दिव्यांग की चुनौती : हम कब कहेंगे उन्हें पहले आप !
प्राकृतिक रूप से या किसी दुर्घटनावश शारीरिक रूप से कुछ कमियों के रह जाने पर ऐसे विशेष व्यक्तियों को ‘फिजिकली हेंडीकेप्ट’ या ‘विकलांग’ जैसे शब्दों से पुकारा जाता रहा है। बाद में संबोधन में सम्मान देने की दृष्टि से ‘स्पेशली चैलेंजड’ या ‘दिव्यांग’ जैसे बेहतर शब्दों को आगे बढाया गया। बोलने और सुनने की शक्ति में कमी होने पर ऐसे लोगों को गूंगे बहरे की जगह ‘मूक बधिर’ और आँखों से देखने में अक्षम होने पर या नजर कम हो जाने पर ‘नेत्रहीन’ की बजाए ‘दृष्टि बाधित’ का प्रयोग किया जाना किसी भी सभ्य समाज में इन विशेष व्यक्तियों के लिए सम्मानजनक जगह बनाने के प्रयासों का एक महत्वपूर्ण और मानवीय संवेदनाओं का अनुकरणीय उदाहरण कहा जा सकता है।
दुनिया भर में कम ज्यादा पैमाने पर ऐसे प्रयास दिखाई देते हैं. कनाडा प्रवास के दौरान मुझे दिव्यांगों को लेकर नागरिक और सरकारी स्तर पर किये गए प्रयासों को देख-जानकर बहुत अच्छा लगा। कागज़ पर बनाई गयी योजनाओं का सचमुच धरातल पर क्रियान्वित होना विशेष व्यक्तियों के प्रति सहयोग और सच्ची संवेदनाओं का परिचायक है।
यहाँ हर सार्वजनिक स्थल पर विशेष व्यक्तियों के लिए आगे बढ़कर सुविधाएं उपलब्ध कराईं गईं हैं। सार्वजनिक बसों में चढ़ने, उतरने के लिए लो फ्लोर और विशेष लोगों के ट्रेन कोच के सामने स्टेशनों पर कुछ ऊंचे उठे हुए प्लेटफोर्म बने हैं। विकलांग व्यक्ति अपनी व्हील चेयर सहित आसानी से भीतर प्रवेश कर लेता है। बस या कोच के भीतर भी व्हील चेयर को खडा रखने के लिए स्थान छोड़ा गया होता है। यहाँ दो-तीन व्हील चेयर्स अन्य यात्रियों को बिना कोई परेशानी के खडी की जा सकती हैं।
रजिस्ट्रेशन या टिकिट काउंटरों पर दिव्यांगों के लिए अलग से खिड़कियाँ, पार्किंग स्थलों पर उनकी चार पहिया या चेयर गाड़ियों के लिए आरक्षित स्थान, रेलवे स्टेशनों, बाजारों, पार्कों, सभागृहों, मनोरंजन स्थलों आदि में रैम्प, एक्सलेटरों के अलावा अलग से लिफ्ट आदि रखे जाना अनिवार्य सा ही है। मैंने कनाडा प्रवास के दौरान ऐसा कोई स्थान नहीं देखा जहां इन चीजों की उपेक्षा की गई हो। बल्कि इनके लिए नियत पार्किंग स्थानों का उपयोग सामान्य व्यक्ति द्वारा किया जाने पर दंडात्मक टिकट अवश्य कट जाता है।
जरूरतमंद की मदद और सहयोग करना तो यहाँ संस्कारों का हिस्सा महसूस हुआ। जहां सामान्य व्यक्ति के लिए ही जब सहयोग के हाथ बढ़ना सामान्य बात है वहां ‘विकलांग’ के लिए तो कोई कसर रह ही नहीं सकती इधर।
दरअसल विकसित देशों में विकलांगों को सहज जीवन जीने के अवसर देने हेतु कई सुविधाएं आम तौर पर और सरकारी तौर पर दी जाती हैं। खासतौर से रोजगार,शिक्षा, स्वास्थ्य ,परिवहन और सामाजिक क्षेत्रों में विकलांगों को ध्यान में रखकर नियम, अधिनियम बनें हैं जिनका कड़ाई से पालन किया जाता है।
यूएसए और कनाडा में विकलांग व्यक्तियों को रोजगार, शिक्षा और परिवहन में प्राथमिकता देने के लिए कई कानून और नीतियां हैं। अमेरिकास विद डिसएबिलिटी एक्ट (एडीए) विकलांग व्यक्तियों को रोजगार में भेदभाव से बचाता है। कनाडा में भी विकलांग व्यक्तियों को रोजगार में भेदभाव से बचाने के लिए कनाडियन ह्यूमन राइट्स एक्ट है। इन अधिनियमों के तहत नियोक्ताओं को विकलांग व्यक्तियों को उचित आवास प्रदान करना होता है।
इसी प्रकार शिक्षा के क्षेत्र में विकलांग शिक्षा अधिनियम (आईडीईए) विकलांग छात्रों को मुफ्त और उपयुक्त शिक्षा प्रदान करता है। स्कूलों को विकलांग छात्रों को उचित आवास प्रदान करना होता है। कनाडा में विकलांग छात्रों को शिक्षा में भेदभाव से बचाने के लिए कनाडियन ह्यूमन राइट्स एक्ट है जिसके अंतर्गत स्कूलों को विकलांग छात्रों को उचित आवास प्रदान करना आवश्यक होता है। अमेरिकास विद डिसएबिलिटी एक्ट (एडीए) विकलांग नागरिकों और लोगों को परिवहन में भेदभाव से बचाता है। सार्वजनिक परिवहन को विकलांग व्यक्तियों के लिए सहज सुलभ होना चाहिए। कनाडा में विकलांग व्यक्तियों को परिवहन में भेदभाव से बचाने के लिए कनाडियन ह्यूमन राइट्स एक्ट है। जो सार्वजनिक परिवहन में विकलांग व्यक्तियों को प्राथमिकता देना सुनिश्चित करता है।
इसके साथ ही विकसित देशों में विकलांग व्यक्तियों को सहायक उपकरण और सहायता सामग्री प्रदान की जाती है, जैसे कि व्हीलचेयर, श्रवण यंत्र, और कृत्रिम अंग। विकलांग व्यक्तियों को शिक्षा और रोजगार के अवसर प्रदान किए जाते हैं, जिससे वे आत्मनिर्भर बन सकें। मुफ्त या रियायती दरों पर चिकित्सा सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाती हैं। पेंशन और बीमा योजनाओं द्वारा विकलांग लोगों को सामाजिक सुरक्षा देने के प्रावधान किए गए हैं। लो फ्लोर बसों और ऊंचे प्लेटफॉर्म वाली सुलभ परिवहन व्यवस्था के साथ उनके लिए सुलभ भवन और सार्वजनिक स्थान बनाए जाते हैं, जिनमें कि रैंप और एलिवेटर की व्यवस्था अनिवार्य होती है।
हमारे देश भारत में भी विकलांग व्यक्तियों के लिए कई सुविधाएं और प्रोत्साहन योजनाएं कार्यान्वित हैं। विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत, विकलांग व्यक्तियों को समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण और पूर्ण भागीदारी प्रदान करने का प्रावधान किया गया है।की जाती है।
सुगम्य भारत अभियान का उद्देश्य विकलांग व्यक्तियों के लिए बाधा मुक्त और अनुकूल वातावरण बनाना है। दीनदयाल विकलांग पुनर्वास योजना (डीडीआरएस) के तहत, गैर सरकारी संगठनों को विकलांग व्यक्तियों के पुनर्वास के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।विकलांग व्यक्तियों को सहायक उपकरण और सहायता सामग्री की खरीद हेतु सहायता (एडीआईपी) योजना है जो विकलांग व्यक्तियों को सहायक उपकरण और सहायता सामग्री प्राप्त करने में मदद करती है।प्रदान की जाती है। विकलांग पेंशन योजना के तहत, विकलांग व्यक्तियों को मासिक पेंशन प्रदान की जाती है। विकलांग व्यक्तियों के लिए शिक्षा और रोजगार में आरक्षण प्रदान किया जाता है। मुफ्त या रियायती दरों पर स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान की जाती हैं।
इन सुविधाओं के अलावा, प्रधानमंत्री विकलांग योजना,विकलांग लोन योजना, दिव्यांगजन स्वावलंबन योजना,विकलांगों के लिए राज्य पुरस्कार योजना जैसे कार्यक्रम भी भारत सरकार ने शुरू किए हैं ।
इन योजनाओं और कार्यक्रमों के माध्यम से यद्यपि भारतीय समाज में भी विशेष व्यक्तियों के प्रति नजरिये और व्यवहार में शनै शनै सकारात्मक परिवर्तन आता दिखाई दे रहा है। लेकिन जन्म से शारीरिक कमी लिए बच्चे के विकास और उसके शिक्षण प्रशिक्षण में वह रूचि और दायित्व अभी पालकों में पैदा नहीं हो सका है जो इधर विकसित समाज में नजर आता है। विकलांग व्यक्ति यहाँ लगभग मुख्यधारा का हिस्सा है. हमारे यहाँ आज भी अधिकाँश ग्रामीण और गरीब परिवारों के विशेष व्यक्ति चौराहों , मंदिरों या सार्वजनिक स्थलों पर मदद की गुहार लगाते दिखाई दे जाते हैं। सरकारें और स्वैच्छिक संगठन उनकी मदद के लिए जरूर कुछ आगे आकर तिपहिया आदि भेंट कर उनकी सहायता करने की थोड़ी सी कोशिश करते रहते हैं, लेकिन जब तक बचपन से ही उनमें आगे बढ़ने का जज्बा और अन्य सामान्य लोगों में उनके प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन जागृत नहीं होगा, तब तक बात बनती दिखाई नहीं देती।
‘विकलांग’ को ‘दिव्यांग’ जैसे शब्द में बदलकर भावनात्मक रूप से तो अपनी पीठ अवश्य ठोकी गई है लेकिन आचरण और व्यवहार में वास्तविक दिव्यता तो तब ही आएगी जब हमारे मुंह से निकलेगा- ‘पहले आप!’
ब्रजेश कानूनगो
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