घाना के बाजार : महिला ही नहीं बाजार सशक्तिकरण की मिसाल
विश्वभर में कई समुदायों में मातृसत्तात्मक (Matriarchal) व्यवस्था प्रचलित है, जहाँ वंश, संपत्ति और निर्णय लेने का अधिकार महिलाओं के पास होता है। प्रमुख रूप से जिनमें इंडोनेशिया के मिनांगकाबाऊ, चीन के मोसुओ जनजाति, और भारत के मेघालय की खासी जनजाति भी शामिल हैं। इन समाजों में महिलाएँ परिवार की मुखिया और उत्तराधिकारी होती हैं।
जुटाई जानकारी के अनुसार मिनांगकाबाऊ समाज इंडोनेशिया में है जो दुनिया का सबसे बड़ा मातृसत्तात्मक समाज माना जाता है, जहाँ संपत्ति महिलाओं द्वारा हस्तांतरित होती है। मोसुओ, चीन (यूनान और सिचुआन) के मोसुओ समाज को "महिलाओं का साम्राज्य" कहा जाता है। यहाँ 'वॉकिंग मैरिज' (walking marriage) की परंपरा है। भारत के मेघालय की खासी और गारो जनजातियों में वंशावली माँ के नाम से चलती है और सबसे छोटी बेटी (खतदुह) को संपत्ति विरासत में मिलती है। कोस्टा रिका की ब्रिब्री स्वदेशी जनजाति में महिलाएं भूमि की मालकिन होती हैं और कबीले के प्रमुख का पद महिलाओं के माध्यम से चलता है। नासो समुदाय जो पनामा और कोस्टा रिका में है वह भी खुद को मातृसत्तात्मक बताता है। घाना (अफ्रीका) का आसानते भी एक प्रमुख मातृवंशीय समूह है। घाना गणराज्य पश्चिम अफ्रीका में स्थित एक देश है, जो पूर्व में टोगो, पश्चिम में कोटे डी आइवर, उत्तर में बुरकिना फासो, और दक्षिण में गिनी की खाड़ी से घिरा हुआ है। घाना की राजधानी अकरा है, और यह देश की सबसे बड़ा शहर भी है।
पिछले दिनों हमने यूट्यूब पर एक ट्रैवलर के वीडियो में घाना के एक ऐसे बाजार को नजदीक से देखा जहां बाजार की सारी बागडोर महिलाओं के हाथ में थी। जिन्हें वहां मार्केट क्वीन कहा जाता है। मातृसत्तात्मक समाजों की प्रमुख विशेषता यह होती है कि विवाह के बाद पति पत्नी के घर जाकर रहता है (matrilocal) और बच्चों का वंश माँ के परिवार से पहचाना जाता है। लेकिन घाना के मातृसत्तात्मक बाजार की मार्केट क्वीन का इनसे बड़ा महत्वपूर्ण अंतर है। मातृसत्तात्मक समाजों में, महिलाएं परिवार और समुदाय के निर्णयों में भूमिका निभाती हैं और संपत्ति की उत्तराधिकारिता भी महिलाओं के माध्यम से होती है। उदाहरण के लिए, भारत की खासी जनजाति और घाना के अकरन समुदाय में महिलाएं परिवार और समुदाय के निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। जबकि घाना की मार्केट क्वीन महिलाएं ' बाजार ' में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, यह उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति को दर्शाता है, न कि मातृसत्तात्मक समाज की विशेषता। ये महिलाएं बाजार में अपनी शक्ति और प्रभाव का उपयोग करती हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं है कि वे परिवार और समुदाय के निर्णयों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएं।
घाना में 'मार्केट क्वींस' (Market Queens) उन वरिष्ठ और प्रभावशाली महिला व्यापारियों को कहा जाता है, जो बाजारों में विभिन्न कमोडिटी समूहों (जैसे टमाटर, मक्का, या याम) का नेतृत्व करती हैं। इन्हें स्थानीय भाषा में 'ओहेम्मा' (ohemma) भी कहा जाता है।
वे बहुत कुशलता से बाज़ार के विशिष्ट अनुभागों का प्रबंधन करती हैं और व्यापारियों के बीच विवादों को सुलझाती हैं। बाज़ार में आपूर्ति और कीमतों को नियंत्रित करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसके साथ ग्रामीण उत्पादकों (किसानों) को शहरी बाज़ारों से जोड़ने के उपाय करती हैं, जिससे खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होती है। ये महिलाएं अक्सर एक अनौपचारिक बैंकिंग प्रणाली के रूप में काम करती हैं, जो छोटे व्यापारियों को ऋण और सहायता प्रदान करती हैं। इस तरह ये महिलाएँ घाना के अनौपचारिक (informal) आर्थिक क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं और पारंपरिक रूप से व्यापार को सुचारू रूप से चलाने की जिम्मेदारी निभाती हैं। स्थानीय प्रशासन और नगर पालिका के साथ बातचीत कर बाजार की सुविधाओं (साफ-सफाई, टैक्स आदि) का प्रबंधन करती हैं।
घाना की अर्थव्यवस्था और वहां के बाजारों की संरचना दुनिया के सबसे दिलचस्प उदाहरणों में से एक है। यहाँ महिलाओं का वर्चस्व है, यहां तक कि बाजार में सिर पर माल ढोने वाली श्रमिक महिलाएं भी बाजार में अपना पसीना बहाते जुटी होती हैं। इन्हें स्थानीय स्तर पर 'कायायेई' (Kayayei) कहा जाता है। 'काया' का अर्थ है 'सामान' और 'येई' का अर्थ है 'महिलाएं'। ये ज्यादातर उत्तरी घाना के गरीब इलाकों से बेहतर जीवन की तलाश में दक्षिण के बड़े शहरों (जैसे अकरा और कुमासी) में आती हैं। ये महिलाएं अपने सिर पर बड़े एल्यूमीनियम के परातों (Pans) में भारी सामान, अनाज की बोरियां और खरीदे गए कपड़े लेकर चलती हैं। इनका जीवन अत्यंत कठिन होता है। वे बहुत ही कम मजदूरी पर काम करती हैं और अक्सर बाजारों के पास खुले में या झोपड़ियों में रहती हैं।
घाना की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था (Informal Economy) में इन महिलाओं का योगदान अतुलनीय है। मार्केट क्वींस घाना के व्यापार की रणनीतिकार हैं, तो कायायेई उस व्यवस्था की मांसपेशियां । इन दोनों के बिना घाना की रोजमर्रा की अर्थव्यवस्था का चलना लगभग असंभव है। घाना की सामाजिक और आर्थिक संरचना में वहां की मातृसत्तात्मक (Matriarchal/Matrilineal) व्यवस्था का बड़ा महत्व हो जाता है। यह व्यवस्था न केवल परिवारों को चलाती है, बल्कि वहां के विशाल बाजारों के स्वरूप को भी निर्धारित करती है।
घाना की सरकार और विभिन्न गैर-सरकारी संगठन इन महिलाओं, विशेषकर 'कायायेई' (Kayayei) की स्थिति सुधारने के लिए कई मोर्चों पर काम कर रहे हैं। चूंकि मार्केट क्वींस पहले से ही प्रभावशाली और आर्थिक रूप से मजबूत हैं, इसलिए सरकारी प्रयासों का मुख्य केंद्र बोझ ढोने वाली श्रमिक महिलाएं ही होती हैं।
कौशल विकास और प्रशिक्षण (Kayayei Empowerment Programme) के अंतर्गत इन महिलाओं को केवल शारीरिक श्रम पर निर्भर रहने से बचाने के लिए 'कायायेई एम्पावरमेंट प्रोग्राम' शुरू किया है। इसमें उन्हें सिलाई, साबुन बनाना, बेकिंग और कंप्यूटर जैसे तकनीकी कौशल सिखाए जाते हैं। ताकि वे बाजारों से निकलकर सम्मानजनक और कम जोखिम वाले व्यवसायों में जा सकें। कायायेई अक्सर खुले आसमान के नीचे या असुरक्षित बस्तियों में सोती हैं। इसे देखते हुए सरकार ने अकरा और कुमासी जैसे बड़े शहरों में इनके लिए विशेष हॉस्टल का निर्माण शुरू किया है। यहाँ उन्हें सुरक्षित रहने की जगह, पानी और स्वच्छता की सुविधाएं प्रदान की जाती हैं। सरकार इन महिलाओं का 'नेशनल हेल्थ इंश्योरेंस स्कीम' (NHIS) में मुफ्त या रियायती दरों पर पंजीकरण कराती है ताकि बीमारी की स्थिति में उनका इलाज हो सके। अनौपचारिक क्षेत्र से जुड़ी इन महिलाओं को मुख्यधारा की बैंकिंग से जोड़ने के लिए मोबाइल मनी और छोटे बचत खाते खोलने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। 2017 में घाना सरकार ने एक बड़ा कदम उठाते हुए कायायेई पर लगने वाले 'मार्केट टोल' (प्रतिदिन का कर) को खत्म कर दिया था। इससे उनकी दैनिक आय में थोड़ी बढ़ोतरी हुई, क्योंकि पहले उन्हें अपनी मामूली कमाई का एक हिस्सा नगर पालिका को देना पड़ता था। बाजारों में काम करने वाली महिलाओं के बच्चों के लिए 'डे-केयर सेंटर' और स्कूलों में नामांकन की सुविधाएं दी जा रही हैं, ताकि उनकी अगली पीढ़ी को इस कठिन श्रम चक्र से बाहर निकाला जा सके। घाना में अब कई महिलाएं 'मार्केट क्वींस' के नेतृत्व में डिजिटल साक्षरता भी सीख रही हैं ताकि वे व्हाट्सएप और अन्य ऐप्स के जरिए अपने माल का ऑर्डर ले सकें।
घाना के प्रसिद्ध बाजारों (जैसे कि अकरा का मकोला मार्केट) में महिलाओं का वर्चस्व इतना अधिक है कि इसे अक्सर 'मातृसत्तात्मक' आर्थिक व्यवस्था के रूप में देखा जाता है। वहां "मार्केट क्वींस" (Ohemmaa) न केवल व्यापार बल्कि सामाजिक नियमों को भी नियंत्रित करती हैं। ऐसे में पुरुषों की भूमिका पूरी तरह से खत्म नहीं होती, बल्कि वह मुख्य रूप से लॉजिस्टिक्स, भारी श्रम और थोक आपूर्ति तक सीमित होती है। घाना के बाजार में एक अनकहा नियम है: "महिलाएं व्यापार का चेहरा हैं, और पुरुष उसकी मांसपेशियों (शक्ति) का काम करते हैं।" वहां पैसा और बाजार की राजनीति महिलाओं के हाथ में होती है, जबकि पुरुष उन सेवाओं को प्रदान करते हैं जिनके बिना बाजार चल नहीं सकता।
घाना में बाजार केवल व्यापार का केंद्र नहीं, बल्कि महिला सशक्तिकरण की एक जीवित प्रयोगशाला है, जहाँ मातृसत्तात्मक मूल्यों ने महिलाओं को 'शक्ति' (Power) और 'पूंजी' (Capital) दोनों दी हैं।
ब्रजेश कानूनगो
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