ग्रामीणों के लिए पेड़ों के आबंटन की व्यवस्था
कुछ दिनों पूर्व हमने एक विश्व यात्री और यूट्यूबर के जरिए रूस के एक गांव की आभासी सैर की थी। हमने देखा कि प्रत्येक घर के परिसर में एक ऐसा स्टोरेज था जिसमें कटी हुई लकड़ियों के गुल्ले बड़ी व्यवस्थित रूप से जमाकर रखे हुए थे। निश्चित रूप से ये उस घर में रहने वाले परिवार की ऊर्जा का इंतजाम था और वह उनको सालभर आग और गर्मी का प्रबंध करने के लिए काम आने वाली थी।
जब ट्रैवलर ने अपने होस्ट से इस बारे में जानकारी मांगी तो उसने बताया कि वहां का प्रशासन गांव के हर परिवार को इस हेतु एक वृक्ष का आबंटन करता है, उसी की लकड़ियां काट कर सालभर की जरूरत के लिए सहेज कर रखी जाती हैं। हमारे लिए खासकर मेरे लिए यह बहुत न सिर्फ चौंकाने वाली बात थी बल्कि एक नई जिज्ञासा भी पैदा कर दी। साथ ही कुछ और जानकारी जुटाने के लिए प्रेरित किया।
दरअसल, रूस के ग्रामीण क्षेत्रों में लकड़ी (wood) का आवंटन वहां की संस्कृति और कानून की एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात है जो "रूसी वन संहिता" (Forest Code of the Russian Federation) के तहत मिलने वाली सुविधाओं को उपलब्ध कराती है। रूस में आज भी करोड़ों लोग लकड़ी के चूल्हों और 'बन्या' (पारंपरिक रूसी सौना) पर निर्भर हैं, इसलिए सरकार वहां के नागरिकों को मुफ्त या बहुत ही मामूली दाम पर लकड़ी काटने का अधिकार देती है।
रूसी कानून के अनुसार, हर नागरिक को अपनी व्यक्तिगत जरूरतों के लिए "मुफ्त" (या बहुत कम प्रशासनिक शुल्क पर) लकड़ी प्राप्त करने का अधिकार है। इस अधिकार के तहत सर्दियों में अपने घर को गर्म करने के लिए जलावन या हीटिंगअलाव के लिए हर साल एक निश्चित मात्रा दी जाती है। नया घर बनाने या पुराने की मरम्मत के लिए आमतौर पर हर 10-25 साल में एक बार लकड़ी का एक बड़ा हिस्सा आवंटित किया जाता है। प्रशासन पेड़ों को ऐसे ही नहीं काटने देता, इसके पीछे एक व्यवस्थित प्रक्रिया होती है। पहले ग्रामीण व्यक्ति स्थानीय वन विभाग (Lesnichestvo) में आवेदन करता है। वन अधिकारी जंगल के एक विशेष हिस्से में जाते हैं और उन पेड़ों पर निशान (Marking) लगाते हैं जिन्हें काटा जा सकता है। अक्सर ये वो पेड़ होते हैं जो बूढ़े हो गए हैं या जिन्हें हटाने से जंगल का स्वास्थ्य बेहतर हो सकता है। सरकार केवल पेड़ की 'लकड़ी' आवंटित करती है, उसे काटने और घर तक लाने की जिम्मेदारी ग्रामीण की होती है। उन्हें खुद आरी (Chainsaw) और ट्रैक्टर या घोड़ों का इंतजाम करना पड़ता है। सबसे चुनौतीपूर्ण यही काम होता है। लकड़ी की मात्रा क्षेत्र (Region) और जरूरत के आधार पर अलग-अलग होती है। जैसे साइबेरिया जैसे ठंडे इलाकों में जलावन के लिए प्रति परिवार सालाना 15 से 30 क्यूबिक मीटर तक लकड़ी मिल सकती है। घर बनाने के लिए यह मात्रा 50 से 100 क्यूबिक मीटर तक हो सकती है। ग्रामीण इस लकड़ी को बेच नहीं सकते। अगर कोई इस आवंटित लकड़ी को बेचते हुए पकड़ा जाता है, तो उसे भारी जुर्माना भरना पड़ता है। रूस का एक बड़ा हिस्सा गैस पाइपलाइनों से नहीं जुड़ा है, और वहां की सर्दियां -30°C से -50°C तक जा सकती हैं। ऐसे में लकड़ी ही जीवन बचाने का एकमात्र साधन है। यह परंपरा सदियों पुरानी है और आज भी वहां के ग्रामीण जीवन का आधार है।
रूस जैसी व्यवस्था दुनिया के कई अन्य देशों और भारत में भी मौजूद है, हालांकि इनके नियम और उद्देश्य स्थानीय जरूरतों और जलवायु के हिसाब से अलग-अलग हैं। रूस में मुख्य जोर "सर्दियों में बचने (Heating)" पर है, जबकि अन्य देशों में यह "आजीविका और पारंपरिक अधिकारों" से अधिक जुड़ा है। स्कैंडिनेवियाई देशो में (जैसे फिनलैंड, स्वीडन और नॉर्वे) रूस जैसी ही ठंड पड़ती है, इसलिए यहाँ "Everyman's Right" (सबका अधिकार) जैसा कानून है। यहाँ कोई भी व्यक्ति जंगल से सूखी लकड़ी इकट्ठा कर सकता है। हालांकि, अगर किसी को निर्माण के लिए जीवित पेड़ काटना है, तो उसे 'वन प्रबंधन योजना' के तहत अनुमति लेनी पड़ती है। यहाँ के लोग अक्सर निजी वनों के मालिक होते हैं, लेकिन उन पर भी नए पेड़ लगाने की सख्त कानूनी जिम्मेदारी होती है। इसके अलावा कनाडा में स्वदेशी समुदायों (First Nations) के पास पारंपरिक भूमि पर लकड़ी काटने के विशेष अधिकार हैं। वे अपनी सांस्कृतिक जरूरतों और घरों के निर्माण के लिए लकड़ी ले सकते हैं।अलास्का (यूएसए) जैसे क्षेत्रों में आम नागरिकों को "Personal Use Timber Permit" दिया जाता है, जिससे वे अपने घर के उपयोग के लिए एक निश्चित मात्रा में पेड़ काट सकते हैं।
भारत में भी वनाधिकार अधिनियम (FRA) और 'निस्तार' अधिकार के तहत ग्रामीण और आदिवासी समुदायों के लिए जंगलों से संसाधन प्राप्त करने के कानूनी अधिकार हैं। वनाधिकार अधिनियम, 2006 (Forest Rights Act) कानून उन लोगों को अधिकार देता है जो पीढ़ियों से जंगलों में रह रहे हैं। इसके तहत ग्रामीण "लघु वन उपज" (Minor Forest Produce) जैसे बांस, जलावन लकड़ी और फल इकट्ठा कर सकते हैं। निस्तार (Nistar) अधिकार के रूप में भारत के कई राज्यों (जैसे मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़) में 'निस्तार' की पुरानी व्यवस्था है। इसके तहत ग्रामीणों को घर बनाने, खेती के औजार बनाने या अंतिम संस्कार के लिए रियायती दरों पर या मुफ्त में सरकारी डिपो से लकड़ी (Timber) आवंटित की जाती रही है। भारतीय वन अधिनियम के तहत कुछ जंगलों को "ग्राम वन" घोषित किया जाता है, जिनका प्रबंधन ग्राम सभा करती है। यहाँ ग्रामीण अपनी सामूहिक जरूरतों के लिए लकड़ी काट सकते हैं।
यह देखना भी गौरतलब होगा कि पेड़ और वनों से निकलने वाली लकड़ी के युक्तियुक्त प्रबंधन से ग्रामीणों और वहां के निवासियों को इन नीतियों का कितना लाभ मिलता है। निश्चित ही अध्ययन का यह एक अलग विषय हो सकता है।
ब्रजेश कानूनगो
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