Wednesday, 11 March 2026

जापान की शिंकानसेन और समुद्री सुरंग की सैर

जापान की शिंकानसेन और समुद्री सुरंग की सैर

दुनियाभर की सैर करने वाले घुमक्कड़ जब जापान जाते हैं तो उनके लिए वहां की रेलों के संचालन को देखने,समझने और उनमें यात्रा करने का भी एक बड़ा आकर्षण होता है। खासतौर से जापान की शिंकानसेन (Shinkansen), जिसे दुनिया 'बुलेट ट्रेन' के नाम से जानती है जो केवल अपनी गति के लिए नहीं बल्कि अपनी सुरक्षा और समय की पाबंदी (Punctuality) के लिए भी प्रसिद्ध है, इसमें यात्रा करने का सुख अद्भुत होता है। अनेक यूट्यूबर अपने ट्रेवल वीडियोस में इन पर अपनी बात कहते हुए हमे भी रोमांचित कर देते हैं। 

शिंकानसेन याने बुलेट ट्रेन का चलना विज्ञान और इंजीनियरिंग के कई उन्नत सिद्धांतों पर आधारित है। ​इसकी डिजाइन खास एयरोडायनामिक (Aerodynamics) के अनुसार विकसित की गई है। सामने का हिस्सा (Nose) बहुत लंबा और नुकीला होता है। यह केवल स्टाइल के लिए नहीं है, बल्कि 'पिस्टन इफेक्ट' को कम करने के लिए है। जब ट्रेन संकरी सुरंगों में तेज गति से प्रवेश करती है, तो हवा का दबाव एक तेज़ धमाका (Sonic Boom) पैदा कर सकता है। यह लंबा नाक वाला डिजाइन उस हवा को चीर देता है और शोर को कम करता है। इस ट्रेन से जापान की अंडरवाटर टनल से होकर यात्रा करते हुए किसी भी व्यक्ति का चकित हो जाना स्वाभाविक है। जापान जाने वाले हर ट्रैवलर की विश लिस्ट में यह टनल प्राथमिकता में होती है। दरअसल,जापान की सेइकान टनल (Seikan Tunnel) दुनिया की सबसे गहरी और सबसे लंबी अंडरवाटर रेल सुरंगों में से एक है। यह केवल इंजीनियरिंग का चमत्कार नहीं है, बल्कि इसके पीछे मानवीय संकल्प, बलिदान और विज्ञान की एक अद्भुत गाथा छिपी है।

​1950 के दशक तक, जापान के मुख्य द्वीप होंशू (Honshu) और उत्तरी द्वीप होक्काइडो (Hokkaido) के बीच यात्रा का एकमात्र साधन समुद्री जहाज (Ferry) थे। वर्ष 1954 की एक त्रासदी में 'टोया मारू' (Toya Maru) नाम का एक समुद्री जहाज तूफान में फंसकर डूब गया, जिसमें 1,400 से अधिक लोगों की जान चली गई। इस बड़ी दुर्घटना ने जापानी सरकार को एक ऐसे विकल्प पर विचार करने के लिए मजबूर किया जो मौसम की मार से सुरक्षित हो। इसी के बाद समुद्र के नीचे सुरंग बनाने की योजना ने जन्म लिया। कठिन श्रम और संघर्ष से भरे संकल्प से सेइकान टनल का निर्माण 1964 में शुरू हुआ और इसे पूरा होने में लगभग 24 साल लगे। ​निर्माण के दौरान कठिन परिस्थितियाँ आईं।  खुदाई के दौरान इंजीनियरों को ऐसी चट्टानों का सामना करना पड़ा जो ज्वालामुखी से बनी थीं और बहुत ही अस्थिर थीं। भीतर काम करते हुए समुद्र के पानी का रिसाव एक निरंतर खतरा बना रहता था। इसके बावजूद इस प्रोजेक्ट में हजारों मजदूरों और इंजीनियरों ने दिन-रात काम किया। निर्माण के दौरान कठिन परिस्थितियों और दुर्घटनाओं के कारण 34 श्रमिकों को अपनी जान भी गंवानी पड़ी। अंत में जापानियों ने अपने संकल्प को पूरा कर लिया। 

समुद्र के नीचे ट्रेन चलाना कोई साधारण बात नहीं थी। इसके लिए उस समय की सबसे उन्नत तकनीक का उपयोग किया गया जो इस सुरंग की विशेषताओं के रूप में रिकॉर्ड हो गईं।सुरंग की कुल लंबाई 53.85 किमी है, जिसमें से 23.3 किमी का हिस्सा समुद्र तल के नीचे है। यह समुद्र की सतह से लगभग 240 मीटर नीचे स्थित है। शॉट्रीट तकनीक (Shotcrete) से पानी के रिसाव को रोका गया है, दीवारों पर भारी दबाव के साथ कंक्रीट का छिड़काव किया गया है। जापान एक भूकंप संभावित क्षेत्र है। सुरंग को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह बड़े झटकों को सहन कर सके और पानी का दबाव दीवार को नुकसान न पहुँचाए।

इस सुरंग में 'शिंकानसेन' (बुलेट ट्रेन) और मालगाड़ी दोनों के लिए ट्रैक बिछाए गए हैं। सुरंग के अंदर दो विशेष स्टेशन (तप्पी-कैतेई और योशिओका-कैतेई) बनाए गए हैं। ये स्टेशन यात्रियों के सुरक्षित निकलने के लिए दुनिया के पहले अंडरवाटर स्टेशन रहे। सुरंग के अंदर आर्द्रता और तापमान को नियंत्रित करने के लिए विशाल वेंटिलेशन सिस्टम लगाया गया है। आज यह टनल जापान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। यह होंशू और होक्काइडो के बीच निर्बाध परिवहन सुनिश्चित करती है, जिससे व्यापार और पर्यटन को बढ़ावा मिलता है। 1988 में इसके उद्घाटन के बाद से, इसने जापानी रेलवे को एक नई पहचान दी है। शिंकानसेन सामान्य ट्रेनों के साथ ट्रैक साझा नहीं करती। इसके लिए स्टैंडर्ड गेज (1435 mm) के अलग ट्रैक होते हैं। पटरियों के बीच कोई गैप नहीं होता, जिससे कंपन (Vibration) कम होता है और ट्रेन बिना शोर के 320 किमी/घंटा की रफ्तार पकड़ पाती है। मोड़ों पर पटरियों को एक तरफ थोड़ा झुकाया जाता है (Banking), ताकि ट्रेन बिना गति कम किए सुरक्षित रूप से मुड़ सके। ट्रेन को 25,000 वोल्ट की ओवरहेड लाइनों से बिजली मिलती है। जब ड्राइवर ब्रेक लगाता है, तो मोटरें जनरेटर की तरह काम करने लगती हैं और बिजली पैदा करती हैं, जो वापस ग्रिड में भेज दी जाती है। जापान में भूकंप का खतरा हमेशा रहता है। शिंकानसेन में एक विशेष सेंसर सिस्टम लगा है जो भूकंप के शुरुआती झटकों (P-waves) को महसूस करते ही पूरी बिजली काट देता है और ट्रेनों में ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेक लगा देता है।

एक जानकारी के अनुसार निर्माणाधीन ​भारत का मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल (MAHSR) प्रोजेक्ट काफी हद तक जापान की शिंकानसेन तकनीक पर ही आधारित है।भारत इस प्रोजेक्ट के लिए जापान की 'E5 सीरीज' शिंकानसेन तकनीक का उपयोग कर रहा है। भारत में भी वही भूकंप सुरक्षा और ऑटोमैटिक ट्रेन कंट्रोल सिस्टम (ATC) लागू किया जा रहा है जो जापान में है।ट्रेनों का लुक और उनकी आंतरिक संरचना लगभग जापान की बुलेट ट्रेनों जैसी ही होगी। भारत के इस 508 किमी लंबे रूट में ठाणे के पास समुद्र के नीचे 21 किमी लंबी सुरंग बनाई जा रही है, जो जापान की सेइकान टनल जैसी इंजीनियरिंग का उदाहरण होगी। भारत में पहली बार 'जे-स्लैब' (J-Slab) ट्रैक सिस्टम का उपयोग हो रहा है, जिसमें पत्थर (Ballast) नहीं होते, बल्कि कंक्रीट के स्लैब पर पटरी बिछाई जाती है। भारत की गर्मी और धूल भरी परिस्थितियों को देखते हुए  तदनुसार ट्रेनों के एयर कंडीशनिंग और वेंटिलेशन सिस्टम में भी विशेष बदलाव किए जा रहे हैं।

बुलेट ट्रेन तकनीक को अपनाने के साथ संकल्पों को पूरा करने में जापानियों के संघर्ष, लगन और जुझारूपन को भी निश्चित ही आत्मसात करना हमारे लिए कम महत्वपूर्ण नहीं होगा। 


ब्रजेश कानूनगो 




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