कंगारू के देश में ऊंटों का जलवा
जिस तरह अफ्रीका महाद्वीप की जेब्रा, जिराफ,चिंपाजी और शेर से, अंटार्कटिका की पेंग्वीन, शील,व्हेल से, उत्तरी ध्रुव प्रदेश की भालू से, अरब और रेगिस्तान क्षेत्र की ऊंटों से पहचान बनती है उसी तरह ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप की पहचान कंगारू से बनती है। कंगारू ऑस्ट्रेलिया का सबसे प्रतिष्ठित और राष्ट्रीय पशु है। यह अपने खास चलने के अंदाज और बच्चों को रखने वाली थैली के कारण पूरी दुनिया में जाना जाता है। प्राकृतिक रूप से कंगारू केवल ऑस्ट्रेलिया और न्यू गिनी के क्षेत्रों में ही पाए जाते हैं। यह दुनिया के अन्य किसी भी महाद्वीप (जैसे एशिया, अफ्रीका या अमेरिका) में प्राकृतिक रूप से नहीं मिलता। करोड़ों साल पहले जब ऑस्ट्रेलिया अन्य महाद्वीपों से अलग हुआ, तो यहाँ के जीव बाकी दुनिया से कट गए। कंगारू एक 'मार्सुपियल' (Marsupial) यानी धानीप्राणी है, और इस प्रजाति का विकास इसी भौगोलिक अलगाव के कारण ऑस्ट्रेलिया में हुआ।
कंगारू जैसे अपने इस विशिष्ट जीव की पहचान के बावजूद ऑस्ट्रेलिया अपने यहां के ऊंटों के कारण भी बहुत चर्चा में बना रहता है। शायद आपको जानकर हैरानी हो कि आज सऊदी अरब और कतर जैसे देश, जहाँ ऊंटों की बहुत अहमियत है, ऑस्ट्रेलिया से ऊंट आयात करते हैं। इसके दो मुख्य रूप से दो कारण हैं पहला यह कि ऑस्ट्रेलिया के ऊंट रोग-मुक्त और पूरी तरह 'ऑर्गेनिक' होते हैं, इसलिए उनके मांस की मांग अरब देशों में बहुत है। दूसरा कारण है कि आस्ट्रेलियाई ऊंटों की शुद्धता और मजबूती के कारण, इनका उपयोग वहां की नस्लों को बेहतर बनाने के लिए किया जा रहा है।
अरब और भारत के ऊंटों से इनके अलग होने के कुछ विशिष्ट कारण हैं। मध्य पूर्व और भारत के ऊंट अक्सर कई बीमारियों (जैसे 'सरा') से ग्रस्त रहते हैं, लेकिन ऑस्ट्रेलिया के ऊंट दुनिया के सबसे स्वस्थ ऊंट माने जाते हैं। इसका कारण यह है कि वे एक सदी से भी अधिक समय तक बाहरी दुनिया से अलग-थलग रहे, जिससे उन तक संक्रामक बीमारियाँ नहीं पहुँचीं। क्योंकि ये ऊंट जंगली हैं, इन्हें भोजन और पानी के लिए मीलों चलना पड़ता है। इस कारण ये पालतू ऊंटों की तुलना में अधिक मांसपेशी युक्त (Muscular) और ताकतवर होते हैं। आज ऑस्ट्रेलिया में दुनिया की सबसे शुद्ध 'ड्रोमेडरी' (एक कूबड़ वाली) नस्ल पाई जाती है, क्योंकि वहां इनका अन्य प्रजातियों के साथ संकरण (Cross-breeding) नहीं हुआ।
पालतू ऊंट आमतौर पर शांत होते हैं, लेकिन ऑस्ट्रेलिया के जंगली ऊंट इंसानों के प्रति बहुत सतर्क और कभी-कभी आक्रामक होते हैं। ये ऊंट बहुत बड़े झुंडों में रहते हैं (कभी-कभी सैकड़ों की संख्या में), जबकि पालतू ऊंटों को छोटी टोलियों में रखा जाता है। सूखे के समय ये हजारों की तादाद में एक साथ पानी की तलाश में निकलते हैं, जो एक डरावना दृश्य होता है।
ऑस्ट्रेलिया के कुछ इलाकों में पानी बहुत खारा होता है। यहाँ के ऊंटों ने उच्च लवणता (Salinity) वाला पानी पीने की क्षमता विकसित कर ली है, जो सामान्य पालतू ऊंटों के लिए घातक हो सकता है। ये ऊंट ऑस्ट्रेलिया की स्थानीय कँटीली झाड़ियों और उन पौधों को भी खा जाते हैं जिन्हें वहां के स्थानीय जानवर (जैसे कंगारू) नहीं खा सकते।
ऑस्ट्रेलिया में ऊंटों का इतिहास और वर्तमान स्थिति काफी अनोखी है। जहां दुनिया के कई हिस्सों में ऊंट पालतू जानवर के रूप में पाए जाते हैं, वहीं ऑस्ट्रेलिया में ये "जंगली" (Feral) हो चुके हैं और पर्यावरण के लिए एक बड़ी चुनौती बन गए हैं। ऑस्ट्रेलिया में ऊंट प्राकृतिक रूप से नहीं पाए जाते थे। सबसे पहले 1840 में कैनरी आइलैंड्स से ऊंट ऑस्ट्रेलिया लाए गए। इसके बाद 1860 से 1907 के बीच भारत और अफगानिस्तान से हजारों ऊंट आयात किए गए।
विशाल रेगिस्तानी इलाकों की खोज, सामान ढोने, और रेलवे व टेलीग्राफ लाइनों के निर्माण के लिए ऊंट सबसे उपयुक्त थे क्योंकि वे घोड़ों से अधिक सहनशील थे। इनके साथ 'अफगान' ऊंट हांकने वाले लोग (Cameleers) भी आए। जब मोटर गाड़ियां और ट्रेनें आ गईं, तो ऊंटों की जरूरत खत्म हो गई। कई मालिकों ने इन्हें मारने के बजाय रेगिस्तान में खुला छोड़ दिया। अनुकूल वातावरण और शिकारियों की कमी के कारण इनकी आबादी तेजी से बढ़ी।
आज ऑस्ट्रेलिया में जंगली ऊंटों की संख्या 10 लाख से भी अधिक होने का अनुमान है, जो हर 8-9 साल में दोगुनी हो जाती है। इनके कारण अनेक समस्याएं पैदा हो रही हैं। ये ऊंट एक बार में सैकड़ों लीटर पानी पी सकते हैं। सूखे के दौरान, पानी की तलाश में आदिवासी बस्तियों में घुस जाते हैं, पाइपलाइन तोड़ देते हैं और एयर कंडीशनर तक से पानी निकालने की कोशिश करते हैं। ये मवेशियों के लिए लगाई गई बाड़ (fences) और पानी की टंकियों को भारी नुकसान पहुँचाते हैं। देशी वनस्पतियों को खा जाते हैं, जिससे मिट्टी का कटाव (Erosion) बढ़ता है। वे शुद्ध जल स्रोतों (Waterholes) को भी गंदा कर देते हैं, जिससे स्थानीय जीव और पौधे मर जाते हैं। ऊंट बड़ी मात्रा में मीथेन गैस छोड़ते हैं, जो ग्रीनहाउस प्रभाव को बढ़ाती है, जो ग्लोबल वार्मिंग का एक कारण है।
ऑस्ट्रेलियाई सरकार और स्थानीय समुदाय ऊंटों की आबादी को नियंत्रित करने के लिए कई कड़े और विवादास्पद कदम उठाते हैं, जैसे हवाई शूटिंग (Aerial Culling) सबसे प्रमुख तरीका है। हेलीकॉप्टरों से पेशेवर निशानेबाज जंगली ऊंटों को मारते हैं ताकि उनकी संख्या कम की जा सके। एक जानकारी के अनुसार 2020 के भीषण सूखे के दौरान लगभग 10,000 ऊंटों को मारने का आदेश दिया गया था। कुछ ऊंटों को पकड़कर उनका मांस (Meat) निर्यात किया जाता है या उन्हें पालतू बनाकर पर्यटन (कैमल सफारी) में इस्तेमाल किया जाता है। ऑस्ट्रेलिया अब मध्य पूर्व के देशों को ऊंट निर्यात भी करता है, क्योंकि वहां ऊंटों की नस्ल और मांस की मांग है। इनके आतंक से बचने के लिए महत्वपूर्ण जल स्रोतों और संवेदनशील इलाकों के चारों ओर मजबूत बाड़ लगाई जाती है ताकि ऊंट वहां पहुंच कर नुकसान न पहुंचा सकें।
दरअसल, ऑस्ट्रेलिया के जंगली ऊंटों ने पिछले 100-150 वर्षों में खुद को वहां के वातावरण के अनुसार इस तरह ढाल लिया है कि वे अब अपने पूर्वजों (मध्य पूर्व और भारत के ऊंटों) से काफी अलग दिखाई और व्यवहार करते हैं। यह बात भी बहुत दिलचस्प है कि कंगारू प्रधान देश में ऊंटों की इतनी अधिक संख्या है कि वहां प्रतिवर्ष ऊंटों की दौड़ (Camel Racing) का आयोजन भी किया जाता है, जो काफी लोकप्रिय है।
ब्रजेश कानूनगो
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