अस्तित्व के लिए जूझ रहे गंगा डेल्टा के द्वीप
पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले में गंगा नदी के मुहाने पर स्थित गंगासागर द्वीप एक ऐसा महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक स्थल है जहां मकर संक्रांति के दिन इसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है। इस दिन गंगा नदी का पानी कुछ घंटों के लिए हट जाता है, जिससे द्वीप का अधिकांश हिस्सा दिखाई देने लगता है। यह घटना ज्वार-भाटा के कारण होती है, जब चंद्रमा और सूर्य की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण समुद्र का पानी नीचे चला जाता है । इसी कारण तीर्थाटन के लिए निकले यात्रियों और पर्यटकों की जुबान से निकल ही पड़ता है, सारे तीरथ बारम्बार गंगासागर एक बार!
इस दिन लाखों लोग गंगासागर द्वीप पर आते हैं और गंगा स्नान करते हैं। यह एक महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजन है, जिसे मकर संक्रांति के रूप में मनाया जाता है। गंगासागर द्वीप का इतिहास और संस्कृति बहुत पुरानी और समृद्ध है। यह द्वीप हिंदू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यहां कपिल मुनि का आश्रम है, जो भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं। कपिल मुनि ने यहां तपस्या की थी और भगवान विष्णु ने उन्हें आत्मज्ञान प्रदान किया था। यहां के लोग मुख्य रूप से बंगाली भाषा बोलते हैं और उनकी जीवनशैली में हिंदू धर्म की बहुत बड़ी भूमिका है। द्वीप पर कई मंदिर और आश्रम स्थित हैं।
यहां धार्मिक आस्था के एक प्रमुख तीर्थ के भौगोलिक, पर्यावरणीय, सामाजिक, आर्थिक पक्ष और जनजीवन को एक घुमक्कड़ी दृष्टि से समझने का प्रयास दिलचस्प होगा। इस द्वीप का क्षेत्रफल लगभग 300 वर्ग किलोमीटर है और यह कोलकाता से लगभग 150 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। यह द्वीप गंगा डेल्टा का एक हिस्सा है और यहां मैंग्रोव के जंगल, जलमार्ग और छोटी नदियां हैं। द्वीप का जलवायु उष्णकटिबंधीय है और यहां औसत तापमान 26 डिग्री सेल्सियस रहता है। द्वीप पर मैंग्रोव के जंगल यहां के पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
दरअसल, गंगासागर भूकटाव और प्राकृतिक खतरों से लगातार प्रभावित हो रहा है। 1969 में इस द्वीप का क्षेत्रफल लगभग 255 वर्ग किलोमीटर था, जो अब कम होकर 224.3 वर्ग किलोमीटर हो गया है। यह लगभग 31 वर्ग किलोमीटर की कमी है। समुद्र का बढ़ता जलस्तर, तटीय कटाव, चक्रवाती तूफान, ज्वारीय लहरें तथा मानव गतिविधियों से होने वाले पर्यावरण परिवर्तन के कारण होने वाला यह कटाव इस द्वीप के अस्तित्व के लिए गंभीर चिंता की वजह बना हुआ है। द्वीप का क्षेत्रफल लगातार कम हो रहा है, जिससे स्थानीय लोगों की जीवनशैली और जीविका प्रभावित हो रही है। इसके अलावा, द्वीप के मैंग्रोव जंगलों का विनाश हो रहा है, जिससे जैव विविधता पर भी खतरा मंडरा रहा है।
पिछले दिनों हमने पश्चिम बंगाल की यात्रा पर निकले ट्रेवलर ब्लॉगर नोमेडिक इंडियन के दीपांशु सांगवान के कई यूट्यूब वीडियो देखे। यात्रा के दौरान उन्होंने न सिर्फ गंगासागर बल्कि डेल्टा क्षेत्र के अन्य द्वीपों की यात्रा की और वीडियो और ब्लॉग बनाए। वे घोरमारा द्वीप में भी गए।
सुंदरबन डेल्टा में स्थित घोरमारा द्वीप (Ghoramara Island) आज दुनिया के उन हिस्सों में से एक है जो जलवायु परिवर्तन और समुद्र के बढ़ते जलस्तर की मार सबसे पहले और सबसे बुरी तरह झेल रहे हैं। कोलकाता से लगभग 92 किलोमीटर दूर स्थित यह द्वीप धीरे-धीरे नदी और समुद्र में समा रहा है।
ट्रेवलर के वीडियो में देखकर और अध्ययन से यहां के जनजीवन और भविष्य की स्थिति को सहजता से समझा जा सकता है। इसका भूगोल सिकुड़ता जा रहा है पिछले 40-50 वर्षों में इस द्वीप ने अपने क्षेत्रफल का लगभग 50% से अधिक हिस्सा खो दिया है। एक समय यह द्वीप करीब 26 वर्ग किलोमीटर में फैला था, जो अब घटकर 4-5 वर्ग किलोमीटर के आसपास रह गया है। हुगली और मुरीगंगा नदियों के संगम पर स्थित होने के कारण यहाँ मिट्टी का कटाव (Erosion) बहुत तीव्र है। हर पूर्णिमा और अमावस्या के ज्वार के साथ घोरमारा द्वीप का कुछ हिस्सा बह जाता है।
यहां के निवासियों का जीवन भी बहुत चुनौतीपूर्ण है। जनजीवन में यहाँ के लोगों का मुख्य पेशा खेती (विशेषकर पान की खेती और चावल) और मछली पकड़ना था। लेकिन समुद्र का खारा पानी खेतों में घुसने से जमीन बंजर हो रही है। द्वीप पर पक्की सड़कों और बिजली का अभाव है। लोग मुख्य रूप से सोलर पैनल और केरोसिन पर निर्भर हैं। यहाँ केवल कुछ ही स्कूल और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बचे हैं। कुछ ई रिक्शा द्वीप में परिवहन के साधन बने हैं। द्वीप के डूबने के डर से लोग यहाँ अपनी बेटियों की शादी करने से कतराते हैं। यहाँ के पुरुषों को काम की तलाश में दक्षिण भारत या कोलकाता पलायन करना पड़ता है। घोरमारा के हजारों लोग पहले ही पास के सागर द्वीप या मुख्य भूमि पर शरण ले चुके हैं। जो लोग अब भी वहाँ रह रहे हैं, वे या तो बहुत गरीब हैं या उनके पास कहीं और जाने का साधन नहीं है। इन्हें अक्सर 'भारत के पहले जलवायु शरणार्थी' कहा जाता है। घोरमारा द्वीप पर तूफान के समय लोगों के बचाव के लिए विशेष सेंटर बनाए गए हैं, जिन्हें शेल्टर होम कहा जाता है। ये शेल्टर होम 350 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से आने वाली हवाओं को भी झेल सकते हैं और लोगों को सुरक्षित रखने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं। इन शेल्टर होम्स में 2000 से 3000 लोगों को रखा जा सकता है ।
घोरमारा द्वीप के पहले इसी डेल्टा क्षेत्र का लोहाचारा द्वीप समाप्त हो गया था। यह द्वीप भी सुंदरबन डेल्टा में स्थित था और जलवायु परिवर्तन, समुद्र के बढ़ते जलस्तर और तटीय कटाव के कारण पूरी तरह से डूब गया था। 1980 के दशक तक यह द्वीप बसा हुआ था, लेकिन 1990 के दशक तक यह पूरी तरह से पानी में डूब गया था। लोहाचारा द्वीप को दुनिया का पहला ऐसा बसा हुआ द्वीप माना जाता है जो जलवायु परिवर्तन के कारण पूरी तरह से समुद्र में डूब गया है। डेल्टा क्षेत्र के अन्य डूबते द्वीपों की तरह गंगासागर के क्षरण को लेकर सरकारों की चिंता का अपना बड़ा महत्व हो जाता है। किन उपायों और परियोजनाओं को प्राथमिकता से लागू किया जाता है, यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
गंगासागर द्वीप के संरक्षण के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं। सरकार ने नदियों के प्रदूषण को कम करने और जल गुणवत्ता में सुधार करने के लिए गंगा एक्शन प्लान शुरू किया है। इसके तहत सीवेज ट्रीटमेंट प्लेंट्स, नदी के किनारे बागवानी, और सार्वजनिक जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। इसके अलावा, सरकार ने द्वीप के आसपास के क्षेत्रों में मैंग्रोव वृक्षारोपण करने की योजना बनाई है, जो तटीय कटाव को रोकने में मदद करेगा । यहां एक गहरे पानी का बंदरगाह बनाने की योजना है, जो यहां के आर्थिक विकास को बढ़ावा देगा। सरकार ने तटीय क्षेत्रों में ऐसे कई शेल्टर होम बनाए हैं, जो तूफान और बाढ़ के समय लोगों को सुरक्षित रखने के लिए उपयोग किए जाते हैं। इन शेल्टर होम्स में लोगों को भोजन, पानी, चिकित्सा सुविधा और अन्य आवश्यक सेवाएं प्रदान की जाती हैं ।इसके अलावा, सरकार यहां के पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए भी काम कर रही है।
ब्रजेश कानूनगो
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