Monday, 9 March 2026

डीसैलिनेशन प्लांट : जो समुद्र के पानी को पेयजल में बदलते हैं

डीसैलिनेशन प्लांट : जो समुद्र के पानी को पेयजल में बदलते हैं

जब ईरान के खिलाफ इजरायल और अमेरिका की जंग लगातार बढ़ती गई तो दोनों ही खेमों का निशाना तेल और मिसाइल से आगे बढ़कर पानी तक पहुंच गया। ऐसे में डीसैलिनेशन प्लांट  (विलवणीकरण संयंत्र) यानी जल शुद्धिकरण संयंत्र को टार्गेट किया जाने लगा तो हमारा ध्यान इस बात की ओर गया कि विश्व के अनेक देशों में जहां शुद्ध पेयजल की कमी है वहां बड़े पैमाने पर समुद्र के खारे जल को परिष्कृत करने के लिए पीने के पानी में बदला जा रहा है।

समुद्र के खारे पानी को पीने योग्य बनाना (Desalination) आज के समय में जल संकट से निपटने का एक क्रांतिकारी तरीका बन गया है। दुनिया के कई देश अपनी पानी की जरूरत का एक बड़ा हिस्सा इसी तकनीक से पूरा कर रहे हैं। वर्तमान में दुनिया भर में हजारों डिसेलिनेशन प्लांट काम कर रहे हैं। कुछ प्रमुख देशों ने बड़े पैमाने पर यह तकनीक अपनाई है। सऊदी अरब दुनिया का सबसे बड़ा समुद्री जल शोधक देश है। यहाँ के पानी की लगभग 50% से अधिक आपूर्ति इसी माध्यम से होती है। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के दुबई और अबू धाबी जैसे शहर लगभग पूरी तरह से शोधित समुद्री पानी पर निर्भर हैं। ​इजराइल अपनी उन्नत तकनीक के कारण इजराइल अपनी घरेलू पानी की जरूरत का करीब 75% हिस्सा समुद्र से प्राप्त करता है। कुवैत, कतर, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका (विशेषकर कैलिफोर्निया) और भारत (चेन्नई और गुजरात में कुछ बड़े प्लांट) भी इस तकनीक का बड़े पैमाने पर उपयोग कर रहे हैं।

एक खबर के अनुसार युद्ध के दौरान अमेरिका ने ईरान के केश्म द्वीप के वॉटर प्लांट पर हमला करके उसके 30 गांवों को प्यासा कर दिया। जवाब में ईरान ने भी टार्गेट बदलते हुए बहरीन में वॉटर डिसेलिनेशन प्लांट को निशाना बनाया। विशेषज्ञों और समाजशास्त्रियों का  मानना है कि ये प्लांट्स यहां के जनजीवन के लिए सर्वोच्च महत्व के संयंत्र हैं।  इनके ऊपर हमला होना इस पूरे क्षेत्र के जीवन के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। अगर इन प्लांट्स पर आगे भी हमला जारी रहे या साइबर अटैक हो या पानी दूषित कर दिया जाए तो यह सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं होगा बल्कि इससे पूरे खाड़ी क्षेत्र में मानव सुरक्षा का गंभीर संकट संभावित हो सकता है। इसका मतलब है कि अगर इन प्लांट्स को नुकसान हुआ तो शहरों की रोजमर्रा की जिंदगी तुरंत ठप हो सकती है।

बहरहाल, अब समझते हैं कि वाटर डीसैलिनेशन प्लांट कैसे काम करते हैं। दरअसल ​समुद्र के पानी से नमक अलग करने की मुख्य रूप से दो वैज्ञानिक विधियां सबसे अधिक प्रचलित हैं। जिनमें से पहली है रिवर्स ऑस्मोसिस (Reverse Osmosis - RO) जो सबसे आधुनिक और ऊर्जा-कुशल तकनीक है। इसमें समुद्र के पानी को बहुत उच्च दबाव (High Pressure) पर एक 'अर्ध-पारगम्य झिल्ली' (Semi-permeable Membrane) से गुजारा जाता है। यह झिल्ली इतनी सूक्ष्म होती है कि इसमें से पानी के अणु तो निकल जाते हैं, लेकिन नमक और अन्य अशुद्धियाँ पीछे रह जाती हैं।

डिसेलिनेशन की दूसरी विधि है थर्मल डिसेलिनेशन (Thermal Desalination) ​इसमें 'वाष्पीकरण' (Evaporation) के सिद्धांत पर काम होता है। पानी को गर्म करके भाप बनाई जाती है, जिससे नमक नीचे बैठ जाता है। फिर उस भाप को ठंडा (Condensation) करके शुद्ध पानी के रूप में इकट्ठा कर लिया जाता है। मध्य पूर्व के देशों में, जहाँ ऊर्जा सस्ती है, वहां इस तकनीक का काफी उपयोग होता है।

​डीसैलिनेशन प्रक्रिया केवल नमक हटाने तक सीमित नहीं है, इसमें कई महत्वपूर्ण चरण होते हैं। ​प्री-ट्रीटमेंट (Pre-treatment) के तहत समुद्र से लिए गए पानी से पहले कचरा, रेत और शैवाल (Algae) को छाना जाता है ताकि मुख्य झिल्ली (Membrane) खराब न हो। फिर होता है ​डिसेलिनेशन (Desalination) जिसके अंतर्गत  RO या थर्मल तकनीक के जरिए नमक को अलग किया जाता है। बाद में ​पोस्ट-ट्रीटमेंट (Post-treatment) में शुद्ध किए गए पानी का स्वाद बेहतर करने और उसे स्वास्थ्यवर्धक बनाने के लिए इसमें जरूरी खनिज (Minerals) जैसे कैल्शियम और मैग्नीशियम मिलाए जाते हैं। तत्पश्चात ​अपशिष्ट निपटान (Brine Disposal) के दौरान बचा हुआ अत्यधिक खारा पानी (Brine) वापस समुद्र में सावधानीपूर्वक विसर्जित किया जाता है।

एक भारतीय व्यक्ति होने के नाते आम जिज्ञासा सहज है कि अपने देश में समुद्र के पानी से पेय जल बनाने की दिशा में क्या कुछ कार्य किया गया है। ​भारत में मुख्य रूप से तमिलनाडु और गुजरात में सबसे बड़े और प्रभावी प्लांट स्थित हैं। यहाँ के पानी का उपयोग और वितरण (Usage and Distribution) मुख्य रूप से दो श्रेणियों में किया जाता है।  घरेलू और औद्योगिक क्षेत्रों के लिए।  चेन्नई में CMWSSB(Metrowatrer) पाइपलाइनों के माध्यम से इस पानी को घरों तक पहुँचाता है।  दक्षिण और उत्तर चेन्नई के लगभग 30-40 लाख लोग अपनी दैनिक जरूरतों के लिए इसी पर निर्भर हैं। भविष्य में 'पेरूर प्लांट' के पूरा होने पर यह संख्या और बढ़ जाएगी। ​लक्षद्वीप में छोटे LTTD (Low Temperature Thermal Desalination) प्लांट लगे हैं, जो द्वीपों पर रहने वाले समुदायों को मीठा पानी प्रदान करते हैं।

औद्योगिक उपयोग (Industrial Water) के अंतर्गत ​गुजरात के दहेज (Dahej) और जामनगर जैसे क्षेत्रों में पानी का उपयोग बड़ी कंपनियों द्वारा किया जाता है।  गुजरात औद्योगिक विकास निगम (GIDC) दहेज में स्थित पेट्रोलियम और केमिकल कंपनियों को पानी की आपूर्ति करता है। यह बहुत महत्वपूर्ण पक्ष है कि उद्योगों को समुद्र का पानी देने से खेती और पीने के लिए इस्तेमाल होने वाले ताजे पानी यानि नदियों के पानी की  बचत होती है।

डीसैलिनेशन प्रक्रिया को भारत के राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान (NIOT) ने भी विकसित किया है। यह तकनीक समुद्र की सतह और गहराई के पानी के तापमान के अंतर का उपयोग करती है। यह लक्षद्वीप के लिए वरदान साबित हुई है।

भारत जैसे देश के लिए  डीसैलिनेशन  के क्षेत्र में ​कुछ चुनौतियां भी हैं इस प्रक्रिया में मसलन इसकी लागत बहुत अधिक होती है, पाइपलाइन से आने वाले साधारण पानी की तुलना में डिसेलिनेशन का पानी 3 से 4 गुना महंगा हो जाता है।

इसके अलावा पर्यावरणीय दृष्टि से समुद्र से पानी निकालने के बाद बचा हुआ ब्राइन (अत्यधिक खारा घोल) वापस समुद्र में डालने से समुद्री जीवों को नुकसान पहुँच सकता है, जिसे कम करने के लिए भारत में 'मल्टी-डिस्कस' तकनीक पर काम किया जा रहा है। ​महाराष्ट्र (मुंबई के मनोरी में प्रस्तावित) और आंध्र प्रदेश जैसे राज्य भी अब इस दिशा में बड़े कदम उठा रहे हैं।

ब्रजेश कानूनगो 


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