Tuesday, 13 January 2026

जैव विविधता के संरक्षण की चिंताओं के प्रतीक शुभंकर

जैव विविधता के संरक्षण की चिंताओं के प्रतीक शुभंकर

शुभंकर को अंग्रेजी में Mascot (मैस्कॉट) कहते हैं, जिसका मतलब है, ऐसा एक प्रतीक चिन्ह जिसमे कोई जानवर या कोई व्यक्ति चित्रित या प्रदर्शित होता है जो किसी संगठन, टीम या इवेंट के लिए सौभाग्य या पहचान माना जाता है और उनका प्रतिनिधित्व करता है।

खेल आयोजनों में शुभंकर रखने की परंपरा 1968 में ग्रेनोबल, फ्रांस में आयोजित शीतकालीन ओलंपिक से शुरू हुई, जब शुस नामक एक छोटा सा स्कीयर शुभंकर बनाया गया था। इसके बाद, 1972 में म्यूनिख में आयोजित ओलंपिक में वाल्डी नामक एक डैचशंड को शुभंकर बनाया गया, जो ओलंपिक के पहले आधिकारिक शुभंकर थे। स्कीयर शुभंकर शुस एक छोटा सा स्कीयर था, जो एक मानव जैसा प्राणी था, न कि कोई जानवर। यह 1968 में ग्रेनोबल, फ्रांस में आयोजित शीतकालीन ओलंपिक के लिए बनाया गया था। जबकि वाल्डी एक डैचशंड था, जो एक प्रकार का कुत्ता है। यह 1972 में म्यूनिख में आयोजित ओलंपिक के लिए बनाया गया आधिकारिक शुभंकर था।

शुभंकर का उद्देश्य खेल आयोजनों को अधिक आकर्षक और मनोरंजक बनाना होता है, साथ ही साथ आयोजकों को अपनी ब्रांडिंग और प्रचार के लिए एक मंच भी प्रदान करता है। शुभंकर अक्सर स्थानीय संस्कृति और परंपराओं को दर्शाते हैं और आयोजनों के लिए अनोखे और यादगार अनुभव प्रदान करते हैं।

भारत में शुभंकरों का उपयोग विभिन्न खेल आयोजनों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में किया जाता रहा है।  शुभंकरों को अक्सर टीम की भावना और ऊर्जा को दर्शाने के लिए डिज़ाइन किया जाता है।

शुभंकरों के डिज़ाइन में आमतौर पर उनकी आँखें बड़ी और आकर्षक बनाने से उन्हें जीवंत और मित्रवत बनाया जाता है। इन्हें चमकदार और आकर्षक रंग प्रदानकर और अधिक मनभावक भी बनाया जाता है। शुभंकरों का आकार अक्सर बड़ा और आकर्षक होता है, जिससे वे दूर से ही दिखाई दें। इनका व्यक्तित्व कुछ इस तरह निर्मित किया जाता है कि वे टीम या आयोजन की भावना को प्रकट कर सकें।

बहुत लोगों को अब भी याद होगा कि भारत में संपन्न 1982 के नई दिल्ली एशियाई खेलों का शुभंकर अप्पू (Appu) नामक एक युवा,चंचल हाथी था, जो एशियाई खेलों के इतिहास का पहला शुभंकर बना और शक्ति, बुद्धि तथा भारत की संस्कृति का प्रतीक बन गया था। भारतीय संस्कृति में हाथी को बहुत श्रद्धा भाव से देखा जाता है, अप्पू को उसी प्रतिरूप जो भारत की समृद्ध विरासत, शक्ति और बुद्धि का प्रतिनिधित्व करता था, साथ ही खेलों में युवाओं के उत्साह और भागीदारी को दर्शाता था। 'अप्पू' जैसे प्यारे नाम भी भारत में हाथियों के लिए इस्तेमाल होने वाला वाला एक सामान्य नाम है, जो हिंदी शब्द 'आहनाप' (हाथी) से लिया गया। आयोजन के दौरान अप्पू इतना लोकप्रिय हुआ कि उसे प्रचार सामग्री, व्यापारिक वस्तुओं और समारोहों में दिखाया जाता रहा। जिससे खेलों के लिए एक उत्सवपूर्ण माहौल भी बना। इस संदर्भ में यह भी दिलचस्प है कि शुभंकर के प्रतीक के अलावा, एक वास्तविक जीवित हाथी (जिसका नाम कुट्टिनारायणन था) भी इस आयोजन का हिस्सा था रहा था।  बताया जाता है कि एक टैंक में गिरने के बाद वह घायल हो गया था और बाद में उसकी मृत्यु हो गई। 

दुनियाभर में होने वाले प्रमुख खेलों के वन्य जीवों एवं अन्य प्राणियों पर आधारित शुभंकरों की जानकारी जुटाते हैं तो पता चलता है कि 1980 में रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) में मॉस्को ग्रीष्मकालीन ओलंपिक का शुभंकर भालू 'मिशा' ((Brown Bear)) था, जो ओलंपिक इतिहास के सबसे प्रसिद्ध शुभंकरों में से एक है। भालू रूस के राष्ट्रीय गौरव और शक्ति का प्रतीक है। इसे बहुत ही प्यारा और मिलनसार दिखाया गया था, जिसने दुनिया भर के लोगों का दिल जीत लिया था।

वर्ष 2000 के खेलों में सिडनी (ऑस्ट्रेलिया) में ऑस्ट्रेलिया के तीन अनोखे जीवों को शुभंकर बनाया गया। प्लैटिपस (Platypus), कूकाबुरा (Kookaburra) और इकिडना (Echidna)।  ​सिड (प्लैटिपस) पानी में रहने वाला जीव, ​ओली (कूकाबुरा) ऑस्ट्रेलिया का प्रसिद्ध पक्षी और ​मिली (इकिडना) एक चींटीखोर जैसा दिखने वाला कांटेदार जीव होता है।​ ये तीनों क्रमश: पानी, हवा और धरती का प्रतिनिधित्व करते थे।

​2008 के बीजिंग ओलंपिक में पांच शुभंकर थे, जिनमें 'जिंगजिंग' (विशाल पांडा) मुख्य था। पांडा चीन में राष्ट्रीय महत्व का प्राणी है। इसके अलावा इसमें एक तिब्बती मृग (यिंगयिंग) और एक निगल पक्षी (निनि) भी शामिल थे। ये सुख, स्वास्थ्य और सौभाग्य के प्रतीक माने जाते हैं।

2016 में ब्राजील में आयोजित रियो ओलंपिक खेलो का शुभंकर 'विनिसियस' एक मिश्रित वन्यजीव (Hybrid Animal) था, यह कोई एक जानवर नहीं था, बल्कि ब्राजील के विभिन्न जानवरों (बिल्ली, बंदर और पक्षियों) का एक मिश्रण था। यह ब्राजील की जैव-विविधता और उनकी चपलता का प्रतीक था।

​कतर में 2022 के फीफा विश्व कप में 'लाएब'  शुभंकर बना, हालांकि यह जानवर नहीं था (यह एक पारंपरिक अरबी हेडड्रेस 'कुफिया' जैसा था), लेकिन फीफा के इतिहास में 'विली' (शेर) को याद करना जरूरी है। 1966 (इंग्लैंड) में 'विली' विश्व कप का पहला शुभंकर था, जो एक ब्रिटिश शेर था।

शुभंकर के लिए प्राणियों को चुनने के पीछे भी बहुत सोचे समझे कारण होते हैं। जिनमें क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान, खेल भावना के हार्दिक प्रदर्शन के साथ साथ लुप्तप्राय प्रजातियों को शुभंकर बनाकर उनके संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाना भी उद्देश्य होते हैं। 

हमारे देश में खेलो इंडिया अभियान के शुभंकर हर संस्करण के साथ बदलते रहते हैं; हाल ही में, खेलो इंडिया यूथ गेम्स 2025 के लिए गजसिंह (हाथी और शेर का मिश्रण) था, जबकि खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स 2025 के लिए खम्मा और घनी (ऊँट) थे, और खेलो इंडिया पैरा गेम्स 2023 के लिए उज्ज्वला (गौरैया) थी। हमारी धरती पर जैव विविधता और पर्यावरणीय संतुलन के प्रति ऐसा रचनात्मक दृष्टिकोण बहुत आश्वस्त करता है।


ब्रजेश कानूनगो


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