बोझिल भविष्य में सुख देंगी कलाएं
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और प्रौद्योगिकी में हम जिस तेजी से आगे बढ़ रहे हैं इससे लगता है कि दुनिया भर के,हर क्षेत्र और हर विषय के ज्ञान से हम कुछ समय बाद लबालब भरे होंगे। बल्कि हमारा ज्ञान छलक छलक कर बाहर आने को बेताब होगा। यह एक नई ऊब हमारे जीवन मे ला सकती है। कुछ पाने के लिए हमारे पास करने को कुछ नहीं होगा जिससे जीवन मे प्रवाह,उमंग और उत्साह बढ़ता रहे। ऐसे में मुझे लगता है हमारे संतोष और खुशी मे केवल उन कलाओं की भूमिका ही रह जाएगी जो हमारी आदिम सभ्यता का हिस्सा रहीं हैं। जो हमारे मनुष्य होने से संभव हुईं हैं। जिन्हें हम प्रदर्शन कलाओं और ललित कलाओं के नाम से पुकारते हैं।
ललित कला (Fine Arts) और प्रदर्शन कला (Performing Arts) मानवीय अभिव्यक्ति के दो सबसे सुंदर स्तंभ हैं। जहाँ ललित कला को हम देख और महसूस कर सकते हैं, वहीं प्रदर्शन कला (परफॉर्मिंग आर्ट) को समय और गति के माध्यम से जिया जाता है। ललित कला का मुख्य उद्देश्य सौंदर्य और दृश्य आनंद पैदा करना है। यह अक्सर "स्थिर" होती है और इसे भौतिक माध्यमों (जैसे रंग, मिट्टी या पत्थर) से बनाया जाता है। जैसे चित्रकला,मूर्तिकला,वास्तुकला,,रेखांकन आदि जिनमें कलाकार स्वयं रचनात्मक रूप से सक्रिय रहता है। वहीं प्रदर्शन कला (परफॉर्मिंग आर्ट) में कलाकार अपने शरीर, आवाज और चेहरे के हाव-भाव का उपयोग करके कला का प्रदर्शन करते हैं। यह 'क्षणभंगुर' होती है—यानी यह प्रदर्शन के साथ ही घटित होती है और समाप्त हो जाती है। इन कलाओं में संगीत, नृत्य, नाटक और कुछ हद तक मार्शल आर्ट को शामिल किया जा सकता है।
जब मनुष्य के पास सब कुछ होगा तो वह अपनी खुशी के लिए चित्र बनाएगा, धातुओं,काष्ठ में मूर्ति या चट्टानों में शिल्प गढ़ेगा या फिर गाने, बजाने और शारीरिक प्रस्तुतियों से खुद को और समाज को आनंदित होने का अवसर देगा। नृत्य करेगा, अभिनय के माध्यम से लोक कथाएं या कहानियां देखी सुनी जाएंगी। दरअसल, एक ट्रैवल वीडियो में पश्चिम अफ्रीका के आइवरी कोस्ट (Ivory Coast) के गौरो (Guro) समुदाय के प्रसिद्ध 'ज़ौली' (Zaouli) नृत्य को देखते हुए जो खुशी और आनंद की अनुभूति हुई उसने हमारा विश्वास दृढ़ किया कि चाहे जितना हम विकास कर लें, प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बौद्धिकता से सब कुछ पा लें लेकिन हमारी प्राचीन कलाएं सदैव हमारे साथ बनी रहेंगीं। हमारे जीवन में रस घोलती रहेंगी।
ज़ौली' (Zaouli) नृत्य अपनी अविश्वसनीय गति और जटिल फुटवर्क के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। ज़ौली (Zaouli) नृत्य की सबसे बड़ी विशेषता इसकी लय और ताल है, जिसे विशिष्ट पारंपरिक वाद्ययंत्रों के माध्यम से जीवंत किया जाता है। संगीत और नर्तक के पैरों की गति के बीच का तालमेल ही इस प्रदर्शन को जादुई बनाता है। ज़ौली में संगीत केवल बैकग्राउंड में नहीं बजता, बल्कि यह नर्तक के लिए एक 'चुनौती' की तरह होता है। ड्रमर एक जटिल ताल बजाता है, और नर्तक को अपने पैरों से ठीक उसी ताल को दोहराना होता है। जैसे-जैसे ड्रम की गति बढ़ती है, नर्तक को अपनी शारीरिक क्षमता की सीमाओं को पार करते हुए और भी तेज़ी से थिरकना पड़ता है। संगीत में अचानक आने वाले ठहराव (Breaks) पर नर्तक को बिल्कुल स्थिर हो जाना पड़ता है, जो दर्शकों के लिए सबसे रोमांचक क्षण होता है।
इस नृत्य की शुरुआत 1950 के दशक में हुई थी। माना जाता है कि यह एक सुंदर लड़की 'ज़ौली' (Zaouli) से प्रेरित है। यह नृत्य स्त्री सौंदर्य और अनुग्रह (Grace) का सम्मान करने के लिए किया जाता है, हालांकि इसे पारंपरिक रूप से पुरुषों द्वारा ही प्रदर्शित किया जाता है। 2017 में, इस नृत्य को इसकी सांस्कृतिक विशिष्टता के कारण यूनेस्को (UNESCO) की 'अमूर्त सांस्कृतिक विरासत' (Intangible Cultural Heritage) की सूची में शामिल किया गया था। हमने वीडियो के जरिए आभासी आनंद लेते हुए देखा कि इसमें नर्तक एक चमकीले रंग का लकड़ी का मुखौटा पहनता है, जो अक्सर किसी जानवर या सुंदर महिला के चेहरे को दर्शाता है। यह मुखौटा गौरो शिल्पकारों की बेहतरीन कला का नमूना होता है। नर्तक शरीर पर रंगीन बुने हुए कपड़े और पैरों में घंटियाँ पहनता है। हाथों में अक्सर पूंछ के बालों से बने 'फ्लाइविस्क' (Fly-whisks) होते हैं, जो नृत्य के दौरान हवा में लहराते हैं। यह नृत्य दुनिया के सबसे चुनौतीपूर्ण नृत्यों में से एक माना जाता है क्योंकि नर्तक के पैर इतनी तेज़ी से चलते हैं कि वे आंखों से धुंधले दिखने लगते हैं। यह शरीर के ऊपरी हिस्से को स्थिर रखते हुए किया जाता है। नृत्य पूरी तरह से ड्रम और बांसुरी की थाप पर आधारित होता है। नर्तक और ड्रमर के बीच एक गहरा संवाद होता है; हर कदम ड्रम की एक विशिष्ट बीट के साथ मेल खाता है। यह शारीरिक रूप से बहुत थका देने वाला होता है, इसलिए एक प्रदर्शन के लिए नर्तक को बहुत अभ्यास और ताकत की आवश्यकता होती है। ट्रैवलर को स्थानीय निवासी बताते हैं कि यह नृत्य केवल मनोरंजन नहीं है, बल्कि यह गांवों के बीच एकता का प्रतीक भी है। इसे शादी, उत्सवों और कभी-कभी अंतिम संस्कार के समय भी प्रदर्शित किया जाता है ताकि समुदाय के बीच भाईचारा बढ़े।
यदि अपने देश के संदर्भ में बात करें तो भारत में शास्त्रीय नृत्य कलाएं और लोक नृत्य कलाएं दोनों ही अपनी अनूठी शैली और सांस्कृतिक महत्व के लिए प्रसिद्ध हैं।तमिलनाडु का भरतनाट्यम नृत्य अपनी भावपूर्ण भंगिमाओं और जटिल पदचाप के लिए जाना जाता है।उत्तर प्रदेश का कथक नृत्य तेज़ ताल और पैरों की जटिल तकनीक के लिए प्रसिद्ध है। केरलम का कथकली नृत्य रंगीन मेकअप, वेशभूषा और नाटकीय अभिव्यक्ति के लिए प्रसिद्ध है। आंध्र प्रदेश का कुचिपुड़ी नृत्य नाटक और नृत्य का सुंदर संगम है। मणिपुर का मणिपुरी नृत्य अपनी कोमलता और लयबद्धता के लिए जाना जाता है। केरलम का मोहिनीअट्टम नृत्य स्त्रीत्व और लालित्य का प्रतीक है। ओडिशा का ओडिसी नृत्य मंदिरों से जुड़ा है और भक्ति भावनाओं से ओतप्रोत है। असम का सत्रिया नृत्य अपनी अनूठी शैली और सांस्कृतिक महत्व के लिए जाना जाता है। इन शास्त्रीय नृत्यों के अलावा हमारे देश में अनेक लोक नृत्य कलाएं भी बहुत प्रसिद्ध और लोकप्रिय हैं असम का बिहू अपनी ऊर्जा और उत्साह के लिए जाना जाता है। पंजाब का भांगड़ा अपनी जोशीली और उत्साही शैली के लिए प्रसिद्ध है। गुजरात का गरबा अपनी अनूठी शैली और सांस्कृतिक महत्व के लिए जाना जाता है। महाराष्ट्र की लावणी अपनी भावपूर्ण और आकर्षक शैली के लिए प्रसिद्ध है। राजस्थान का घूमर नृत्य अपनी अनूठी शैली और सांस्कृतिक महत्व के लिए जाना जाता है।
इन विविध नृत्य कलाओं से समृद्ध देश होने के कारण हम आश्वस्त हो सकते हैं कि भविष्य में सब कुछ पा लेने के भारी बोझ के बीच भी हमारे लिए अपने आनंद की राह निकाल लेना कठिन नहीं होगा।
ब्रजेश कानूनगो