारित होते हैं और उनका आहार भी मवेशियों पर ही आधारित होता है। ये लोग सुरमिक भाषा बोलते हैं, जो नीलो-सहारन भाषा परिवार से आती है। 


मुर्सी महिलाओं के पहनावे से उनकी पहचान सुनिश्चित होती है। सबसे खास और पहचानी जाने वाली विशेषता उनके निचले होठों में सजावटी मिट्टी की डिस्क (देभिन्या) पहनना है, जो सुंदरता और वयस्कता का प्रतीक है। जब कोई लड़की अपनी किशोरावस्था में होती है, तो उसके निचले होंठ को काट दिया जाता है और मिट्टी की डिस्क के साथ तब तक खुला रखा जाता है जब तक कि यह ठीक न हो जाए। फिर इस कट को हर बार नई और अधिक मिट्टी की डिस्क डालकर कई महीनों तक धीरे-धीरे खींचा जाता है,प्रत्येक महिला यह तय करती है कि उसे अपने होंठ को कितना फैलाना है। पुरुष और महिलाएं अपनी सामर्थ्य और शक्ति सिद्ध करने के लिए द्वंद्व युद्ध जैसी कई पारंपरिक रूढ़ खेल प्रतियोगिताओं का सामना करते हैं। इसमें पुरुष लाठियों और महिलाएं धातु के कंगनों का हथियारों के रूप में उपयोग करती हैं। 


बोडी जनजाति मुर्सी जनजाति के पड़ोसी हैं, और दोनों समूह अक्सर व्यापार करते हैं। वे चरवाहे लोग हैं जो मवेशियों को बहुत महत्व देते हैं और आम तौर पर खेती की प्रथाओं में भाग नहीं लेते हैं, इसके बजाय आदिवासी बाजारों में मक्का और अन्य कृषि उत्पादों के लिए व्यापार करना पसंद करते हैं। वे खानाबदोश समुदाय हैं, जो भूमि की कमी को रोकने और अपने मवेशियों के लिए नए चरागाह क्षेत्र खोजने के लिए आगे बढ़ते हैं। उनके जीवन में मवेशियों के महत्व के कारण, बोडी का मुख्य आहार भी मवेशियों पर केंद्रित है। इस जनजाति के लोग छह महीने तक एक कमरे में रहकर खून और दूध का सेवन करते हैं। यहां के आदिवासी लोग जानवर का खून और दूध एक साथ मिलाकर पीते हैं, जिससे यह कम से कम समय में अधिक मोटे हो सके। यह प्रक्रिया पूरे छह महीने तक दोहराई जाती है, जिससे शख्स की अच्छी सेहत बन सके। वहीं, इसके अलावा भी यह अन्य चीजों का सेवन करते हैं। बोडी पुरुष कपड़े की स्कर्ट पहनते हैं, जबकि महिलाएं बकरी की खाल से बने कपड़े पहनती हैं। पुरुष और महिला दोनों ही विशिष्ट रस्म में हिस्सा लेते हैं, जिसका इस्तेमाल व्यक्तियों की सुंदरता और साहस दिखाने के लिए किया जाता है। ये लोग मोटा होना अच्छा मानते हैं और इसके लिए कई उपाय करते हैं। छह माह वसायुक्त भोजन कर शारीरिक श्रम बंद करके अपना वजन बढ़ाते हैं। इस जनजाति में, मोटा होना बहुत आकर्षक माना जाता है और इसलिए महिलाएँ भी संभावित पतियों की तलाश के लिए इस उद्देश्य से आयोजित एक समारोह का उपयोग करती हैं


कारा एक अर्ध-खानाबदोश जनजाति है, कारा पहले चरवाहे थे जो मवेशियों पर निर्भर थे, बाद में परिस्थितियों वश उन्होंने मकई, सेम और कद्दू उगाने के लिए कृषि तकनीक विकसित की।   उनके पास मछली पकड़ने का एक अनूठा तरीका भी है, जिसमें मछलियों को छेदने के लिए लंबे भाले का इस्तेमाल किया जाता है। दिलचस्प बात यह है कि केवल अविवाहित युवा पुरुष ही मछली पकड़ सकते हैं, और उन्हें बाद में शुद्धिकरण अनुष्ठान करना होगा क्योंकि मछली पकड़ना पहले वर्जित माना जाता था।


इनके गांव शंकु के आकार की झोपड़ियों से बने हैं, जो लकड़ी के खंभों को आपस में बुनकर बनाई गई हैं और मिट्टी से ढकी हुई हैं, और छतें पुआल की हैं। झोपड़ियों में लकड़ी के खंभों से बने 'दरवाजे' हैं, जहाँ वे घर के प्रतीकात्मक प्रवेश द्वार के रूप में भैंस के कान या खुर जैसी वस्तुएँ लटकाते हैं। कपड़े साधारण होते हैं। केश सज्जा कारा संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें पुरुषों के बालों को लट में बांधा जाता है, रंगा जाता है और मोतियों, पंखों और फूलों से भिन्न शैलियों में सजाया जाता है।

कारा अपने शरीर को सफेद चाक, काले कोयले और पीले और लाल खनिजों का उपयोग करके डिज़ाइनों से रंगते हैं। वे निशान बनाने की प्रथा भी अपनाते हैं, जिसमें त्वचा को जानबूझकर काटा जाता है ताकि एक उभरा हुआ निशान प्रभाव पैदा हो जो महिलाओं के लिए एक सौंदर्य अपील के रूप में देखा जाता है, और पुरुषों की उपलब्धियों का संकेत देता है जैसे कि किसी दुश्मन या खतरनाक जानवर को मारना।


ओमो घाटी की अधिकांश जनजातियों में  कपड़े और अलंकरण महत्वपूर्ण सांस्कृतिक मूल्य रखते हैं। महिलाओं के लिए, सामाजिक स्थिति उनके द्वारा पहने जाने वाले मोतियों के हार की संख्या और रंग से प्रदर्शित होती है, लड़कियों को उनका पहला हार उनके पिता द्वारा दिया जाता है और फिर हर साल नए जुड़ते जाते हैं, जिन्हें कभी नहीं उतारा जाता है।  पुरुषों के लिए, नुकीले धातु के छल्ले और कटे हुए किनारों वाले कंगन रक्षात्मक हथियार के रूप में उपयोग के लिए पहने जाते हैं, और निशान योद्धा के रूप में उनकी उपलब्धियों को दर्शाते हैं। 


हमारे ट्रैवल विलोगरों के हम जैसे दर्शक हमेशा शुक्रगुजार रहेंगे जिनकी बदौलत घर बैठे इस अनोखी दुनिया के लोगों, रीति रिवाजों और जीवन शैली को जानने समझने का मौका मिल जाता है। शुभकामनाएं है कि वे खूब यात्राएं करें, उनके कैमरों से हमें नई दृष्टि और रचनात्मक समझ भी मिलती रहे। 


ब्रजेश कानूनगो

Sunday, 20 April 2025

पर्यटन क्षेत्रों के बाद लोक परिवहन में केबल कार प्रणाली

पर्यटन क्षेत्रों के बाद लोक परिवहन में केबल कार प्रणाली

पिछले दिनों नोमेडिक टूर यूट्यूब चैनल के तोरवशु का एक ट्रैवल विलॉग देखा जिसमें वे दक्षिण अमेरिका के बोलिविया देश के कैपिटल टाउन ला पॉज  में घूम रहे थे, वहां के दृश्यों को निहार रहे थे।  यह दुनिया के समुद्र तल से लगभग चार हजार मीटर ऊपर  बसे शहरों में पहले नंबर पर है।  


बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, यहाँ की एक केबल कार लाइन हर 24 घंटे में 65,000 लोगों को ले जाती है। ला पाज़ में दुनिया की सबसे लंबी मेट्रो केबल कार प्रणाली है, जो 16 किलोमीटर से अधिक लंबी है। 


इस केबल प्रणाली का संजाल कोई आठ नौ लाइनों के जरिए फैला हुआ है। हर लाइन की कारों का अपना अलग रंग है, हर लाइन का अपना अलग रंग है। कोई ब्लू लाइन है तो कोई रेड लाइन, येलो, ग्रीन लाइन आदि।  शहर के आसमान में हवा में तारों पर केबल कारों का एक पूरा नेटवर्क चलता है जिस पर हजारों यात्री एक स्थान से दूसरे स्थान आते जाते हैं। मेट्रो ट्रेन स्टेशनों की तरह इन लाइनों पर कई आधुनिक सुविधाओं से सज्जित साफ सुथरे जंक्शन स्टेशन हैं।   


यह शहर पहाड़ों से घिरा हुआ है ,चारों तरफ  बड़ा सौंदर्य बिखरा पड़ा है। पहाड़ों से घिरे इस दुर्गम शहर में मेट्रो रेल चलाना संभव नहीं था, तो वहां इस केबल कार नेटवर्क का विचार आया था तब दुनिया की यह सबसे और लंबी केबल प्रणाली अस्तित्व में आई।  तोरवाशु के ट्रैवल वीडियो को देखकर बड़ा आनंद आया। हमें लगा कि पर्यटन और परिवहन में उपयोगी इस प्रणाली के बारे में थोड़ी और जानकारी प्राप्त करना दिलचस्प होगा। 


पर्यटन क्षेत्र के साथ साथ अब शहरी परिवहन के लिए यह प्रणाली एक बहुत लोकप्रिय साधन के रूप में उभर रही है। केबल कारें शहरी परिवहन के एक लोकप्रिय साधन के रूप में उभरी हैं, और कई शहरों में अब इनकी अपनी प्रणाली है, उदाहरण के लिए, मेडेलिन (कोलंबिया), जेरूसलम (इजराइल), तस्मानिया (ऑस्ट्रेलिया), गोथेनबर्ग (स्वीडन), मोम्बासा (केन्या), और शिकागो (संयुक्त राज्य अमेरिका) में केबल कारें या उनके लिए योजनाएं चल रही हैं। 


केबल कारें न केवल परिवहन का एक सुगम साधन हैं, बल्कि वे पर्यटकों के लिए आनंददायी और दिलकश आकर्षण भी हैं। वे अक्सर शानदार प्राकृतिक दृश्यों के साथ एक अद्वितीय अनुभव प्रदान करती हैं, जैसे कि ला पाज़ में केबल कार प्रणाली, जो शहर और आसपास के पहाड़ों के अद्भुत दृश्य प्रदान करती है। 


कई जगह अनेक निजी केबल कार प्रणालियाँ भी अस्तित्व में आती गई हैं मसलन दुबई में पाम जुमेराह मोनोरेल दुबई के तटीय इलाके में स्थित एक निजी केबल कार प्रणाली है। लास वेगास, यूएसए में स्थित लास वेगास एरियल ट्रामवे एक अन्य प्रमुख केबल कार प्रणाली है। स्विट्जरलैंड में मैटरहॉर्न ग्लेशियर राइड एक प्रसिद्ध केबल कार प्रणाली है जो पर्यटकों को आकर्षित करती है। हांगकांग में ओशिनिया केबल कार एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है। कुछ शहरों में शहरी परिवहन के लिए केबल कार प्रणालियों का उपयोग किया जाता है, जैसे कि पुर्तगाल में लिस्बन केबल कार।


ये प्रणालियाँ शहरों और पहाड़ी क्षेत्रों में विशेष रूप से उपयोगी होती हैं जहां पारंपरिक परिवहन प्रणालियों का उपयोग करना मुश्किल हो जाता है। यही कारण है कि भविष्य में इन प्रणालियों का विकास देखा जा रहा है। शहरी गतिशीलता में सुधार और पर्यटन को बढ़ावा मिलने का रास्ता आसान हो रहा है।  


विश्व में कई शहरों में अब इसकी अपनी अपनी प्रणालियाँ हैं।  कोलंबिया, जेरूसलम इज़राइल, तस्मानिया ऑस्ट्रेलिया, मोंबासा केन्या और शिकागो संयुक्त राज्य अमेरिका में इन केबल कारों के लिए कई बड़ी-बड़ी योजनाएं चल रही हैं।  


भारत में, पर्यटन स्थलों तक पहुँच के लिए रोपवे (रोपवे) का उपयोग बढ़ रहा है। मेरे गृह नगर देवास में बहुत दिनों का सपना था कि यहां रोप  वे बनाया जाए, देवास टेकरी जो केवल 300 मीटर ऊंची है, ऊपर मंदिरों तक पहुंचाने के लिए अब रोप वे और केबल कारों की सुविधा उपलब्ध हो गई है। मैहर की माताजी है, मनसा देवी सहित कई धार्मिक तीर्थ स्थल हैं जहां श्रमसाध्य चढ़ाई की बजाए श्रद्धालुओं, दर्शनार्थियों को आसानी हो गई है।  दार्जिलिंग के रंगीत वैली पैसेंजर रोपवे, जिसे दार्जिलिंग रोपवे के नाम से भी जाना जाता है, भारत का सबसे पुराना और सबसे प्रसिद्ध रोपवे है। यह समुद्र तल से 7,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है और यात्रियों को दार्जिलिंग और आसपास के इलाकों का एक अद्भुत दृश्य प्रदान करता है। इसके अलावा, अन्य पहाड़ी पर्यटन स्थलों में भी रोपवे मौजूद हैं, जैसे कि गुलमर्ग (कश्मीर) में दो-स्टेज गोंडोला और शिमला में रोपवे।उत्तराखंड के ओली,  वैष्णो देवी जम्मू कश्मीर, और शिमला हिमाचल प्रदेश में यह बहुत सफल,पुरानी और बहुत लोकप्रिय केबल प्रणाली सिद्ध हुई है।  सबसे उल्लेखनीय पक्ष इस प्रणाली का यह है कि  इसमें कार्बन का उत्सर्जन बहुत कम होता है तो यह पर्यावरण हितैषी है, अन्य साधनों की बजाए यह कम खर्चीली  और सुगम है। दो स्थानों की दूरी भी कम हो जाती है क्योंकि अन्य रास्ते घुमावदार और लंबे हो जाते हैं। 


आगे की केबल प्रणाली योजनाओं के बारे में बात करें तो सरकार द्वारा ' पर्वतमाला परियोजना ' के तहत कई रोपवे परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है, जिनमें केदारनाथ, माता वैष्णो देवी और शंकराचार्य मंदिर जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक और पर्यटन स्थल शामिल हैं। इन परियोजनाओं का उद्देश्य है तीर्थयात्रियों और पर्यटकों के लिए यात्रा को आसान और सुरक्षित बनाना है।  सोनप्रयाग-केदारनाथ रोपवे लगभग 12.9 किलोमीटर लंबा रोपवे त्रिकुटी तकनीक से बनाया जाएगा और इसकी क्षमता प्रति घंटे प्रति दिशा में 1,800 यात्रियों की होगी। आमेर किला-नाहरगढ़ किला रोपवे जो 6.45 किलोमीटर लंबा  होगा राजस्थान में आमेर किले को नाहरगढ़ किले से जोड़ेगा। सोनमर्ग-थजीवास ग्लेशियर रोपवे 1.6 किलोमीटर लंबा होगा जो जम्मू-कश्मीर में सोनमर्ग को थजीवास ग्लेशियर से जोड़ेगा। मसूरी-केम्प्टी फॉल्स रोपवे 3.21 किलोमीटर लंबा रहेगा उत्तराखंड में मसूरी को केम्प्टी फॉल्स से जोड़ेगा। 


इसके अलावा भी कई अन्य योजनाएं भी है जिनमें गंगटोक रोपवे सिक्किम में स्थित यह रोपवे कंचनजंगा पर्वत का अद्भुत दृश्य प्रदान करता है। मनाली रोपवे हिमाचल प्रदेश के कुल्लू मनाली में स्थित है। वैष्णो देवी रोपवे जम्मू-कश्मीर में स्थित है। वाराणसी रोपवे उत्तर प्रदेश के वाराणसी में यह पहली शहरी सार्वजनिक परिवहन रोपवे परियोजना है। 


कुछ समय पूर्व ही पढ़ने में आया था कि मध्यप्रदेश के हमारे शहर इंदौर में भी शहर की घनी बस्तियों के ऊपर से रोप वे अर्थात केबल नेटवर्क शुरू करके परिवहन को सुगम बनाने की योजना पर विचार किया जा रहा है। यद्यपि यहां अभी देश की श्रेष्ठ सिटी बस सेवा के अलावा मेट्रो ट्रेन का चरणबद्ध निर्माण भी गति पर है। लेकिन भविष्य में केबल कार को धरातल पर लाने की इस पर्यावरण हितैषी पहल का स्वागत अवश्य किया जाना चाहिए। 


ब्रजेश कानूनगो

Saturday, 12 October 2024

समुद्र में डूबते देश की अर्थ व्यवस्था का आधार

समुद्र में डूबते देश की अर्थ व्यवस्था का आधार


किसी भी देश का जनजीवन और लोगों की खुशहाली वहां की अर्थव्यवस्था पर निर्भर करती है। यद्यपि प्रति व्यक्ति आय जैसे आंकड़े का भी बहुत महत्व होता है बल्कि कुछ अधिक ही होता है। सकल घरेलू आय का समान वितरण आबादी के बीच समान रूप से नही होने से समाज में निर्धन और संपन्न वर्गों के खांचे बन जाते हैं तो बड़े देशों में खुशहाली में भी असमानता दिखाई देती है।  लेकिन जब देश बहुत छोटे हों तो अमीरी  गरीबी के बीच की यह खाई उतनी गहरी दिखाई नहीं दे पाती। जिनकी अर्थव्यस्था कमजोर है तो गरीब होते ही हैं। जिन छोटे देशों की अर्थ व्यवस्था बेहतर होगी तो लोगों में खुशहाली भी बेहतर हो जाती है।
यदि क्षेत्रफल की दृष्टि से विश्व के चार सबसे छोटे देशों की बात करें तो मात्र 0.44 वर्ग किलोमीटर वाला वेटिकन सिटी सबसे छोटा देश है, इसके बाद मीनाको 2.10 वर्ग किलोमीटर, नाउरू 21 वर्ग किलो मीटर के बाद तुवालू 26 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल के साथ चौथा सबसे छोटा देश है। तुवालू की अर्थ व्यवस्था में जिस चीज का महत्वपूर्ण योगदान है वह हमारी सामान्य समझ को चौंका देती है।

तुवालु दक्षिण प्रशांत महासागर में नौ छोटे द्वीपों का एक समूह है, जिसने 1978 में यूनाइटेड किंगडम से स्वतंत्रता प्राप्त की थी। इनमें से पांच द्वीप प्रवाल द्वीप हैं, जबकि अन्य चार समुद्र तल से ऊपर उठी भूमि से बने हैं। पूर्व में एलिस द्वीप के नाम से जाने जाने वाले ये सभी द्वीप निचले इलाके में हैं, और तुवालु की समुद्र तल से ऊंचाई 4.5 मीटर से अधिक नहीं है। ग्लोबल वार्मिक के कारण समुद्र का जल स्तर ऊपर उठ रहा है, ऐसे में यह खतरा भी यहां पैदा हुआ है कि कुछ ही वर्षों बाद ये द्वीप डूबकर विलुप्त हो सकते हैं। ट्रेवल व्लॉगरों को तुवालू की यात्रा करने में काफी दिलचस्पी रहती है। पिछले दिनों पैसेंजर परमवीर और डॉक्टर यात्री व्लाग के परमवीर और नवांकुर के यूट्यूब वीडियो हमने देखे और यहां के जनजीवन को जाना समझा है।

तुवालू की राजधानी फुनाफ़ुटि है जहां एक मात्र अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट है जहां प्रति सप्ताह दो तीन फ्लाइट का संचालन होता है, एयर कनेक्टिविटी केवल फिजी के जरिए ही होती है। बाकी समय यहां के रन वे का उपयोग खेल के मैदान के रूप में होता है। बच्चे और अन्य लोग इसका आनंद उठाते हैं। परिवहन के रूप में एक सिरे से दूसरे सिरे तक बस सड़क बनी हुई है, लोग पैदल ही यात्रा कर लेते हैं, कुछ दुपहिया वाहन भी हैं। सरकारी अधिकारियों के पास कुछ कारें भी हैं किंतु उनका उपयोग बहुत कम किया जाता है। यहां की आबादी ही केवल 11,500 है जो 26 वर्ग किमी के क्षेत्र में फैली है तो यहाँ की आवश्यकताओं को आसानी से समझा जा सकता है।
हमने देखा कि इन द्वीपों पर जीवन सरल किंतु बहुत कठिन होता है। यहां कोई नदी या अन्य जल स्रोत नहीं हैं, इसलिए बारिश के पानी के संग्रहण से ही लोगों का काम चलता है। नारियल तथा ताड़ के पेड़ ज़्यादातर द्वीपों पर फैले हुए हैं, खोपरा,सूखे नारियल की गिरी आदि ही व्यावहारिक रूप से निर्यात करने योग्य उपज है। यहां की मिट्टी में बढ़ती हुई लवणता के कारण पारंपरिक खेती करना जोखिमपूर्ण है।

तुवालू ने आय के अन्य नवोन्मेषी स्रोत का दोहन करके चतुराई दिखाई है। हम सब जानते हैं कि आधुनिक विश्व एक ग्लोबल समाज बन गया है, जिसकी सारी संरचनाएं, एकजुटता इंटरनेट जैसी आधुनिकतम तकनीक पर निर्भर है। दुनिया की रक्तवाहिनियों में इंटरनेट के प्रवाह से धड़कने बनी हुई हैं। हर संस्था, कंपनी,व्यक्ति या सरकारों की अपनी अलग अलग वेब साइट होती हैं, जो अपने डोमेन के जरिए अंतरराष्ट्रीय रूप से संजाल से जुड़ पाती हैं। ईमेल, वेब सर्च और अन्य कई गतिविधियों के लिए टॉप लेवल डोमेन बनाया जाता है। यह वह हिस्सा होता है जो डोमेन नेम के बिलकुल आखिर में होता है। जिसे हम डॉट कॉम या डॉट इन आदि से जानते हैं।

डॉट कॉम का मतलब होता है यह वेब साइट कमर्शियल उपयोग के लिए है। डॉट ओआरजी का मतलब है यह संस्थागत वेब साइट है।  डॉट जीओवी का मतलब है यह गवर्नमेंट साइट है।
इसी तरह देश का कोड भी होता है। कंट्री कोड टॉप लेवल डोमेन। इससे पता चल जाता है कि यह किस देश का डोमेन है। जैसे भारत के लिए डॉट इन, अमेरिका के लिए डॉट यू एस और ब्रिटेन के लिए डॉट यू के। इसी तरह तुवालू का डोमेन बनता है डॉट टीवी।  जोकि टेलीविजन शब्द का लघु रूप हो जाने से महत्वपूर्ण हो गया है। तुवालू में न तो इंटरनेट है न ही ऑनलाइन कोई संरचना, उसने अपने इंटरनेट कंट्री कोड डोमेन डॉट टीवी को (.tv ) कैलिफोर्निया की एक कंपनी को कई मिलियन डॉलर प्रति वर्ष की निरंतर आय के लिए बेच दिया है। कंपनी इस डोमेन को टेलीविजन प्रसारकों को बेचती है। तुवालू की आय का यह बड़ा स्रोत बन गया है। तुवालू की अर्थ व्यवस्था का यही वह राज है जिससे वहां का जीवन थोड़ा सुगम हुआ है। 

द्वीप के डूबने के खतरे को लेकर ऑस्ट्रेलिया सरकार ने बड़े उपाय किए हैं, अपने यहां तुवालू के नागरिकों को बसने के लिए काफी सुविधाएं और स्थान उपलब्ध कराने के बहुतेरे प्रयास जारी हैं।
तुवालू के बारे में इतनी अनजानी जानकारी जुटाने की प्रेरणा में यूट्यूब के ट्रेवल व्लॉगरों के योगदान को हम भुला नहीं सकते। किताबों की तरह घुमक्कड़ों के कैमरों से दुनिया को देखने का भी अपना एक सुख है। 

ब्रजेश कानूनगो    

Tuesday, 1 October 2024

हाट बाजार में घुमक्कड़

हाट बाजार में घुमक्कड़


गत दिनों हमने नोमेडिक टूर व्लॉग में तोरवशु के एक यात्रा वीडियो को देखा। इसमें वह सूरीनाम देश में यात्रा कर रहे हैं। और भी कई ट्रेवलर्स और घुमक्कड़ों ने इस देश की यात्राएं की है। 
सुरीनाम  दक्षिण अमरीका महाद्वीप के उत्तर में स्थित एक गणराज्य है। सूरीनाम के पूर्व में फ्रेंच गुयाना और पश्चिमी गयाना स्थित है। देश की दक्षिणी सीमा ब्राज़ील और उत्तरी सीमा अंध महासागर से मिलती है।  यह देश दक्षिण अमरीका में क्षेत्रफल और आबादी की दृष्टि से सबसे छोटा संप्रभु देश है। यह पश्चिमी गोलार्ध पर एकलौता डच भाषी क्षेत्र है, जो नीदरलैंड साम्राज्य का हिस्सा नहीं रहा है। सूरीनाम का समाज बहुसांस्कृतिक है, जिसमें अलग-अलग जाति,भाषा और धर्म वाले लोग निवास करते हैं। बरसों पहले दक्षिणी एशिया के देशों से खासतौर से भारत से कई लोगों को मजदूरी के लिए  यहां लाया गया था, वे यहां बसे तो उनकी अनेक पीढ़ियां यहां की होकर रह गईं किंतु उनमें भारत की संस्कृति, परंपराएं और भाषाएं भी बनी रहीं। यद्यपि स्थानीयता का थोड़ा प्रभाव तो बढ़ता गया। 

तोरवशु के वीडियो में हम देखते हैं कि जब वे एक स्थानीय बस में बैठते हैं तो उस बस पर भारतीय देवी देवताओं के चित्र और उनके प्रति श्रद्धा के पद लिखे होते हैं। जय शिवशंकर, हर हर महादेव के अलावा बस कंपनियों के नाम भी इसी तरह के लिखे दिखाई देते हैं। इसके अलावा कई यात्री बसों के आगे बॉलीवुड के कलाकारों के चित्र भी खूबसूरती से पेंट किए नजर आते हैं। ड्राइवर और यात्री हिंदी फिल्मों के पुराने गाने तोरवशु को सुनाने लगते हैं।  हमने देखा कि वहां हिंदुस्तानी लोग जो बरसों पहले भारत से गए थे उनकी संतानों में आज भी भारतीयता नजर आती है, वे लोग अपने मूल स्थान को भारत जाकर देखना चाहते हैं, जहां उनकी कभी जड़ें रही होंगी।  ज्यादातर घुमक्कड़ स्थानीय बाजारों में घूमना फिरना, खरीददारी करना बहुत पसंद करते हैं। चाहे दीपांशु सांगवान हो या दावूद अखुनजादा, यह लोग वहां के स्थानीय सब्जी बाजार में अवश्य जाते हैं। दुकानदारों और ग्राहकों से दिलचस्प बातचीत करते हैं। तोरवशु भी ऐसे ही एक बाजार में घूमते हैं, सब्जी विक्रेताओं से बातचीत करते हैं, भारत के बारे में पूछते हैं।  बहुत दिलचस्प है इसको देखना। उनकी सांस्कृतिक, धार्मिक परंपराओं और राजनीतिक चेतना देख सुनकर हमें बहुत सुख मिलता है।  

अनेक व्लागर्स के हमने बाजार भ्रमण के कई विडियोज देखें हैं, यूरोप, अरब देशों, अफगानिस्तान आदि के पारंपरिक बाजारों को देखना अद्भुत होता है। पूर्व सोवियत देशों और पश्चिम देशों के शीतकालीन बाजारों की विशिष्ठता भी बहुत अलग तरह से मुग्ध करती है। लेकिन  हम यहां उन हाट बाजारों पर अपनी बात केंद्रित रखना चाहते हैं जिनकी दक्षिण एशियाई देशों में खास पहचान और महत्व होता है। कुछ इसी तरह के हाट बाजार हमने अफ्रीका के कुछ देशों में भी कुछ व्लागर्स के माध्यम से देखे हैं जो आदिवासी इलाकों के गांवों और कस्बों में लगते हैं। उनके दृश्य देखकर हमें अपने 50 साल पुराने भारत के ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों की याद आ जाती है। तंजानिया, युगांडा,केन्या,नाइजीरिया आदि जैसे अनेक देशों के ग्रामीण और परंपरागत बाजारों के नजारे ठीक    हाट बाजारों की तरह ही होते हैं। 
इसी तरह हमने ताइवान के कुछ वीडियो भी देखे हैं।  वहां के लोकल किस तरह से सब्जी उगाते हैं, उसकी देखभाल करते हैं, ग्राहकों को विक्रय हेतु तैयार करते हैं, बाजार ले जाते हैं, ज्यादातर देशों में हम इन बाजारों पर महिलाओं का आधिपत्य देखते हैं। हाट बाजारों का अधिकतम कामकाज महिलाएं संभालती हैं। हमारे देश के उत्तर पूर्वी याने सेवन सिस्टर राज्यों में यह सहजता से देखा जा सकता है। नोमेडिक इंडियन के दीपांशु सांगवान के विडियोज के साथ हमने इन क्षेत्रों का खूब आनंद लिया है। 

जो हम बचपन से देखते आए उससे कहा जा सकता है कि गांवों और कस्बों में लगने वाले स्थानीय बाज़ार को हाट बाज़ार कहते हैं। यहां सब्ज़ी, फल, खाद्यान्न, और परचून सामग्री मिलती है। गाँव के लोगों की रोज़मर्रा की ज़रूरतें पूरी करने में हाट बाज़ार की अहम भूमिका होती है। कुछ दैनिक तो कुछ बाजार साप्ताहिक रूप से भरते हैं, अब हम हमारे शहर की बात करें तो हमारे यहां एक सोमवारिया हाट लगता था, इसी तरह शुक्रवार के दिन किसी और जगह पर हाट भरता था, दिन के आधार पर ही इन हाटों का नाम ख्यात हो जाता है। दिल्ली जैसे महानगर में जनकपुरी की सड़कों पर हमने इसी तरह का शनिवारी बाजार लगते देखा है। उस दिन वहां जाम जैसा लग जाता है, लेकिन उसका भी अपना आनंद है।
  
बहुत से बाजारों में सेकंड हैंड सामान की दुकानें लगती हैं, इन बाजारों को दक्षिण एशिया में, टर्मिनल बाज़ार या सेकेंड हैंड सामान का बाज़ार , लांडा बाज़ार भी कहते हैं। गैर लाभकारी संस्थानों के उत्पादों या सेवा कार्यों को रेखांकित करने के लिए जो प्रदर्शनी लगती है उसे मीना बाज़ार कहा जाता है लेकिन हाट बाजार की झलक भी इन मीनाबाजारों में मिल जाती है। मलेशिया, इंडोनेशिया और सिंगापुर जैसे कुछ देशों में शाम को खुलने वाले रात्रि कालीन बाज़ार को पासार मालम कहते हैं। सुबह के बाजारों को  पासार पागी कहते हैं। ये आमतौर पर आवासीय इलाकों की सड़कों पर लगते हैं, खाने पीने के भी स्टाल लगते हैं। सुबह से दोपहर तक इनमें खरीदारी की जा सकती है। कई बार बाजारों की सड़कें वाहनों के आवागमन के लिए बंद रहती हैं। 

कुछ हाटबाजार विशेष अवसरों और पर्वों पर भी लगते हैं। कुछ हाट गांवों और आदिवासी क्षेत्रों में भी होते हैं जिनका काफी सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व होता है, ये कई पुरानी परंपराओं और रीति रिवाज का हिस्सा बन चुके होते हैं। जैसे हमारे मध्य प्रदेश में झाबुआ जिले में होली के अवसर पर लगने वाले हर्षोल्लास से परिपूर्ण भगोरिया हाट।  इन हाटों मेलों में आदिवासियों के रिश्ते बनते हैं। ऐसे ही पर्वों पर लगने वाले हाट बाजार और मेले जिन्हे जतरा भी बोला जाता है पर्यटकों की खास रुचि का हिस्सा बन जाते हैं।  मध्य प्रदेश के देवास शहर में  आषाढ़ी पूर्णिमा पर तीन दिवसीय मेला या जतरा लगती है जिसमे आसपास के ग्रामीण स्त्री पुरुष, बच्चे बड़े उत्साह से शामिल होकर आनंद उठाते हैं। मेले की यह सतरंगी छटा और गहमा गहमी देखते ही बनती है।  कहीं शिवरात्रि पर लगता है तो कहीं दशहरे पर। ये मेले भी कहीं न कहीं ग्रामीण हाट का ही विस्तृत रूप होते हैं। 

अब इन बाजारों का महत्व सरकारों द्वारा भी समझ लिया गया है और इनका उपयोग क्षेत्र के सामाजिक, आर्थिक विकास के लिए भी होने लगा है। हाट बाजारों का अपना सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक महत्व है।  सरकारों ने अपनी गतिविधियों को भी जोड़ दिया है।  मेलों  में आसपास के ग्रामीण लोग एक साथ इकट्ठा होते हैं, अपने परंपरागत परिधानों में आते हैं, वहां लोक कलाएं, लोकगीत के आयोजन होते हैं।   हाट बाजारों में हर समाज के हर क्षेत्र के हर वर्ग के ग्रामीण लोग, स्थानीय लोग, आसपास के लोग एक दूसरे के संपर्क में आते हैं। व्यापारी किसान से मिल रहा है, किसान दिहाड़ी मजदूर से। शिल्पकार, कारीगर, श्रमिक, पुजारी, शिक्षक, सरकारी आदमी, पटवारी सब एक दूसरे से मिल रहे हैं। पशुपालक है यहां तो पशु चिकित्सक भी मिल जाता है।  सामाजिक समरसता और एकजुटता की राह इधर से बनने की गुजाईश निर्मित होती है। 

स्थानीय व्यापारियों, छोटे दुकानदारों, किसानों के बीच खरीद बेच से स्थानीय स्तर पर पूंजी का प्रवाह स्थानीय समाज में ही होता है। यहीं की अर्थ व्यवस्था को सुदृढ़ होने में आसानी होने लगती है। स्थानीय हुनरमंद कलाकारों ,उद्यमियों, बुनकरों, शिल्पकारों कारीगरों को स्थानीय स्तर पर बाजार उपलब्ध हो पाता है।  इस तर्ज पर अब शिल्पग्राम, क्राफ्ट बाजार, हाथ कराघा बाजार, बांस की टोकरियों बनाने वाले लोगों के उत्पादों, लोहे के शिल्प और औजार  बनाने वालों के उद्योगों को भी इन हाट बाजार के जरिए महत्व दिया जा रहा है। 

हमारे देश में स्वयं सहायता समूह अवधारणा का जो व्यापक माध्यम आया है, जिसमें समूह बनाकर ग्रामीण महिलाएं अपनी उत्पाद गतिविधियों में जुटी हैं, विशेष कर ग्रामीण महिलाओं के समूह है जो गृह उद्योगों में आगे बढ़ी हैं, मसलन मसाला उद्योग, लघु उद्योग में प्रोडक्ट बनाती हैं, साबुन, अगरबत्ती या अन्य जीवनोपयोगी वस्तुएं, इन सब चीजो के विक्रय के लिए इन बाजारों का भी उपयोग होने लगा है।   कहीं कहीं इनके लिए  अलग से हाट बाजार बनाए गए हैं, सुविधाएं दी गई हैं। हाट बाजार का एक अपना अलग महत्व होता है और एक तरह से देखा जाए तो सारे ही बाजार एक दूसरे पर अब निर्भर करते हैं।  
 
दुनिया के विभिन्न बाजारों को घुमंतुओं के यूट्यूब वीडियो में देखने पर एक अलग ही आनंद आता है। हमे लगता है दुनिया को घर बैठे देखने का यह भी एक अच्छा तरीका हो सकता है।  विचार करें! 

ब्रजेश कानूनगो 

Tuesday, 24 September 2024

क्यों होता है ऐसा अनजान पर्यटकों के साथ

क्यों होता है ऐसा अनजान पर्यटकों के साथ

जब मैंने जीवन में पहली बार अकेले लंबी यात्रा की थी, उस यात्रा का एक कटु अनुभव मेरे भीतर अभी तक बसा हुआ है। जब तब वह मुझे दुखी करता रहता है। खासतौर से घुमक्कड़ों के ट्रेवल वीडियो देखते हुए जब उनके साथ कोई स्कैम होता देखता हूं, अपना वह बुरा अनुभव पुनः मन को खिन्न बना जाता है। मैं सोचता हूं कि काश मेरे साथ वैसा ना हुआ होता , उस वक्त मेरे किशोर उम्र मन पर जो गहरी छाप अंकित हो गई थी वह अब तक कायम है, अफसोस है समय की धारा भी उसे धो नहीं सकी।  

वर्ष 1977 के आसपास की बात है, हमारी पढ़ाई समाप्त हुई ही थी।  हमने यह सोच कर एमएससी कर लिया था कि हमारे नगर के आसपास बड़े पैमाने पर औद्योगिकरण हो रहा था, नए-नए संस्थान खुल रहे थे, नौकरी मिलने की संभावनाएं बनने लगीं थीं। अगर हम केमिस्ट्री में एमएससी कर लेते हैं तो हमें तुरंत कहीं ना कहीं किसी फैक्ट्री में, किसी प्रयोगशाला में नौकरी मिल जाएगी।  एमएससी तो हो गया था उसका परिणाम नहीं आया था फाइनल ईयर का।  लेकिन डाक तार विभाग में उन दिनों मैट्रिक और हायर सेकेंडरी के अंकों के आधार पर चयन नौकरी के लिए हो जाया करता था। हमारे अंक अच्छे ही आते थे परीक्षाओं में, मैट्रिक और हायर सेकेंडरी में भी जिले में प्रथम विद्यार्थियों में रहे थे। अंकों के आधार पर हमारा चयन हो गया और एमएससी का परिणाम आने के पहले ही हमको डाक विभाग में क्लर्क के पद के लिए चुन लिया गया।  प्रशिक्षण के लिए हमें उत्तर प्रदेश के सहारनपुर प्रशिक्षण केंद्र पर जाना था तीन महीनों के लिए। वहां एक बहुत बड़ा प्रशिक्षण केंद्र हुआ करता था जो सहारनपुर शहर से थोड़ा ग्रामीण क्षेत्र में दूर स्थित था, यह परिसर संभवतः पहले सैन्य विभाग के पास रहा था तो वहां उसी तरह का अनुशासन होता था। अब तो बहुत बदल गया होगा , हमने तो फिर पीछे मुड़ के देखा ही नहीं।  बहरहाल 3 महीने का हमारा प्रशिक्षण होना था, उसके बाद पोस्टिंग होनी थी।  हम कभी घर से निकले नहीं थे मात्र 21 बरस की हमारी उम्र थी, पहली अकेले लंबी रेल यात्रा थी, इंदौर से सहारनपुर तक की। 

लेकिन जो मैं बताना चाहता हूं वह सहारनपुर स्टेशन पर उतरने के बाद का प्रसंग है। हमने एक ऑटो रिक्शा लिया, उसको बताया कि हमको ट्रेनिंग सेंटर पर पहुंचा दे,  कितने पैसे लेंगे, हमको तो यह भी पता नहीं था कि कितने लगते हैं, कितना किराया होता है, उसने हमको जो बताया हम तैयार हो गए। ट्रेनिंग सेंटर बहुत दूर था, शहर से काफी दूर था, हमको कुछ भी पता नहीं था। उस समय ना तो कोई गूगल मैप होता था ना कोई ऐसी जानकारी लेकर घर से निकले थे। नौकरी मिल जाने की ख़ुशी में हम बस निकल गए थे। रिक्शा हमने बुक कर लिया और उसमें बैठ गए डरते डरते। सुन भी रखा था कि यह क्षेत्र बड़ा बदनाम है, और यहां लूट पाट की बड़ी घटनाएं होती रहती हैं।  शहर से बाहर निकलते ही हाइवे जैसा मार्ग आया तो रिक्शा वाले ने रिक्शा से उतारकर पूरा किराया वसूल करने के बाद कहा कि अब आप यहां से कोई अन्य सवारी ले लें।  राजा बाबू टाइप जीवन रहा था हमारा, दुनियादारी कुछ समझते नहीं थे, अब क्या करें, भीतर ही भीतर हम घबराते रहे। 

पता नहीं रिक्शा वाले पर हमारी परेशान शक्ल का असर हुआ या हमारी मासूमियत के कारण थोड़ी बहुत दया आ गई।  तो उसने हाइवे पर गुजर रही एक बैल गाड़ी को रुकवा कर उससे कुछ बात की। बैलगाड़ी में बोरियां लदी थीं और गाड़ी में कार के टायर लगे थे, एक ऊंचा पूरा मजबूत बैल उसे खींच रहा था। उसने गाड़ीवान को कहा कि इस लड़के को वह ट्रेनिंग सेंटर छोड़ दे। मान गया बैलगाड़ी वाला, जो सामान लेकर शहर से बाहर किसी गांव में जा रहा होगा।  उस गाड़ी पर हम सवार हो गए।  रास्ते में उस गाड़ी वाले ने बताया कि यहां इसी तरह से बाहर से आने वालों को परेशान किया जाता है। रिक्शा वाले ने भी दो तीन गुना किराया मुझसे वसूल कर लिया था। बैलगाड़ी वाले ने रास्ते में पड़ने वाले ट्रेनिंग सेंटर के गेट पर हमे उतार दिया। थोड़ी सी राशि उसे भी हमने देने की कोशिश की किंतु वह लेने को राजी नहीं हुआ। 

यह वही घटना थी जिसमे रिक्शा चालक ने गंतव्य तक के पूरे पैसे लेकर वहां तक पहुंचाने का वादा किया था, उसने हमारे साथ धोखा किया था, पर्यटकों की आज की भाषा में मेरे साथ स्कैम हुआ था। आज तक नहीं भूल पाया हूं और मुझे लगता है कि यह लोग अजनबी और मासूम  यात्रियों के साथ ऐसा क्यों करते हैं? थोड़ा सा ख्याल करना चाहिए, उनके साथ हमदर्दी से पेश आना चाहिए। जब भी मैं किसी ट्रैवलर को या विदेशी ब्लॉगर को या अन्य भाषा भाषी ट्रैवलर को किसी दूसरे इलाके में ठगा जाता देखता या मूर्ख बनाए जाते देखता हूं तो बड़ी वेदना और ग्लानि भी महसूस होने लगती है। 

दिल्ली में जो भी ट्रैवलर आते हैं, यहां के बाजारों, स्ट्रीट फूड चौपाटियों, गलियों आदि का खूब मजा लेते हैं। लाल किले के सामने के बाजार और जामा मस्जिद के आसपास के बाजार, चांदनी चौक जैसे इन इलाकों में बहुत रुचि से घूमते हैं और वहां के खान-पान को और वहां की चहल पहल, भीड़ भाड़ को भी एंजॉय करते हैं।  यहां के लोगों से उत्साह से बातचीत करते हैं और बहुत अच्छा चित्रण करते हैं। कनॉट प्लेस पर भी ये लोग बहुत घूमते हैं।

एक वीडियो हमने देखा था पिछले दिनों।  दिल्ली घूमने आया ऐसा ही एक विदेशी पर्यटक खरीददारी कर रहा है और अपने यूट्यूब चैनल के लिए वीडियो बनाते हुए व्लोगिंग भी कर रहा है।

हिंदी में बातचीत करने के लिए उसके पास मात्र कुछ वाक्य हैं। नमस्कार,सलाम वालेकुम,कैसे हो? आपका नाम क्या है? आप कहां से हो? इसके अलावा उसे हिंदी में कुछ समझ नहीं आता। संकेतों और मोबाइल के ट्रांसलेट एप से काम चलाने की कोशिश करता है।  चाय और लस्सी जरूर पीता है बीच बीच में। बहुत आत्मीयता दिखाई देती है स्थानीय लोगों और पर्यटक के बीच। देखते हुए दर्शक भी भाव विह्वल हो उठते हैं। बड़े सुखद दृश्य होते हैं सामने, जब वह हमारी परंपराओं और खान पान में रुचि दिखाता है। मन गदगद हो उठता है।

पर्यटक जानता है कि दिल्ली के बाजारों में मोल भाव (बार्गेनिंग) काफी होता है। पांच छह गुनी कीमत लेकर विदेशी पर्यटक को सामान बेचते हम अपने सामने देखते हैं। फिर भी पर्यटक वह चीजें खरीदता है। कोशिश करता है कम कीमत पर खरीदने की। विराट कोहली जैसी जर्सी खरीदता है, रेबेन ब्रांड जैसा गॉगल और ब्रांडेड जूते भी। सभी कुछ असली नहीं होते, उनकी नकल होते हैं,उसे भी पता है लेकिन खरीदने के लिए खरीददारी करता है। पहनकर घूमता फिरता है। अन्य स्थानीय ग्राहकों से बाद में पूछता है कि इन जूतों की क्या कीमत होगी? आठ हजार रुपयों के जूते उसने मोल भाव के बाद तीन हजार में खुशी खुशी पहन लिए थे। यह जानकर उसके चेहरे पर कोई शिकन नहीं है कि जूतों की वास्तविक कीमत मात्र पंद्रह सौ रुपए है। उसके पास अपने काम की खुशी है। स्थानीयता और लोगों को जानने और उनसे संवाद करने का सुख और आनंद है।

नए खरीदे महंगे जूते उसे आरामदायक नहीं लग रहे। एक जगह रुककर फिर से पुराने जूते पहन लेता है। अब वह ठीक से घूमने का मजा ले रहा है। सामने एक मोची दिखाई देता है। वह अपने पुराने जूतों को पॉलिश करवाता है। सौ रुपयों में बिल्कुल नए हो जाते हैं पर्यटक के जूते। हुनरमंद मोची टूटी फूटी अंग्रजी बोलता है। समझ भी लेता है। पर्यटक मजदूरी के सौ रुपए देता है उसे और अपने नए खरीदे जूतों की जोड़ी भी उसी मोची को दे देता है उपहार में। कहता है इनका जो उपयोग करना हो, कर लेना।

इस बीच व्लॉगर पर्यटक के कुछ स्थानीय फोलोवर भी वहां इकट्ठा हो गए होते हैं। एक लड़की अचरज से पूछती है ये नए जूते आपने मोची को क्यों दे दिए? ये तो बहुत महंगे हैं।

वह बोलता है, ये मेरे किसी काम के नहीं हैं अब। इन्हे पहनने के बाद मैं अपना काम ही नहीं कर पा रहा। इनके काम आ जाएंगे। इन्होंने मेरे पुराने जूते सही दाम लेकर नए कर दिए हैं।

नए जूते की खरीददारी में ठगे जाने पर विदेशी पर्यटक को कोई अफसोस नहीं है। उसके चेहरे पर कोई शिकन नहीं है। अपना कैमेरा थामे विडियो बनाता हुआ वह आगे बढ़ जाता है।

टीवी स्क्रीन के सामने बैठा मैं ग्लानि से पानी पानी हो जाता हूं। माथे पर तनाव की लकीरें कुछ और गहरा जाती हैं।

यह विडंबना ही है कि अजनबियों को ठगे जाने की ये घटनाएं वर्षों पहले भी होती थीं और आज इतनी प्रगति और विकास होने के बाद भी हमारी यह प्रवृत्ति बनी हुई है। जरा सोचिए, ऐसा क्यों है? 


ब्रजेश कानूनगो

Friday, 20 September 2024

लॉस्ट चांस टूरिज्म : कितना अंतिम है यह

लॉस्ट चांस टूरिज्म : कितना अंतिम है यह


पयर्टन के क्षेत्र में ' लॉस्ट चांस टूरिज्म ' जैसे नए ट्रेंड के बहाने एक नया रास्ता मिला है। इससे इस उद्योग को नया बाजार भी मिला है। अंतिम अवसर पर्यटन, जिसके तहत यात्री उन स्थलों पर जाते हैं जो बदलते पर्यावरण, क्षरण और जलवायु परिवर्तन के कारण खतरे में हैं। यह एक ऐसी बढ़ती हुई प्रवृत्ति है जिसमें पर्यटक इन स्थानों के संभावित रूप से बदलने या पूरी तरह से गायब होने से पहले इनका दर्शन लाभ उठाने और सैर सपाटे की इच्छा से प्रेरित हुई है। 

जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन के बारे में जागरूकता बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे इन संवेदनशील स्थानों में पर्यटक की रुचि भी बढ़ती जाती है। इसमें होता है यह है कि टूर प्रबंधन कंपनियां उन स्थानों की पर्यटकों को सैर कराते हैं जो दृश्य या चीजें इस पृथ्वी से या इस दुनिया से गायब होने के खतरों से गुजर रहीं हैं। अब इस गायब होने की अवधि कितनी लंबी होगी इसका अनुमान लगाना बहुत कठिन होगा। यह समय इतना लंबा भी होना संभव है कि हमारी कई पीढ़ियां गुजर जाएं या इतना छोटा भी हो सकता है कि कुछ वर्षों में ही यह चीजें विलुप्त हो जाएं। उनके समाप्त होने के पहले लोगों को उन तक पहुंचा देने की सारी जद्दोजहद को अंतिम अवसर पर्यटन या लास्ट चांस टूरिज्म के रूप में इन दिनों काफी चर्चा में है और एक पूरी पीढ़ी में अदृश्य होने के पहले मनोहारी और अद्भुत चीजों को देखने के प्रति रुचि बढ़ाई जा रही है या बढ़ गई है। 

बहरहाल, हमारी असली चिंता यह है कि ये खूबसूरत नजारे और उनका आनंद हमारी दुनिया से गायब आखिर क्यों होते जा रहा है। इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं।  इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण पृथ्वी के तापमान में निरंतर वृद्धि होना माना गया है। जलवायु में जो परिवर्तन हो रहे हैं उसका असर व्यापक रूप से दिखाई दे रहा है। बहुत सी चीजें  समाप्त हो रही हैं, अदृश्य हो रही है या उनमें बदलाव आता जा रहा है। परंपरागत जनजीवन, पर्यावरण , जीव जंतु और प्रकृति पर इस परिवर्तन का असर बढ़ता दिखाई देने लगा है। 

वस्तुतः ग्लोबल वार्मिंग के कारण जलवायु परिवर्तन हो रहा है। कहीं सूखा पड़ रहा है तो कहीं बाढ़ आ रही है। यह जलवायु असंतुलन ग्लोबल वार्मिंग का ही नतीजा है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण गर्मी और नमी के पैटर्न में बदलाव आ रहा है। कई नए वायरस और बीमारी फैलाने वाले कीट और मच्छरों की आवाजाही बढ़ रही है। बाढ़, सुनामी और अन्य प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि के कारण, जन धन का बड़ा नुकसान पर्वतीय और तटीय क्षेत्रों में बढ़ता गया है जिसकी वजह से सहज मानव जीवन बाधित हो जाता है। 

जलवायु में वैश्विक बदलाव के कारण कई पौधों और जानवरों के आवास नष्ट हो जाते हैं। इस स्थिति में, जानवरों को अपने प्राकृतिक आवास से पलायन करना पड़ता है और उनमें से कई धीरे धीरे विलुप्त भी हो जाते हैं। यह पृथ्वी की जैव विविधता पर ग्लोबल वार्मिंग का एक बड़ा प्रभाव है। 

पृथ्वी के निरंतर बढ़ते तापमान को हम लोग जिस ग्लोबल वार्मिंग के नाम से जानते हैं, इन दिनों काफी चर्चा में भी है।  तापमान के बढ़ने से वर्तमान परिस्थितियों में, जलवायु में बहुत से परिवर्तन हो रहे हैं और उन परिवर्तनों के कारण   पर्यटन के उद्देश्य से जिनका महत्व होता है उन चीजों में भी बदलाव हो रहे हैं, या वे विलुप्त हो रही हैं। मसलन आर्कटिक और अंटार्कटिक ध्रुवीय क्षेत्र यहां सबसे ज्यादा बदलाव हो रहा है। यहां जो पशु पक्षी रहते हैं, खास तौर से जो ध्रुवीय भालू हैं, वह सब समाप्त हो रहे हैं।  ग्लेशियर और विशाल आइस बर्ग हैं वे भी जल्दी पिघलने लगे हैं। उनका सौंदर्य अनुभव करने में पर्यटक को अब धीरे धीरे निराश होने की आशंका सताने लगी है।   

समुद्रों में खास तौर से ऑस्ट्रेलिया के ग्रेड बैरियर रीफ़ में बढ़ते तापमान के कारण वहां पर्यटकों के खास आकर्षण खूबसूरत कोरल्स और शैवालों में भारी कमी आई है। अनेक सुंदर जल जीवों की प्रजातियों में कमी और तादाद में कमी होती जा रही है।   इटली का खूबसूरत शहर वेनिस जो अपनी वास्तुकला के साथ-साथ अपनी सुंदर जल धाराओं में पर्यटकों को मनोहारी और रोमांटिक नौकायन का सुख देता है, अपनी क्षमता खोता जा रहा है। वह समुद्र स्तर में बदलाव और बार-बार बाढ़ आने से उनकी वास्तु कला और शिल्प प्रभावित हो रहा है। इसके सौंदर्य के घटने की आशंका बलवती होती जा रही है।
  
पर्यटकों के आकर्षण के कई ऐसे द्वीप पृथ्वी पर मौजूद हैं जो समुद्र तल से थोड़ा सा ही ऊपर हैं। जैसे-जैसे बदलाव आ रहा है, इनके समुद्र में समा जाने की संभावना पैदा हो गई है। समुद्र किनारों पर जो खूबसूरत पर्यटन स्थल हैं, बीच हैं, सैरगाह हैं, जहां सर्व सुविधायुक्त कॉटेज बनाए गए हैं, ये सब खतरे में घिर रहे हैं। अनेक छोटे छोटे पर्यटन द्वीप हैं लुप्त होते जा रहे हैं या जल्दी ही समुद्र में डूब सकते हैं।  विशेष रूप से मालदीव जो बहुत बड़ा आकर्षण का केंद्र है और लाखों पर्यटक यहां पर प्रतिवर्ष सैर सपाटे के लिए जाते हैं, वह समुद्र तल से बहुत थोड़ा सा ऊपर है, उसके अद्भुत समुद्र तट धीरे-धीरे सौंदर्य खोते जा रहे हैं, समाप्त होते जा रहे हैं।  लास्ट चांस टूरिज्म ट्रेंड में इन सब स्थानों के पर्यटन का महत्व और बढ़ता जा रहा है। 
  
इस ग्लोबल वार्मिंग के कई मानव जनित कारण भी हैं। बढ़ता औद्योगीकीकरण और शहरीकरण भी कुछ हद तक जिम्मेदार होता है।  जिस तरह से शहरीकरण बढ़ता जा रहा है पर्यटन स्थलों की ओर जो बसाहट हो रही है, उससे प्राकृतिक स्थितियों में बदलाव हुआ है, पर्वतीय और तटीय पर्यटन स्थलों का सौंदर्य ही नहीं बल्कि जीवन पर भी खतरा पैदा हुआ है।  

औद्योगिकरण से वायुमंडलीय प्रदूषण बढ़ा ही है, स्वास्थ्य के अलावा धरोहरों के भी क्षरण की स्थितियां देखी गईं हैं। हमने कुछ समय पहले पढ़ा था कि ताजमहल की संगमरमर पर भी प्रदूषित यायु का असर देखा गया है। ग्रीन हाउस गैसेस, कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसें वायुमंडल में बढ़ती गईं हैं। धरती की मिट्टी में मौजूद पिघलता हुए परमाफ्रास्ट के क्षरण से जो गैसों का विस्फोट होता है वह भी वायुमंडल में ही अंततः प्रवेश कर जाता है। उससे भी हमारी पृथ्वी का तापमान गड़बड़ा रहा है।   

अफसोस है कि  अनेक सुंदर प्राकृतिक दृश्य, सुंदर द्वीप, सुंदर स्थान, सुंदर ध्रुव प्रदेश, समुद्रीय सौंदर्य और प्राकृतिक छटाएं और मानव निर्मित संरचनाएं अपने पर संकट के बादल घिरे पाते हैं और इस संकट का लाभ पर्यटन इंडस्ट्री को मिला है।  अंतिम अवसर पर्यटन के हिसाब से टूर बनाए  जाने लगे हैं। इससे रोजगार भी मिला है।  

आखरी कब तक पर्यटन क्षेत्र में यह अंतिम अवसर रहेगा?  यह तो कहा नहीं जा सकता लेकिन यह चिंता बेहद वाजिब है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण हमारी दुनिया धीरे-धीरे बदलती जा रही है। जो खूबसूरती आज है, जो दृश्य हम आज देखते हैं, हो सकता है कि कल हम उन्हें नहीं देख पाएं। अंततः सबसे बड़ी चिंता और जिम्मेदारी तो हमें इस पृथ्वी को खूबसूरत बनाए रखने की है। यह लास्ट चांस टूरिज्म, अंतिम अवसर पर्यटन कितना ही प्रचलित होता रहे लेकिन हमारा अंतिम लक्ष्य यही होगा कि इस पृथ्वी की खूबसूरती हमेशा कायम रहे, हम इसमें पूरी तरह से रुचि लेते रहें, लोगों में जागरूकता बढ़ाते रहें और प्रकृति, पर्यावरण और पृथ्वी को बचाने के हर प्रयास करते रहे।  

ब्रजेश कानूनगो 

Monday, 16 September 2024

स्लम्स और झुग्गियों में घूमता घुमक्कड़

स्लम्स और झुग्गियों में घूमता घुमक्कड़


किसी भी देश की मलिन और झुग्गी बस्तियों को ढंक देने के प्रयास अक्सर उस वक्त होते रहते हैं जब वहां अंतरराष्ट्रीय महत्व का कोई आयोजन हो रहा होता है। स्लम या झोपड़पट्टियों का होना किसी भी सरकार और वहां के नागरिकों के लिए अपमान जनक बात कही जा सकती है। इनकी उपस्थिति चांद जैसे खूबसूरत शहरों पर बदनुमा धब्बे की तरह माना गया है। 

दरअसल, झुग्गी बस्ती या झोपड़पट्टी या स्लम ऐसे घने रहवासी क्षेत्र होते हैं, जहां जीर्ण शीर्ण घरों के छोटे छोटे से कमरों में कई लोग बड़ी कठिनाइयों के साथ रहते हैं, यहां कई बार धूप भी बमुश्किल से दिखाई देती है, स्वच्छता का अभाव होता है, शुद्ध हवा का प्रवाह नही रहता, पेय जल की अस्वास्थकर व्यवस्थाएं होती हैं। ये तमाम ऐसी स्थितियां होती हैं बस्तियों में जिन्हे मानव जीवन के विकास के लिए उपयुक्त नहीं माना जा सकता। कई जगह कचरा, गंदगी का साम्राज्य होता है, सार्वजनिक शौचालयों की स्थिति बदतर होती जाती हैं। स्कूलों की दशा और वहां के साधन बदहाल होते हैं। 

अनेक प्रयासों के बावजूद कई बड़े देशों के बड़े महानगरों के सौंदर्य के बीच इनकी उपस्थिति आज भी बनी हुई है। यह अलग बात है कि सरकारें और कई स्वैच्छिक संगठन इन बस्तियों के उद्धार और यहां के निवासियों के कल्याण के लिए काम करते हैं। किंतु स्लम्स या झुग्गियों का होना आधुनिक समाज में एक कड़वी सच्चाई है। 

दिलचस्प बात यह है कि प्राकृतिक और मानव निर्मित रमणीय स्थलों की सैर करना विश्व के पर्यटक बहुत पसंद करते हैं, वहीं दुनिया के बड़े स्लम्स और झुग्गी बस्तियां भी घुमक्कड़ों को आकर्षित करती रहती हैं। कई घुमक्कड़ों को हमने यूट्यूब पर दुनिया की घनी बस्तियों और झोपड़पट्टियों में भ्रमण करते, वहां के जनजीवन और स्थितियों पर ब्लागिंग करते देखा है। कई तरह की जोखिमपूर्ण स्थितियों के बावजूद ये घुम्मकड़ हम दर्शकों को भी वहां का आभासी मुआयना करवा देते हैं।  

पिछले दिनों हमने ऐसे ही कई वीडियो देखे। नोमेडिक टूर चैनल के तोरवशु के साथ दक्षिणी अमेरिका के ब्राजील में रियो डी जेनेरो के सबसे बड़े स्लम जिसे फावेला कहा जाता है की आभासी सैर की। इससे पहले कुछ अन्य व्लॉगरो के अलावा डॉक्टर यात्री के नवांकुर का भी वीडियो हमने देखा था। दरअसल ब्राजील, रूस,कनाडा,चीन, यू एस ए के बाद विश्व का पांचवा सबसे बड़ा देश है। इसके बाद ऑस्ट्रेलिया और भारत का क्रम आता है। 

ब्राजील के स्लम पर्यटन के संदर्भ में यहां कुछ बातें जान लेना भी दिलचस्प होगा।  यहां पूर्व में पुर्तगालियों का साम्राज्य रहा था। पुर्तगाली भाषा में रियो डी जेनेरियो का अर्थ है,जनवरी की नदी। यह शहर  गुआंडू नदी के पास बसा है। दरअसल यह शहर अटालंटिक महासागर का तट है जिसे जनवरी की नदी कह दिया गया था।  
ब्राज़ील में शहरी केंद्रों के पास जो झुग्गी-झोपड़ियाँ हैं उन्हें ही फावेला कहा जाता है। ये अनौपचारिक अवैध बस्तियाँ तब बनीं जब बेघर लोग रियो डी जेनेरियो और साओ पाओलो जैसे बड़े शहरों के नज़दीक खाली ज़मीन के भूखंडों पर आकर बसने लगे। झुग्गी झोपड़ी की यह बसाहट लगभग सन 1930 के आसपास शुरू हो गई थी। इन इलाकों में बसने वाले लोग अपने घरों का निर्माण उन सामग्रियों से करते हैं जिन्हें वे सहजता से जुटा सकते हैं। नालीदार पतरे, कार्डबोर्ड बॉक्स, प्लास्टिक शीट और प्लाईवुड आदि जैसा कबाड़ की तरह निकलने वाली सामग्री इनके निवासियों के लिए बड़ी उपयोगी हो जाती है। यहां की एक विशेष वनस्पति से भी फावेला शब्द की उत्पत्ति का संबंध बताया जाता है। शायद उसी तरह जिस तरह कुछ लोग गाजरघास शब्द का प्रयोग हमारे यहां की झोपड़पट्टियों की बसाहट के संदर्भ में करते रहते हैं। 

एक जानकारी के अनुसार 2010 की जनगणना के अनुसार, ब्राज़ील में लगभग 11 मिलियन लोग, या कुल आबादी का लगभग 6%, फावेला में रहते हैं। विश्व के लोगों ने 2002 की फ़िल्म सिटी ऑफ़ गॉड के माध्यम से भी यहां की अनूठी बसाहट और अपराध और हिंसा को थोड़ा बहुत जाना है। तोरवशु ब्लॉगर के वीडियो को देखते हुए हमने जाना कि इन बस्तियों में कई जगह तो सूर्य की किरणे तक नहीं पहुंच पाती। भूलभुलैया सी तंग गलियों से बाहर निकलना भी बेहद कठिन हो जाता है।

रियो डी जेनेरियो जैसे बेहद खूबसूरत शहर और विश्व के सात आश्चर्यों में शामिल कारकोवादो  पर्वत के शिखर पर स्थित ईसा मसीह की विशाल प्रतिमा के लिए विख्यात रियो यहां की हिंसात्मक और अपराधिक गतिविधियों के लिए भी कुख्यात है। फावेला बस्तियों के सकारात्मक और नकारात्मक दोनो पक्ष हैं किंतु पर्यटकों को अकेले वहां जाने की सलाह नहीं दी जाती। किसी स्थानीय व्यक्ति या गाइड को साथ लेकर ही यहां पर्यटक जा पाते हैं। 

ब्राजील की इन बस्तियों को देखते हुए भारत में मुंबई महानगर में बसी धारावी की बसाहट और जनजीवन का दृश्य भी सामने आने लगता है। इस बस्ती में भी बड़ी संख्या में पर्यटकों का आना बना रहता है। धारावी दुनिया के पर्यटकों की सूची में स्लम पर्यटन की दृष्टि से सबसे ऊपर क्रम की ख्वाहिश रहती है।  यह दुनिया की सबसे बड़ी झुग्गियों में से एक है। एक जानकारी के अनुसार भौगोलिक क्षेत्र का आकार सिर्फ़ 2.39 वर्ग किलोमीटर है, लेकिन इसकी आबादी लगभग 3 से दस लाख लोगों तक आकलित की गई है। इसका मतलब है कि धारावी दुनिया के सबसे घनी आबादी वाले रिहायशी इलाकों में से एक कहा जा सकता है।

माना जाता है कि 1884 से  जब शहर में ग्रामीण इलाकों से शहरी मुंबई की ओर लोगों का भारी पलायन हुआ था तो वे धारावी इलाके में बसते गए। यह शहर का वह इलाका था जहाँ आर्थिक रूप से कमज़ोर लोगों की सबसे ज़्यादा आबादी रहती थी। जैसे-जैसे उद्योगों की संख्या बढ़ी, झुग्गी-झोपड़ियों का आकार भी बढ़ता गया।

यह बहुत महत्वपूर्ण है कि अपनी तंग बस्तियों और चुनौतीपूर्ण  स्थितियों के बावजूद, यहां के निवासियों ने एक संपन्न सूक्ष्म अर्थव्यवस्था, रीसाइक्लिंग उद्योग का निर्माण करने में कामयाबी हासिल की है। मुंबई के लगभग 60% प्लास्टिक कचरे को धारावी में रीसाइकिल किया जाता है।  धारावी का चमड़ा उद्योग एक और फलता-फूलता व्यवसाय है, जिस पर यहां की अर्थ व्यवस्था निर्भर करती है। कुशल कारीगर उच्च गुणवत्ता वाले चमड़े के सामान बनाने से लेकर उन्हें ठीक करने तक के काम में लगे हुए हैं। अनेक पर्यटक तो यहां के इन उद्योगों की कार्यप्रणाली देखने समझने के लिए ही आते रहते हैं। 

धारावी की संभवतः सबसे बड़ी ताकत है यहां की  सांप्रदायिक विविधता और बेहतरीन सामाजिक समभाव और भाईचारा। धारावी का अविश्वसनीय रूप से मिलजुला समुदाय यह सब संभव बना देता है। मुंबई का यह इलाका संस्कृतियों, भाषाओं और धर्मों का एक सुखद मेल है। भारत के विभिन्न हिस्सों से आए लोग इस जगह को अब अपना घर कहते हैं और वे इसे बेहतरीन बनाने के लिए हर संभव प्रयास करते रहते हैं।

अगर हम सहजता से जानना चाहें कि स्लम टूरिज्म क्या है, तो बस धारावी पर थोड़ी जानकारी इकट्ठी करें। हर साल 15,000 से अधिक पर्यटक धारावी आते हैं। ट्रेवलर्स चॉइस एक्सपिरिएंस की एशियाई सूची में वर्ष 2019 में इसका स्थान पहले दस स्थानों में रहा था। स्लम डॉग मिलेनियर जैसी प्रसिद्ध फिल्म की शूटिंग यहां की गई थी। 

इसके अलावा भारत में दिल्ली की भलस्वा,चैनई की नोचिकुप्पम, बैंगलुरू की राजेंद्रनगर बस्ती, कोलकाता की बसंती झुग्गी बस्तियां भी बड़े स्लम्स हैं।  सन 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में कोई 6.5 करोड़ आबादी झुग्गियों में रहती हैं जिनमे से लगभग 1.8 करोड़ महाराष्ट्र में निवास करती हैं। एक आकलन यह भी है कि भारत के 6 शहरी व्यक्तियों में से 1 झोपड़पट्टी में रहता है। जिन के विकास और कल्याण के लिए प्रयास होते रहते हैं। 

स्लम पर्यटन के जरिए भी जनसंख्या के एक ऐसे बड़े वर्ग पर व्लोगर ध्यान आकर्षित करते हैं जिनके कल्याण और विकास के लिए समाज और सरकारों को अभी बहुत कुछ करना शेष है। 

ब्रजेश कानूनगो  

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