Thursday, 25 December 2025

भूमध्य रेखा के दाएं बाएं

 


भूमध्य रेखा के दाएं बाएं दिशा बदल देता है पानी में घूमता फूल 

हम में से अधिकांश लोगों ने अपनी प्राथमिक शिक्षा के दौरान अक्षांश और देशांतर रेखाओं के बारे में अवश्य पढ़ा होगा। पृथ्वी पर किसी भी स्थान की सटीक भौगोलिक स्थिति बताने वाली ये काल्पनिक रेखाएँ हैं, जहाँ अक्षांश (Latitude) भूमध्य रेखा के उत्तर या दक्षिण में दूरी (पूर्व-पश्चिम की ओर) बताता है और देशांतर (Longitude) प्रधान मध्याह्न रेखा (ग्रीनविच) के पूर्व या पश्चिम में दूरी (उत्तर-दक्षिण की ओर) बताता है. अक्षांश समांतर रेखाएँ (parallels) होती हैं, जबकि देशांतर रेखाएँ (meridians) ध्रुवों को जोड़ती हैं। इसी तरह पृथ्वी को उत्तरी गोलार्ध और दक्षिणी गोलार्ध में बांटती भूमध्य रेखा भी ऐसी ही  एक काल्पनिक रेखा है जो पृथ्वी के मध्य से गुजरती है और इसे शून्य डिग्री अक्षांश पर माना जाता है। यह रेखा लगभग 13 देशों से होकर गुजरती है, जिनमें से कुछ प्रमुख देश हैं - इक्वाडोर, कोलंबिया, ब्राजील, साओ टोमे और प्रिंसिप, गैबॉन, कांगो गणराज्य, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, युगांडा, केन्या, सोमालिया, मालदीव, और इंडोनेशिया।


एक ट्रेवलर के यूट्यूब वीडियो में जब हमने भूमध्य रेखा पर युगांडा के एक पर्यटन स्थल पर एक दिलचस्प प्रदर्शन देखा तो हतप्रभ रह गए। युगांडा में भूमध्य रेखा पर एक प्रसिद्ध टूरिस्टिक प्वाइंट है, जिसे "इक्वेटर लाइन" कहा जाता है। यहाँ पर आप पानी में फूल डालने और उसके भिन्न दिशाओं में घूमने का प्रदर्शन देख सकते हैं, जो भूमध्य रेखा के दोनों ओर के पानी के घूमने की दिशा को दर्शाता है। यह एक अनोखा और रोमांचक अनुभव है जो आपको पृथ्वी की घूर्णन गति के बारे में जानने का अवसर देता है।

इक्वेटर लाइन पर पर्यटकों के लिए सेल्फी प्वाइंट तो बने ही हुए थे किंतु किंतु वहां अलग अलग जगह लगे तीन पात्रों में पानी के बीच फूल के घूमने की भिन्न प्रक्रिया भूमध्य रेखा के वैज्ञानिक पक्ष को महत्वपूर्ण बना देती है। इस स्थान पर क्रमशः भूमध्य रेखा के दाहिने  तरफ, एक पात्र ठीक भूमध्य रेखा पर तथा एक अन्य पात्र बांई ओर रखा है। इन पात्रों में जब पानी के बीच फूल को रखा जाता है तो वह भूमध्य रेखा के पात्र में स्थित रहता है लेकिन अन्य दोनों पात्रों में उसके घूमने की दिशा बिल्कुल विपरीत हो जाती है। 

दरअसल भूमध्य रेखा के इस स्थान पर पर फूल के अलग-अलग दिशाओं में घूमने और भूमध्य रेखा पर बने प्वाइंट पर स्थिर होने का प्रदर्शन एक दिलचस्प वैज्ञानिक प्रयोग है, जो पृथ्वी की घूर्णन गति और कोरिओलिस बल के प्रभाव को दर्शाता है। कॉरिओलिस बल एक प्रकार का आभासी बल है जो पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण उत्पन्न होता है। यह बल पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में दाईं ओर तथा दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर कार्य करता है। भूमध्य रेखा पर, कॉरिओलिस बल शून्य होता है, क्योंकि पृथ्वी की घूर्णन गति का प्रभाव यहाँ न्यूनतम होता है। जब एक फूल को भूमध्य रेखा पर पानी भरे  पात्र में रखा जाता है, तो वह स्थिर रहता है, क्योंकि कॉरिओलिस बल का प्रभाव वहां शून्य होता है। जब फूल को भूमध्य रेखा के उत्तर या दक्षिण में रखा जाता है, तो कॉरिओलिस बल का प्रभाव बढ़ जाता है। उत्तरी गोलार्ध में, फूल दाईं ओर घूमने लगता है, जबकि दक्षिणी गोलार्ध में, वह बाईं ओर घूमने लगता है।

इस रोचक गतिविधि के पीछे  मुख्यतः फेरल का नियम कार्य करता है। जिसे 19वीं सदी के मौसम विज्ञानी विलियम फेरेल (William Ferrel) ने प्रतिपादित किया था।   29 जनवरी, 1817, पेनसिल्वेनिया, अमेरिका में जन्मे वे एक अमेरिकी मौसम विज्ञानी थे, जिन्होंने वायुमंडलीय गतिशीलता और मौसम विज्ञान के वैज्ञानिक सिद्धांतों को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, विशेषकर पृथ्वी के घूर्णन के कारण हवाओं और समुद्री धाराओं के विक्षेपण, कोरिओलिस  प्रभाव को समझाने के लिए वे जाने जाते हैं, जिससे आधुनिक मौसम विज्ञान की नींव पड़ी और उन्होंने ज्वार-भाटा की भविष्यवाणी करने वाली मशीन का भी आविष्कार किया। 

फेरल के नियम के अनुसार, “धरातल पर मुख्य रूप से चलने वाली सभी हवाएं पृथ्वी की गति के कारण उत्तरी गोलार्द्ध में दाहिनी ओर तथा दक्षिणी गोलार्ध  में बायीं ओर मुड़ जाती हैं।” पृथ्वी अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है, और विभिन्न अक्षांशों पर इसकी घूर्णन गति अलग होती है (भूमध्य रेखा पर सबसे तेज़, ध्रुवों पर शून्य। जब कोई वस्तु (जैसे हवा) भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर या ध्रुवों से भूमध्य रेखा की ओर जाती है, तो पृथ्वी की सतह अपनी प्रारंभिक गति को बनाए रखने के लिए अलग गति से घूमती है, जिससे वस्तु अपनी मूल दिशा से हट जाती है। इसके परिणाम स्वरूप उत्तरी गोलार्ध में रखे पात्र के पानी में रखा फूल दाईं ओर घूमने लगता है और दक्षिणी गोलार्ध में रखे पात्र के फूल की गति बाईं ओर होने लगती है जबकि ठीक भूमध्य रेखा पर रखे पात्र का फूल स्थित रहता है और बह जाता है। 

वस्तुतः भूमध्य रेखा पर फूल की स्थिरता और उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध में उसकी घूर्णन गति का कारण पृथ्वी की घूर्णन गति और कॉरिओलिस बल का प्रभाव ही है। यह प्रयोग पृथ्वी की घूर्णन गति और उसके प्रभावों को समझने के लिए एक दिलचस्प और रोमांचक तरीका है। पर्यटकों और नागरिकों को ऐसे स्थानों पर उसके विज्ञान की जानकारी देने को सचमुच सराहा जाना चाहिए। 


ब्रजेश कानूनगो 


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Tuesday, 23 December 2025

अद्भुत और दिलचस्प प्रक्रिया है ग्रहों का निर्माण

अद्भुत और दिलचस्प प्रक्रिया है ग्रहों का निर्माण

जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (JWST) नासा का प्रमुख खगोल विज्ञान और खगोल भौतिकी मिशन है, जिसे 25 दिसंबर, 2021 को प्रक्षेपित किया गया और इसे पृथ्वी से 15 लाख किलोमीटर दूर लैग्रेंज पॉइंट 2 (L2) पर एक हेलो ऑर्बिट में स्थापित किया गया।

जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (JWST) ने अंतरिक्ष में बन रहे नए तारे के निर्माण की एक अद्भुत तस्वीर ली है। यह तस्वीर पृथ्वी से लगभग 625 प्रकाश वर्ष दूर स्थित एक तारे के निर्माण को दर्शाती है, जो हमारी आकाशगंगा (मिल्की वे) के सबसे नजदीकी तारा-निर्माण क्षेत्रों में से एक में अवस्थित है। 

इससे पहले भी इसी माध्यम से नासा ने कई महत्वपूर्ण तस्वीरों को जारी किया था। पिलर्स ऑफ क्रिएशन नामक  तस्वीर ईगल नेबुला के अंदर धूल और गैस के विशालकाय स्तंभों को दर्शाती है, जहां नए तारे बन रहे हैं ।JWST ने SMACS 0723 नाम के एक आकाशगंगा समूह की तस्वीर ली है, जो लगभग 13 अरब साल पुरानी है । सदर्न रिंग (Southern Ring)  तस्वीर एक नेबुला के एक अन्य तारे को दर्शाती है, जो धूल और गैस से बना है। स्टीफंस क्विनटेट (Stephen’s Quintet) तस्वीर पांच आकाशगंगाओं के एक समूह को दर्शाती है, जो एक दूसरे के करीब स्थित हैं। कैरिना नेबुला (Carina Nebula) तस्वीर ब्रह्मांड के सबसे बड़े नेबुला में से एक को दर्शाती है, जो पृथ्वी से 7,600 प्रकाश वर्ष दूर है। इसी तरह JWST ने बृहस्पति ग्रह की तस्वीर ली है, जिसमें उसके तीन चंद्रमा यूरोपा, थेबे और मीटिस को देखा जा सकता है।

WASP-96b  तस्वीर एक ग्रह के वातावरण में मौजूद तरंगों को दर्शाती है, जो पृथ्वी से 1,150 प्रकाश वर्ष दूर है । इन तस्वीरों को भी नासा, यूरोपियन स्पेस एजेंसी और कैनेडियन स्पेस एजेंसी ने मिलकर तैयार किया। 

नए तारे के निर्माण की हाल ही में जारी ताजा तस्वीर जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप की एडवांस्ड इन्फ्रारेड क्षमता का उपयोग करके ली गई है, जो धूल और गैस के बादलों के भीतर झांकने में सक्षम है। तस्वीर में एक तारे से गैस और धूल का गुबार निकलता हुआ दिखाया गया है, जो नए तारे के निर्माण की प्रारंभिक प्रक्रिया को दर्शाता है ।

आकाश में तारा बनने की प्रक्रिया एक जटिल और लंबी प्रक्रिया है, जिसमें कई चरण शामिल हैं। यह प्रक्रिया लगभग 13.6 अरब वर्ष पहले शुरू हुई थी, जब ब्रह्मांड का निर्माण हुआ था।

तारा बनने की प्रक्रिया एक गैसीय क्लाउड (नेबुला) से शुरू होती है, जिसमें हाइड्रोजन और हीलियम गैसें होती हैं। जब गैसीय क्लाउड में गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव बढ़ता है, तो यह संकुचित होने लगता है और एक प्रारंभिक तारा बन जाता है। जब तारा का तापमान और दबाव बढ़ता है, तो न्यूक्लियर फ्यूजन की प्रक्रिया शुरू होती है, जिसमें हाइड्रोजन परमाणु हीलियम में बदल जाते हैं और ऊर्जा का उत्पादन होता है। इसका विकास कई चरणों में होता है, जिसमें यह लाल विशालकाय, श्वेत बौना, और अंततः एक न्यूट्रॉन तारा या ब्लैक होल में बदल जाता है।

शोध निष्कर्षों के अनुसार प्रारंभिक तारा बनने की प्रक्रिया लगभग 13.6 अरब वर्ष पहले शुरू हुई थी, जब ब्रह्मांड का निर्माण हुआ था। पहले तारे लगभग 13.5 अरब वर्ष पहले बने थे, जो विशाल और गर्म थे। समय के साथ, तारों की विविधता बढ़ी, जिसमें छोटे और ठंडे तारे भी शामिल थे। तारों के समूहों ने आकाशगंगाओं का निर्माण किया, जो आज हम देखते हैं।

हमारी पृथ्वी भी ब्रह्माण्ड का ही एक महत्वपूर्ण ग्रह है जिस पर जीवन है। पृथ्वी के जीवन काल के बारे में जानकारी प्राप्त करना भी बहुत रोचक होगा। पृथ्वी का जीवन काल लगभग 4.54 अरब वर्ष है, जो ब्रह्मांड के जीवन काल का लगभग एक तिहाई है। आइए जानते हैं कि पृथ्वी के जीवन काल के बारे में क्या उपलब्ध जानकारी है।

पृथ्वी के जीवन काल को कई ईऑन याने वृहद कालखंडों और चरणों में समझा गया है। तारा निर्माण की विविध प्रक्रियाओं से गुजरते हुए हेडियन ईऑन (4.54 - 4 अरब वर्ष पूर्व) में हमारी इस पृथ्वी का निर्माण हुआ, यह तब एक गर्म और तरल अवस्था में थी। आर्कियन ईऑन (4 - 2.5 अरब वर्ष पूर्व) में पृथ्वी की सतह ठंडी हुई और अनेक महासागरों का निर्माण हुआ। प्रोटेरोज़ोइक ईऑन (2.5 अरब - 541 मिलियन वर्ष पूर्व) में पृथ्वी पर जीवन का उद्भव हुआ और यह धीरे धीरे विकसित होने लगा।इसके पश्चात फेनज़ोइक ईऑन (541 मिलियन वर्ष पूर्व - वर्तमान) से पृथ्वी पर जीवन विविधता पूर्ण और जटिल होता गया और आज का  वर्तमान स्वरूप विकसित हुआ।

करोड़ों वर्ष पुराने इस अनूठे ग्रह पर प्रकृति और प्राणियों के अद्भुत सौंदर्य को निहारना और अनुभव करना कितना सुखद व आनंददायी है यह कौन घुम्मकड़ भला नकारना चाहेगा। करोड़ों पर्यटक और ट्रैवलर इसी रोमांच की तलाश में दुनिया का कोना कोना छान आते हैं।  इनके ट्रैवलॉग और यूट्यूब वीडियो को घर बैठे देखना हमारे लिए भी कम सुखद नहीं है। 


ब्रजेश कानूनगो

Monday, 22 December 2025

सफारी : वन्यजीवों से उनके घर आंगन में मिलने का सुख

 

सफारी : वन्यजीवों से उनके घर आंगन में मिलने का सुख


पर्यटक और ट्रैवेलर्स अक्सर अपनी यात्रा में जंगल सफारी को भी शामिल करते हैं और उस क्षेत्र के खास प्राणियों को देखने की योजना बनाते हैं।  जंगल सफारी न केवल रोमांच का अनुभव कराती है, बल्कि हमें प्रकृति और वन्यजीवों के करीब आने का मौका भी देती है। हमने अनेक ट्रेवलरों को उनके बनाए वीडियोस में यूट्यूब पर दुनियाभर के अभ्यारण्यों और नेशनल पार्कों में जंगल सफारी का आनंद लेते देखा है। हाल ही में अफ्रीका के विभिन्न अभयारण्यों में वन्य जीवों को बिल्कुल नजदीक से देखते हुए रोमांचित हुए। खासतौर से जेबरा,जिराफ, हाथियों और शेर आदि को समूहों में विचरण करते देख बहुत आनंद की अनुभूति होती है। 

कुछ प्रमुख वन्यजीव अभ्यारण्य (Famous Wildlife Sanctuaries) सफारी के लिए ऐसे स्थान हैं जिन्हें "स्वर्ग" माना जा सकता है इनमें से अफ्रीका का मसाई मारा नेशनल रिजर्व, केन्या (Masai Mara, Kenya) यह दुनिया की सबसे प्रसिद्ध सफारी जगहों में से एक है। यहाँ 'द बिग फाइव' (शेर, तेंदुआ, हाथी, भैंसा और गैंडा) पाए जाते हैं। मुख्य आकर्षण यह देखना है जब 'ग्रेट माइग्रेशन' (जुलाई से अक्टूबर) के दौरान जहाँ लाखों की संख्या में ज़ेबरा और वाइल्डबीस्ट (Wildebeest) नदी पार करते हैं। क्रूगर नेशनल पार्क (Kruger National Park, South Africa)
​एक और अफ्रीका का सबसे पुराने और सबसे बड़े उद्यानों में से एक है। यहाँ आप स्वयं कार चलाकर  (Self-drive safari) भी अफ्रीकी हाथी, अफ्रीकी जंगली कुत्ते और पक्षियों की सैकड़ों प्रजातियां का आनंद ले सकते हैं। नेशनल पार्क के गाइड और वाहनों से भी ये सफारी की जा सकती है, जो सुरक्षित होती है। ये खास गाड़ियां वन्य जीवों के बिल्कुल नजदीक तक ले जाकर ट्रैवलरों, पर्यटकों को जानवरों की गतिविधियों का दर्शन कराते हैं। 

यदि दुनिया के विभिन्न महाद्वीपों के ऐसे जानवरों की बात करें जो केवल उन्हीं क्षेत्रों में विशेष रूप से उपलब्ध होते हैं और वहां की पहचान कहे जा सकते हैं तो इसे जानना भी बड़ा रोचक होगा।  अफ्रीका महाद्वीप से ही बात शुरू करते हैं। अफ्रीका के सवाना घास के मैदानों में पाए जाने वाले सिंह याने शेर दुनिया के सबसे बड़े मांसाहारी जानवरों में से एक हैं। अफ्रीका के जंगलों में पाए जाने वाले हाथी डायनासोर के खत्म हो जाने के बाद जमीन पर रहने वाले दुनिया के सबसे बड़े जानवर हैं। दुनिया के सबसे लंबे  जानवर जिराफ भी यहीं के मैदानों में पाए जाते हैं। यहां पाए जाने वाले अपनी विशिष्ट धारियों से मन मोहने वाले जेब्रा भी अफ्रीका की खास पहचान हैं। यहां की नदियों और झीलों में पाए जाने वाले  हिप्पोपोटेमस दुनिया के सबसे बड़े जलीय जानवरों में से एक हैं। कैंपफायर नामक बर्डअफ्रीका के सवाना घास के मैदानों में पाए जाने वाले पक्षी अपनी विशिष्ट आवाज़ के लिए जाने जाते हैं। अफ्रीका के जंगलों में पाए जाने वाले चिम्पैंजी दुनिया के सबसे बुद्धिमान जानवरों में से एक होते हैं। इस धरती पर जीवन और जीवों की उत्पत्ति भी अफ्रीका से शुरू होना माना गया है। आधुनिक मनुष्य भी यहीं से निकली एक प्राणी प्रजाति है। 
गोरिल्ला भी जंगलों में पाए जाने वाले  दुनिया के सबसे बड़े स्तनधारी प्राणी हैं। घास के मैदानों में पाए जाने वाले यहां के लेपर्ड अपनी विशिष्ट धारियों के लिए जाने जाते हैं। यहां आए पर्यटकों को जब विशिष्ट सिंग वाला राइनो ( गेंडा) दिख जाता है तो उसकी सफारी का आनंद द्विगुणित हो जाता है। वैसे यदि अफ्रीका के दो बेहद आकर्षक जीवों की बात करें तो सबसे पहले जिराफ और जेब्रा की तस्वीर ही मन में उभर जाती है।

अफ्रीका में जिराफों की विभिन्न प्रजातियां केन्या और तंजानिया में यहाँ 'मसाई जिराफ' भारी संख्या में पाए जाते हैं। घास के मैदानों में इन्हें झुंड में चलते देखना एक क्लासिक सफारी अनुभव होता है।
​सम्बुरु नेशनल रिजर्व, केन्या में दुर्लभ 'रेटिकुलेटेड जिराफ' (Reticulated Giraffe) पाए जाते हैं, जिनके शरीर पर गहरे भूरे रंग के सुंदर चौकोर निशान होते हैं। मर्चिसन फॉल्स, युगांडा में 'रॉथ्सचाइल्ड जिराफ' (Rothschild’s Giraffe) की सबसे बड़ी आबादी रहती है।​ जिराफ दुनिया के सबसे ऊँचे स्तनधारी जीव हैं। वे खड़े-खड़े ही सोते हैं और उनकी जीभ लगभग 21 इंच लंबी और नीले-काले रंग की होती है, जो उन्हें ऊँचे काँटेदार पेड़ों की पत्तियाँ खाने में मदद करती है।
​क्रूगर नेशनल पार्क में आप अपनी गाड़ी से भी सफारी कर सकते हैं और 'साउथ अफ्रीकन जिराफ' को करीब से देख सकते हैं। नैरोबी का जिराफ मैनर (Giraffe Manor) एक अनूठा होटल है जहाँ जिराफ को ऊंची बालकनी से अपने हाथों से नाश्ता करवाया जा सकता है।

​भारत के जंगलों में जिराफ नहीं होते हैं, यद्यपि जीवों को अन्य स्थितियों वाले क्षेत्रों में विकसित करना संभव है, लेकिन यह एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। जीवों की विशिष्ट प्रजातियाँ विशिष्ट जलवायु, मिट्टी, और पर्यावरणीय स्थितियों में विकसित होती हैं, इसलिए उन्हें अन्य क्षेत्रों में स्थानांतरित करना आसान नहीं होता है। लेकिन देश के कुछ प्रमुख चिड़ियाघरों में इन्हें देखा जा सकता है। मैसूर चिड़ियाघर (कर्नाटक) को जिराफों का सबसे अच्छा प्रजनन केंद्र माना जाता है। अलीपुर चिड़ियाघर (कोलकाता) में भी जिराफों की अच्छी संख्या है। पटना चिड़ियाघर (संजय गांधी जैविक उद्यान) बिहार भी  चिड़ियाघर जिराफों के लिए काफी लोकप्रिय है। खबर है कि वन विहार नेशनल पार्क (भोपाल) में जिराफ और ज़ेबरा लाने की योजना पर काम चल रहा है ताकि पर्यटक इन्हें देख सकें। चिड़ियाघर में वन्य जीवों के देखने में वह मजा उतना नहीं जो उन्हीं के घर में ,उन्हीं के आंगन में स्वछंद निर्भीक विचरण करते उन्हें देखने में हमे आ पाता है। 

ब्रजेश कानूनगो 




सूर्योदय और सूर्यास्त का अलौकिक सुख

 

सूर्योदय और सूर्यास्त का अलौकिक सुख
मैने मेरे एक मित्र से जब पूछा कि वे वर्ष के अंतिम दिन को और नए वर्ष के पहले दिन को किस तरह संजोना चाहेंगे? उस दिन अपनी स्मृति को किस तरह स्मरणीय बनाना चाहेंगे? उनका जवाब बहुत सामान्य सा था लेकिन उसके पीछे जीवन को देखने समझने का दृष्टिकोण और गहरा अर्थ समाया हुआ था।  उन्होंने कहा कि दुनिया में सब कुछ बदलता रहता है लेकिन जो नहीं बदलता वह केवल प्रतिदिन पूर्व दिशा से प्रातः सूर्य का निकलना और शाम को पश्चिम में उसका अस्त हो जाना ही है, जो शाश्वत है। यही जीवन का असली उत्सव है। दर्शन है और सौंदर्य भी। वर्ष की समाप्ति पर उन्हें सूर्यास्त और नए साल के आगमन पर सूर्योदय को देखना बहुत भाता है। 

उनका कहना बिल्कुल सही भी था। वर्ष की अंतिम शाम और पहले दिन के सूर्य को देखना ही नहीं बल्कि हरेक दिन सूर्य का निकलना, ढलना और अस्त हो जाना हमेशा से मनमोहक रहा है। सूर्योदय और सूर्यास्त दो ऐसे समय हैं जब प्रकृति अपनी पूरी शोभा के साथ हमें आकर्षित करती है। इन समयों में आकाश का रंग, बादलों की आकृति, और वातावरण का तापमान सभी कुछ बदल जाता है। यह समय मनुष्य के मन और आचरण पर गहरा प्रभाव डालता है। इस दौरान हमारे शरीर की आंतरिक घड़ी नियंत्रित हो जाती है, जो हमारे मस्तिष्क और शरीर के कार्यों को सकारात्मक रूप से प्रभावित करती है। 

यही कारण है कि दुनिया भर के लोग रोजमर्रा सुबह, शाम के नजारों से रूबरू होने के बावजूद ऐसे खास स्थलों पर पहुंचते हैं जहां से सूर्य के उदय और अस्त होने के नयनाभिराम दृश्यों से आनंदित हो सकें। लाखों पर्यटक, घुम्मकड़ और आम लोग अपने सामर्थ्य के अनुसार अपनी यात्राओं में इन दृश्यों से अपने मन में खुशी और उमंग की अनुभूतियां प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। 

सूर्योदय और सूर्यास्त देखने के लिए दुनिया भर में कई प्रसिद्ध स्थल हैं। पर्यटकों की प्राथमिकता में रहनेवाले स्थलों की बात करें तो मिलेनियम आइलैंड, किरीबाती दुनिया का पहला स्थान है जहां सूर्योदय होता है। यह प्रशांत महासागर में स्थित एक छोटा सा द्वीप है। भारत में अरुणाचल प्रदेश का डोंग गांव सूर्योदय देखने के लिए एक प्रसिद्ध स्थल है। यहाँ सूर्य की पहली किरण 3 बजे धरती को छूती है। अमेरिका में ग्रैंड कैनियन, पेरू का माचू पिचू  सूर्यास्त देखने के लिए  प्रसिद्ध स्थल हैं। यहाँ का सूर्यास्त देखने का अनुभव अद्वितीय है।
मालदीव का वाधू आइलैंड सूर्यास्त देखने के लिए एक प्रसिद्ध स्थल है। यहाँ का सूर्यास्त देखने का अलग रोमांटिक स्वरूप है। कंबोडिया का अंकोरवाट सूर्योदय देखने के लिए एक प्रसिद्ध स्थल है। यहाँ का सूर्योदय देखने का अनुभव अविस्मरणीय है। इसी तरह इटली में लीनिंग टावर ऑफ पीसा, ऑस्ट्रेलिया मेंग्रेट बैरियर रीफ भी सूर्यास्त देखना भी पर्यटकों के लिए एक आकर्षण का केंद्र है। इन स्थलों की विशेषताएं अलग-अलग हैं, लेकिन सभी सूर्योदय और सूर्यास्त देखने के लिए प्रसिद्ध हैं।

हमारे देश में भी समुद्र के क्षितिज में सूर्यास्त और सूर्योदय के विशिष्ट नजारे देखने के लिए भारत में कई प्रसिद्ध स्थल हैं। कन्याकुमारी, तमिलनाडु में यहाँ तीन समुद्रों का संगम होता है सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों का अद्भुत दृश्य यहां देखा जा सकता है। केरल में वर्कला बीच पर सूर्योदय और सूर्यास्त का दृश्य बहुत भी सुंदर होता है, जहां अरब सागर के ऊपर सूर्य की किरणें पड़ती हैं। गोवा के पलोलेम बीच , राधानगर बीच, अंडमान और निकोबार बीच पर सूर्यास्त का दृश्य बहुत ही सुंदर होता है, जहां समुद्र के ऊपर सूर्य की किरणें पड़ती हैं। मुंबई के मरीन ड्राइव पर सूर्यास्त का दृश्य भी मनमोहक होता है । अरुणाचल  प्रदेश में सूर्योदय का दृश्य बहुत ही सुंदर होता है, जहां हिमालय की पहाड़ियों के ऊपर सूर्य की किरणें पड़ती हैं। मेघालय में उमियम झील पर सूर्योदय का दृश्य बहुत ही सुंदर होता है, जहां झील के ऊपर सूर्य की किरणें पड़ती हैं।

कई टूर कंपनियां पर्यटकों के लिए सूर्योदय दर्शन के विशेष पैकेज के तहत यात्राएं करवाती हैं जो तड़के तीन चार बजे से पर्यटकों को दुर्गम स्थलों तक ले जाने के उपक्रम करती हैं। पहाड़ों के ऊपर तड़के सूर्य को निकलते देखना किसी दिव्य अनुभूति से कम नहीं होता। उत्तर पूर्व, केरल, महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्यों सहित अनेक ऐसे ऊंचे स्थान हैं जहां से सूर्योदय देखना अविस्मरणीय हो जाता है। मुन्नार की पहाड़ी के टॉप स्टेशन से सूर्योदय और एलेप्पी केरल में बेक वाटर में  हाउस बोट की सैर करते हुए डूबते सूर्य के नजारे हमारे भीतर भी असीम सुख और संतोष की धारा प्रवाहित कर जाते हैं।

क्या आप जानते हैं कि तन और मन को असीम आनंद से भर देने वाली इन  घटनाओं में केवल सौंदर्य ही नहीं, बल्कि विज्ञान भी छुपा होता है? दरअसल,सूर्योदय और सूर्यास्त के समय, सूर्य की किरणें वायुमंडल में अधिक दूरी तय करती हैं, जिससे प्रकाश का रंग बदल जाता है। यह घटना रेले स्कैटरिंग कहलाती है, जिसमें प्रकाश के छोटे तरंगदैर्ध्य (निल और बैंगनी) अधिक बिखरते हैं, जबकि बड़े तरंगदैर्ध्य (लाल और नारंगी) कम बिखरते हैं। यही कारण है कि सूर्योदय और सूर्यास्त के समय आकाश लाल और नारंगी रंग का दिखाई देता है। इस समय वातावरण में कई बदलाव होते हैं। तापमान में कमी आती है, जिससे वायुमंडल में नमी बढ़ जाती है। यह नमी बादलों के निर्माण में मदद करती है, जो वर्षा का कारण बनते हैं। इसके अलावा, सूर्योदय और सूर्यास्त के समय वायुमंडल में ओजोन की मात्रा भी बढ़ जाती है, जो हमें हानिकारक पराबैंगनी किरणों से बचाती है। सूर्योदय और सूर्यास्त के समय प्राणी जगत में भी कई बदलाव होते हैं। कई जानवर, जैसे कि पक्षी और मछली, सूर्योदय के समय सक्रिय हो जाते हैं, जबकि अन्य जानवर, जैसे कि शेर और चीता, सूर्यास्त के समय सक्रिय हो जाते हैं। इसके अलावा, सूर्योदय और सूर्यास्त के समय कई पौधे भी अपने पत्तों को खोलते और बंद करते हैं, जो उनकी फोटोसिंथेसिस प्रक्रिया को नियंत्रित करता है।

सूर्योदय और सूर्यास्त का समय मनुष्य के मन और आचरण पर गहरा प्रभाव डालता है। यह समय हमारे शरीर की आंतरिक घड़ी को नियंत्रित करता है, जो हमारे मस्तिष्क और शरीर के कार्यों को प्रभावित करता है। सूर्योदय का समय हमारे शरीर में कोर्टिसोल और एड्रेनालाईन जैसे हार्मोन्स का स्तर बढ़ाता है, जो हमें दिन के लिए तैयार करते हैं।
यह समय हमारे मस्तिष्क में सेरोटोनिन और डोपामाइन जैसे हार्मोन्स का स्तर बढ़ाता है, जो हमें खुश और संतुष्ट महसूस कराते हैं। सूर्योदय का समय ध्यान और एकाग्रता का समय होता है। यह समय हमारे मस्तिष्क को शांत और केंद्रित करता है, जो हमें अपने लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करने में मदद करता है, जबकि सूर्यास्त का समय आराम और शांति का समय होता है। यह समय हमारे शरीर में मेलाटोनिन जैसे हार्मोन्स का स्तर बढ़ाता है, जो हमें आराम और नींद की ओर ले जाता है। सूर्यास्त का समय विचार और आत्म-विश्लेषण का समय होता है। यह समय हमारे मस्तिष्क को शांत और केंद्रित करता है, जो हमें अपने दिन के अनुभवों पर विचार करने और आत्म-विश्लेषण करने में मदद करता है। सूर्यास्त का समय संबंध और प्रेम का समय होता है। यह समय हमारे मस्तिष्क में ऑक्सीटोसिन जैसे हार्मोन्स का स्तर बढ़ाता है, जो हमें दूसरों के साथ जुड़ने और प्रेम करने के लिए प्रेरित करता है।

हम सबको मोहने वाले सूर्योदय और सूर्यास्त का समय सौंदर्य और विज्ञान का अनूठा संगम होता है। यह समय न केवल हमें प्रकृति की शोभा का अनुभव कराता है, बल्कि हमारे मन को प्रफुल्लता और असीम संतोष से भर देता है। यही कारण है कि जीवन को थोड़ा और सार्थक कर देने वाले ये दृश्य पर्यटकों को ही नहीं प्रत्येक व्यक्ति की विश लिस्ट में प्राथमिकता से होते हैं। 

ब्रजेश कानूनगो 

Wednesday, 17 December 2025

अनोखा बाजार जहां करेंसी नोटों की दुकानें सजती हैं

 अनोखा बाजार जहां करेंसी नोटों की दुकानें सजती हैं

हम हाट बाजारों में किराना,सब्जियों और हर तरह की रोजमर्रा जरूरतों की चीजों की दुकानें सजा कर व्यापारियों को अपना माल बेचते देखते रहे हैं। पिछले दिनों हमने एक ट्रेवलर के यूट्यूब वीडियो में देखा तो दंग रह गए कि बाजार में करेंसी नोटों की बहुत सारी खुले आम दुकानें सजी हुई हैं और कोई खास सुरक्षा की व्यवस्था भी नहीं दिखी। नमाज का समय होने पर दुकानदार बिना कोई लूट के डर से निश्चिंत होकर दुकान को खुला छोड़कर मस्ज़िद की ओर चला गया। 

हम बात कर रहे हैं सोमालीलैंड की। सोमालीलैंड पूर्वी अफ्रीका में स्थित एक स्व-घोषित स्वतंत्र देश है, जिसने 1991 में सोमालिया से स्वतंत्रता की घोषणा की थी। यह देश हॉर्न ऑफ अफ्रीका में स्थित है और इसकी सीमाएं जिबूती, इथियोपिया और सोमालिया से लगती हैं। इसका इतिहास 1884 से शुरू होता है, जब यह ब्रिटिश संरक्षित क्षेत्र बन गया था। 1960 में, यह स्वतंत्र हुआ और सोमालिया के साथ मिलकर सोमाली गणराज्य का गठन किया। हालांकि, 1991 में, सोमालीलैंड ने फिर से अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की और तब से यह एक स्व-घोषित स्वतंत्र बहुदलीय लोकतंत्र है, जिसमें एक राष्ट्रपति और एक द्विसदनीय संसद है। देश में नियमित रूप से चुनाव होते हैं और यह अफ्रीका में सबसे अधिक स्थिर और लोकतांत्रिक देशों में से एक माना जाता है।
इसकी अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से पशुपालन और कृषि पर आधारित है। देश में बेरबेरा पोर्ट है, जो एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र भी है। इसके अलावा, देश में तेल और गैस जैसे खनिज संसाधन भी हैं।  
मुख्य रूप से यहां की सोमाली संस्कृति में इस्लाम धर्म का महत्वपूर्ण स्थान है। देश में कई ऐतिहासिक स्थल हैं, जिनमें लास गील की चट्टान कला शामिल है।

दरअसल दुकान खुली छोड़कर दुकानदार के नमाज पढ़ने चले जाने का दृश्य सोमालीलैंड के सड़क किनारे लगने वाले मनी मार्केट (पैसे के बाज़ार) जैसी अनोखी जगह का है जहाँ सामान नहीं, बल्कि नोटों के बंडल बेचे जाते हैं, क्योंकि स्थानीय मुद्रा सोमालीलैंड शिलिंग (Somaliland Shilling) की कीमत बहुत कम और अस्थिर होती गई है, जिससे लोग भारी मात्रा में नकदी लेकर खरीददारी करते हैं, यहाँ तक कि सब्जियों या सोने के लिए भी नोटों की बोरियाँ ले जानी पड़ती हैं, और इसी कारण अब लोग डिजिटल भुगतान (मोबाइल मनी) को भी पसंद करने लगे हैं। हालांकि ये बाज़ार सुरक्षित माने जाते हैं और इनमें खुलेआम लेन-देन होता है। 

सोमालीलैंड शिलिंग (SLS) की कीमत इतनी कम है कि $1 एक अमेरिकी डॉलर के बदले 10,000 से 11,000 SLS सोमालीलैंड शिलिंग तक मिलते हैं। नोटों की इतनी बड़ी मात्रा के कारण, दुकानदार अक्सर पैसों को गिनने के बजाय तौलकर लेन-देन करते भी दिखाई देते हैं। नोटों के ये बाज़ार फल-सब्जी की मंडी की तरह लगते हैं, जहाँ लोग नोटों के बंडल खरीदते और बेचते हैं यहां तक कि सब्जियों के लिए भी नोटों से भरे थैले ले जाने पड़ सकते हैं। खास बात यह कि इन बाजारों में लेन-देन खुलेआम होता है और इन्हें सुरक्षित माना जाता है, जहाँ लोग बिना डर के भारी नकदी ले जाते हैं, कभी-कभी तो ठेले (wheelbarrows) में भी।

नोटों की भारी भरकम नकदी जैसी समस्या से बचने के लिए, सोमालीलैंड के लोग अब मोबाइल मनी (जैसे EVC Plus) का बड़े पैमाने पर उपयोग करने लगे हैं; यहाँ तक कि भिखारी भी डिजिटल लेनदेन करते पाए जाते हैं। अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का यह बाज़ार सोमालीलैंड की अर्थव्यवस्था और लोगों की वित्तीय ज़रूरतों को पूरा करने के तरीके को दर्शाता है, जहाँ राज्य की संस्थाएँ कमज़ोर हैं और लोग आत्मनिर्भर हैं। ​इस अनोखे बाज़ार के पीछे मुख्य कारण सोमालीलैंड शिलिंग (SL Shilling) का अत्यधिक अवमूल्यन (Devaluation) और उच्च मुद्रास्फीति होना (High Inflation) है। 

संक्षेप में, सोमालीलैंड का यह मनी मार्केट एक ऐसी जगह है जहाँ भौतिक नकदी का मूल्य इतना कम है कि वह एक वस्तु बन जाती है, जिसे खरीदा-बेचा जाता है, और यह उनकी अर्थव्यवस्था की अनूठी वास्तविकता को दिखाता है। ट्रैवलरों के यूट्यूब वीडियो देखते हुए सोमालीलैंड के इस खुले मनी मार्केट को देखकर अचंभित तो हो ही जाते हैं दर्शक। 

ब्रजेश कानूनगो  

दिव्यांग की चुनौती : हम कब कहेंगे उन्हें पहले आप !

 दिव्यांग की चुनौती :  हम कब कहेंगे उन्हें पहले आप !


प्राकृतिक रूप से या किसी दुर्घटनावश शारीरिक रूप से कुछ कमियों के रह जाने पर ऐसे विशेष व्यक्तियों को ‘फिजिकली हेंडीकेप्ट’ या ‘विकलांग’ जैसे शब्दों से पुकारा जाता रहा है। बाद में संबोधन में सम्मान देने की दृष्टि से ‘स्पेशली चैलेंजड’ या ‘दिव्यांग’ जैसे बेहतर शब्दों को आगे बढाया गया। बोलने और सुनने की शक्ति में कमी होने पर ऐसे लोगों को गूंगे बहरे की जगह ‘मूक बधिर’ और आँखों से देखने में अक्षम होने पर या नजर कम हो जाने पर ‘नेत्रहीन’ की बजाए ‘दृष्टि बाधित’ का प्रयोग किया जाना किसी भी सभ्य समाज में इन विशेष व्यक्तियों के लिए सम्मानजनक जगह बनाने के प्रयासों का एक महत्वपूर्ण और मानवीय संवेदनाओं का अनुकरणीय उदाहरण कहा जा सकता है।

दुनिया भर में कम ज्यादा पैमाने पर ऐसे प्रयास दिखाई देते हैं. कनाडा प्रवास के दौरान मुझे दिव्यांगों को लेकर नागरिक और सरकारी स्तर पर किये गए प्रयासों को देख-जानकर बहुत अच्छा लगा। कागज़ पर बनाई गयी योजनाओं का सचमुच धरातल पर क्रियान्वित होना विशेष व्यक्तियों के प्रति सहयोग और सच्ची संवेदनाओं का परिचायक है।

यहाँ हर सार्वजनिक स्थल पर विशेष व्यक्तियों के लिए आगे बढ़कर सुविधाएं उपलब्ध कराईं  गईं हैं। सार्वजनिक बसों में चढ़ने, उतरने के लिए लो फ्लोर और विशेष लोगों के ट्रेन कोच के सामने स्टेशनों पर कुछ ऊंचे उठे हुए प्लेटफोर्म बने हैं। विकलांग व्यक्ति अपनी व्हील चेयर सहित आसानी से भीतर प्रवेश कर लेता है। बस या कोच के भीतर भी व्हील चेयर को खडा रखने के लिए स्थान छोड़ा गया होता है। यहाँ दो-तीन व्हील चेयर्स अन्य यात्रियों को बिना कोई परेशानी के खडी की जा सकती हैं।

रजिस्ट्रेशन या टिकिट काउंटरों पर दिव्यांगों के लिए अलग से खिड़कियाँ, पार्किंग स्थलों पर उनकी चार पहिया या चेयर गाड़ियों के लिए आरक्षित स्थान, रेलवे स्टेशनों, बाजारों, पार्कों, सभागृहों, मनोरंजन स्थलों आदि में रैम्प, एक्सलेटरों के अलावा अलग से लिफ्ट आदि रखे जाना अनिवार्य सा ही है। मैंने कनाडा प्रवास के दौरान ऐसा कोई स्थान नहीं देखा जहां इन चीजों की उपेक्षा की गई हो। बल्कि इनके लिए नियत पार्किंग स्थानों का उपयोग सामान्य व्यक्ति द्वारा किया जाने पर दंडात्मक टिकट अवश्य कट जाता है।

जरूरतमंद की मदद और सहयोग करना तो यहाँ संस्कारों का हिस्सा महसूस हुआ। जहां सामान्य व्यक्ति के लिए ही जब सहयोग के हाथ बढ़ना सामान्य बात है वहां ‘विकलांग’ के लिए तो कोई कसर रह ही नहीं सकती इधर।

दरअसल विकसित देशों में विकलांगों को सहज जीवन जीने के अवसर देने हेतु कई सुविधाएं आम तौर पर और सरकारी तौर पर दी जाती हैं। खासतौर से रोजगार,शिक्षा, स्वास्थ्य ,परिवहन और सामाजिक क्षेत्रों में विकलांगों को ध्यान में रखकर नियम, अधिनियम बनें हैं जिनका कड़ाई से पालन किया जाता है।

यूएसए और कनाडा में विकलांग व्यक्तियों को रोजगार, शिक्षा और परिवहन में प्राथमिकता देने के लिए कई कानून और नीतियां हैं। अमेरिकास विद डिसएबिलिटी एक्ट (एडीए) विकलांग व्यक्तियों को रोजगार में भेदभाव से बचाता है। कनाडा में भी विकलांग व्यक्तियों को रोजगार में भेदभाव से बचाने के लिए कनाडियन ह्यूमन राइट्स एक्ट है। इन अधिनियमों के तहत नियोक्ताओं को विकलांग व्यक्तियों को उचित आवास प्रदान करना होता है।

इसी प्रकार शिक्षा के क्षेत्र में विकलांग शिक्षा अधिनियम (आईडीईए) विकलांग छात्रों को मुफ्त और उपयुक्त शिक्षा प्रदान करता है। स्कूलों को विकलांग छात्रों को उचित आवास प्रदान करना होता है।  कनाडा में विकलांग छात्रों को शिक्षा में भेदभाव से बचाने के लिए कनाडियन ह्यूमन राइट्स एक्ट है जिसके अंतर्गत स्कूलों को विकलांग छात्रों को उचित आवास प्रदान करना आवश्यक होता है। अमेरिकास विद डिसएबिलिटी एक्ट (एडीए) विकलांग नागरिकों और लोगों को परिवहन में भेदभाव से बचाता है। सार्वजनिक परिवहन को विकलांग व्यक्तियों के लिए सहज सुलभ होना चाहिए। कनाडा में विकलांग व्यक्तियों को परिवहन में भेदभाव से बचाने के लिए कनाडियन ह्यूमन राइट्स एक्ट है। जो सार्वजनिक परिवहन में विकलांग व्यक्तियों को प्राथमिकता देना सुनिश्चित करता है।
इसके साथ ही विकसित देशों में विकलांग व्यक्तियों को सहायक उपकरण और सहायता सामग्री प्रदान की जाती है, जैसे कि व्हीलचेयर, श्रवण यंत्र, और कृत्रिम अंग। विकलांग व्यक्तियों को शिक्षा और रोजगार के अवसर प्रदान किए जाते हैं, जिससे वे आत्मनिर्भर बन सकें। मुफ्त या रियायती दरों पर चिकित्सा सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाती हैं। पेंशन और बीमा योजनाओं द्वारा विकलांग लोगों को सामाजिक सुरक्षा देने के प्रावधान किए गए हैं। लो फ्लोर बसों और ऊंचे प्लेटफॉर्म वाली सुलभ परिवहन व्यवस्था के साथ उनके  लिए सुलभ भवन और सार्वजनिक स्थान बनाए जाते हैं, जिनमें कि रैंप और एलिवेटर की व्यवस्था अनिवार्य होती है।

हमारे देश भारत में भी विकलांग व्यक्तियों के लिए कई सुविधाएं और प्रोत्साहन योजनाएं कार्यान्वित हैं। विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016  के तहत, विकलांग व्यक्तियों को समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण और पूर्ण भागीदारी प्रदान करने का प्रावधान किया गया है।की जाती है।
सुगम्य भारत अभियान का उद्देश्य विकलांग व्यक्तियों के लिए बाधा मुक्त और अनुकूल वातावरण बनाना है। दीनदयाल विकलांग पुनर्वास योजना (डीडीआरएस) के तहत, गैर सरकारी संगठनों को विकलांग व्यक्तियों के पुनर्वास के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।विकलांग व्यक्तियों को सहायक उपकरण और सहायता सामग्री की खरीद हेतु सहायता (एडीआईपी) योजना है  जो विकलांग व्यक्तियों को सहायक उपकरण और सहायता सामग्री प्राप्त करने में मदद करती है।प्रदान की जाती है। विकलांग पेंशन योजना के तहत, विकलांग व्यक्तियों को मासिक पेंशन प्रदान की जाती है। विकलांग व्यक्तियों के लिए शिक्षा और रोजगार में आरक्षण प्रदान किया जाता है।  मुफ्त या रियायती दरों पर स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान की जाती हैं।
इन सुविधाओं के अलावा, प्रधानमंत्री विकलांग योजना,विकलांग लोन योजना, दिव्यांगजन स्वावलंबन योजना,विकलांगों के लिए राज्य पुरस्कार योजना जैसे कार्यक्रम भी भारत सरकार ने शुरू किए  हैं ।

इन योजनाओं और कार्यक्रमों के माध्यम से  यद्यपि भारतीय समाज में भी विशेष व्यक्तियों के प्रति नजरिये और व्यवहार में शनै शनै सकारात्मक परिवर्तन आता दिखाई दे रहा है। लेकिन जन्म से शारीरिक कमी लिए बच्चे  के विकास और उसके शिक्षण प्रशिक्षण में वह रूचि और दायित्व अभी पालकों में पैदा नहीं हो सका है जो इधर विकसित समाज में नजर आता है। विकलांग व्यक्ति यहाँ लगभग मुख्यधारा का हिस्सा है. हमारे यहाँ आज भी अधिकाँश ग्रामीण और गरीब परिवारों के विशेष व्यक्ति चौराहों , मंदिरों या सार्वजनिक स्थलों पर मदद की गुहार लगाते दिखाई दे जाते हैं। सरकारें और स्वैच्छिक संगठन उनकी मदद के लिए जरूर कुछ आगे आकर तिपहिया आदि भेंट कर उनकी सहायता करने की थोड़ी सी कोशिश करते रहते हैं, लेकिन जब तक बचपन से ही उनमें आगे बढ़ने का जज्बा और अन्य सामान्य लोगों में उनके प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन जागृत नहीं होगा, तब तक बात बनती दिखाई नहीं देती।

‘विकलांग’ को ‘दिव्यांग’ जैसे शब्द में बदलकर भावनात्मक रूप से तो अपनी पीठ अवश्य ठोकी गई है लेकिन आचरण और व्यवहार में वास्तविक दिव्यता तो तब ही आएगी जब हमारे मुंह से निकलेगा- ‘पहले आप!’

ब्रजेश कानूनगो

Monday, 15 December 2025

अनोखे गांव जहां सड़कें नहीं नहरें घर तक ले जाती हैं

अनोखे गांव जहां सड़कें नहीं नहरें घर तक ले जाती हैं


दुनिया में कई ऐसे गांव और कस्बे हैं जहां सड़कों की बजाय नहरों में बोटिंग से एक घर से दूसरे घर जाया जाता है। गिथोर्न नीदरलैंड का एक ऐसा ही छोटा सा गांव है, जो अपनी सुंदर नहरों, पुलों और घास के छत वाले घरों के लिए प्रसिद्ध है। इसे "नीदरलैंड का वेनिस" भी कहा जाता है। गांव में कोई सड़क नहीं है, और लोग नाव, साइकिल या पैदल ही यात्रा करते हैं।

पिछले दिनों हमने ट्रैवलर बंसी बिश्नोई के यूट्यूब वीडियो से नीदरलैंड के इसी कस्बे गिथोर्न की मानस यात्रा की। खूबसूरत और अनोखे गिथोर्न में कोई 176 पुल हैं जिनके नीचे से नावें और बोट निकलकर हरेक घर तक पहुंच सकती हैं।, सड़कों की जगह नहरें कस्बे के यातायात का माध्यम बनती हैं। गांव के घरों की छतें घास से बनी हुई हैं, जो उन्हें एक अनोखा और सुंदर रूप देती हैं। गांव में नाव और साइकिल किराए पर ली जा सकती हैं, जो पर्यटकों के लिए एक अच्छा विकल्प हो जाता है।

ट्रैवलर के वीडियो को देखते हुए हमें अपने कनाडा प्रवास में देखे ऐसे ही एक नहरों के जरिए जुड़े एक गांव की स्मृति हो आई। कनाडा प्रवास के दौरान हम लोग न्यूमार्केट कस्बे में हमारे घर से कोई 70 किलोमीटर दूर स्थित  ओरिलिया कस्बे की वृहद झील पर पिकनिक मनाने पहुंचे थे। कस्बे में एक खूबसूरत तुधोप पार्क है। मीठे पानी की झील के किनारे यहां एक बीच भी है। रविवार को छुट्टी होने से बच्चों और परिवारों की उपस्थिति ज्यादा थी। वॉलीवाल, स्केटिंग, नौकायन, तैराकी,वाटर स्पोर्ट्स आदि यहां झीलों के किनारे होने वाली आम गतिविधियां होती हैं। लोग बारबेक्यू जमाये खाने पीने में भी व्यस्त थे। रेत पर घर बनाते और खेलते बच्चों के अलावा कुछ दिव्यांगजन भी अपने विशेष वाहनों पर पार्क का आनन्द उठाते नजर आए। कुछ लाइफ गार्ड्स भी मुस्तैदी से अपनी सेवाएं देते दिखाई दिए।

नेताओं और महान व्यक्तियों की स्मृति और युद्ध में गौरव पूर्ण विजय को यादगार बनाने के लिए अनेक स्मारक हम देखते ही रहे हैं। लेकिन ओरिलिया कस्बे के तुधोप पार्क में कनेडियन श्रमिकों के उनके अवदान और कार्य करते हुए अपनी जान गंवा देने को सम्मान व महत्व देने के लिए बने स्मारक को देखकर विशेष खुशी का अहसास हुआ।

कनाडा की लबालब झीलों और पार्कों को कभी भुलाया नहीं जा सकता। ये सुंदर हैं। व्यवस्थित हैं। साफ सुथरे और सुविधा सम्पन्न हैं। प्राकृतिक संसाधनों के रखरखाव को यहां अनुभव किया जा सकता है। लोगों की रुचियों और जीवन शैली को अनुशासित ढंग से एक सूत्र में बांधे हुए आनन्द की हिलोरें यहां सर्वत्र दिखाई देती हैं। यह अद्भुत है और अनुकरणीय भी। औरेलिया से ही कोई दस मिनट की ड्राइव के बाद एक विशिष्ट और खूबसूरत 'लगून सिटी' पहुंचे। इस खास बस्ती की विशेषता यह है कि यहां के प्रत्येक घर और कॉटेज के सामने या पीछे झील से जुड़ी नहरें इस तरह गुजरती हैं, जैसे हमारे यहां सड़कें बनी होती हैं। बेशक इन घरों के सामने सड़क तो है ही लेकिन नहरों के जरिये अपनी बोट से,नाव से भी यात्रा की जा सकती है। निकट के शहर भी जाया जा सकता है और झील में पहुंच कर वाटर स्पोर्ट्स, बीच आदि का आनन्द भी उठाया जा सकता है।

बहती नहरों के ऊपर कई ऊंचे ब्रिज बने हैं जिनसे वाहन गुजरते हैं और नीचे से बड़े छोटे जल यान, मोटर बोट्स और नावों में यहां के निवासी यात्रा करते हैं। आनन्द उठाते हैं। घरों के नीचे तक पानी इस तरह भरा होता है कि बोट्स आदि कारों की तरह घर में पार्क भी किये जा सकते हैं। इस नए दृश्य और जीवन शैली को देखना हमारे लिए बहुत रोमांचक रहा था। 
ट्रैवलर बंसी बिश्नोई के नीदरलैंड यात्रा में गिथोर्न गांव के यूट्यूब वीडियो ने हमारे देखे कनाडा के लगून सिटी के सारे अनूठे अनुभव पुनः ताजा कर दिए।

दुनिया भर में अनेक ऐसे शहर और गांव हैं जो झीलों और खूबसूरत नदियों, समुद्र की जलराशि के बीच पर्यटकों और घुमक्कड़ों को लुभाते रहें हैं। इटली के वेनिस को तो हर कोई जानता है जो एक प्रसिद्ध शहर है और नहरों पर बना हुआ है। चीन का गियानजियांग भी ऐसा ही एक छोटा सा गांव है नीदरलैंड का अम्स्टर्डम एक प्रसिद्ध शहर है जहां नहरों का अपना विशेष महत्व है। इसी तरह जापान का कागोशिमा शहर भी नहरों पर बना हुआ है। यहाँ के घरों में भी बोटिंग के लिए विशेष व्यवस्था है और लोग बोट से ही एक घर से दूसरे घर जाते हैं।

भारत में पूरी तरह नहरों का सौंदर्य समेटे ऐसा कोई विशेष गांव या हिस्सा तो नहीं हैं जहां नहरों में हर घर से बोटिंग की जाती है। किंतु बहुत सी ऐसी जगहें अवश्य हैं जहां का अनुभव भी कम स्मरणीय नहीं होता। कश्मीर की डल झील और उदयपुर की पिछोला झील, भोपाल का बड़ा तालाब और केरल के बेक वाटर, उत्तर पूर्व और ब्रह्मपुत्र क्षेत्र सहित देश भर में कई छोटे बड़े गांव जो टापुओं पर मुख्य आबादी से अलग बसे हैं वहां की यात्रा थोड़ा बहुत इस रोमांच और जीवनशैली का अहसास करा ही सकती है, लेकिन पूरी तरह नहरों पर बसी कनाडा की लगून सिटी और नीदरलैंड के गिथोर्न गांव की मोहकता और अनूठेपन की तो बात ही कुछ अलग है। 

ब्रजेश कानूनगो 

Saturday, 6 December 2025

मन मोहते ये खूबसूरत भव्य जलप्रपात

मन मोहते ये खूबसूरत भव्य जलप्रपात


​जलप्रपात प्रकृति की सबसे अद्भुत रचनाओं में से एक हैं, जो अपनी शक्ति, सौंदर्य और विशालता से हर किसी को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। ये न केवल भौगोलिक आश्चर्य हैं, बल्कि दुनिया भर में पर्यटन, रोमांच और सांस्कृतिक महत्व के केंद्र भी हैं।

गत दिनों हमने यूट्यूब पर ट्रैवलर ब्लॉगर दावूद अखुंदाज़ा के जांबिया और जिम्बाब्वे के ट्रैवल वीडियोस को देखा। ट्रैवलर ने जांबिया और जिम्बाब्वे दोनों देशों की ओर से विक्टोरिया फाल के नजारे देखे और दर्शकों को भी घर बैठे पर्यटन का आनंद देने की सफल कोशिश की। दरअसल विक्टोरिया फॉल्स अफ्रीका के दक्षिणी भाग में स्थित एक प्रसिद्ध झरना है, जो ज़ाम्बिया और ज़िम्बाब्वे की सीमा पर स्थित है। यह झरना ज़ाम्बेज़ी नदी पर स्थित है और अपनी विशालता और सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है। उनकी इस यात्रा को देखकर हमें अपनी कनाडा यात्रा के नियाग्रा जल प्रपात के दृश्यों की याद आ गई। 


कुछ वर्ष पहले कनाडा के न्यूमार्केट कस्बे से तीन घण्टे की यात्रा के बाद  हम लोग नियाग्रा नदी के विश्वप्रसिद्ध विशाल और खूबसूरत प्रपात के शुरुआती छोर के सामने प्रफुल्लित खड़े थे। मौसम भीगा भीगा था। हल्की बारिश थी या प्रपात की हवा में घुलकर उछलती बूंदें कुछ कहा नहीं जा सकता। बादल भी थे और धुंध भी। लेकिन धीरे धीरे रोशनी भी बढ़ रही थी और धूप भी अठखेलियाँ खेलने लगी थी। मालवा के अपने जाने पहचाने 'चिड़ा चिड़ी' के विवाह जैसा ही मौसम था। आसामान में इंद्रधनुष खिलने का मैं इंतजार करता रहा मगर यह आस पूरी नहीं हो सकी। शायद प्रपात की उछलती बूंदों और सूर्यकिरण का कांटा नहीं भिड़ा। 12 बजते बजते मौसम बहुत साफ हो गया।

नदी किनारे कोई 100 फिट ऊपर लगी रेलिंग के साथ साथ आगे बढ़ते हुए देखने पर हर बार प्रपात की भव्यता और खूबसूरती प्रत्येक कोण से निखरती जाती है। गहराई में पर्यटकों से भरे बोट कोई 400 से अधिक यात्रियों को बिल्कुल निकट तक ले जाकर तेज बौछारों में नहलाकर इसकी भव्यता और रोमांच का अहसास करा देते हैं।

दरअसल 'नियाग्रा जलप्रपात' अमेरिका के न्यूयॉर्क और कनाडा के ओंटारियो प्रांतों के मध्य अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बहने वाली नियाग्रा नदी पर स्थित है। यह दुनिया के सबसे बड़े और ऊँचे प्रपातों में से एक दर्शनीय जलप्रपात है। यह जलप्रपात न्यूयॉर्क के बफेलो से 27 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम और कनाडा के टोरंटो (ओन्टारियो) से 120 किलोमीटर दक्षिण पूर्व में स्थित है।

घोड़े की नाल के आकार की तरह होने के कारण कनाडा की साइड के प्रपात को 'हॉर्स शू प्रपात' कहा जाता है वहीं अमेरिका वाली साडड पर दिखाई देने वाले को 'अमेरिकन प्रपात' कहते हैं। 'हॉर्स शू प्रपात' यहाँ आने वाले पर्यटकों को ऐसे निरीक्षण कक्ष में ले जाते हैं, जहां गिरते पानी के बीच खड़े होने का अहसास होता है। अमरीका साइड और कनाडा साइड से चलने वाले विशाल बोट पर्यटकों को प्रपातों के मध्य तक दिन भर सैर करवाते रहते हैं। हम लोगों ने भी इस रोमांच का भरपूर मजा लिया।

विश्व के बड़े जलप्रपात अक्सर दो देशों की सीमाओं पर स्थित नदियों के आसपास दोनों ओर से सुंदर दृश्य प्रस्तुत करते हैं।  नियाग्रा फाल जैसे कनाडा और यूएसए की सीमा पर बहने वाली नियाग्रा नदी पर बनता है उसी तरह विक्टोरिया फाल जांबिया और जिम्बाब्वे की सीमा पर बहने वाली जांबेजी नदी पर बनता है। 
विक्टोरिया फॉल्स नियाग्रा फॉल्स से लगभग दोगुना ऊंचा है। जबकि नियाग्रा फॉल्स विक्टोरिया फॉल्स से अधिक चौड़ा है। विक्टोरिया फॉल्स में पानी की मात्रा नियाग्रा फॉल्स की तुलना में कम है, लेकिन इसका स्प्रे अधिक ऊंचा उठता है यद्यपि दोनों झरने अपनी सुंदरता और रोमांचक गतिविधियों के लिए प्रसिद्ध हैं।

नियाग्रा फॉल्स को यद्यपि कनाडा और यूएसए साइड से देखा जा सकता है किंतु हमने केवल कनाडा साइड से लुफ्त उठाया था जबकि ट्रैवलर दाऊद ने जिम्बाब्वे और जांबिया दोनों देशों की ओर से विक्टोरिया प्रपात का आनंद उठाया और जोखिमपूर्ण एडवेंचर गतिविधियों में भागीदारी की। कुछ स्मृति चिन्ह स्थानीय बाजारों से भी खरीदे। वीडियो देखते हुए ऐसा लगता है जैसे उनके साथ हम भी पर्यटन का साक्षात मजा ले रहे हों। 

जिम्बाब्वे साइड से फॉल्स के 75% हिस्से को देखा जा सकता है, जिसमें मुख्य फॉल्स, डेविल्स कैटरैक्ट और हॉर्सशू फॉल्स शामिल हैं। यहाँ के रेनफॉरेस्ट में 16 से अधिक व्यू पॉइंट हैं, जो फॉल्स के शानदार दृश्य प्रदान करते हैं।
जांबिया की तुलना में  जिम्बाब्वे साइड में अधिक सुविधाएं और गतिविधियाँ हैं, जैसे कि हेलिकॉप्टर राइड, माइक्रो लाइट फ्लाइट और सनसेट क्रूज़। यहाँ के आसपास के इलाके में ह्वांग नेशनल पार्क और चोबे नेशनल पार्क जैसे प्रसिद्ध सफारी स्थल हैं। जबकि जांबिया साइड से  फॉल्स के 25% हिस्से को ही देखा जा सकता है, लेकिन यह दृश्य अधिक व्यक्तिगत और रोमांचक होता है। जांबिया साइड में डेविल्स पूल है, जो एक प्राकृतिक पूल है जहाँ आप फॉल्स के किनारे बैठकर तैर भी सकते हैं। यहाँ के आसपास के इलाके में लिविंगस्टोन द्वीप है, जहाँ आप फॉल्स के करीब जा सकते हैं और इसकी सुंदरता का अनुभव कर सकते हैं।
जांबिया साइड में कुछ एडवेंचर गतिविधियाँ भी हैं, जैसे कि व्हाइट वाटर राफ्टिंग और बंजी जंपिंग आदि। 

विश्व प्रसिद्ध नियाग्रा और विक्टोरिया जल प्रपातों के उल्लेख के साथ यदि दक्षिण अमेरिका में अर्जेंटीना और ब्राजील की सीमा पर इगुआजू नदी पर स्थित इगुआजू जलप्रपात तथा दक्षिण अमेरिका के वेनेजुएला के एंजेल जलप्रपात का उल्लेख न किया जाए तो ठीक नहीं होगा। इगुआजू प्रपात 60-82 मीटर (197-269 फीट) ऊंचा है। इगुआजू जलप्रपात दुनिया की सबसे बड़ी जलप्रपात प्रणाली है, जो 275 से अधिक अलग-अलग झरनों से मिलकर बनी है और लगभग 2.7 किलोमीटर में फैली हुई है। इसका सबसे प्रसिद्ध भाग 'डेविल्स थ्रोट' (Garganta del Diablo) U-आकार का एक विशाल झरना है। पर्यटक अर्जेंटीना और ब्राजील दोनों तरफ से इस जलप्रपात का अनुभव कर सकते हैं, हर तरफ से एक अलग और अनूठा दृष्टिकोण मिलता है। अर्जेंटीना की तरफ से ट्रेकिंग और झरने के बिल्कुल करीब जाने का मौका मिलता है, जबकि ब्राजील की तरफ से इसका व्यापक, मनोरम दृश्य मिलता है।  यह दो राष्ट्रीय उद्यानों (अर्जेंटीना में इगुआजु नेशनल पार्क और ब्राजील में इगुआकू नेशनल पार्क) के बीच स्थित है, जो दोनों यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल हैं। यह क्षेत्र अपनी समृद्ध जैव विविधता, दुर्लभ पक्षियों और वन्यजीवों के लिए प्रसिद्ध है, जो इको-टूरिज्म को बढ़ावा देता है।  इसे दुनिया के नए प्राकृतिक अजूबों (New 7 Wonders of Nature) में शामिल किया गया है, जिससे इसकी वैश्विक अपील और पर्यटन में वृद्धि हुई है। 

एंजेल जलप्रपात (Angel Falls) कैनेमा राष्ट्रीय उद्यान, बोलिवर राज्य, वेनेजुएला (दक्षिण अमेरिका) में स्थित है जिसकी ऊंचाई 979 मीटर (3,212 फीट) है और यह यह दुनिया का सबसे ऊंचा निर्बाध (uninterrupted) जलप्रपात है। यह इतनी अधिक ऊंचाई से गिरता है कि पानी नीचे पहुँचने से पहले ही अधिकांशतः धुंध और बारीक बूंदों में बदल जाता है। यह जलप्रपात रियो कारोनी नदी की सहायक नदी, चुरुन नदी पर स्थित है। एंजेल जलप्रपात तक पहुँचना अपने आप में एक रोमांचक साहसिक यात्रा है। पर्यटकों को अक्सर कैनो (छोटी नाव) और लंबी पैदल यात्रा (ट्रेकिंग) का सहारा लेना पड़ता है, जिससे यह प्रकृति प्रेमियों और एडवेंचर चाहने वालों के लिए एक शीर्ष गंतव्य बन जाता है।

 कैनैमा नेशनल पार्क के भीतर स्थित है,  यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल (UNESCO World Heritage Site) है। आस-पास के टेबलटॉप पहाड़ (टेपुई) और घने वर्षावन इसे अविश्वसनीय रूप से सुंदर बनाते हैं।इसकी विशालता और दुर्गमता ने इसे कई फिल्मों और साहित्य के लिए प्रेरणा का स्रोत बनाया है, जिससे इसकी वैश्विक पहचान और बढ़ती गई है।

जहां तक हमारे अपने देश की बात करें तो भारत में भी कई प्रसिद्ध वाटर फॉल्स हैं जो अपनी सुंदरता और विशालता के लिए जाने जाते हैं। यहाँ  के कुछ प्रमुख वाटर फॉल्स हैं: कुंचिकल झरना, जो कर्नाटक के शिमोगा जिले में स्थित है, यह भारत का सबसे ऊंचा झरना है, जिसकी ऊंचाई 455 मीटर है। नोहकालीकाई झरना, जो मेघालय में स्थित, यह झरना 340 मीटर ऊंचा है और अपनी सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है। दूधसागर झरना, गोवा-कर्नाटक सीमा पर स्थित है जो 310 मीटर ऊंचा है और अपनी विशालता के लिए जाना जाता है। जोग फॉल्स, कर्नाटक में स्थित है, यह झरना 253 मीटर ऊंचा है और अपनी सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है। चित्रकूट झरना, छत्तीसगढ़ में स्थित, यह झरना 29 मीटर ऊंचा है और यह भीअपनी सुंदरता के लिए जाना जाता है। धुआंधार झरना, जबलपुर मध्य प्रदेश में स्थित है, यह झरना 10 मीटर ऊंचा है और यह भी अपनी सुंदरता के लिए पर्यटकों को खूब आकर्षित करता है। केरल में स्थित मीनमुट्टी झरना 300 मीटर ऊंचा है और तमिलनाडु में स्थित थलईयार झरना 297 मीटर ऊंचा है।  ये सभी प्राकृतिक सौंदर्य की अद्भुत छटा बिखेरते है और पर्यटकों, ट्रैवलरों का मन मोह लेते हैं।  


दुनिया में स्थित सारे ही छोटे बड़े जलप्रपात अपने आप में भिन्न भिन्न विशेषताएं रखते हैं, हरेक व्यक्ति अपनी पसंद, हैसियत, सामर्थ्य के अनुसार निकट या दूरस्थ इन सुंदर दृश्यों का आनंद और अनुभूति प्राप्त करने की जीवन में कोशिश अवश्य करता है। 

ब्रजेश कानूनगो 


 

Wednesday, 3 December 2025

हजारों वर्षों से संतुलित खड़ी ये चट्टानें

  हजारों वर्षों से संतुलित खड़ी ये चट्टानें

कई बार हम जब पहाड़ों में पर्यटन या ट्रेकिंग के लिए घूमने जाते हैं तो कुछ प्राकृतिक संरचनाओं को देखकर दांतों तले उंगलियां दबाने को मजबूर हो जाते हैं। एक चट्टान के ऊपर बहुत बड़ी दूसरी चट्टान को जरा सी जगह पर टिके देखकर अचंभित हो जाना स्वाभाविक है। एक बड़ी गोलाकार विशाल चट्टान एक बिंदु पर दूसरी चट्टान के ऊपर संतुलित हजारों वर्षों से ज्यों की त्यों खड़ी हुई होती है, लुढ़कर कभी नीचे नहीं फिसलती। ऐसी ही एक संरचना हमने चेन्नई के पास महाबलीपुरम में देखी थी। जिसे लोग कृष्ण की मक्खन गेंद कहते हैं। इसके पीछे कई लोक कथाएं प्रचलित अवश्य हैं लेकिन वास्तविक रूप में भारी भरकम गोलाकार चट्टान  एक अन्य शिला पर न जाने कब से अटकी पड़ी है, जिसके नीचे पर्यटक विभिन्न मुद्राओं में तस्वीरें खिंचवाते हैं।
दरअसल महाबलीपुरम में स्थित कृष्ण की यह बटरबॉल एक अद्भुत चट्टान है, जो लगभग 20 फीट ऊंची और 16 फीट चौड़ी और लगभग 1.2 मीटर ऊंची है। इसका वजन लगभग 250 टन है।
ग्रेनाइड की यह चट्टान लगभग 1200 साल पुरानी होकर महाबलीपुरम की एक छोटी सी पहाड़ी पर स्थित है तथा गुरुत्वाकर्षण को चुनौती देती हुई प्रतीत होती है।

पिछले दिनों हमने ट्रैवल ब्लॉगर दावूद अखुंदजादा के जिम्बाब्वे यात्रा के यूट्यूब वीडियो देखे जिनमें वे वहां के प्रसिद्ध रॉक पार्क की सैर करते हैं। जिम्बाब्वे का रॉक पार्क, जिसे मटोबो नेशनल पार्क के नाम से जाना जाता है, एक अनोखा और आकर्षक स्थल है। यह पार्क अपने विशिष्ट ग्रेनाइट रॉक फॉर्मेशन के लिए प्रसिद्ध है, जो लगभग 2 अरब वर्षों से अधिक पुराने हैं। इन रॉक फॉर्मेशन में से कुछ को बैलेंसिंग रॉक्स कहा जाता है, जो अपने आप में एक अद्भुत दृश्य हैं। यहां की एक रॉक संरचना जिसे मनी रॉक या मोनी रॉक भी कहा जाता है जिसमे तीन चट्टानें बैलेंसिंग बनाए हैं। ये तीन संतुलनकारी पत्थर कभी दुनिया की सबसे ऊँची मुद्राओं में से एक, ज़िम्बाब्वे डॉलर, का मुख्य डिज़ाइन हुआ करते थे। ज़िम्बाब्वे के केंद्रीय बैंक द्वारा जारी किए गए हर नोट पर—1980 में आज़ादी के बाद जारी किए गए एक डॉलर के नोट से लेकर 2008 में मुद्रास्फीति के चरम पर जारी किए गए 100 ट्रिलियन डॉलर के बैंकनोट तक, इन तीन पत्थरों की तस्वीर बनी हुई थीं। बैंकनोटों पर चित्रित पत्थर ज़िम्बाब्वे में कई स्थानों पर पाई जाने वाली इस अनोखी भूवैज्ञानिक विशेषता का सबसे प्रतिष्ठित उदाहरण हैं।
 
माटोपोस अपने आप में देखने लायक है। अंदर जाने के बाद, पर्यटक पाषाण युग की चट्टानों की संरचनाओं के चारों ओर टहल सकते हैं या गाड़ी चला सकते हैं। कुछ बैलेंसिंग संरचनाओं को विशिष्ट सम्मानजनक नाम भी दिए गए हैं। यहां की सभी चट्टानें एक मौन विशालता का एहसास कराती हैं। पार्क के बाहर, कुछ उद्यमी निवासियों ने एपवर्थ में फैले विशाल पत्थरों के बीच अपने घर बना लिए हैं। दावूद कुछ समय इन निवासियों के साथ भी व्यतीत करते हैं और उनकी आर्थिक मदद करके सहृदयता का परिचय देकर हमारा दिल जीत लेते हैं।    

रॉक फॉर्मेशन (Balancing Rock Formations) वास्तव में प्रकृति के अद्भुत चमत्कार हैं! ​ये दुनिया भर में पाए जाते हैं, जिनमें से कुछ तो बहुत प्रसिद्ध है। जैसे- 
बैलेंस्ड रॉक (Balanced Rock), आर्चेस नेशनल पार्क, यूटा, यूएसए। यह दुनिया के सबसे प्रसिद्ध बैलेंसिंग रॉक में से एक है। यह लाल बलुआ पत्थर (red sandstone) से बना है और लगभग 39 मीटर (128 फीट) ऊँचा है। शीर्ष पर स्थित विशाल चट्टान, जिसका अनुमानित वजन 3,600 टन है, एक पतले स्तंभ पर संतुलित है।
लाखों वर्षों के कटाव (Erosion) और अपक्षय (Weathering) ने इसे यह अनोखा आकार दिया है।
​गोल्डन रॉक / क्यैकटियो पगोडा (Golden Rock / Kyaiktiyo Pagoda), म्यांमार (बर्मा)
यह एक धार्मिक और भूवैज्ञानिक चमत्कार है।
एक विशाल ग्रेनाइट पत्थर एक चट्टान के किनारे पर संतुलित है, और ऐसा लगता है कि वह कभी भी लुढ़क सकता है।इस पत्थर को सोने की पत्तियों से ढका गया है, जिससे यह दूर से ही चमकता है। यह बौद्धों के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। 
बैलेंसिंग रॉक (Balancing Rock), डिग्बी, नोवा स्कोटिया, कनाडा। यह अटलांटिक महासागर के तट पर खड़ा एक प्रभावशाली निर्माण है। लगभग 9 मीटर (30 फीट) ऊँचा यह बेसाल्ट स्तंभ ऐसा प्रतीत होता है कि वह अपने निचले आधार के किनारे पर टिका हुआ है। यह अपनी ऊर्ध्वाधर स्थिति (vertical position) के कारण अनोखा है, जबकि अधिकांश बैलेंसिंग रॉक क्षैतिज रूप से (horizontally) संतुलित होते हैं।
भारत में, तमिलनाडु के महाबलीपुरम में कृष्ण की बटर बॉल के अलावा ​मध्य प्रदेश के जबलपुर में मदन महल की पहाड़ियों पर स्थित बैलेंसिंग रॉक विश्व पटल पर भी प्रसिद्ध है। यह कई क्विंटल वजनी पत्थर केवल कुछ इंच के आधार पर संतुलित है। यह ग्रेनाइट चट्टान इतनी संतुलित है कि 1997 में आए 6.2 की तीव्रता के भूकंप के झटकों का भी इस पर कोई असर नहीं पड़ा। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह अपनी गुरुत्वाकर्षण शक्ति (gravitational force) और प्राकृतिक कटाव प्रक्रिया के कारण स्थिर है।

लाखों वर्षों में हवा, पानी, बर्फ और रासायनिक प्रतिक्रियाओं द्वारा चट्टानों के गैर-समान कटाव (non-uniform erosion) के परिणामस्वरूप बनी ये प्राकृतिक संरचनाएं देखकर करोड़ों पर्यटक ही नहीं हम जैसे घर बैठे ट्रैवलॉग्स देखने, पढ़ने वाले दर्शक, पाठक भी रोमांचित हो जाते हैं।

ब्रजेश कानूनगो








 

Wednesday, 26 November 2025

ईरान की भूमिगत प्राचीन कनात जल प्रणाली

 ईरान की भूमिगत प्राचीन कनात जल प्रणाली



हम सब जानते हैं कि ईरान दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है। 

भारत और ईरान के संबंध सदियों पुराने और बहुआयामी हैं, जिनमें गहरा ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध है।यह सहयोग ऊर्जा, व्यापार, कनेक्टिविटी (जैसे चाबहार बंदरगाह), और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे क्षेत्रों में फैला हुआ रहा है। हालाँकि, कुछ राजनीतिक मतभेद और वैश्विक दबावों के कारण संबंधों में चुनौतियाँ भी आई हैं।दोनों देशों में भाषा, कला, वास्तुकला और परंपराओं में कई समानताएं हैं। ईरान भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों में से एक रहा है। भारत ईरान को चावल, चाय, चीनी, और दवाइयाँ जैसे उत्पादों का निर्यात करता है। ईरान से भारत को कच्चा तेल, रसायन, फल और मेवे जैसे उत्पादों का आयात होता है। ईरान में चाबहार बंदरगाह का विकास भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक परियोजना है, जो इसे मध्य एशिया और अफगानिस्तान से जोड़ता है। ईरान कभी भारत के लिए कच्चे तेल के महत्वपूर्ण और विश्वसनीय आपूर्तिकर्ताओं में से एक था।अमेरिका द्वारा ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों ने भारत के तेल आयात को प्रभावित किया है। 
इज़राइल के साथ भारत के बढ़ते संबंधों और कश्मीर जैसे मुद्दों पर ईरान की कुछ प्रतिक्रियाओं ने संबंधों में तनाव पैदा किया है। हाल ही में, भारत के लिए ईरान की वीजा-फ्री एंट्री सुविधा को निलंबित कर दिया गया है। 

इस्लामी क्रांति के बाद ईरान को 1979 में इस्लाम गणराज्य घोषित किया गया था। आज, ईरान एक इस्लामी गणराज्य तथा धर्मतंत्र है।

छठी शताब्दी ईसा पूर्व में साइरस महान ने ईरान में हख़ामनी साम्राज्य की स्थापना की थी जो इतिहास के सबसे बड़े साम्राज्यों में से एक बना। चौथी शताब्दी ईसा पूर्व सिकंदर ने इस साम्राज्य को परास्त कर दिया था। यूनानी राज के बाद इस पर पहलवी तथा सासानी साम्राज्यों का राज रहा। अरब मुसलमानों ने सातवीं शताब्दी ईस्वी में इस क्षेत्र पर विजय प्राप्त की और इसका इस्लामीकरण किया। आगे चल कर यह इस्लामी संस्कृति और शिक्षा का एक प्रमुख और महत्वपूर्ण केंद्र बन गया। इसकी कला, साहित्य, दर्शन और वास्तुकला इस्लामी स्वर्ण युग के दौरान इस्लामी दुनिया में और उससे आगे तक फैलती गई। तुर्क और मंगोल शासन के बाद पंद्रहवीं शताब्दी में ईरान फिर से एकजुट हुआ। उन्नीसवीं सदी तक इसने अपनी काफ़ी ज़मीन खो दी थी। 1953 के तख्तापलट ने शासक मोहम्मद रज़ा पहलवी को और ताकतवर बना दिया जिसने दूरगामी सुधारों की एक श्रृंखला शुरू की। 

तेहरान, इस्फ़हान, तबरेज़, मशहद इत्यादि इसके कुछ प्रमुख शहर हैं। राजधानी तेहरान में देश की 15 प्रतिशत जनता वास करती है। ईरान की अर्थव्यवस्था मुख्यतः तेल और प्राकृतिक गैस निर्यात पर निर्भर है। फ़ारसी यहाँ की मुख्य भाषा है। फ़ारसी लोगों के बाद अज़रबैजानी, कुर्द और लुर यहाँ की सबसे बड़े जातीय समूह हैं।

पिछले दिनों हमने ट्रैवल ब्लॉगर बंशी बिश्नोई के यूट्यूब विडियोज के माध्यम से ईरान की कुछ विशेषताओं को टीवी स्क्रीन पर साक्षात देखने समझने का प्रयास किया।
ईरान एक ऐसा मुल्क है, जहां पर नदियां, तालाब और झरने नहीं हैं, मतलब जमीन के ऊपर पानी की बड़ी किल्लत है। लेकिन जमीन के नीचे पानी की कोई कमी नहीं है। एक जानकारी के मुताबिक आज से करीब तीन हजार साल पहले ही ईरानियों ने जमीन से पानी निकालने की तरकीब खोज निकाली थी, जिसकी मदद से ईरान में कई बगीचे पुराने समय से ही लहलहाते रहे।
जमीन के अंदर से पानी निकालने की पद्धति ईरान के इस्फान और याज्द समेत कई इलाकों में देखने को मिलती हैं।  पानी सप्लाई की इस शानदार इंजीनियरिंग को फारसी भाषा में 'कारिज' कहा जाता हैं, लेकिन इसका अरबी नाम 'कनात' ज्यादा चलन में है। रिपोर्ट के मुताबिक कुछ इलाकों में पहाड़ों की तलहटी से पानी निकालने की पद्धति आज भी चलन में है। साल 2016 में यूनेस्को ने इसे वर्ल्ड हेरिटेज साइट में शामिल कर लिया है।

बताया जाता है कि कनात बनाने के लिए पहले ऐसे पहाड़ों की पहचान की जाती थी, जहां जमीन के अंदर गाद वाली मिट्टी हो। फिर ऐसी जगहों पर खुदाई करके बेहतरीन इंजीनियरिंग के तहत पानी की निकासी की जाती थी और दूर तक इस पानी को ले जाया जाता था। गहरी खुदाई के दौरान ऑक्सीजन पहुंचाने के लिए भी रास्ते बनाए जाते थे। इसी पद्धति से ठंडी के महीनों में बर्फ भी जमाने का काम किया जाता था, जिससे गर्मी के महीनों में इसका इस्तेमाल किया जा सके. साथ ही कनात के पास वातानुकूलित घर भी बनाए जाते थे, जो गर्मी के महीनों में काफी ठंडा रहते थे।

ट्रैवलर बंशी बिश्नोई ने न सिर्फ ईरान के याज्द शहर में स्थित इन जल संरचनाओं के धरातल पर स्थित बस्तियों,घरों और वास्तुशिल्प से परिचित कराया बल्कि जमीन के तीस, चालीस मीटर नीचे बनाई गई नहरों,जल धाराओं, कूपों, ऑक्सीजन खिड़कियों, वातावरण को ठंडा बनाए रखने और अन्य तकनीकों को भी बहुत सहजता से वीडियो में दिखाया, समझाया। इन ऐतिहासिक संरचनाओं को देखने के लिए अनेक पर्यटकों के अलावा स्थानीय लोग भी बड़ी संख्या में यहां आते हैं। कई तंग सुरंगों में तो बहुत कठिनाई से प्रवेश करना पड़ता है।

बंशी बिश्नोई के ट्रैवलॉग वीडियो देखते हुए हमें बुरहानपुर मध्यप्रदेश की प्राचीन भूमिगत जल प्रणाली का स्मरण सहज ही हो जाता है, जोकि आज भी हमारी धरोहर है और प्रेरित करती है। यह प्रणाली कनात प्रणाली का ही एक उदाहरण है, जिसमें भूमिगत सुरंगों के माध्यम से पानी को लंबी दूरी तक ले जाया जाता है। इसे खूनी भंडारा या कुंडी भंडारा के रूप में जाना जाता है, यह प्रणाली भूमिगत सुरंगों और दीर्घाओं का उपयोग करके सतपुड़ा की पहाड़ियों से भूमिगत झरनों से पानी एकत्र करती है और गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध लगभग 80 फीट की गहराई से बहने वाले पानी की आपूर्ति करती है। इसका निर्माण 1615 ईस्वी के आसपास फारसी भू-वैज्ञानिक की मदद से मुगल सूबेदार अब्दुल रहीम खानखाना के संरक्षण में किया गया था। इस प्रणाली में पानी 101 कुंडलियों में घूमता है और माना जाता है कि, यहां का पानी शुद्धता और स्वच्छता के मामले में मिनरल वाटर से कई गुना बेहतर है। इस भूमिगत जल प्रणाली को देखने बड़ी संख्या में पर्यटक यहां भी यहां आते हैं। खास बात ये है कि, कई लोग तो यहां से पानी भरकर अपने साथ भी ले जाते हैं। 

ईरान की कनात भूमिगत जल प्रणाली  वहीं जाकर बहुत अच्छे से देखी जा सकती है किंतु ट्रैवलॉग और ट्रैवल वीडियो के माध्यम से हमने इसका थोड़ा  अनुभव घर बैठे बंशी बिश्नोई के जरिए ले लिया, आभार है इन ट्यूबर ब्लॉगरों का। जहां तक बुरहानपुर की प्रणाली के दीदार की बात है, वहां जाने का कार्यक्रम तो कभी भी बनाया जा सकता है।

ब्रजेश कानूनगो  

Thursday, 20 November 2025

सूर्य के सबसे निकट पर्वत शिखर चिंबोराजो

 सूर्य के सबसे निकट पर्वत शिखर चिंबोराजो



इक्वेडोर दक्षिण अमेरिका महाद्वीप में स्थित एक देश है, जो अपनी विविधता और अद्वितीय प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जाना जाता है। 

इक्वेडोर की राजधानी क्विटो है, जो लैटिन अमेरिका के सबसे अच्छी तरह से संरक्षित औपनिवेशिक केंद्रों में से एक है।

देश की आधिकारिक भाषा स्पेनिश है, लेकिन कई लोग क्वेशुआ और अन्य अमेरिंडियन भाषाएं भी बोलते हैं।इक्वेडोर की मुद्रा अमेरिकी डॉलर है।

यह देश विश्व के शीर्ष केला निर्यातक देशों में से एक है, जो वैश्विक केला निर्यात का 25% से अधिक है।


इस देश की बड़ी खूबी यह है कि यह देश पृथ्वी के दो गोलार्ध के ठीक बीच की रेखा पर स्थित है, जिस रेखा को हम "इक्वेटर" यानी भूमध्यरेखा के नाम से जानते हैं। इसी विशेषता के कारण यहां स्थित पर्वत चिंबोराजो के शिखर का अलग महत्व है।

चिंबोराजो एक सक्रिय ज्वालामुखी है, जो अपनी अद्वितीय भौगोलिक स्थिति के कारण पृथ्वी के केंद्र से सबसे दूर और सूर्य के सबसे निकट है। इसकी ऊंचाई 6,263 मीटर है, जो इसे एंडीज पर्वतमाला की सबसे ऊंची चोटी बनाती है । यद्यपि हिमालय पर्वत की एवरेस्ट सहित अनेक चोटियां समुद्र तल से 8000 मीटर से भी अधिक ऊंची हैं लेकिन भूमध्य रेखा पर होने तथा पृथ्वी के केंद्र बिंदु से सबसे दूर होने के कारण चिंबोराजो सूर्य से सबसे करीब स्थित होने का खिताब अर्जित करता है। कुछ वैज्ञानिक तो अभी भी दावा करते हैं कि इसकी असली ऊंचाई अब तक नापी नहीं जा सकी है। चिंबोराजो की जलवायु ठंडी और शुष्क है, जिसमें तापमान -20°C से 10°C तक रहता है। यहां वनस्पति और जीव-जंतु में देवदार, चीड़ के पेड़ और विभिन्न प्रकार के जंगली जीव पाए जाते हैं,  इक्वाडोर के वन्यजीवों में एंडियन चश्माधारी भालू, प्यूमा, ओसेलॉट, जगुआर, टैपिर, विभिन्न प्रकार के बंदर, स्लॉथ और गुलाबी नदी डॉल्फ़िन शामिल हैं। यहां की वनस्पति में एंडीज पर्वतों के बादल वन, अमेज़ॅन वर्षावन के कपोक और सीबा जैसे ऊंचे पेड़, ऑर्किड और फ़र्न जैसे पौधे शामिल हैं। यह एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है, जहां लोग ट्रेकिंग, स्कीइंग और अन्य एडवेंचर गतिविधियों के लिए भी आते हैं ।


पिछले दिनों हमने नोमेडिक टूर चैनल के हमारे प्रिय ट्रैवल ब्लॉगर तौरवासु के इक्वेडोर यात्रा के कई यूट्यूब पर वीडियो देखे। खासतौर से चिंबोराजा पर्वत के शिखर की ओर जोखिम पूर्ण उनके पैदल भ्रमण ने हमें हतप्रभ कर दिया। वीडियो देखते हुए जो कुछ रोमांच का आभासी अनुभव किया वह सचमुच रोंगटे खड़े कर देता है। कठिन यात्रा करते तौरवशु के पांव कांप रहे थे, चेहरा रक्ताभ हो रहा था, सांसे लड़खड़ा रहीं थी, नाक और मुंह से रक्त सा रिसता नजर आ रहा था। एक पैर को चट्टान पर रखते तो उसमें कंपन को कैमरे पर शूट भी कर रहे थे। शरीर खासतौर पर खुले हिस्सों पर तेज और प्रभावी स्किन क्रीम लगाकर अधिक शक्तिशाली सनग्लासेस लगाने के बावजूद उनकी परेशानियों को महसूस करना सचमुच झकझोर रहा था।  आगे बढ़ने पर बीच में कई कब्रगाह आए जिनमें सैकड़ों  पर्वतारोहियों की कब्रें निश्चित ही पर्यटकों को भयभीत कर रही थीं।


इसके अलावा इक्वेडोर में घूमने के लिए कई आकर्षक स्थल हैं, जिनमें से गैलापागोस द्वीप समूह, क्विटो का ऐतिहासिक केंद्र, और कुएंका शहर प्रमुख हैं।

गैलापागोस द्वीप समूह एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है, जो अपनी अनोखी जैव विविधता और ज्वालामुखीय परिदृश्य के लिए प्रसिद्ध है।

इक्वेडोर का अमेज़न वर्षावन पृथ्वी के सबसे जैव विविध क्षेत्रों में से एक है, जिसमें कुयाबेनो वन्यजीव रिजर्व और यासुनी राष्ट्रीय उद्यान जैसे संरक्षित क्षेत्र हैं।  

ब्लॉगर तौरवशु ने अपने कैमरे से उन जोखिमपूर्ण लेकिन खूबसूरत दृश्यों को भारी थकान और संघर्ष करते हुए दर्शकों के लिए खूबसूरती से प्रस्तुत कर एक नए अनुभव का अहसास करा दिया। 


ब्रजेश कानूनगो

Sunday, 1 June 2025

हिरोशिमा के विनाश और विकास की करुण दास्तान

हिरोशिमा के विनाश और विकास की करुण दास्तान 


पिछले दिनों हुए घटनाक्रम ने लोगों का ध्यान परमाणु ऊर्जा के विनाशकारी खतरों की ओर आकर्षित किया है। यद्यपि जब भी इस ऊर्जा के साधनों के विकास की बात होती है तब सदैव शांतिपूर्ण उपयोग का आश्वासन और संकल्प की सफेद पताका फहराई जाने लगती है। इसके बावजूद विश्व में संयुक्त राज्य अमेरिका,रूस, चीन, फ्रांस, यूनाइटेड किंगडम, भारत, पाकिस्तान,इसराइल और उत्तर कोरिया नौ ऐसे देश हैं जिनके पास परमाणु अस्त्र हैं।  परमाणु शक्तियों के रूप में इनका दबदबा दुनिया में बना हुआ है। इन देशों के पास लगभग बारह हजार परमाणु हथियार उपलब्ध हैं। 
जब जब विश्व में युद्ध शुरू होता है या उसकी  संभावनाएं पैदा होती हैं, या तब तब प्रबुद्ध समाज की सांसे रुकने लगती हैं। कहीं कोई परमाणु शक्ति संपन्न देश जल्दबाजी में परमाणु हथियारों का उपयोग करके तबाही को आमंत्रण ना देदे।  युद्ध के विचार से ही मानव जाति और सभ्यता के विनाश की आशंका से घबराहट का वातावरण बनने लगता है।  

आणविक प्रदूषण अन्य प्रदूषणों से बहुत अलग होता है। धूल,धुँआ ,कचरा आदि दिखाई देते हैं, इनके प्रभाव के लक्षण हमें महसूस होते हैं लेकिन परमाणु विकिरण निराकार है इसे महसूस नहीं किया जा सकता। यह प्रवेश करता है और युगों तक बना रहता है। मानव जींस में पहुँचकर आनुवँशिक रोगों के रूप में परिवर्तित हो कर अनेक पी़ढियों की त्रासदी बन जाता है। लगभग अमरता का वरदान प्राप्त परमाणु कचरा मनुष्य और अपने ही निर्माता को नष्ट करने पर उतारू हो जाता है। जीवन से जुड़ी हरेक वस्तु को विकिरण प्रभावित करके मुश्किलें पैदा कर देता है। कचरे का प्रबंधन इतना कठिन होता है कि स्टील के कनटेनरों में बंद कर सीमेंटीकरण करके जमीन में गाड़ देने के बावजूद विकिरण होना जारी रहता है। 

परमाणु बमों के व्यापक दुष्प्रभाव और विध्वंस के परिणाम अत्यधिक विनाशकारी और दीर्घकालिक होते हैं। हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बमबारी इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। विश्वयुद्ध के दौरान 6 अगस्त 1945 को जापान के हिरोशिमा और 9 अगस्त 1945 को नागासाकी पर परमाणु बम गिराए गए थे। इन हमलों में हजारों लोग मारे गए थे और शहरों का बड़ा हिस्सा नष्ट हो गए थे।  बचे हुए लोगों में विकिरण बीमारी, कैंसर और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं देखी गईं। विकिरण के कारण पर्यावरण और जीव-जन्तुओं पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा।  परमाणु बमों के उपयोग ने वैश्विक शांति और सुरक्षा के लिए खतरा पैदा किया तो परमाणु निरस्त्रीकरण की आवश्यकता पर भी समय समय पर बात होती रही। 
 
यद्यपि हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बमों के गिराए जाने के बाद युद्ध के दौरान इतना बड़ा परमाणु हमला तो नहीं हुआ किंतु कुछ दुर्घटनाएं अनेक कारणों से विश्व में अवश्य होती रहीं जिन्होंने परमाणु ऊर्जा के विवेकशील और सावधानीपूर्ण उपयोग को प्राथमिकता में लाने को बाध्य किया। एक बड़ी दुर्घटना चेर्नोबिल परमाणु दुर्घटना सोवियत संघ के युक्रेनी सोवियत समाजवादी संघ के उत्तरी नगर प्रीप्यत के पास 26 अप्रैल 1986 को चेर्नोबिल परमाणु ऊर्जा संयंत्र के चौथे रिएक्टर में हुई थी। दूसरी है जापान की फूकूशीमा डाईची परमाणु दुर्घटना। 
फुकुशिमा के ओकुमा में फुकुशिमा दाइची परमाणु ऊर्जा संयंत्र में हुई परमाणु दुर्घटना भी एक बड़ी दुर्घटना थी, जो 11 मार्च 2011 को शुरू हुई थी। दुर्घटना का कारण 2011 का तोहोकू भूकंप और सुनामी था, जिसके परिणामस्वरूप विद्युत ग्रिड फेल हो गया और बिजली संयंत्र के लगभग सभी बैकअप ऊर्जा स्रोत क्षतिग्रस्त हो गए । शटडाउन के बाद रिएक्टरों को पर्याप्त रूप से ठंडा करने में असमर्थता ने नियंत्रण को प्रभावित किया और इसके परिणामस्वरूप आसपास के वातावरण में रेडियोधर्मी संदूषक फैल गए थे। चाहे परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में हुई दुर्घटनाएं हों या  परमाणु बमों का युद्ध में प्रयोग इनके दुष्प्रभाव और विध्वंस के परिणाम अत्यधिक विनाशकारी होते हैं। हिरोशिमा और नागासाकी की घटनाएं हमें परमाणु हथियारों के उपयोग के खतरों की याद दिलाती हैं और शांति और निरस्त्रीकरण की दिशा में काम करने की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं।

हिरोशिमा में हुए विध्वंस की घटना के लगभग 80 वर्ष बाद हमने हमारे प्रिय ट्रैवलर ब्लॉगर बंसी बिश्नोई के जापान यात्रा के यूट्यूब वीडियोस के माध्यम से आज के हिरोशिमा शहर और घटनास्थल का अवलोकन किया। हमने देखा तो एक तरफ मन करुणा से भर गया तो दूसरी तरफ जापानी लोगों की जीवटता और उनके हौसलों के कायल भी हो गए। हिरोशिमा आज जापान का एक बड़ा नगर है, जिसकी आबादी लगभग 11,96,274 है। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान परमाणु बम हमले से तबाह होने के बाद, हिरोशिमा ने पुनर्निर्माण और विकास की लंबी यात्रा तय की है। आज यह शहर शांति और मानवता के प्रतीक के रूप में जाना जाता है।

ट्रैवलर बंसी बिश्नोई वर्तमान हिरोशिमा शहर का आभासी टूर हमें बड़ी जीवंतता से देते हैं। खास स्थलों की सैर कराते हुए भावुकता के साथ कुछ जानकारियां भी देते हैं।  हिरोशिमा पीस मेमोरियल पार्क शहर के केंद्र में स्थित है, जो परमाणु बम हमले के पीड़ितों की याद में बनाया गया है। पार्क में कई स्मारक और मूर्तियां हैं, एक सारस की मूर्ति है,जो शांति और आशा का प्रतीक है। शहर में कई संग्रहालय और स्मारक हैं जो परमाणु बम हमले के इतिहास और इसके प्रभावों को प्रदर्शित करते हैं। 
खासतौर से एक संग्रहालय हिरोशिमा पीस मेमोरियल पार्क में स्थित है और परमाणु बम हमले के इतिहास और इसके प्रभावों को प्रदर्शित करता है। संग्रहालय में कई प्रदर्शन हैं, यहां एक क्षत विक्षत गेनबाकु डोम दिखाई देता है, जो परमाणु बम हमले के बाद भी खड़ा रहा था। मलबे से निकले लोगों के कपड़े, जूते, उपकरण,उनके अवशेष देखकर मन रो पड़ता है। दो बच्चे साइकिल चलाते हुए शिकार हो गए थे, अब जंग लगी साइकिल के पास उनके बुत रखे हैं। किसी बच्चे का टिफिन खुला पड़ा है जिसमें रखा भोजन अब फफूंद बन गया है, कहीं स्कूल बैग के साथ कोई किताब है तो कहीं एक बंद पड़ी हाथ घड़ी विध्वंस का ठीक ठीक समय इतिहास में दर्ज कर चुकी है। ट्रैवलर का बोलते बोलते गला भर आता है, वह बाहर निकल कर अपनी आँखें पोंछता हुआ संग्रहालय से निकलकर बाहर आ जाता है। बाहर अनेक पर्यटक उदास हैं, आँखें मलते दिखाई देते हैं। हमारे स्मार्ट टीवी का स्क्रीन धुंधलाने लगता है। हमारी आंखों में आंसू की बूंदे हैं, गला रूंध गया है।  

संग्रहालय का उद्देश्य लोगों को परमाणु बम हमले के भयानक परिणामों के बारे में जागरूक करना और शांति और मानवता के महत्व को बढ़ावा देना है। क्या हम इस महत्व को पूरी तरह समझ पाए हैं? यह सवाल हमारे सामने अब भी खड़ा है, जब दुनिया में कई युद्ध चल रहे हैं, कुछ स्थगित दिखाई देते हैं, कहीं कहीं शब्द युद्ध जारी हैं, उम्मीद करें ये अस्त्र शस्त्र धारित युद्धों में नहीं बदल सकेंगे। सचमुच जापान के हिरोशिमा शहर के पुनरुद्धार की कहानी एक प्रेरणादायक उदाहरण है कि कैसे एक शहर विनाश के बाद पुनर्निर्माण और विकास का लक्ष्य हासिल कर सकता है और शांति और मानवता के प्रतीक के रूप में उभर सकता है।

ब्रजेश कानूनगो 

Monday, 26 May 2025

सफेद महाद्वीप की रोमांचक सैर

सफेद महाद्वीप की रोमांचक सैर

अंटार्कटिका, जिसे 'सफेद महाद्वीप' भी कहा जाता है, पृथ्वी का पाँचवाँ सबसे बड़ा महाद्वीप है, जो दक्षिणी ध्रुव के पास स्थित है।  यह दुनिया का सबसे ठंडा, शुष्क और हवादार महाद्वीप है, जो दक्षिणी महासागर से घिरा हुआ है।  अंटार्कटिका में गर्मियों के दौरान, सूर्य कभी नहीं डूबता है, और सर्दियों के दौरान, सूर्य कभी नहीं उगता है।अंटार्कटिका में कई झीलें हैं, जिनमें से कुछ बर्फ के नीचे भी हैं।  अंटार्कटिका का लगभग 98% हिस्सा मोटी बर्फ की चादर से ढका हुआ है, जिसमें पृथ्वी के ताजे पानी का लगभग 75% हिस्सा मौजूद है। यहां औसत वार्षिक वर्षा लगभग 2 इंच से भी कम होती है, दरअसल यह एक बर्फीला रेगिस्तान है।  अंटार्कटिका पृथ्वी पर सबसे ऊंचा महाद्वीप है, जिसकी औसत ऊंचाई 8,200 फीट (2500 मीटर) है।  यहां विशिष्ट वन्यजीव प्रजातियां पाई जाती हैं, जैसे पेंगुइन, सील और व्हेल। 

अंटार्कटिका के निर्माण की भी एक जटिल और लंबी प्रक्रिया है, जो लगभग 4.5 अरब वर्ष पूर्व से शुरू हुई थी। पृथ्वी पर लगभग 550 मिलियन वर्ष पूर्व, गोंडवाना नामक एक महाद्वीप का निर्माण हुआ था, जिसमें अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, और अंटार्कटिका आदि का भूभाग शामिल था।
बाद में लगभग 180 मिलियन वर्ष पूर्व, गोंडवाना का टूटना शुरू हुआ, और अंटार्कटिका धीरे-धीरे खिसकता हुआ सुदूर दक्षिण में पहुँच गया। लगभग 25 मिलियन वर्ष पूर्व, अंटार्कटिका पूरी तरह से अन्य महाद्वीपों से अलग हो गया और अपनी वर्तमान स्थिति में पहुँच गया। 34 मिलियन वर्ष पूर्व, अंटार्कटिका में बर्फ का निर्माण शुरू हुआ, जिसने धीरे-धीरे पूरे द्वीप को ढक लिया। आज, अंटार्कटिका का लगभग 98% भाग बर्फ से ढका हुआ है।

अंटार्कटिका महाद्वीप इस पृथ्वी पर एक मात्र ऐसी जगह है जहां शायद ही कोई भी मनुष्य स्थाई रूप से निवास करता हो। यहां जो भी व्यक्ति पहुंचता है वह या तो किसी अनुसंधान के उद्देश्य या फिर अब जब दुनिया के इस बिरले हिस्से पर पर्यटकों की रुचि जागृत हो गई है, तब बड़ी राशि खर्च कर किन्हीं टूर ऑपरेटरों के माध्यम से कुछ दिनों में यहां के नजारों को देखता है। यहां के हिमशैलों और जीवों को बहुत नजदीक से देखकर रोमांचित होता है। अंटार्कटिका की ये पर्यटन यात्राएँ मुख्य रूप से दर्शनीय स्थलों के आनंद और वन्यजीवों के अवलोकन के साथ साथ मनोरंजक एवं ऐश्वर्यपूर्ण व सुकूनभरे सुविधाजनक पर्यटन पर केंद्रित होती हैं। 

इस सुदूर महाद्वीप की यात्रा, जिसने 1966 में पहले आधुनिक पर्यटक अभियान के बाद लोकप्रियता हासिल की, आमतौर पर दिसंबर से फरवरी तक दक्षिणी गोलार्ध के गर्मियों के महीनों के दौरान होती है। पर्यटक कई तरह की गतिविधियों में शामिल हो सकते हैं, जैसे कि कयाकिंग, स्कीइंग और कैंपिंग, जिनका नेतृत्व अक्सर अनुभवी गाइड करते हैं, जिनमें पूर्व शोधकर्ता भी शामिल हैं। अंतर्राष्ट्रीय अंटार्कटिका टूर ऑपरेटर्स एसोसिएशन (IAATO) द्वारा प्रबंधित नियम लागू हैं, जो जहाजों के आकार और लोकप्रिय स्थलों पर आगंतुकों की संख्या को सीमित करके जिम्मेदार पर्यटन प्रथाओं को सुनिश्चित करते हैं।

हाल के वर्षों में, अंटार्कटिक पर्यटन में रुचि बढ़ी है, 2022-2023 सीज़न में 105,000 से अधिक आगंतुकों ने रिकॉर्ड दौरा किया है, जो साहसिक और पारिस्थितिक पर्यटन की ओर बढ़ते रुझान को दर्शाता है। ट्रैवल ब्लॉगर नवांकुर चौधरी ( डॉक्टर यात्री) के ट्रैवल वीडियो श्रृंखला के माध्यम से हमने उनके साक्षात अनुभवों को अपने को आभासी रूप से महसूस करने की कोशिश की है। 

नवांकुर ने अपनी यह यात्रा अर्जेंटीना के उशआइया पोर्ट से वर्ल्ड ट्रैवल कंपनी के बड़े क्रूज से की। इस संपूर्ण यात्रा के लिए उन्हें कुल साढ़े आठ लाख रुपयों का भुगतान करना पड़ा। हालांकि इस में कुछ खास गतिविधियों के अलावा सारी व्यवस्थाएं और पर्यटन गाइड व साधन शामिल थे। इस बड़े जहाज में सात मंजिलें थी जिनमें रेस्टोरेंट, पुस्तकालय, इनडोर गेम्स, स्वीमिंगपूल , जिम,बार, ऑडिटोरियम आदि के अलावा छत पर एक हेलीपेड भी स्थित था। कमरों में सभी आधुनिक सुविधाओं के साथ एक खुली गैलरी भी थी जहां बैठकर समूची यात्रा का आनंद उठाया जा सकता था। नवांकुर के साथ एक अन्य सिख ट्रैवलर भी थे जो पंजाबी में वीडियो बनाते हैं। 

अंटार्कटिका तक पहुंचने के लिए क्रू यात्रा का भी बड़ा रोमांच है। जहाज के भीतर का अनुभव जहां आधुनिक विकसित जीवन शैली से रूबरू होने का मौका देता है, वहीं प्रबंधन द्वारा पल पल दी जाने वाली सूचनाएं, नियमित ऑडिटोरियम में बैठकों के जरिए यात्रा की तैयारियों, सावधानियों, क्या करना है, क्या नहीं करना है, निर्देशित करना बड़ा दिलचस्प और जरूरी हिस्सा होता है। जहाज में यात्रा कर रहे लगभग 200 पर्यटकों को छोटे छोटे समूहों में बाटकर उन्हें एक साथ अन्य गतिविधियों से जोड़ना, छोटी नावों से स्थलों पर ले जाकर प्रकृति से परिचित कराना, जल जीवों और थल जीवों से साक्षात्कार कराना। यह सब देखना बहुत रोमांचित करता है। सबसे ध्यान रखने वाली बात यह कि पर्यटक के कपड़ों से लेकर उनके शरीर को वेक्यूम क्लीन और सेनेटाइज करना ताकि किसी भी प्रकार के संक्रमण से खुद को और अंटार्कटिका के पर्यावरण को नुकसान न हो सके। 

जहाज याने क्रूज प्रबंधन प्रतिदिन की कार्यसूची प्रत्येक समूह को देता है, दूरबीन, जैकेट आदि भी दिए जाते हैं। प्रतिदिन सेफ्टी ड्रिल सुरक्षा अभ्यास करवाया जाता है। समुद्र में ड्रेक पैसेज जहां समुद्रों के मिलन से खरनाक गतिविधियाँ भारी तबाही का खतरा उत्पन्न करते हैं, ऐसी स्थितियों में यात्री को सचेतक उपाय बताए जाते हैं। जहाज जमे हुए समुद्र की बर्फ काटकर अपना रास्ता बनाते हुए हिमशैलों और धरती के निकट तक पहुंचता है। समूह में बांटे गए पर्यटकों को छोटी छोटी रबर की बोटों में बैठाकर किनारे पर पहुंचाया जाता है। कभी पेंग्विन समूह तो कभी  सील,व्हेल जैसी विभिन्न प्रजातियों के वन्यजीव साक्षात देखे जाते हैं। अंटार्कटिका के बर्फीले परिदृश्य, ग्लेशियर, और हिमशिखर, टूटते , बनते नए हिम खंडों को देखना बहुत ही मनोरम और भव्य होता है। अदभुत होती है  यह सुंदरता। अंटार्कटिका के वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र  भी पर्यटकों को विज्ञान और अनुसंधान के बारे में जानने का अवसर प्रदान करते हैं। पर्यटन का यह अनुभव मूल पर्यावरण और दुर्लभ वन्य जीवन के लुभावने दृश्य प्रस्तुत करता है।  

अंटार्कटिका पर किसी भी देश का स्वामित्व नहीं है, बल्कि यह अंटार्कटिक संधि के तहत एक अंतर्राष्ट्रीय समझौते द्वारा शासित है, जो अंटार्कटिका को केवल शांति और वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए उपयोग करने का प्रावधान करता है।  अंटार्कटिका वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है, और विभिन्न देशों के कई शोध स्टेशन यहां स्थित हैं। भारत के भी दो सक्रिय अनुसंधान केंद्र मैत्री और भारती यहां स्थापित हैं। 

बढ़ती पर्यटन गतिविधियों से अंटार्कटिका में संभावित मिट्टी के कटाव और प्रदूषण जैसी पर्यावरणीय चिंताओं को भी बढ़ाता है। टूर ऑपरेटर पर्यटकों को जलवायु परिवर्तन के पर्यावरणीय प्रभावों के बारे में शिक्षित करने पर हर संभव जोर देते हैं, जिसका उद्देश्य इस नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण को बढ़ावा देना है। जैसे-जैसे उद्योग का विस्तार जारी है, पर्यटन और संरक्षण के बीच संतुलन बनाना अंटार्कटिका के भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती बनी हुई है। आज के दौर में पर्यटन प्रसार और पर्यावरण संरक्षण के उपाय संभवतः एक ही क्रूज पर सवार हैं। अंततः दुनिया की यह रीत भी है। सब साथ साथ चलता रहता है। अंटार्कटिका का पर्यावरण बढ़ते पर्यटन के बावजूद अपने मूल स्वरूप में बना रहेगा ऐसे उपाय हम अवश्य करेंगे, इसी उम्मीद तो की ही जा सकती है। 

ब्रजेश कानूनगो 

Saturday, 24 May 2025

अद्वितीय इंजीनियरिंग की मिसाल पनामा नहर

अद्वितीय इंजीनियरिंग की मिसाल पनामा नहर

 
अक्सर मन में विचार आता रहता है कि मानव जाति के हौसलों और इरादों ने जैसे समूचे ब्रह्मांड पर विजय का संकल्प ले लिया हो। क्या कुछ नहीं पा लिया है मनुष्य ने।  यहां तक कि जीवों के क्लोन और मनुष्य के कृत्रिम अंगों तक को अपने बलबूते बना लेने के प्रयोग सफल हुए हैं। नदियों को आपस में जोड़ देने और विशाल महाद्वीपों के विशाल भूभाग को खोदकर दो समुद्रों तक को मिला देने में अपनी मेहनत और हुनर से सफलता पाई है। विज्ञान और तकनीक ने इतनी प्रगति कर ली है कि चांद सितारों तक पहुंचने की बात तो अब बिल्कुल अविश्वसनीय नहीं लगती, बल्कि अब तो वहां हम कॉलोनियां बनाने के उपाय सोचने लगे हैं।
 मनुष्य के अदम्य साहस और संघर्ष से जो दुनिया के लोगों ने पाया है उनमें से बहुत सी उपलब्धियां हमें चमत्कृत कर देती हैं। उनमें से एक है मानव निर्मित पनामा नहर और उसका मेकेनिज्म। 
उत्तरी अमेरिका और दक्षिणी अमेरिका के मिलन भूभाग को चीरकर नहर बना देना और दुनिया के जलमार्ग परिवहन को सुगम बना देना, सचमुच जानने समझने का विषय है। 

हमारे बहुत से प्रिय घुमक्कड़ विश्व पर्यटन करते हुए पनामा देश और पनामा नहर की यात्रा कर चुके हैं। परमवीर सिंह (पैसेंजर परमवीर) और नवांकुर चौधरी (डॉक्टर यात्री) के पनामा ट्रैवल वीडियोस हमने देखे। इन वीडियो को देखते हुए इस महत्वपूर्ण नहर को महसूस करने और उसकी प्रक्रिया के प्रति जिज्ञासा जब बहुत बढ़ गई तो संबंधित जानकारी जुटाते हुए चकित होना स्वाभाविक था। 

पनामा नहर दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण जलमार्गों में से एक है, जो अटलांटिक महासागर और प्रशांत महासागर को जोड़ती है। यह नहर पनामा देश में स्थित है और इसका निर्माण 20वीं शताब्दी की शुरुआत में हुआ था। यद्यपि पनामा नहर से पहले कई प्रमुख जलमार्ग नहरें बनाई गई थीं, जिनमें से प्रमुख हैं:, बीजिंग-हांग्जो ग्रैंड कैनाल जो विश्व की सबसे लंबी मानव निर्मित नहर है, जिसकी लंबाई 1,776 किमी है। इसका निर्माण 5 वीं सदी ईसा पूर्व में हुआ था और यह चीन में स्थित है। सूएज नहर मिस्र में स्थित एक महत्वपूर्ण नहर है, जो भूमध्य सागर को लाल सागर से जोड़ती है। इसका निर्माण 1869 में पूरा हुआ था। इन नहरों के निर्माण के अनुभवों से निश्चित ही पनामा नहर निर्माण को आगे बढ़ाने का साहस भी मिला होगा हमारे इंजीनियरों को। 

पनामा नहर के निर्माण से पहले, पोत परिवहन में कई दिक्कतें आती थीं। अटलांटिक महासागर से प्रशांत महासागर तक जाने के लिए जहाजों को दक्षिण अमेरिका के दक्षिणी सिरे के चारों ओर जाना पड़ता था, जिसे केप हॉर्न कहा जाता है। यह रास्ता बहुत लंबा और खतरनाक था। इस लंबे रास्ते के कारण, जहाजों को अधिक समय और ईंधन की आवश्यकता होती थी, जिससे परिवहन की लागत बढ़ जाती थी। केप हॉर्न के आसपास का समुद्र बहुत अशांत और खतरनाक था, जिससे जहाजों को दुर्घटना का खतरा रहता था। पनामा नहर बन जाने से अमेरिका के पूर्वी और पश्चिमी तटों के बीच की दूरी इस नहर से होकर गुजरने पर तकरीबन 8000 मील (12,875 कि॰मी॰) घट जाती है क्योंकि इसके न होने की स्थिति में जलपोतों को दक्षिण अमेरिका के हॉर्न अंतरीप से होकर चक्कर लगाते हुए जाना पड़ता था। पनामा नहर को पार करने में जलयानों को अब 8 घंटे का समय लगता है। नहर के माध्यम से जहाजों की आवाजाही से समय और ईंधन की बचत होती है, जिससे परिवहन की लागत कम हो जाती है। जहाजों की आवाजाही अधिक सुरक्षित हुई है, क्योंकि यह रास्ता खतरनाक समुद्रों की हलचलों से भी बचाता है। इसके साथ ही जहाजों की जल्दी आवाजाही से व्यापार और वाणिज्य में वृद्धि हुई है, क्योंकि यह माध्यम दुनिया के विभिन्न हिस्सों के बीच कम समय में सीधा संपर्क प्रदान करता है।

दरअसल पनामा नहर का विचार 16वीं शताब्दी में आया था, जब स्पेनिश खोजकर्ताओं ने इस क्षेत्र का अन्वेषण किया था। हालांकि, नहर का निर्माण 1881 में फ्रांस ने शुरू भी किया किंतु परियोजना कई कारणों से असफल हो गई, जिनमें हजारों मजदूरों की मलेरिया जैसी बीमारी से मर जाना प्रमुख था, उस वक्त मच्छरों से होने वाली इस भयानक बीमारी की पहचान और इलाज खोजा नहीं जा सका था। बाद में अमेरिका ने 1904 में इस परियोजना को अपने हाथ में लिया और 1914 में नहर का निर्माण पूरा किया।

पनामा नहर का निर्माण एक जटिल और चुनौतीपूर्ण कार्य था। नहर की लंबाई लगभग 80 किमी है और इसमें तीन जोड़ी तालाब या झीलें हैं जो जहाजों को एक महासागर से दूसरे में जाने में मदद करती हैं। नहर के निर्माण में लगभग 2.7 करोड़ घन मीटर मिट्टी और पत्थर का उत्खनन किया गया था।

पनामा नहर की कार्यप्रणाली में इन्हीं तालाबों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जब एक जहाज नहर में प्रवेश करता है, तो उसे तालाबों के जल स्तर को ऊपर नीचे उठाकर एक महासागर से दूसरे में ले जाया जाता है। जहाजों को पूरी तरह नहर प्रबंधन को सौंप दिया जाता है। 
समूचा प्रबंधन पनामा नहर प्राधिकरण (Panama Canal Authority) द्वारा किया जाता है, जो पनामा सरकार की एक एजेंसी है। यह प्राधिकरण नहर के संचालन, रखरखाव और सुरक्षा के लिए जिम्मेदार होती  है। ये ही नहर पार करवाने में संपूर्ण तकनीकी प्रक्रिया पूरी करते हैं। बड़े जहाजों को जल सतह से हम स्वयं ऊपर नीचे होते देख पाते हैं। समुद्र तल से ऊपर उठाकर फिर उसे दूसरे समुद्र के तल पर पहुंचा दिया जाता है। यह बहुत रोमांचक दृश्य होता है, जिसमें कुछ घंटों का समय लगता है। 
पनामा नहर स्थल पर एक ऑडिटोरियम में पर्यटकों को इसके इतिहास, निर्माण आदि के बारे में एक फिल्म प्रदर्शन द्वारा जानकारी भी उपलब्ध कराई जाती है। 
पनामा नहर का निर्माण 1881 में शुरू हुआ था और 1914 में पूरा हुआ था जिसकी
लंबाई 82 किमी, औसत चौड़ाई 90 मीटर और न्यूनतम गहराई 12 मीटर है। जो वर्तमान की स्थितियों में विस्तार की जरूरत महसूस करने लगी है।  नहर के विस्तार की परियोजना चल रही है, जिसमें नए लॉक सिस्टम का निर्माण शामिल है ताकि बड़े जहाजों को समाहित किया जा सके। इसी के साथ निकारागुआ में भी एक नई नहर की योजना है, जो प्रशांत महासागर और अटलांटिक महासागर को जोड़ेगी। यह परियोजना अभी निर्माणाधीन है।

इन नहरों का निर्माण और विस्तार वैश्विक समुद्री परिवहन और व्यापार को सुविधाजनक बनाने में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इंजीनियरों की मेहनत और उनके ज्ञान विज्ञान और संघर्षों के लिए संसार उनका सदैव कृतज्ञ रहेगा। 

ब्रजेश कानूनगो 

Friday, 23 May 2025

पदयात्राएं : शब्द वीणा और प्रकृति का सौंदर्य

पदयात्राएं : शब्द वीणा और प्रकृति का सौंदर्य   

एक जानकारी के अनुसार वर्ष 2024 में, भारत में 4.78 मिलियन विदेशी पर्यटकों का आगमन हुआ, जो 2023 के 4.38 मिलियन से अधिक है, लेकिन 2019 के 5.29 मिलियन से कम है. 2024 में घरेलू पर्यटन की संख्या 56.2 करोड़ रही, जो 2023 के मुकाबले 610.22 मिलियन कम है.  2024 की पहली छमाही में, भारत में 4.78 मिलियन विदेशी पर्यटकों का आगमन हुआ, जो 2023 के 4.38 मिलियन से सुधार दर्शाता है.हालांकि, यह संख्या 2019 के 5.29 मिलियन आंकड़ों से कम है, जो कोविड-19 महामारी के पूर्व की स्थिति थी. 2024 में, भारत में घरेलू पर्यटकों की संख्या 56.2 करोड़ थी. यह संख्या 2023 में 610.22 मिलियन थी, जो कोविड-19 महामारी के दौरान हुई थी, जबकी कई पर्यटन स्थल बंद थे। इसका सीधा अर्थ यही है कि 2024 में, विदेशी पर्यटकों के आगमन में सुधार हुआ है, लेकिन अभी भी 2019 के स्तर से कम है। घरेलू पर्यटन में वृद्धि देखी गई है, लेकिन यह 2023 के स्तर से भी कम है।  

भारत के विशेष संदर्भ में घरेलू पर्यटकों की बात करें तो इसमें सर्वाधिक संख्या उन धार्मिक और आस्थावान पर्यटकों या तीर्थ यात्रियों की रहती है जो हमारे तीर्थों, धार्मिक महत्व और आस्था के स्थलों पर पहुंचते हैं। बारह वर्षों के अंतराल पर होने वाले कुंभों, सिंहस्थों और महाकुंभों के अलावा पवित्र नदियों, पर्वतों और धार्मिक स्थलों की लंबी पदयात्राओं को भी एक तरह से धार्मिक पर्यटन के रूप में भी स्वीकार किया जाना भी सर्वोचित ही है। 

पर्यटन के क्षेत्र में अब सोशल मीडिया और घुमक्कड़ों के ट्रैवलॉग वीडियोस ने भी नए पर्यटकों और आम व्यक्तियों को यात्राओं की ओर आकर्षित किया है। जो किन्हीं कारणों से यात्राएं कर पाने में असमर्थ होते हैं वे घर बैठे भी इन घुमक्कड़ों, यायावरों के कैमरों की नजर से यूट्यूब माध्यम से साक्षात स्क्रीन पर पर्यटन और तीर्थाटन का आभासी आनंद तो एक सीमा तक उठा ही लेते हैं। 

पिछले दिनों इसी तरह ब्लॉगरों के साथ विश्व की आभासी यात्राएं करते हुए हमने भी धार्मिक यात्राओं का सुख घर बैठे उठाया। हमारा माध्यम बने इंदौर के रंगकर्मी और मीडिया कर्मी ओम द्विवेदी के वीडियोस जो उन्होंने अपने ओम दर्शन यूट्यूब चैनल पर साझा किए हैं। इनके वीडियोस की अनेक विशेषताएं हैं जो अन्य घुमंतुओं से इन्हें विशिष्टता प्रदान करती हैं। दो दशक तक हिंदी रंगमंच में एकल अभिनय के अलावा मीडिया के क्षेत्र में प्रतिष्ठित पदों पर रहे  ओम द्विवेदी को कुछ वर्ष पहले नर्मदा से जुड़े साहित्य पढ़ने के साथ नर्मदा परिक्रमा वासियों को करीब से जानने का मौका मिला। इसके बाद वह अपने आप ही उनसे प्रेरित हो गए. उन्होंने भी नर्मदा की पैदल परिक्रमा करने का निर्णय लिया। इसके बाद उन्होंने 5 महीने की कठिन 3600 किलोमीटर की नर्मदा परिक्रमा पूरी की।  जिसके बाद वे नर्मदा तट के प्राकृतिक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जीवन में रम गए। इसी दरमियान कुछ साधु-संतों और प्रकृति प्रेमियों से भी उनकी भेंट हुई। 

जिसके बाद उन्होंने उत्तराखंड चार धाम यात्रा के रोमांचक प्रसंग सुने।  तब उन्होंने देवभूमि की यात्रा करने का भी संकल्प लिया.  उत्तराखंड से जुड़े कई अनजाने क्षेत्रों और रहस्य की पहचान हुई. इसके बाद उन्होंने खुद पैदल चलते हुए ऋषिकेश, यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ बदरीनाथ होते हुए पुनः ऋषिकेश तक यात्रा की. इसी बीच उन्हें पांच केदार, सप्त बदरी और पंच प्रयाग के दर्शन किये। 

दरअसल धार्मिक पर्यटन इस दृष्टि से बड़ा महत्वपूर्ण है जो कि लोगों को न सिर्फ अपने धर्म के बारे में जानने का मौका देता है बल्कि व्यापक आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त करने और विभिन्न संस्कृतियों, क्षेत्र विशेष के लोगों की जीवनशैली और रीति-रिवाजों के बारे में जानने का अवसर और समझ प्रदान करता है।  दुर्गम और पर्वतीय वन आच्छादित इलाकों, कलकल करती नदियों, प्रपातों सहित धरती के सौंदर्य और प्रकृति के संगीत को आत्मसात करना तब और सुगम हो जाता है जब आभासी यात्रा ओम द्विवेदी जैसे संत प्रवृत्ति पद यात्री यायावर के कैमरे से प्रांजल वाणी से देखा सुना जा रहा हो।  

अचानक एक दिन ओम द्विवेदी जी के फेसबुक पेज पर हमारी नजर पड़ी जहां उन्होंने नेपाल भ्रमण के कुछ चित्र पोस्ट किए थे, हमने अनुरोध किया कि आप इन्हें वीडियो के रूप में भी साझा कर दें तो  हम भी इसका लाभ लेते रहे घर बैठे।  जवाब में उन्होंने लिखा था कि मैं यात्रा से लौटने पर वीडियो बनाता हूं और यूट्यूब चैनल पर साझा करता हूं। मुझे तब तक पता नहीं था कि उनकी एक चैनल भी है ओम दर्शन के नाम से। मैने तब जाना कि ओम द्विवेदी जी कई यात्राएं कर चुके हैं और उनके कई वीडियो ओम दर्शन चैनल पर उपलब्ध है।  हमने धीरे-धीरे नियमित देखना शुरू कर दिया। बहुत अद्भुत है सारे वीडियोस। अन्य ट्रैवलरों से बहुत अलग भी हैं लेकिन यात्रा वीडियोस की सारी खूबियों के साथ।  हमने उनकी इन वीडियो श्रृंखलाओं में बहुत सी नई बातें अनुभव की। इसको देखते हुए असीम आनंद का अनुभव होता है। दरअसल ओम द्विवेदी जी ने हिमालय क्षेत्र में अनेक यात्राएं की है जिसमें चार धाम यात्रा,  यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ, ये दुर्गम यात्राएं उन्होंने पैदल की। इन सभी वीडियो को देखते हुए हम उनमें डूबते जाते हैं, अपने अस्तित्व को खोते हुए प्रकृति से एकाकार होते चले जाते हैं। हिमालय दर्शन पदयात्राओं के वीडियो में मुझे सबसे महत्वपूर्ण बात यह लगी कि उनकी जो प्रांजल भाषा है, जो हिंदी वे बोलते हैं, वह बहुत सुंदर है।  लगा कि हम तो वह भाषा शायद भूल ही चुके हैं।  लेखन के क्षेत्र में होते हुए भी मुझे अफसोस हुआ कि इतनी सुंदर प्रांजल हिंदी को हम कैसे भूलते चले गए।  जब वह सामान्य चलन से दूर होते गए खूबसूरत और अर्थवान शब्द बोलते लगते हैं तो पश्चाताप होता है, हम अपनी भाषा के सामर्थ्य और सटीकता से कितने भटक गए हैं।  वे अपने को तीर्थयात्री या सैलानी नहीं कहते यायावर बोलते हैं।  कितनी मधुर है कितनी शुद्ध और परिभाषिक है हमारी भाषा, बिना दूसरी भाषाओं का सहारा लिए भी काम चल सकता है।  

महाकुंभ के एक वीडियो में ओम द्विवेदी सभी भाषाओं के सम्मान और हिंदी की उदारता की बात करते हैं, शाही, मुकाम, खालसा आदि जैसे अनेक शब्दों की व्याख्या और औचित्य बताते हैं, वे हिंदुस्तानी की बात करते हैं, ओम जी इसी उदार भाषा का प्रयोग करते हैं।  जो बोलते हैं उनके उच्चारण और प्रवाह इतना प्रभावशाली होता है जैसे कोई संत बोल रहा हो। वैसे लगभग उन्होंने संत का स्वरूप अपना भी लिया है, संत का जीवन ही वह जी रहे हैं यात्राओं के दौरान। इन दिनों उनका पहनावा उनका रहन-सहन सब कुछ एक संत की तरह है।  जब उनके साथ आभासी यात्रा करते हैं तो लगता है कि हम किसी संत की टोली के साथ ही भ्रमण कर रहे हैं। प्रकृति की हरीतिमा में खोते जा रहे हैं, उसकी खुशबू को महसूस कर रहे हैं। 

उत्तराखंड के प्रमुख तीर्थ जो हमारे धाम है वहां तक पैदल यात्रा तो वे करते ही हैं लेकिन जो निकट में कुछ ऐसे दुर्गम स्थल होते हैं उन पर भी वे कठिन चढ़ाई चढ़ जाते हैं।  तब सच में उनके पत्रकार रूप, लेखक रूप और उसके दृष्टिकोण के दर्शन होते हैं। वे बोलते हैं तो लगता है हम कोई आध्यात्मिक प्रवचन सुन रहे हैं, कोई दार्शनिक हमारे सामने बोल रहा है। यही दार्शनिक की भाषा है उसमें कई अर्थ होते हैं, उसमें अनेक बिंब भी होते हैं।  मुझे याद है ऐसे ही हिमालय के पहाड़ों में घूमते हुए जब वह एक स्थान पर जाते हैं, शायद उसको चंद्रशिला कहा गया है।  कठिन चढ़ाई चढ़ते हुए वे ऊपर तक जाते हैं और वहां उसका वर्णन करते हैं, लगता है सचमुच एक प्रबुद्ध भारतीय ट्रैवलर जो आध्यात्मिकता और दर्शन से भरा हुआ है,  उसकी नजर से उसके सार्थक शब्दों से हम उस स्थल को साक्षात अपने सामने स्क्रीन पर देख पाते हैं। एक जगह एक वन में गुजरते हुए, वह एक पेड़ देखते हैं, जिस पेड़ पर किसी चित्रकार ने एक किसी नारी का चित्र उकेर दिया था। दरअसल पेड़ की छाल उखड़ गई थी किसी कलाकार ने उसमें पेंट कर एक स्त्री का चित्र बना दिया था।  इस तरह का रूप दे दिया था कि वह वनदेवी सी लगती है। ओमजी पूरे एपिसोड में केवल उस चित्र को स्थिर करके जो व्याख्यान देते हैं, जो चर्चा करते हैं, जो विश्लेषण करते हैं वह अद्भुत है।  पूरे एक एपिसोड में लगभग बीस मिनट तक एक चित्र को देखते हुए हमें लगता ही नहीं कि यह स्थिर चित्र फ्रेम है। अहा! कितनी अच्छी स्क्रिप्ट, सटीक वक्तव्य। वह कितनी मेहनत से लिखा गया होता है।  

यह भी मन को भाता है कि किस तरह से वे संतों से बात करते हैं किस तरह से उनके अनुभव सुनते हैं, कितने भी रोमांचक प्रसंग और अनुभव सुनते हैं।  किस तरह से वह जब नदियों को देखते हैं, पहाड़ों को देखते हैं, तो किस तरह से उनसे बात करते हैं, स्वयं से बात करते हैं, हम दर्शकों से बात करते हैं, जैसे हम भी उनके और प्रकृति के साथ बह रहे हैं। कलकल करती नदी बहती है  तो लगता है वीणा बज रही है और वादक ओम द्विवेदी होते हैं जो वीणा बजाते हैं शब्दों की।  प्रकृति का राग बजता है, मौसम की जुगलबंदी होती है। सुबह का कोहरा राग, मध्यान्ह की तपिश, शीतल हवा तो कभी पसीना पसीना देह सब कुछ बजता रहता है शब्द वीणा के साथ साथ। जब चढ़ते हैं तो बात करते हैं उतरते हैं तो बात करते हैं, बीमार होते हैं उसकी बात करते हैं, बुखार आता है तो बात करते हैं, किस तरह से कहां आश्रय लेते हैं बात करते हैं, बताते जाते हैं।  मसूरी जैसे बड़े व्यावसायिक पर्यटन स्थल पर पहुंचकर कहते हैं, कि यहां तो रहना हमारे बस की बात नहीं है, कहीं और चलते हैं।  थोड़ा आगे चलकर किसी कुटिया में, आम आदमी के साथ झोपड़ी में विश्राम करते हैं, भोजन भी वहीं मिल जाता है। एक संत की तरह यात्रा करते हैं।  उनके  वीडियो को जो तथ्य खास बनाते हैं, सबसे अलग रखते हैं  निसंदेह इसके पीछे उनका लेखक पत्रकार होना, उनका वृहद धार्मिक, पौराणिक ज्ञान,दार्शनिक नजरिया और उनका एक कुशल रंगकर्मी होना भी है। 

उन्होंने कई एकल अभिनय किए हैं, उनके बड़े प्रसिद्ध नाटक भी हैं जो लोकप्रिय हुए।  वह कई जगह वे महाभारत की बात करते हुए अश्वत्थामा का अभिनय करते हैं।  हिमालय की बात करते हैं। पांडव अपने को गलाने को ही, समाप्त करने के लिए ही  हिमालय की बाहों में अपने को समर्पित कर दिया था। पग पग पर पांडवों का जिक्र होता है, भीम के घमंड और बजरंग बली की पूंछ की चर्चा होती है। पहाड़ों में पौराणिक प्रसंग जीवंत होते रहते हैं। लोक साहित्य और लोकरूचि की बातें मनुष्य के मन की गहराई से स्क्रीन पर उभरती रहती हैं। 

कहा जाता है कि पहाड़ों में कोई साथ हो ना हो कुत्ते हमेशा हमेशा हमारे साथ हो जाते हैं।  ओम जी के साथ भी ऐसा ही होता है, कभी कभी कोई कुत्ता उनके साथ चलने लगता है, अपने क्षेत्र तक उनके साथ जाता है और फिर लौट आता है, वहां से दूसरा कुत्ता उनके साथ हो जाता है अगले चरण तक। वे कहते हैं  हमारे साथ एक भैरव महाराज चल रहे हैं। श्वानों को हमारे यहां भैरव महाराज का स्वरूप भी माना गया है। कभी एक तो कभी दो दो भैरव उनके साथ हो लेते हैं। यही कठिन समय में आस्था का ईश्वर है। कभी कोई राहगीर, कभी कोई किसान, मजदूर,घोड़े वाले, अगले पड़ाव तक पथ प्रदर्शक बन जाते हैं।  राह में एक श्याम श्वान उनके आगे आगे पथ प्रदर्शक बन जाता है, उसके पिछले दोनों पांवों में पोलियो है, लंगड़ा लंगड़ा के ओम जी के साथ आगे आगे चल रहा था। ओम जी कहते हैं जब लक्ष्य सामने हो तो शरीर नहीं, हौसलों से काम होता है। श्वान अपने कष्टों और विकलांगता के बावजूद आगे बढ़ रहा था। अपनी दैहिक सीमाओं के साथ अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए ओम जी का संकल्प नया हौसला पा लेता है। 

हिमालय दर्शन पदयात्रा में ओम  द्विवेदी देवभूमि के चारों धामों के अलावा पंच केदार और सप्त बद्री और अनेक दुर्गम स्थानों तक पदयात्राएं करते हैं।   पुजारियो की कुटिया ,सामान्य बसेरों, मंदिरों और आश्रमों में  उन्हें आश्रय मिला, भोजन प्रसादी और लोगों के स्नेह ने उन्हें ऊर्जा दी। सुबह-सुबह तीन चार बजे उठकर फिर आगे की यात्रा के लिए पांव पांव वे आगे बढ़ते, चढ़ते उतरते गए। 

ये पदयात्राएं आध्यात्मिक और धार्मिक होते हुए भी जिस तरह से प्रकृति के सौंदर्य के दर्शन कराती है, जीवन के दर्शन कराती है, जन और वनजीवन के दर्शन कराती है वह अद्भुत है। हम जान पाते हैं कि किस तरह से सादगी और अभाव के बीच भी हम खूबसूरत और शांत जीवन जी सकते हैं।  ओम द्विवेदी जी की वीडियो श्रृंखलाओं को देख कर सहज समझा जा सकता है। शुभकामनाएं। 

ब्रजेश कानूनगो

Tuesday, 6 May 2025

पर्यटकों को लुभाते अनोखे पेड़

पर्यटकों को लुभाते अनोखे पेड़


गत दिनों हमने ट्रैवलर बंसी विश्नोई के कुछ ट्रैवलॉग वीडियोस को यूट्यूब पर देखा। वे दक्षिण अफ्रीका महाद्वीप के नजदीक स्थित द्वीप देश मेडागास्कर में भ्रमण करते हुए वहां के जनजीवन और खास विशेषताओं और दृश्यों को बहुत नजदीक से फिल्माते हुए भारत में हम जैसे दर्शकों के लिए वहां का लुत्फ उठाना संभव कर रहे थे।

मेडागास्कर गणराज्य हिन्द महासागर में विश्व का चौथा सबसे बड़ा द्वीप है। यहाँ विश्व की पाँच प्रतिशत पादप वनस्पति और जीव प्रजातियाँ मौजूद हैं। इनमें से 80 प्रतिशत केवल मेडागास्कर में ही पाई जाती हैं।
दरअसल पादप या पौधे जीवित प्राणियों का एक समूह है, जो अपना भोजन सूर्य की ऊर्जा से बनाते हैं। ये जीवित प्राणी मिट्टी से पानी और पोषक तत्व लेते हैं और हवा से कार्बन डाइऑक्साइड लेते हैं। पौधे हमें ऑक्सीजन प्रदान करते हैं और हमारे जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बसु ने सिद्ध किया था कि वनस्पति में भी जीवन प्राण होते हैं। ये पादप उन्हीं प्राणवान वनस्पतियों का ही रूप कहा जा सकता है। 

ट्रैवलर बंसी वैष्णव अपनी यात्रा में एक ऐसे क्षेत्र में जाते हैं जहां ऐसी ही अनोखी वनस्पति और पेड़ों की बहुतायत थी। पर्यटकों के लिए उस क्षेत्र में खासतौर से व्यवस्थाएं की गईं थीं। अपने अनोखे और दुनिया में अन्य जगह दुर्लभ बाओ बाब पेड़ की प्रजातियों को यहां देखना बहुत रोमांचित करता है। यह पेड़ अपने मोटे तनों और अनोखे आकार के लिए प्रसिद्ध हैं। ये पेड़ अपने विशाल आकार और लम्बी उम्र के लिए जाने जाते हैं, कुछ बाओबाब पेड़ों की उम्र 1000 साल से भी अधिक होती है।
बाओबाब पेड़ों के अलावा रफ़िया पाम जो एक प्रकार का पाम पेड़ है और इसके पत्तों का उपयोग विभिन्न उद्देश्यों के लिए किया जाता है। टमाल पेड़ एक ऐसा पेड़ है, जो  जिसके बीजों का उपयोग मसाले के रूप में किया जाता है। मेडागास्कर में ऑर्किड की भी कई प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जो अपनी सुंदरता और विविधता के लिए प्रसिद्ध हैं।

मेडागास्कर में बंसी विश्नोई के कैमरे से दैत्याकार बाओ बाब पेड़ों को देखकर सहज जिज्ञासा हुई कि क्या ये पेड़ हमारे देश में भी कहीं पाए जाते हैं ? मैने कई बार ऐतिहासिक और पर्यटन केंद्र मांडू (मध्यप्रदेश) की सैर की थी, तब मुझे वहां एक खास प्रकार के बड़े फल को खाने का मौका मिला था, जिसे स्थानीय भाषा में मांडू की इमली कहा जाता है। कबीट या नारियल जैसे इस फल के भीतर से खट्टा मीठा गुदा निकलता है। इसके विशालकाय पेड़ भी वहां देखे थे। बाओ बाब पेड़ों  को बंसी जी के ट्रैवल वीडियो में देखकर लगा कि मांडू की इमली के पेड़ भी संभवतः इसी प्रजाति के हैं। थोड़ी जानकारी जुटाई तो यह सच भी निकला कि खुरासानी इमली के ये पेड़ उसी प्रजाति के हैं। कुछ ऐसे ही पेड़ सिवनी के वनों में भी पहचाने गए थे। 

बाओ बाब के अलावा भी दुनिया में ऐसे कई अद्भुत पेड़ हैं जो अपनी अनूठी विशेषताओं और प्राकृतिक सुंदरता के लिए पर्यटकों को आकर्षित करते रहे हैं। जैसे ड्रैगन ब्लड ट्री (यमन), बॉटल ट्री (नामीबिया), और रेनबो यूकेलिप्टस (अमेरिका और दक्षिण पूर्व एशिया)। 
यमन के सोकोट्रा द्वीप पर पाए जाने वाले ड्रेगन ब्लड ट्री की छाल का रंग खून के समान लाल होता है। इस पेड़ का रस भी लाल रंग का होता है और इसे पारंपरिक रूप से एक दवा के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।  
सिडनी, ऑस्ट्रेलिया के ब्लू माउंटेन्स में पाए जाने वाले  वालामी पाइन पेड़ को जीवित जीवाश्म माना जाता है क्योंकि यह 200 मिलियन साल से भी अधिक पुराना है।  
बहरीन के जियाज द्वीप पर स्थित ट्री ऑफ लाइफ पेड़ अपने अजीब और अनोखे रूप के लिए जाना जाता है। यह पेड़ बिना किसी पानी के स्रोत के जीवित रहने में सक्षम है। दक्षिण पूर्व एशिया और अमेरिका के रेनबो यूकेलिप्टस पेड़ की छाल विभिन्न रंगों के साथ आती है, जिससे यह एक सुंदर दृश्य प्रस्तुत करता है। साउथ कैरोलिना के जॉन्स आइलैंड पर स्थित एंजल (यूएसए) ओक पेड़ 1,500 वर्षों से अधिक पुराना है। यह पेड़ अपनी विशाल छतरी के लिए प्रसिद्ध है।   न्यूज़ीलैंड की वानाका झील के पास स्थित वानका एक अकेला विलो पेड़ अपने घुमावदार स्वरूप और शांत झील के पानी पर मोहक प्रतिबिंब के लिए बहुत प्रसिद्ध है।  कंबोडिया तथा दक्षिण पूर्व एशिया का सिल्क कॉटन ट्री पेड़ की छाल और पत्तियां रेशम की तरह नरम होती हैं। इसलिए इसे सिल्क कॉटन ट्री कहा जाता है। बहुत लोकप्रिय पेड़ हैं। 

भारत का सबसे बड़ा वट वृक्ष कोलकाता के आचार्य जगदीश चंद्र बोस बॉटनिकल गार्डन में स्थित है, जिसे द ग्रेट बयाइन ट्री के नाम से जाना जाता है।  यह बरगद का पेड़ 250 साल से अधिक पुराना है और 14,500 वर्ग मीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है।  यह वट वृक्ष दुनिया का सबसे चौड़ा बड़ा बरगद का पेड़ माना जाता है। इसकी 3,372 से अधिक जटाएं हैं जो जमीन में जड़ें डाल चुकी हैं। एक जंगल की तरह दिखता है यह पेड़ और 87 से अधिक प्रजातियों के पक्षियों का बसेरा है। इसे गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी शामिल किया गया है  लोग इसे 'वॉकिंग ट्री' भी कहते हैं। 1884 और 1987 में आए चक्रवाती तूफानों ने इस पेड़ को नुकसान पहुंचाया था, लेकिन यह फिर भी जीवित है।

वनस्पति और वृक्षों के गुणों के कारण भारत में उनका औषधीय, धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व हमेशा से रहा है। पेड़ों में आस्था व्यक्त करते हुए उनकी पूजा करना भारतीयों के संस्कार में शामिल हैं। बरगद को भारत का राष्ट्रीय वृक्ष माना जाता है, जबकि पीपल को धार्मिक महत्व दिया जाता है, और नीम को अपने औषधीय गुणों के लिए जाना जाता है।

जब हम घर बैठे घुमंतुओं के यूट्यूब ट्रैवल वीडियो देखते हैं तो न सिर्फ दुनिया के लोगों, प्राणियों और वनस्पति को जानते हैं बल्कि कुदरत के करिश्में और प्रकृति का अप्रतिम सौंदर्य भी हमें अभिभूत कर देता है। धन्यवाद प्रिय विश्व यात्रियों। शुभकामनाएं!

ब्रजेश कानूनगो  
  

बोझिल भविष्य में सुख देंगी कलाएं

बोझिल भविष्य में सुख देंगी कलाएं कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और प्रौद्योगिकी में हम जिस तेजी से आगे बढ़ रहे हैं इससे लगता है कि दुनिया भर के,ह...