Thursday, 1 May 2025

मृतदेह की खिदमत में इंडोनेशिया का तोराज समुदाय

मृतदेह की खिदमत में इंडोनेशिया का तोराज समुदाय

कुछ समय पहले समाचार पढ़ा था कि उत्तराखंड में  नेपाल भारत सीमा पर एक गुफा में बहुत सारे नर कंकाल मिले हैं।  बताया गया कि ये कंकाल आठवीं शताब्दी से पहले के हो सकते हैं। अब इनका अध्ययन होगा और इतिहास के रहस्य से पर्दा हट सकेगा। यद्यपि पूर्व में भी उत्तराखंड में ऐसी कुछ गुफाएं मिली थीं।  प्रारंभिक तौर पर कहा गया है कि बौन धर्म मानने वाले लोगों के यह कंकाल हो सकते हैं। 

खबर पढ़ कर नोमेडिक शुभम चैनल के ट्रैवलर शुभम का वह वीडियो याद आया जिसमें वे इंडोनेशिया में एक समुदाय के गांव में गए थे। वीडियो में देखा था कि वहां परिवार में किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उनका अंतिम संस्कार नहीं किया जाता बल्कि उनको अपने घर में ही लंबे समय तक रखा जाता है। उसकी इस तरह से देखभाल की जाती है जैसे वह जीवित ही हो। उनकी मान्यता यह है कि व्यक्ति अभी समाप्त नहीं हुआ है बल्कि वह बीमार है और वह उनके साथ है। शव की रोज साफ सफाई करते हैं, नए कपड़े पहनाते हैं और यह तब तक किया जाता है जब तक कि पारंपरिक अंतिम अनुष्ठान के लिए उनके पास पर्याप्त धन इकट्ठा नहीं हो जाता। 

अलग-अलग देशों के समुदायों में अंतिम संस्कार के लिए अपनी अलग-अलग मान्यताएं, परंपराएं और प्रथाएं होती हैं।  उनका रहन-सहन और जीवन जीने का तरीका भी काफी अलग होता है। आमतौर पर जब भी किसी व्यक्ति की मौत होती है तब या तो उसे अग्नि के हवाले किया जाता है या दफनाया जाता है। लेकिन इंडोनेशिया एक ऐसा देश है, जहां के पहाड़ी इलाकों में रहने वाले कुछ समुदाय मरने वाले अपनों के शवों को ममी बनाकर सुरक्षित रखते हैं।    

तोराजा जनजाति के लोगों को बहुत छोटी उम्र से ही मृत्यु का सामना करने के लिए तैयार कर दिया जाता है। शुभम के वीडियो में हमने देखा कि घर के लोग डेड बॉडी को रोजाना खाना खिलाते हैं और  एक कमरे में तब तक सुरक्षित रखते हैं, जब तक अंतिम संस्कार के लिए उनके पास पैसे इकट्ठे न हो जाएं। जब अंतिम संस्कार का वक्त आता है तो लोग डेड बॉडी को पत्थर की कब्र में दफनाते हैं।  हालांकि ऐसा नहीं है कि वह दफनाकर अपनों को भूल जाते हैं।  वह Ma’nene मानेने नाम के एक अनुष्ठान के लिए कुछ समय के बाद मृत शरीर को कब्र से बाहर निकालते हैं और उसे अच्छे से साफ करते हैं।  मृत शरीर को धोकर उसे साफ कपड़े पहनाए जाते हैं और कुछ देर के लिए धूप में सूखने के लिए रखा जाता है।  

शुभम के वीडियो में हमने देखा कि एक मृत व्यक्ति के शव को तो उसकी मृत्यु के करीब 40 साल बाद भी निकाला गया और उसकी साफ सफाई की गई, उसके कपड़े बदले गए।  यह सब उनकी परंपराओं का हिस्सा है लेकिन ट्रैवलर ब्लॉगर शुभम जैसे युवा भारतीय व्यक्ति के लिए यह सब देखना और वीडियो बनाना कितना कठिन रहा होगा समझा जा सकता है। उन्हें कई बार उबकाई सी आती रही, रात की नींद उनकी आंखों गायब रही,मन में अजीब से डर को वे महसूस करते रहे।

मृतक के ताबूत को पहाड़ों की शिलाओं के बीच में खोद कर बनाए केबिनों में सहेजा जाता है।   प्रति 3 वर्ष में या जब उनकी श्रद्धा होती है या जब भी रस्म का समय आता है उन्हें बाहर निकालकर परंपरागत अनुष्ठान संपन्न किया जाता है। 

भारत नेपाल सीमा पर नरकंकालों वाली गुफा मिलने के समाचार से याद आया कि  इंडोनेशिया में भी जब शुभम पहाड़ी गांव में जाते हैं तो वहां भी वे ऐसी कई गुफाएं दिखाते हैं। हजारों की संख्या में कंकाल वहां दिखाई देते हैं। एक जगह दो कंकाल एक साथ रखे हुए थे तो गाइड उनको एक किंवदंती सुनाता है कि यह दोनों कभी प्रेमी थे और आपस में शादी करना चाहते थे, लेकिन जीते जी उनकी शादी नहीं हो पाई,  दोनों के समुदाय और उनके परिवार इस संबंध के लिए तैयार नहीं हुए तो एक दिन दोनों ने अपनी जान दे दी।  बाद में लोगों को इस बात का पता चला और जब उनका अंतिम संस्कार किया गया तो दोनों शवों एक साथ वहां पर रखा गया था। 

पहाड़ों में बॉक्स खोदने और आवश्यक अनुष्ठान के लिए धन इकट्ठा होने तक लंबे समय तक जैसा पहले उल्लेखित किया कि मृतक के शव की परिवारजन एक जीवित व्यक्ति की तरह सेवा करते रहते हैं। पहाड़ में ताबूत के लिए बने स्थान को अपनी हैसियत के अनुसार सजाया संवारा जाता है।  उसके बाहर गेट लगते हैं, डेकोरेशन होता है।   

एक जमाने में कभी हमारे यहां तेरहवीं की रस्म बड़ी शान ओ शौकत के साथ मनाई जाती थी। रस्म में कितने गांवों के लोग शामिल हुए, कितनी बड़ी संख्या में लोगों ने नुक्ता भोज ग्रहण किया, यह सब संपन्नता और समर्पण भाव का परिचायक समझा जाता था। इंडोनेशिया के इन समुदायों में भी अंतिम अनुष्ठानों का भी कुछ ऐसा ही महत्व दिखाई देता है। यह बहुत खर्चीला भी होता है। अनुष्ठान में सभी रिश्तेदारों और परिचितों को बुलाया जाता है और दावत रखी जाती है। युवा लोग अपने पूर्वजों से मिलते हैं और उनकी डेड बॉडी के साथ तस्वीरें लेते हैं। जब अनुष्ठान पूरा हो जाता है तो शव को वापस ताबूत में रख दिया जाता है। अनुष्ठान की यह प्रथा यहां सदियों से चली आ रही है।  ऐसा कहा जाता है कि पोंग रुमासेक नामक एक शिकारी तोराजा की पहाड़ियों पर भ्रमण किया करता था।  एक दिन उसे एक पेड़ के नीचे किसी की लाश पड़ी हुई मिली।  उसने लाश की हड्डियों को अपने पास मौजूद कपड़े में रखा और उसे जमीन में दफना दिया।  माना जाता है कि ऐसा करने के बाद उस शिकारी को जीवन भर भाग्यशाली और धनवान रहने का आशीर्वाद मिला।  तोराजा जनजाति के लोग यह मानते हैं कि अगर वे अपने पूर्वजों का ख्याल रखेंगे और उनकी देखभाल करेंगे तो उन्हें भी आशीर्वाद मिलेगा। 

ट्रैवल वीडियो देखते हुए सचमुच रोमांच होता है कि दुनिया के कुछ लोग जीते जी  ही नहीं मरने पर भी मृत देह पर अपना स्नेह और आदर समर्पित करते हुए खिदमत करते रहते हैं, आशीर्वाद पाते हैं। 

ब्रजेश कानूनगो

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