Friday, 30 August 2024

ट्रैकिंग की बातें

ट्रैकिंग की बातें


हमारे गृह नगर देवास में एक पहाड़ी है जिसको माताजी की पहाड़ी कहते हैं।  यहां देवी चामुंडा और तुलजा भवानी के अतिरिक्त अन्य भी बहुत सारे मंदिर हैं। ब्रिटिश इतिहासकार ईएम फास्टर ने अपनी पुस्तक हिल आफ देवी में इसका उल्लेख भी किया है। ऊपर एक परिक्रमा मार्ग भी है। पहाड़ी पर जाकर देवास के लोग नित्य व्यायाम की दृष्टि से सुबह की सैर करते हैं। जिनकी आस्था होती है उन्हे देवी के दर्शन भी हो जाते हैं। जिन्हे  केवल व्यायाम की दृष्टि से जाना होता है तो उनको सुबह की ताजी हवा के अलावा थोड़ी सी कसरत का लाभ भी मिल जाता है। 

पहाड़ी के ऊपर तक जाने के लिए करीब पांच सौ सीढ़ियां रही होंगी। एक रपट मार्ग भी रहा है जिस पर जीप जैसी गाड़ियां उचित अनुमति के बाद ऊपर ले जाई जा सकती थीं। यह मैं अपने बचपन की स्मृति बता रहा हूं। अब तो वहां रोप वे बन गया है और श्रद्धालु टिकिट खरीद कर भी पहाड़ी के ऊपर जाने लगे हैं। बचपन में सीढ़ियों और रपट पर दौड़ते हुए मिनटों में ऊपर चढ़ जाया करते थे।  इन दिनों घुम्मकड़ों के ट्रेवल वीडियो देखते हुए उनको ट्रेकिंग करते हुए भी कई रोमांचक वीडियो देखे हैं। हमे लगा कि बचपन में जब हम गृहनगर की पहाड़ी पर चढ़ा करते थे वह भी एक मायने में ट्रेकिंग ही तो था। सीढ़ी मार्ग होने के बावजूद लोगों ने कुछ ऐसे दुर्गम रास्ते खोज लिए थे जिनसे होकर हम लोग ऊपर पहुंचा करते थे। इसे खड़े पहाड़ चढ़ना कहते थे। ट्रेकिंग की परिभाषा भी यही है कि कटीले, गिट्टियों, झाड़ियों भरे दुर्गम कठिन रास्तों से होते हुए पहाड़ों के ऊपर चढ़ते जाना। 

हमारे बुजुर्ग लोग हमसे कहा करते थे कि आप नित्य थोड़ा पहाड़ी पर घूम आया करें, एक दो चक्कर लगा लिया करें सुबह शाम। किंतु यह हिदायत देना भी न भूलते कि खड़े पहाड़ न चढ़ना। पर उत्साह और जोश से भरा एक ट्रैकर  कहां ऐसी चेतावनियों को सुनता है, हम खड़े पहाड़ चढ़ने का जोखिम उठा ही लेते। अब समझ में आया कि हम भी बचपन में छोटे मोटे ट्रैकर रहे  हैं। 

स्कूल कॉलेज के दिनों में एनसीसी (राष्ट्रीय छात्र सेना) का कैडेट रहते हुए भी कैंपिंग और ट्रैकिंग के कुछ अनुभव हुए थे। तब उसमें जो कुछ सिखाया जाता था उसमे दशहरा दिवाली की छुट्टी में कैंपिंग होता था, हम खूब आनंद उठाते थे, ट्रैकिंग भी होता था और नकली युद्ध भी लड़ा जाता था।  दो ग्रुप बना दिए जाते, जो एक दूसरे ग्रुप पर अटैक के लिए  दो तीन किलोमीटर दूर विपरीत दिशाओं से ट्रैकिंग करते आगे बढ़ते रात को निकलते। घमासान युद्ध का अभ्यास होता। आज जब यूट्यूब पर हम घुम्मकड़ों के ट्रैकिंग वीडियो को देखते हैं तो असली ट्रैकिंग के रोमांच से भर उठते हैं। 

बहुत सारे ऐसे ट्रेवलर्स हैं जिनको ट्रैकिंग करते देखकर बहुत अच्छा लगता है। मुझे कुछ ब्लॉगर्स के नाम याद आते हैं जिनके वीडियो देखकर मन प्रसन्न हो जाता है, जैसे डेल फिलिप (Dale Phillip ) एक ब्लॉगर हैं, स्कॉटलैंड के हैं, अंग्रेजी में अपने वीडियो बनाते हैं। श्रीलंका में वह दो-तीन बार गए हैं।  श्रीलंका के सारे बड़े शहरों में तो घूमते ही हैं लेकिन कुछ ट्रैकिंग में श्रीलंका के पहाड़ों में अकेले निकल जाते हैं, ना तो उनको तमिल आती है न सिंहली, न वहां के पहाड़ी लोगों को अंग्रेजी समझती है। गूगल ट्रांसलेट से भी बात करते हैं लेकिन गूगल ट्रांसलेट भी ऐसी जगह पर काम नहीं करता। हम जानते हैं मुस्कुराहट और सद्भाव की अपनी अलग वैश्विक भाषा होती है, किसी तरह काम निकल ही जाता है।  तो वहां इसी तरह से कुछ बच्चो के साथ वे श्रीलंका की पहाड़ियों पर ट्रैकिंग करते हैं। बहुत अच्छा दिलचस्प वीडियो उन्होंने बनाया है।  उसमें प्रकृति का वास्तविक सौंदर्य हमको बहुत नजदीक से दिखाई देने लगता है। दरअसल ट्रैकिंग ही एक ऐसा माध्यम है जिसमें हम प्रकृति से सीधे जुड़ जाते हैं, इस दरम्यान हवा, चट्टान, वनस्पति, आकाश, मिट्टी, पानी, बादल, एक दूसरे से गले लगते हैं। मनुष्य और प्रकृति एक दूसरे से आत्मीय संवाद करने लगते हैं।  ट्रैकर के माथे और देह को भिगोता संघर्ष का पसीना हम दर्शकों को रोमांचित करने लगता है।  वीडियो देखते हुए प्रकृति सीधे हमसे बातचीत करने लगती है और सीधे दिल में उतरती चली जाती है।  

ऐसे ही डेल फिलिप एक बार जंगलों में ट्रैकिंग करते हुए रेलवे पटरी के साथ साथ आगे बढ़ रहे होते हैं तो उनका पांव थोड़ा मुड़ जाता है, पांव में चोट आ जाती है। लेकिन यह देखकर बहुत अच्छा लगा कि चोटिल परदेसी ब्लॉगर को एक स्थानीय उनके चाहने वाले ने अपने परिवार के साथ घर में अतिथि की तरह स्थान देकर उनकी सेवा सुश्रा की।  उनको कोई 15 दिन वहां रहना पड़ा।  पांव में काफी सूजन रही। चलने फिरने में दिक्कत आई। इस घटनाक्रम का भी डेल ने वीडियो बनाया। हमें कई बार चिंता होती है कि ये ब्लॉगर अकेले अकेले अपरिचित क्षेत्रों में भटकते रहते हैं, दुर्भाग्य से कल कहीं कुछ दुर्घटना या अनहोनी घट जाए तो क्या होगा?  लेकिन यह दुनिया बहुत खूबसूरत है, यहां के लोग बहुत खूबसूरत हैं, प्रेम, सम्मान और सौहार्द्र की भाषा और आचरण सबसे महत्वपूर्ण होता है, सब एक दूसरे का दुख दर्द जान लेते हैं। ऐसा कभी नहीं होता कि कहीं कोई मनुष्य अकेला पड़ जाए, समय आने पर बहुत लोग उनके साथ होते हैं, शुभचिंतक हो जाते हैं, सहयोग करते हैं। और फिर हम दर्शकों की शुभकामनाएं तो उनके साथ होती ही हैं जिनके लिए वे जोखिम उठाकर हमारे लिए अपने अनुभव साझा करते हैं।  
 
ट्रैकिंग के और भी अनेक व्लॉगरों के वीडियो हमने देखे हैं खासतौर पर नेपाल, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश सहित अन्य देशों में  पहाड़ी इलाकों में ग्रेब्रियल ट्रेवलर, दाउद अकुंजादा, बैग्स पैकर्स फैमिली के परिवार के साथ ट्रैकिंग का मानस आनंद लेते रहे हैं। 
उधर पाकिस्तान के भारत से लगे हिमालय क्षेत्र भी काफी सुंदर हैं। गिलगिट आदि क्षेत्रों के मनोरम दृश्य को देखते हुए लगता ही नहीं कि यह भारत नहीं है। दाउद अकुंजादा उस खूबसूरत स्थल की यात्रा में सुंदर फिल्मांकन करते हैं।
 
एक ब्लॉगर के वीडियो में हमने देखा कि कुछ ऐसे नव विकसित कैंपिंग स्थल तो ऐसे भी हैं जहां से पर्यटक पाकिस्तान से भारत के दृश्यों और हलचल को निहार सकते हैं और पाकिस्तान से भारत के मनोरम दृश्य का आनंद उठा पाते हैं। कुछ स्थान ऐसे भी हैं जिनके बीच एक खूबसूरत नदी होती है और दोनों किनारों पर खड़े पर्यटक एक दूसरे का अभिवादन कर सकते हैं।  

ट्रैकिंग के बारे में यह सब लिखने पर कुछ मित्र पूछ सकते हैं कि हम ऐसा कैसे कर पा रहे? कई बार यह होता है कि जिस क्षेत्र में हमने कुछ नहीं किया हो उस विषय पर भी हम लिखने की कोशिश करते हैं। हमारे इधर एक कहावत है, शादी नहीं की तो क्या, बारात में तो गए ही हैं।   बारात में जाकर भी शादी का अनुमान लगाया जाता रहा है। समझ लीजिए कि हम घुमक्कड़ ना सही परंतु घुम्मकड़ों के बनाए वीडियो तो देखते हैं, उनके अनुभव से एकाकार होकर अनुमान लगाते हैं। कुछ यात्राएं हुईं हैं, भारतीय और पश्चिम की संस्कृति और परिवेश को भी थोड़ा बहुत अपने कनाडा प्रवास से जाना समझा है, इसी से अनुमान लगाने में अधिक कठिनाई नहीं आती। यह बहुत सारे जो हमारे ब्लॉगर मित्र हैं, जो इतने खूबसूरत वीडियो बनाते हैं कि देखते हुए हम उसमें डूब से जाते हैं और हमको लगता है कि बस हम ही घूम रहे हैं। अपनी अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने की आकांक्षा इसे शब्दों में बदलने लगती है। वीडियो बनाने वाले हमारे इन मित्रों को हम बहुत धन्यवाद देते हैं और शुभकामनाएं भी कि वे खूब यात्राएं करें और घर बैठे दुनिया की सैर हमें भी नित्य करवाते रहें।

ब्रजेश कानूनगो 

Wednesday, 28 August 2024

माखन मिश्री का आभासी आनंद

माखन मिश्री का आभासी आनंद

घुम्मकड़ो द्वारा बनाए विडियोज को यूट्यूब पर देखते हुए अक्सर कई ब्लॉगरों से गहरी आत्मीयता हो जाती है। इस जुड़ाव के कई कारण होते हैं। कभी उनकी बातचीत अच्छी लगती है तो कभी उनका संवेदनशील व्यवहार और उदारता। हर व्लॉगर की अपनी विशिष्टता होती है। जो क्रमशः उसके प्रति हमारे लगाव का कारण बनती जाती है।

अमरीकन व्लॉगर क्रिस लेविस ( Chris Lewis) उनकी सहजता, सरलता तथा अंग्रेजी, हिंदी और उर्दू बोलने वाले घुम्मकड़ के तौर पर हमें बहुत पसंद हैं। भारत के शहरों में घूमते हुए वे खानपान के अनुभव के भी वीडियो बनाते रहते हैं। खासतौर से दिल्ली के चांदनी चौक और मुंबई, गुजरात आदि के उनके ऐसे वीडियो अलग सुख देते हैं। कई जगह डेल मैक्स जैसे अपने मित्र व्लॉगर के साथ भी वे दिखाई दे जाते हैं।

मूलतः लेविस ऐसे घुम्मकड़ व्लॉगर हैं जिसमे वे लोक जीवन का चित्रण स्थानीय निवासियों से गहरी संवेदनाओं के साथ करते चले जाते हैं। एकत्रित लोग उनकी टूटी फूटी हिंदी और उर्दू सुनकर काफी प्रभावित होते हैं और अपनेपन की एक अदृश्य स्नेह डोर सबको जोड़े रखती है। उनके वीडियो से ही पता चला कि क्रिस लेविस ने अपनी कामचलाऊ हिंदी उर्दू ताइवान में उनके एक पाकिस्तानी मित्र से सीखी है, दिलचस्प यह है कि कई बार उनका वार्तालाप स्थानीय आम लोगों से बेहद घरेलू और आत्मीय हो जाता है।

कई बार वीडियो देखते हुए जब लगता है कि हमारे प्रिय व्लॉगर के साथ कुछ गलत हो रहा है या उसके कहे को कोई समझ नहीं रहा, भ्रम और असमंजस की स्थिति बन रही है तो एक दर्शक के रूप में हम कोई सहायता उनकी नहीं कर पाते। जैसे मुंबई में कोई क्रिस के साथ ठगी का प्रयास करता है या मथुरा जैसी जगह पर माखन मिश्री के स्वाद के आनंद की उनकी इच्छा अधूरी रह जाती है। एक दर्शक के रूप में हम मात्र बेबस व्यक्ति की मनःस्थिति से भर जाने और व्यथित होने के अलावा क्या कर सकते हैं।

जब एक विदेशी पर्यटक और व्लॉगर यूट्यूब के लिए विडियो बनाता है। हिंदी सीखकर हिंदुस्तान को समझने के लिए हिंदुस्तान आया है। वह हिंदी बोलता है तो हर व्यक्ति के मन में खुशी और गौरव की लहर दौड़ जाती है। मुस्कुराहटें बिखर जाती हैं। और जब कोई असहज करने वाली बात दिखाई देने लगती है तो मन का दुखी हो जाना  स्वाभाविक है।

व्लॉगर बाजार में चहलकदमी करते हुए दर्शकों को श्रीकृष्ण और कंस की कहानी सुनाता हुआ कृष्ण की प्रिय वस्तु 'माखन मिश्री' की बात भी करता है। उसका स्वाद लेना चाहता है  किंतु उसे पता नहीं है कि यह क्या चीज होती है। हर दुकान पर वह इसके बारे में पूछता जाता है। एक जगह वह इसे मांगता है तो उसे मिश्री पकड़ा दी जाती है। दुकानवाला मक्खन के लिए आगे की किसी दुकान का पता बता देता है। व्लॉगर वहां पहुंचकर माखन मांगता है। यह दूध की दुकान है। माखन मांगने पर दूधवाला आधा किलो गर्म दूध पॉलिथीन की थैली में पैक कर दे देता है। पर्यटक इसे मक्खन ही समझता है। वीडियो देखते हुए हमें बहुत दुख और अफसोस होता है। कैसे व्लॉगर की मदद करें?

होटल पहुंचकर व्लॉगर क्रिस लेविस किसी तरह मिनरल वाटर की खाली बोतल में तथाकथित माखन (दूध) भरता है। मिश्री के कुछ टुकड़े उसमें घोलने की कोशिश करता है। हम दुखी होते जा रहे हैं। विदेशी व्लॉगर असीम उत्साह और खुशी से भरा है। उसके चेहरे पर संतुष्टि का भाव है। बोतल से मुंह लगाकर सारा दूध मिश्री एक सांस में गटक जाता है। भगवान श्रीकृष्ण की मनपसंद वस्तु का सेवन करने का सुख सहज उसके चेहरे पर देखा जा सकता है।

विडियो देखते हुए हमे आत्मग्लानि सी होने लगती है। काश कोई उसे वहां बता पाता कि 'माखन मिश्री' क्या होती है। मन को दिलासा देते हैं,भगवान तो बस भाव को ग्रहण करते हैं। हो सकता है उस व्लॉगर को दूध मिश्री में भी वही स्वाद और आनंद मिला होगा जो सचमुच श्रीकृष्ण को मिलता था।

विडियो खत्म हो जाता है। पर्यटक महंगे होटल के बिस्तर में चादर तान कर सो जाता है। इधर स्मार्ट टीवी बंद करने के बाद भी हमारी आंखों में नींद नहीं उतर पा रही। भीतर कुछ भीगता रहता है।

घुम्मकड़ो के ऐसे वीडियो लंबे समय तक हमे झकझोरते रहते हैं।

ब्रजेश कानूनगो

Saturday, 24 August 2024

हज्जाम की दुकान पर घुम्मकड़

हज्जाम की दुकान पर घुम्मकड़

निर्माण कार्य और सृजन प्रक्रिया को निहारने का अपना अलग सुख होता है। बात चाहे वैज्ञानिक प्रक्रिया की हो, किस्सागोई की हो, भवन निर्माण की हो या सड़क निर्माण के लिए भूमि समतलीकरण की, लोग जमा होकर पल पल में घटने वाली गतिविधि को जानने को उत्सुक हो जाते हैं। ठीक उसी तरह केश कर्तनालय में हेयर कटिंग प्रक्रिया को देखना भी हमेशा से सबको मोहता रहा है। यूट्यूब पर घुम्मकड़ो द्वारा बनाए विडियोज में बारबर शॉप या सैलून में उनको अपने केश कटवाते देखना भी बड़ा आनंददायी होता है।

जिन लोगों ने घुम्मक्कड़ी को ही अपने जीवन का मुख्य ध्येय बना लिया है, उनके बनाए यूट्यूब वीडियो ब्लॉग्स को देखकर महसूस किया है कि वे कई कई महीनों तक अपने घर या अपने वतन से दूर रहते हैं। एक देश से दूसरे देश की यात्राएं करते हुए ही उनका जीवन आगे बढ़ता रहता है। यही उनका प्रोफेशन हो जाता है,और प्रायः विडियो निर्माण या यूट्यूब आदि पर उनके ब्लॉग्स से होने वाली आय ही उनका आर्थिक सहारा हो जाता है।

सामान्य दर्शकों और अपने फॉलोअर्स को दुनिया भर की मानस यात्रा और पर्यटन का आभासी सुख देने वाले इन युट्यूबर्स की रोजमर्रा की अनेक गतिविधियों, उनकी जरूरतों, कठिनाइयों को भी हम इनके विडियोज के जरिए महसूस कर  पाते हैं। इनका होस्टलों, गुरुद्वारों, महंगी होटलों से लेकर किसी मेहमान या काउच सरफर के घर रुकना,ठहरना, खाना बनाना, खाना पीना भी पूरक रूप से हमारा खूब मनोरंजन करता है। 

लंबे समय तक जब केवल घुम्मकड़ी करते हुए भटकते रहते हैं, तब अचानक इन्हे एक दिन परदेस के अजनबी शहर में इस बात का भान होता है कि इनके विडियोज की तरह इस दौरान सिर और दाढ़ी के बाल भी बढ़ते चले गए हैं तो ये लोग भी किसी स्थानीय बारबर या सैलून की तलाश करते नजर आते हैं। हमने महसूस किया है कि लगभग सभी ट्रेवल ब्लॉगर्स बारबर शॉप पर जाकर अपने बालों को कटवाने, हजामत बनवाने, मसाज करवाने के विडियोज बहुत रुचि से बनाते हैं। ये विडियोज भी बहुत दिलचस्प होते हैं, इनको देखना भी बहुत अच्छा लगता है। अनावश्यक को हटा देना ही सौंदर्य की प्राथमिक शर्त होती है। एक दो घंटे सैलून में बिताकर ये घुम्मकड़ पुनः बाहर निकलते हैं तब उनकी आभा देखते ही बनती है।

यों देखा जाए तो आम आदमी के जीवन और समाज में हज्जाम, बारबर या नाई की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। जिन कलाकारों के बगैर हमारी दैनंदिनी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो सकती, उनमें हमारे व्यक्तित्व की सज्जा करने वाला यह भी एक प्रमुख प्राणी होता है।  कई फिल्मों, नाटकों, टीवी शो में भी बारबर या नाई को केंद्र में रखकर कई दृश्य रचे गए हैं। ख्यात फिल्म शोले की जेल  के खबरी हरिराम नाई को याद कीजिए, जो जेलर को पल पल की खबरें पहुंचाता रहता है। ख्यात हास्य चरित्र मिस्टर बीन के उस दिलचस्प दृश्य को याद कीजिए जहां खुद हजामत बनवाने जाते हैं और सैलून में हज्जाम की अनुपस्थिति में अन्य लोगों के अजीबो गरीब हरकतों के साथ बाल काटते हुए दर्शकों को खूब हंसाते हैं। घुम्मकड़ो द्वारा बारबर शॉप या सैलून में बाल कटवाने और मसाज के ये विडियो भी बहुत दिलचस्प और रुचिकर होते हैं।

कई बार ब्लॉगर और हज्जाम दोनों ही एक दूसरे की भाषाएं नहीं जानते। तब बड़ी मुश्किल से यूट्यूबर अपनी पसंद बता पाता है। कई बार बड़ी हास्यास्पद कटिंग और हेयर स्टाइल बन जाती है।  कई सैलून में घंटो प्रतीक्षा के बाद मुख्य नाई ग्राहक के सिर को संवारता है, इसके पूर्व अन्य कई नौसिखिया स्त्री पुरुष सिर का खेत जोत चुके होते हैं। लेकिन शानदार फेस मसाज और हेड मसाज के बाद हर यूट्यूबर के चेहरे पर खुशी चमकने लगती है। एक शानदार और रोचक कंटेंट वाला वीडियो हमारे लिए बनकर तैयार हो चुका होता है।

घुमक्कड़ी में बाल कटवाने वाले विडियोज में मुझे अजरबैजान के दाऊद अकुंदजादा के ब्लॉग्स सबसे अलग और संवेदनाओं से भरपूर लगे। उनकी प्रस्तुतियों में कई बार बड़ी मार्मिकता और उदारता के दर्शन होते हैं।  दाऊद बहुत उदार, दयालु और संवेदनशील प्रकृति के घुम्मक्कड़ हैं।  दाढ़ी रखते हैं, कई विडियोज में उन्हें बारबर शॉप पर जाकर बाल कटवाते, दाढ़ी संवरवाते, मसाज करवाते देखा जा सकता है।

विकासशील देश के एक कस्बे के भ्रमण के दौरान वे हेयर कट करवाने बेहद खस्ताहाल शॉप में पहुंचते हैं। बारबर को अंग्रेजी भाषा नहीं आती, दाऊद को स्थानीय बोली नहीं आती। किंतु इशारों और मुस्कुराहटों से बात बन ही जाती है। दाढ़ी की मात्र स्ट्रीमिंग कराने गए दाऊद उसके काम से इतने प्रभावित हो जाते हैं कि न सिर्फ हेड मसाज कराते हैं बल्कि फेस मसाज और बॉडी मसाज भी उस बेहद साधारण से सैलून में करवाकर प्रफुल्लित हो जाते हैं। बाद में उस कलाकार को मेहनताना तो देते ही हैं किंतु इससे आगे बढ़कर एक बहुत बड़ी राशि उसकी शॉप के नवीनीकरण के लिए भी भेंट कर देते हैं। इस बार दाउद के चेहरे की ताजगी से कहीं अधिक चमक बारबर की आंखों में दिखाई पड़ती है। यूट्यूबर की दयालुता देखकर हम जैसे भावुक दर्शकों की आंखे भर आती हैं। ऐसे ही सड़क किनारे किसी पेड़ की छांव में दुकान लगाए एक आम और गरीब नाई से दाढ़ी संवारने पहुंचने में उन्हें कोई झिझक नहीं होती। जरा सी लाइनिंग करवाने के बहाने वे अफगानिस्तान, बांग्ला देश, श्रीलंका,भारत आदि देशों में शहरों की सड़कों की पटरी पर बैठे कारीगर, कलाकारों की मदद करते हैं, उन्हे प्रेम से गले लगाते हैं, परिवार के दुख दर्द जानने की आत्मीयता दिखाते हैं। मन भाव विभोर हो उठता है। वीडियो किसी सार्थक और मार्मिक कविता में बदलता जाता है। एक आम यूट्यूबर किसी रचनाकार में रूपांतरित हो जाता है। सृजनात्मकता की यही उपस्थिति हमारे वीडियो ब्लॉग्स अवलोकन को संतुष्टि से भर जाती है।

ब्रजेश कानूनगो

Monday, 5 August 2024

देवदूत जैसे उदार घुम्मकड़

देवदूत जैसे उदार घुम्मकड़ 

अजरबैजान मूल के घुम्मकड़ और ब्लॉगर दावुद अकुंजादा को पहली बार उनके अमृतसर यात्रा के वीडियो में देखा था। कद काठी में पूरे पठान लगते हैं, भारतीय वस्त्रों की दुकानों पर बड़ी मुश्किल उनके नाप का कुर्ता, शूज या जूता मिल पाता है। जहां जाते हैं दुकान में सबसे बड़े नाप का परिधान मांगते हैं।  

बहरहाल, जब वे अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में गए तो अपने सिर पर पगड़ी बंधवाई। गुरु गोविंदसिंह द्वारा स्थापित सिद्धांतों के अनुसार खालसा सिक्खों द्वारा धारण किए जाने वाले पांचों ककार चीजों याने  केश, कड़ा, कृपाण, कंघा और कच्छा के बारे में जानकारी ली, उन्हे रुचिपूर्वक देखा समझा भी।    

कई ब्लॉगरों को हमने पवित्र स्वर्ण मंदिर दर्शन के लिए जाने के पूर्व सिक्ख पुरुषों द्वारा बांधी जाने वाली पगड़ियां बंधवाने की प्रक्रिया को देखा है। इसका वीडियो देखना भी बहुत दिलचस्प होता है। परिसर से पहले कारिडोर में अनेक ऐसी दुकानें हैं जहां से पगड़ी हेतु मनपसंद रंगीन कपड़े खरीद कर वहीं अपनी सेवाएं देते कर्मियों से अपने सिर पर उसे बंधवा सकते हैं। प्रक्रिया का वीडियो बना सकते हैं। दावुद का व्यक्तित्व बहुत प्रभावी है और जब वे अपने सिर पर पगड़ी धारण करते हैं तो पूरे सरदार लगते हैं। उनकी शानदार दाढ़ी उनके इस अवतार को आकर्षण और पूर्णता प्रदान कर देती है। 

अपने विडियोज में उन्होंने स्वर्ण मंदिर की पूरी सैर कराई। लंगर की रसोई का गहनता से दर्शन कराया। लंगर की पंगत में बैठकर भोजन किया। सबसे अंत में दान काउंटर पर जाकर एक बड़ी राशि वहां भेंट की। इन्ही वीडियो को देखते हुए ज्ञात हुआ कि दावुद जहां की सैर करते हैं और वीडियो बनाते हैं उससे होने वाली आय को उसी स्थान के लोगों में या कल्याण कार्यों में दान स्वरूप खर्च कर देते हैं। उनकी यह उदारता उनकी हर यात्रा के विडियोज में देखी जा सकती है। 

अजरबैजान में बहुसंख्यक आबादी इस्लाम धर्म को मानने वालों की है लेकिन वह एक धर्म निरपेक्ष देश है तथा वहां समाज का एक बड़ा वर्ग किसी धर्म का अनुयाई नहीं है। एकाध वीडियो में दावुद भी इसी बात को स्वीकारते दिखाई देते हैं। दावुद मनुष्यता को धर्म मानते हैं। सभी धर्मों,समुदायों का सम्मान उनके मन में है। सब जगह जाते हैं, सम्मान व्यक्त करते हैं और वीडियो में यह सब सहजता से देखा जा सकता है। अपनी उदारता से वे दर्शकों का मन जीत लेते हैं। किसी सांता क्लाज या देवदूत की तरह वे वृद्ध,  बच्चों, कमजोर और जरूरतमंद के लिए अकस्मात देवदूत की तरह प्रकट हो जाते हैं।  

दावुद ने भी यूट्यूब माध्यम में पूर्णतः ट्रवेलर ब्लॉगर के रूप में प्रवेश अपनी नौकरी छोड़कर किया है। वे सामान्यतः अच्छी होटलों में ठहरते हैं। कई बार उस जगह की सबसे लग्जरी होटल में रुकते हैं। वीडियो टूर देते हैं। नाश्ता, लंच, डिनर, स्विमिंग पूल, टेरेस, जिम आदि सभी पक्षों का आस्वाद अपने दर्शकों को कराते हैं। लेकिन यह केवल एक पक्ष है, बड़ा महत्वपूर्ण दूसरा पक्ष यह है कि वे सामान्य लोगों के बीच अपना अधिकांश समय सामान्य परिदृश्य में गहरे से उतरते जुड़ते हुए बिताते हैं। 

ज्यादातर वे खाना बाजार में स्थानीय रेस्टोरेंट में करते हैं और उसमें भी स्ट्रीट फूड और छोटे छोटे स्टाल्स उनकी प्राथमिकता में होते हैं। बाजार में घूमते हुए जब देखते हैं कि कोई बहुत अच्छा स्थानीय शरबत मिल रहा है तो वह अवश्य उसका आनंद उठाएंगे। ऐसे में उनके आसपास लोगों की भीड़ जुट जाती है तो  दुकानदार से बोलते हैं कि इन सबको भी यह दे दीजिए, उसका पूरा पेमेंट वही कर देते हैं। 

किसी दुकानदार की कमजोर स्थिति देखकर वे भावुक भी हो जाते हैं ,पूछते हैं, भाई आप दिन भर में कितना कमा लेते हैं?  मान लीजिए वह व्यक्ति  बता देता है कि मैं दिन भर में  500 रुपए कमा लेता हूं तो दाऊद उससे उसके स्टाल का पूरा सामान फ्री लोगों में वितरित करने का कह देते हैं,  सब लोगों को आप मेरी तरफ से फ्री बांट दीजिए, और आप आज के लिए कुछ नहीं करें, आप घर जाकर आराम करें।  यह दया भाव एक जरूरतमंद छोटे कारोबारी व्यक्ति के लिए देखकर बहुत अच्छा लगता है। 

एक बार शायद कोलकाता या बांग्लादेश में कहीं घूम रहे थे।  सब्जी मंडी में एक बूढ़ी महिला अपनी छोटी सी बास्केट में लहसुन रखकर सड़क किनारे बैठी थी। वे उससे स्नेहपूर्वक बातें करते हैं, खैरियत पूछते हैं, उसकी सारी लहसुन खरीद लेते हैं। वह लहसुन आगे जाकर उन्होंने और किसी गरीब जरूरतमंद परिवार को भेंट कर दी।  लहसुन के पूरे दाम चुका के कुछ और राशि अतिरिक्त देकर उन्होंने कहा कि आज आप आगे काम नहीं करेंगे, आप घर जाइए आराम करिए।  

दावुद अकुंजादा की उदारतापूर्ण मार्मिक अनुभूतियों से गुजरना चाहते हैं तो उनकी श्रीलंका सीरीज के विडियोज को अवश्य देखा जाना चाहिए। स्कूटर से उनको ग्रामीण क्षेत्रों में घूमते, ग्रामीणों, खेत में काम करते मजदूरों से वार्तालाप करना, छोटे छोटे ग्रामीण स्टालों, टापरियों पर जाकर खाना पीना, आत्मीयता से सुख दुख की बातें करना फिर उन सबकी मदद करना। निर्धन परिवारों और बच्चों की संस्थाओं में जाकर उनसे मेल मुलाकात, सहयोग का हाथ बढ़ाना और आर्थिक सहयोग करना, बहुत अद्भुत और मानवीय संवेदनाओं का प्रेरक गुलदस्ता सा बन जाते हैं ट्रेवल ब्लॉगर दावुद अकुंजादा।

ट्रेवल वीडियो देखते हुए यदि ब्लॉगर की अनुभूतियां हमारी अनुभूति में रूपांतरित होकर  संवेदनाओं और नैतिक मूल्यों का थोड़ा भी प्रस्फुटन करती हैं तो क्यों न हमें इनका भरपूर स्वागत और आभार व्यक्त करना चाहिए ! साधुवाद दावुद!

ब्रजेश कानूनगो

Tuesday, 30 July 2024

भोजन वही जो हम चाहें, कीमत वही जो तुम चाहो

भोजन वही जो हम चाहें, कीमत वही जो तुम चाहो


बहुत से ट्रेवल व्लॉगर्स पूर्व तैयारियों के साथ अपने वीडियो बनाते हैं। अपने हाथों में कैमेरा या मोबाइल स्टिक थामें हुए दृश्य का फिल्मांकन नहीं करते, बल्कि उनके साथ उनकी एक टीम होती है, कैमरामैन होता है, ड्रोन कैमेरा सहित आधुनिक तकनीक वाले अन्य उपकरण अपने साथ लेकर वे पूर्व निर्धारित डेस्टिनेशन या विशिष्ठ महत्व के स्थलों की सैर करते हैं।  जिन ऐसे व्लॉगरों के वीडियो हम यूट्यूब माध्यम पर नियमित देखते हैं उनमें पहला नाम वीजा टू एक्सप्लोर के हरीश बाली का लिया जा सकता है। 

हरीश बाली की विशेषता यह है कि वह जिस क्षेत्र में जाते हैं वहां के समूचे परिवेश पर उनकी नजर रहती है। वहां के स्थानीय खानपान के अलावा वहां के ऐतिहासिक महत्व, वहां की लोककलाएं, प्राकृतिक सौंदर्य, इतिहास और पर्यटन को वे समग्रता से शामिल करने की कोशिश करते हैं। इसके लिए आवश्यकता होने पर गाइड की सेवाएं लेकर भी वीडियो को असंदिग्धता और प्रामाणिकता मिल जाती है। प्रायः हरीश बाली पर्यटन विभागों के गेस्ट हाउसों या उनके द्वारा संचालित होटल में ठहरने को प्राथमिकता देते हैं। अन्यथा अन्य होटलों का चयन भी वे सूझबूझ के साथ करते हैं। 

जिस क्षेत्र में वे जाते हैं तो वहां के स्थानीय भोजन का जरूर आनंद उठाते हैं।  छत्तीसगढ़ जाएंगे तो  वहां का भोजन करना पसंद करेंगे, उड़ीसा में जाएंगे तो उड़ीसा के स्थानीय परंपरागत, वहीं का बना, उन्हीं से बनवाया हुआ भोजन खाएंगे।  मध्यप्रदेश के पचमढ़ी और कान्हा अभ्यारण्य की यात्रा में उन्होंने इसी तरह का भोजन किया।  स्थानीय ग्रामीणों के हाथों का बना भोजन किया। अपने दर्शकों को वे उस भोजन के जायके और उसमें प्रयुक्त सामग्री से भी बखूबी परिचित करवाते जाते हैं। स्थानीय स्ट्रीट फूड का जायका तो हरेक पर्यटक या व्लॉगर लेता ही है। बाली भी ऐसे वीडियो बनाते हैं। जोधपुर की कचोरी प्रसिद्ध है तो वहां कचोरी खाएंगे अगर कहीं का गुलाब जामुन या पेठा मशहूर है तो उसका आनंद भी उठाना ही है।  इंदौर का पोहा जलेबी, गराडू और भुट्टे का कीस कैसे छोड़ा जा सकता है। 

ट्रेवल व्लॉगरों के वीडियो में खानपान के दृश्यों को देखने में भी बड़ा आनंद आता है।  इसी तरह से डेली मैक्स जैसे विदेशी ब्लॉगर तो मुंबई या अहमदाबाद से केवल इंदौर में रात्रिकालीन सराफा बाजार के खाऊ बाजार के स्वादिष्ट स्वाद के लोभ में ही उड़े चले आते हैं। फिर छप्पन दुकान और इंदौर के अनेक खाऊ ठिए उन्हें तीन चार दिनों तक बांधे रखते हैं।   हालांकि ये लोग ट्रेवल ब्लॉगर हैं  लेकिन अपने वीडियो में खान-पान को भी बहुत महत्व देते हैं। यह सब देखते हुए  दर्शक न सिर्फ भारतीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यंजन संस्कृति से परिचित हो पाते हैं।  

राजस्थान के बंसी बिश्नोई जो बहुत अच्छे ट्रेवल ब्लॉगर हैं, जब चीन का दौरा करते हैं, तो उनको दो दिन तो समझ में ही नहीं आता है कि शाकाहारी भोजन कहां व कैसे मिलेगा।  उन्हे बहुत परेशानी होती है तो मुंह से शब्द निकल जाते हैं, घर से जो भाभी ने लाडू (लड्डू) बनाकर साथ में रखे हैं उनसे ही काम चलाऊंगा। देखते हुए अच्छा लगा कि ये लोग भी घर की बनी चीजें अपने साथ रखकर चलते हैं। हमारे यहां तो यह परंपरा रही है कि  लंबी यात्रा पर जाने से पूर्व लिट्टी, परांठे, थेपले, पूरियां साथ में मां अवश्य बांध ही दिया ही करतीं थीं। कुछ ब्लॉगर लोग अपने दो-तीन दिन के नाश्ते का सामान घर से साथ में ले कर निकलते हैं। मुझे याद है हमारी दादी दूध में गूंथे आटे की रोटियां और कैर सांगली की सब्जी यात्राओं के समय साथ लेकर चलती थीं, ये चीजें अधिक समय तक खराब नहीं होती हैं। भारतीय व्लॉगरों को भी ऐसा करते देख हम अतीत में पहुंच जाते हैं। नीदरलैंड के हमारे प्रिय सौरव और मेघा (देसी कपल ऑन द  गो ) भी वेजिटेरियन हैं और खानपान के मामले में  कई बार इनको बहुत दिक्कत आती हमने देखी है। ये लोग सबसे पहले सर्च करते हैं कि भारतीय रेस्टोरेंट कहां है, शाकाहारी खाना कहां मिलता है।  तो वहां जाकर खाते हैं, और जब वहां भी कुछ नहीं मिलता है तो मैंने उन्हें यह भी कहते सुना कि अब तो हॉस्टल जाकर अपने को थेपले ही निकालना पड़ेंगे। गुजराती थेपला, और उसके साथ दही और दूध तो हर जगह मिल ही जाता है। तो इससे काम चलाते हैं।  

वैसे समूची दुनिया में जितने रेस्टोरेंट है उनमें थोड़े प्रयास से हमको भारतीय खाना मिल ही जाता है, भारतीय कुक और खानसामें  मिल जाते हैं। भारतीय भोजन और रेस्टोरेंट काफी लोकप्रिय भी हैं।  कई वीडियो में देखा कि ज्यादातर शाकाहारी भोजन बनाने वाले कुक उत्तराखंड से आते हैं, कुछ नेपाल, बांग्ला देश और पाकिस्तान के भी मिल जाते हैं, हमारे साउथ इंडियन भाई  भी वहां भारतीय भोजन पकाते खिलाते मिलते हैं। 

विदेशी धरती पर भूख से व्याकुल किसी भारतीय को दाल मखानी, राजमा चावल, पालक पनीर, पकौड़ा कड़ी और छोला पूरी मिल जाए तो और क्या चाहिए! भोजन जो हम चाहें,कीमत जो तुम चाहो। 

**** 

ब्रजेश कानूनगो 

 

साइकिल पर सवार घुमक्कड़ का खानपान

साइकिल पर सवार घुमक्कड़ का खानपान 


हर व्यक्ति की कुछ नैसर्गिक जरूरतें होती हैं। वह आप हम जैसा सामान्य व्यक्ति हो या सार्वजनिक क्षेत्र का कोई विशिष्ठ व्यक्ति, नेता, अभिनेता ही क्यों न हो, रोजमर्रा के कुछ कार्य तो करना ही होते हैं। घुम्मकड़ और पर्यटक भी इनसे अलग नही होते बल्कि इन्हे तो थोड़ी अधिक ही परेशानियों का सामना करना पड़ता है।   

जीवन का अधिकतम समय यात्रा, घुम्मकड़ी और पर्यटन में गुजार देने वाले दुस्साहसी ट्रैवल व्लॉगर इन सबके बीच हमारे लिए वीडियो भी बनाते हैं और दुनिया के खूबसूरत नजारों, जनजीवन के दृश्यों को हमारे टीवी, मोबाइल स्क्रीन तक पहुंचा देने का कार्य करते रहते हैं।  उन्हे देखते हुए उनके अनुभव हमारे अनुभव में बदलते जाते हैं।यह एक तरह से ब्लॉगर का रचनात्मक योगदान ही कहा जाएगा।  

घुम्मकड़ को भी अपनी यात्रा और प्रवास के दौरान भूख सताती है, अपने को स्वच्छ और स्वस्थ बनाए रखना होता है। विदेशों में घुम्मकड़ी के दौरान खासतौर से शाकाहारी लोगों को समस्याएं आना बहुत स्वाभाविक है। चीन और कई साउथ एशियन देशों में तो हमारे यहां का सामिष याने नॉन वेजिटेरियन व्यक्ति भी मुश्किल में पड़ जाता है। अनेक जीवों से बनाए भोजन की कल्पना से ही सिहरन होने लगती है। अनेक घुम्मकड़ भारतीय रेस्टोरेंट ढूंढते हैं सर्च करते नजर आते हैं।  

जो साइकिल से घुम्मकड़ी करते हैं वे खाने का प्रबंध कैसे करते हैं,  उसके बारे में चर्चा करना बड़ा दिलचप होगा।  विश्व साइकिल यात्री साइकिल बाबा जिनका वीडियो हम देखते हैं अब तक 109 देशो की यात्रा साइकिल से कर चुके हैं। साइकिल चलाते हुए अगर रास्ते में कुछ साधन नहीं मिलता है तो सामान्यतः वे सड़क के किनारे अपना कैंपिंग कर लेते हैं, चाहे पेट्रोल पंप पर हो या कोई कैंपिंग एरिया अपना तंबू तान लेते हैं। अपने साथ में एक छोटा सा फोल्डिंग स्टोव रखते हैं, जो गैस के छोटे से गैस सिलेंडर से जुड़ जाता है। ट्रेवलर्स इसे अच्छी तरह जानते हैं, बहुत आम है। इस पर आप अपना खाना पकाना कर सकते हैं। साइकिल बाबा भी एक बर्तन रखते हैं,  कुछ ऐसी सामग्री अपने साथ रखते हैं जो रेडी टू ईट होती हैं। सब्जियां, चाय,काफी पाउच,मैगी कुछ फल भी साथ होते हैं उनके। उनकी साइकिल पर पानी की बोतलें लगाने के लिए व्यवस्था होती है। रास्ते के पेट्रोल पंप से जहां स्टोर होता है या किसी सुपरमार्केट से अपने खाने पीने का सामान थोड़ा-थोड़ा खरीद कर रखते हैं, अगले पड़ाव तक के लिए उतना ही होता है यह सब। किसी ओट के सहारे हवाओं से बचते हुए वहीं सड़क किनारे या कैंपिंग स्थान पर वहीं पर अपना खाना पकाते हैं, और खा लेते हैं। यह सब उन्हे करते हुए देखना भी बड़ा अच्छा लगता है।  थोड़े आराम के बाद या अगली सुबह फिर आगे की यात्रा पर निकल पड़ते हैं, अपनी धन्नो साइकिल पर तिरंगा लहराते हुए। 

वे कभी होटल में भी ठहर जाते हैं, कोई होम स्टे भी मिल जाता है, हॉस्टल की डोरमेट्री का भी उपयोग कर लेते हैं। सबसे दिलचस्प तो यह होता है कि पूरे विश्व में उनके भारतीय प्रशंसक और सब्सक्राइबरों का आतिथ्य उन्हे मिल जाता है। कई बार वे उन भारतीयों के परिवारों, दोस्तों के साथ भी खूबसूरत लम्हों को जीते हैं। दोस्तों के घर पर चार-पांच दिन भी रह लेते हैं। उनके साथ स्थानीय भ्रमण करते हैं, उन्ही लोगों के घर उनके साथ ही भोजन करते हैं।  यह देखकर बहुत अच्छा लगता है कि जब वह वहां से अगले पड़ाव के लिए यात्रा शुरू करते हैं तब मेजमान परिवार उनके साथ यथोचित भोजन भी साथ पैक करके देता है। वही पराठे,खिचड़ी या अन्य पकवान जब रास्ते में कहीं रुककर खोलते हैं तब जिस आत्मीयता से मेहमान परिवार को याद करते हैं तो बड़ी मार्मिक अनुभूति होती है।  बहुत अच्छा लगता है यह देखना कि भारतीय लोग पूरे विश्व में किस तरह से फैले हुए हैं और किसी भारतीय साइकिल यात्री का जिस प्रकार स्वागत सम्मान करते हैं, वह सचमुच देखने लायक होता है, मन को भिगो देता है।  

अफगानिस्तान, ईरान या इस तरह के अन्य देशों में जब विश्व साइकिल यात्री अपनी साइकिल से किसी हाईवे से गुजर रहे होते हैं तो अनेक कार या ट्रक चालक अपने वाहन रोक कर उनके पास चले आते हैं। बहुत से ट्रक चालक साउथ एशियन देशों के हमारे बंधु भी होते हैं जो थोड़ी थोड़ी हिंदी, उर्दू और भारतीय भाषाओं को समझते हैं, धन्नों पर तिरंगा लहराते देख साइकिल यात्री के स्वागत में प्रफुल्लित इन अजनबियों से मुलाकात गदगद कर देती है।  कोई अफगानिस्तान का होता है, कोई पाकिस्तान का होता है, बांग्लादेश का होता है कोई म्यामार का भी। जो एक दूसरे की भाषा नही जानते समझते वे भी बड़ी आत्मीयता से मिलते हैं। 

सबसे दिलचस्प तो तब होता है वे ट्रक ड्राइवर साइकिल यात्री को अपने ट्रक के पास ले जाते हैं, ट्रक में बने एक विशेष दराज को खोलते हैं तो पूरा किचन टेबल बाहर निकल आता है जहां पूरी रसोई का सामान सजा होता है। उसी पर खाना पकाना होता है और साइकिल बाबा को भी पेश किया जाता है। 

सड़क से गुजरते सद्भाव से भरे कार चालक और शुभचिंतक पानी की बोतलें और स्वल्पाहार उन्हे ऑफर करते हैं। जरूरत होती है तो वे स्वीकार लेते हैं, जरूरत नहीं होती तो धन्यवाद और मुस्कुराते हुए शुभकामनाएं व्यक्त कर देते हैं।
 
मुस्कुराहट, सद्भाव और सौहार्द्र की भाषा तो समूची पृथ्वी पर सब जानते ही हैं, साइकिल बाबा को जो निश्छल प्रेम मिलता है यह देखना सचमुच अद्भुत आनंद से हमें लबालब कर देता है। यूट्यूब पर साइकिल बाबा के नाम से उनका ट्रेवलॉग चैनल है जिसको देखते हुए हम भी कुछ हद तक उनके हमसफर बन जाते हैं और दुनिया के खूबसूरत लोगों और नजारों के  मानस साक्षी बन जाते हैं।  

***
ब्रजेश कानूनगो

Monday, 22 July 2024

जीवित ज्वालामुखी और लावा पर कैंपिंग

जीवित ज्वालामुखी और लावा पर कैंपिंग 

स्कूल के शुरुआती दिनों में याने प्राथमिक, माध्यमिक कक्षाओं के समय हर साल भूगोल विषय की किताबों में पृथ्वी की उत्पत्ति से लेकर इसकी संरचना,वनस्पति, महासागरों, नदियों,पहाड़ों, प्राकृतिक  घटनाओं आदि के बारे में पढ़ाया जाता था। सातों महाद्वीपों के आकार प्रकार, विभिन्न महासागरों की विशालता और गहराई के बारे में समझाया जाता था। हरेक की जलवायु और उनकी भिन्न प्रकृति की जानकारी दी जाती थी। इसके लिए हम लोग पुस्तक विक्रेता से एक एटलस याने मानचित्रों की एक पुस्तक भी खरीद लाते थे, जिसमे इन्ही सब बातों को सचित्र दर्शाया गया होता है।

इसी दौर में हमने भूगर्भीय हलचलों के बारे में पढ़ा। भूकंप और ज्वालामुखियों के बारें में पढ़ते हुए बहुत रोमांचित हो जाते थे। ऐसी घटनाएं हमारे लिए उस वक्त अजूबा होती थीं। किस तरह धरती कांपती है और किस तरह जनजीवन अस्त व्यस्त हो जाता है। समाचार पत्रों में कभी कुछ पढ़ने को मिल जाता था तो अनुमान लगाकर काल्पनिक ताल मेल बैठाने की कोशिश करते थे। लेकिन जब से दूरदर्शन या टीवी आया तब से नई पीढ़ी ने उसके जीवंत दृश्यों को स्क्रीन पर साक्षात देखा है। ज्वालामुखी कैसे होते हैं, किस तरह वे लावा उगलते हैं, यह सब नई पीढ़ी के साथ साथ उम्रदराज लोग भी अब इंटरनेट के माध्यम से साक्षात देख पाते हैं।

प्राकृतिक प्रकोप से सुरक्षित भूभाग के आम लोगों के लिए भी भूकंप, सुनामी और ज्वालामुखी की भयानक घटनाएं अब कल्पना और अनुमान की बातें नहीं रहीं।  आधुनिक टेक्नोलोजी की बदौलत इनसे हुआ विध्वंस, प्रभाव और खौफनाक मंजर अब सबकी आंखों के सामने घटित होता नजर आता है। अब तो मनुष्य समाज को इतनी सुविधाएं प्राप्त हो गईं है कि वह ज्वालामुखी फटने जैसी खौफनाक घटना को भी भौतिक रूप से घटना स्थल के सामने खड़े होकर अपनी आंखों से देख सकता है। ज्वालामुखी तक पहुंचने के लिए अब पर्यटन व्यवस्थाएं भी काफी चलन में आ गईं हैं।

जीवित ज्वालामुखी पर्यटन कोई नई बात नहीं रही है। कई शताब्दियों से सक्रिय ज्वालामुखियों की कष्ट साध्य यात्रा करते रहे हैं। वर्तमान समय में भी हर साल लाखों पर्यटक सक्रिय और निष्क्रिय ज्वालामुखियों को देखने जाते हैं। वे इनकी भयानकता के बावजूद इसके शानदार नज़ारे देखना चाहते हैं। वे ज्वालामुखी पर्वतों के पास के खूबसूरत सूर्योदय और सूर्यास्त का आनंद लेना चाहते हैं। विस्फोटों और धधकते लावा के बहाव को अनुभव करते हुए उसकी शानदार तस्वीरें दुनिया के अन्य लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।

कई देसी विदेशी घुम्मकड़ों,पर्यटकों  को ऐसा करते हमने यूट्यूब पर अनेक ट्रेवल विडियोज में देखा है कि वे किस तरह ऐन ज्वालामुखी की तलहटी तक पहुंचते हैं, कैंप में सोते हैं और विस्फोटों के समय उन दृश्यों को देखते हैं और कैमरों में कैद कर लेते हैं। विडियोज बनाते हैं। 

इसी वर्ष (2024) के मार्च की एक खबर पढ़ी थी कि आइसलैंड के दक्षिणी हिस्से में ज्वालामुखी फटने के बाद वहां आपातकाल की घोषणा कर दी गई। इससे पहले इस यूरोपीय देश के रेकजेन्स प्रायद्वीप में बीते साल दिसंबर 2023 के बाद यह चौथा ज्वालामुखी विस्फोट था। इसी बात से इसकी भयावहता का अनुमान लगाया जा सकता है कि ज्वालामुखी से निकला लावा पास के कस्बे ग्रिंडाविक  तक पहुंच गया और उसको खाली करवा लिया गया। इसके अलावा पर्यटकों की पसंदीदा जगह ब्लू लगून के पास मौजूद लोगों को भी वहां से हटाकर सुरक्षित जगह पहुंचाया गया। ज्वालामुखी से निकलने वाला लावा दो या अधिक धाराओं में अलग-अलग दिशाओं में बहने लगता है। स्थानीय प्रशासन को हमेशा अपने नागरिकों और पर्यटकों की चिंता बनी रहती है।

सामान्य जानकारी हेतु यहां बताना उचित होगा  कि आइसलैंड में 33 सक्रिय ज्वालामुखी हैं। यह देश मिड-एटलांटिक रेंज पर है जहां पृथ्वी की दो सबसे बड़ी टेक्टोनिक प्लेट्स मिलती हैं। पूरी पृथ्वी पर लगभग 1500 से ज़्यादा सक्रिय ज्वालामुखी हैं। हर साल लगभग 50-70 ज्वालामुखी फटते हैं। यूरोप में 82 ज्वालामुखी हैं और इनमें से 33 आइसलैंड में हैं। भारतीय भूभाग में दो ज्वालामुखी हैं, पहला, बैरन ज्वालामुखी जो बैरन द्वीप अंडमान निकोबार दीप समूह में मध्य अण्डमान के पूर्व में स्थित है तथा दूसरा, नारकोंडम ज्वालामुखी जो अंडमान निकोबार द्वीप समूह के उत्तर अण्डमान के पूर्व में है। बैरन ज्वालामुखी को सक्रिय या जागृत ज्वालामुखी माना गया है।

बहरहाल, यहां बात ज्वालामुखी पर्यटन की ही करते हैं। इन क्षेत्रों में कई ट्रेवल कंपनियां हैं जो पर्यटकों को ज्वालामुखी पर्यटन कराती हैं, जिनमें उनको वहां तक ले जाना, खाने पीने की व्यवस्था करना, गाइड के नेतृत्व में ट्रेकिंग करवाना आदि शामिल होता है। यह सुरक्षित तो होता है लेकिन बहुत थका देने वाला भी। यूट्यूब माध्यम से हमने आइसलैंड और इथोपिया के कुछ जीवित ज्वालामुखियों पर दीपांश, शुभम, बंसी वैष्णव तथा कुछ अन्य विदेशी पर्यटकों के व्लॉगरों के वीडियो से यहां की रोमांचक यात्रा का मानस अनुभव लिया है। 

इथोपिया के ट्रेवल एजेंसी के लोग इन पर्यटकों को शक्ति शाली एस यू वी गाड़ियों से रेतीले मरुस्थल से होकर एर्टा ऐल ज्वालामुखी की तलहटी तक ले जाते हैं। यहां गिट्टियों की तरह का पुराना काला लावा बिखरा होता है जिसे समतल करके ट्रेवल एजेंसियों ने यहां खाने पीने की व्यवस्था लगाई होती है। रात को यहीं पर गाड़ियों पर लाद कर लाए गए गद्दों को बिछा दिया जाता है। हरेक पर्यटक की अलग रजाई, कंबल, बिस्तर होता है। ठंडे लावे के फर्श पर किसी धर्मशाला में ठहरे बारातियों की तरह सेवाएं की जाती हैं। कैंप क्षेत्र से रात भर विस्फोटों की आवाजें अवश्य सुनाई देती हैं किंतु ज्वाला और आग के दर्शन नहीं होते यहां से।

सुबह तड़के कोई चार बजे ज्वालामुखी के मुहाने के करीब पहुंचने का ट्रेकिंग शुरू हो जाता है। थोड़ी देर में ताजा निकला लावा दिखाई देने लगता है। यह कोई एकाध महीने पूर्व का लावा है। पैर रखने पर चटकने लगता है। कुछ यात्रियों के पैर भी जख्मी हो जाते हैं। कष्ट की कोई परवाह नहीं है। जीवित ज्वालामुखी को देखने का असीम उत्साह थकने नही देता, पीड़ा की अनुभूति नहीं होती। यही नजारा आइसलैंड के ज्वालामुखी पर्यटन का है।

थोड़ा और आगे पहुंचने पर अंधेरे में लाल लाल चमकती धाराएं नजर आने लगती हैं। ये बहते गर्म लावा की धाराएं हैं, जिनमे अंगारे बह रहे हैं। थोड़ा और आगे बढ़ने पर ज्वालामुखी पर्वत नजर आते हैं, आग उगलते दानव की तरह। धरती ने अपना मुंह खोल दिया है। चिंगारियां बरस रही है। पहाड़ के मुख से गर्म लावा कई धाराओं बहकर नीचे की ओर बहुत धीमी गति से कोई 20 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चला आ रहा है। गनीमत है पर्यटक ऊपर पहाड़ पर हैं।

थोड़ा और आगे ताजा दो तीन दिन पुराना लावा है अभी ठंडा नहीं हुआ है। जैसे सिगड़ी के भीतर अंगारों की आंच अभी बाकी है। आइसलैंड में बच्चो के साथ आया पर्यटक परिवार इन अंगारों पर अपने साथ लाए सींक टिक्के को गर्म करता है। अपने साथियों को भी देता है। यह अद्भुत है रोमांचक है। टीवी स्क्रीन पर हम आंखें गढाए इन बच्चों को आग के पास नहीं जाने की, उससे नहीं खेलने की चेतावनी देते लगते हैं। लेकिन वे सुरक्षित हैं, अब तक शायद घर भी लौट आए होंगे, तभी तो हम यह वीडियो देख पा रहे हैं।

जीवित ज्वालामुखी के इतने करीब पहुंच कर हम तक इन विडियोज को पहुंचाने के लिए आभार के साथ शुभकामनाओं के अलावा हमारे पास देने के लिए इससे बेहतर और क्या हो सकता है।


ब्रजेश कानूनगो

डिका जनजाति : गायों में निहित हैं उनके सुख दुख

डिका जनजाति : गायों में निहित हैं उनके सुख दुख सुबह की सुनहरी लालिमा अभी छंटी भी नहीं थी कि दक्षिण सूडान की डिका जनजाति की बस्ती में हलचल शु...