Monday, 2 February 2026

वेनेजुएला : तेल ही नहीं सबसे ऊंचे जलप्रपात के लिए भी प्रसिद्ध है

वेनेजुएला : तेल ही नहीं सबसे ऊंचे जलप्रपात के लिए भी प्रसिद्ध है 

हाल ही में भारत से बहुप्रतीक्षित अमेरिका से सशर्त ट्रेड डील हो जाने का समाचार आया है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कथित रूप से दावा किया है कि भारत रूस की बजाए अब वेनेजुएला से कच्चा तेल लेगा। 

वेनेजुएला, दक्षिण अमेरिका के उत्तरी तट पर स्थित एक ऐसा देश है जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता और विशाल तेल भंडार के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। वर्तमान में (फरवरी 2026), यह देश एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील ऐतिहासिक मोड़ से गुजर रहा है। जनवरी 2026 में, अमेरिकी सैन्य अभियान "ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व" के तहत राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हिरासत में लेकर अमेरिका ले जाया गया । वर्तमान में देश एक संक्रमणकालीन दौर में है। डेल्सी रोड्रिगेज ने कुछ समय के लिए जिम्मेदारी संभाली है, लेकिन राजनीतिक अस्थिरता बनी हुई है। देश में लंबे समय से "बोलिवेरियन क्रांति" (समाजवाद) और विपक्षी ताकतों के बीच संघर्ष रहा है।

राजनीतिक संदर्भों और आग्रहों से अलग हटकर देखें तो जानने को मिलता है कि वेनेजुएला का तेल और रूस या अरब देशों का तेल रासायनिक रूप से एक-दूसरे से काफी अलग होते हैं। इसे समझने के लिए हमें तेल की "क्वालिटी" (Quality) और "निकालने की प्रक्रिया" (Extraction) पर ध्यान देना होगा।

वेनेजुएला में मुख्य रूप से 'अति-भारी कच्चा तेल' (Extra-Heavy Crude) पाया जाता है। यह कोलतार (tar) जैसा गाढ़ा और चिपचिपा होता है। इसे पाइपलाइनों में बहाने के लिए इसमें हल्का तेल या केमिकल मिलाना पड़ता है। जबकि ​रूस/सऊदी अरब का तेल आमतौर पर 'हल्का' (Light) या 'मीडियम' (Medium) होता है। यह पानी की तरह पतला होता है और इसे आसानी से निकाला और ट्रांसपोर्ट किया जा सकता है। ​वेनेजुएला का तेल 'सोर' (Sour) होता है, जिसका अर्थ है कि इसमें सल्फर (गंधक) की मात्रा बहुत अधिक होती है। इसे रिफाइन करना कठिन और महंगा होता है क्योंकि सल्फर निकालने के लिए जटिल तकनीक चाहिए। ​रूस (Urals): रूस का तेल 'मीडियम सोर' होता है। ​सऊदी अरब  का तेल काफी हद तक 'स्वीट' (Sweet) होता है, जिसमें सल्फर कम होता है और इसे रिफाइन करना सबसे आसान होता है।

​वेनेजुएला के भारी तेल से डीजल या गैसोलीन बनाने के लिए बहुत ही आधुनिक और विशेष 'कॉम्प्लेक्स रिफाइनरीज' की आवश्यकता होती है। दुनिया की बहुत कम रिफाइनरियाँ ही (मुख्यतः अमेरिका और भारत में) इसे कुशलता से प्रोसेस कर सकती हैं। जबकि​रूस या अरब देशों के तेल को साधारण रिफाइनरियों में भी आसानी से प्रोसेस किया जा सकता है। 

दरअसल वेनेजुएला का तेल "मात्रा" में तो सबसे ज्यादा है, लेकिन "गुणवत्ता" के मामले में यह रूस और सऊदी अरब के मुकाबले काफी कठिन और महंगा हो जाता है। यही कारण है कि भारी तेल होने के बावजूद वेनेजुएला अपनी अर्थव्यवस्था को उतनी तेजी से नहीं संभाल पाया, क्योंकि इसे बेचने के लिए उसे विदेशी तकनीक और विशेष रिफाइनरियों पर निर्भर रहना पड़ता है।

वेनेजुएला की तेल प्रधान देश होने जैसी विशेषता के अलावा इसका पर्यटनीय महत्व भी कम नहीं है। वेनेजुएला को "लैंड ऑफ ग्रेस" कहा जाता है। यहाँ एंडीज पर्वत, अमेज़न वर्षावन, विशाल घास के मैदान (Llanos) और कैरेबियन तट रेखा का अनूठा संगम मिलता है। दुनिया का सबसे ऊँचा निर्बाध जलप्रपात 'एंजेल फॉल्स' स्थित है, जिसकी ऊँचाई लगभग 979 मीटर है। ​लेक मार्काइबो दक्षिण अमेरिका की सबसे बड़ी और दुनिया की सबसे पुरानी झीलों में से एक है, जिसके नीचे तेल के विशाल भंडार हैं। यहाँ मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय (Tropical) जलवायु रहती है, लेकिन ऊँचाई के साथ तापमान में बदलाव आता है। यद्यपि फिलहाल यहां की यात्राओं के लिए विशेष एडवाइजरी जारी की गई है तथापि वेनेजुएला के प्राकृतिक दृश्यों और जनजीवन ने पर्यटकों और घुमक्कड़ों को सदैव आकर्षित किया है।

ब्रजेश कानूनगो 


गाम्बिया : जहाँ पत्थरों से मतदान होता है

गाम्बिया : जहाँ पत्थरों से मतदान होता है

दुनिया के अधिकांश देशों में चुनाव या तो इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन से करवाए जाते हैं या फिर बेलेट पेपर याने मतपत्र द्वारा नागरिक अपने नेतृत्व या सरकार को चुनते रहे हैं। जिस दौर में हमारे यहां ईवीएम को लेकर कई सवाल खड़े होते रहे हैं और चुनावों में कागजी मतपत्रों के उपयोग की ओर लौटने की आवाजें सुनाई दे रहीं हैं उसी समय एक गणराज्य ऐसा भी है जहाँ अब तक पत्थरों द्वारा अपने नेतृत्व और सरकार को चुना जाता रहा है। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं अफ्रीका के गाम्बिया देश की ।

गांबिया (The Gambia) पश्चिम अफ्रीका में स्थित एक छोटा लेकिन सांस्कृतिक रूप से समृद्ध देश है।  इसके दोस्ताना लोगों और भौगोलिक बनावट के कारण  इसे "The Smiling Coast of Africa" कहा जाता है।  गांबिया एक बहुदलीय लोकतांत्रिक गणराज्य (Democratic Republic) है। यहाँ राष्ट्रपति शासन प्रणाली है, जहाँ राष्ट्रपति ही राष्ट्र और सरकार दोनों का प्रमुख होता है। बांजुल (Banjul) यहाँ की राजधानी है, जबकि सेरीकुंडा (Serrekunda) सबसे बड़ा शहर और आर्थिक केंद्र है। गाम्बिया 18 फरवरी 1965 को ब्रिटेन से स्वतंत्र हुआ था। 2017 में लंबे समय तक रहे तानाशाह याह्या जाम्मेह के शासन के अंत के बाद यहाँ लोकतंत्र मज़बूत हुआ है।

गांबिया (The Gambia) दुनिया का संभवतः इकलौता ऐसा देश है जहाँ चुनावों में कागजी मतपत्रों (ballots) के बजाय पत्थरों या कंचों (marbles) का उपयोग किया जाता है। यह व्यवस्था काफी अनोखी है और इसके पीछे कुछ दिलचस्प कारण हैं।  हर पोलिंग बूथ पर उम्मीदवारों के नाम और फोटो वाले अलग-अलग रंग के लोहे के ड्रम (Ballot Boxes) रखे होते हैं। मतदाता को मतपत्र की जगह एक पारदर्शी कांच का कंचा या पत्थर जैसा गोला दिया जाता है। वह अपनी पसंद के उम्मीदवार के ड्रम में उसे डाल देता है। ड्रम के अंदर एक धातु की नली लगी होती है। जब कंचा उसमें गिरता है, तो साइकिल की घंटी जैसी आवाज आती है। इससे चुनाव अधिकारियों को पता चल जाता है कि मतदाता ने वोट डाल दिया है और यह भी सुनिश्चित होता है कि किसी ने एक बार में एक से ज्यादा कंचे तो नहीं डाले।

​दरअसल जब यह सिस्टम 1960 के दशक में शुरू किया गया था, तब गांबिया में साक्षरता दर बहुत कम थी। कंचों और रंगों वाले ड्रमों की मदद से उन लोगों के लिए भी वोट देना आसान हो गया जो पढ़-लिख नहीं सकते थे। ​इस प्रक्रिया में धोखाधड़ी की संभावना कम हो जाती है, ड्रमों को सील कर दिया जाता है और कंचों को गिनना काफी पारदर्शी प्रक्रिया मानी जाती है।

​इसके अलावा यह भी माना गया है कि कागजी मतपत्रों की छपाई और उन्हें सुरक्षित रखने के मुकाबले यह व्यवस्था काफी सस्ती पड़ती है क्योंकि ड्रम और कंचों का दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। यह प्रक्रिया पर्यावरण अनुकूल है क्योंकि मार्बल और ड्रम को कई बार इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे कागज की भी बचत होती है।

​हाल के वर्षों में गांबिया में इस सिस्टम को बदलने और आधुनिक पेपर बैलेट लाने पर चर्चा हुई है, क्योंकि उम्मीदवारों की संख्या बढ़ने पर इतने सारे ड्रम रखना मुश्किल हो जाता है। हालांकि, 2021 के राष्ट्रपति चुनाव में भी इसी 'कंचा पद्धति' का इस्तेमाल किया गया था क्योंकि जनता इस पर बहुत भरोसा करती है। अब गांबिया ने 2026 के राष्ट्रपति चुनाव से पेपर बैलेट सिस्टम अपनाने का फैसला किया है, क्योंकि मार्बल सिस्टम अब संभवतः लंबे समय तक नहीं चलाया जा सकता। 

​इस लोकतांत्रिक देश की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से तीन स्तंभों पर टिकी है कृषि,पुनर्नियात व्यापार और पर्यटन। लगभग 75% आबादी कृषि पर निर्भर है। मूंगफली (Peanuts) यहाँ की मुख्य नकदी फसल है और निर्यात का बड़ा हिस्सा है। समुद्र तट पर स्थित होने के कारण यह पड़ोसी देशों के लिए एक व्यापारिक केंद्र के रूप में कार्य करता है।अपने खूबसूरत समुद्र तटों (Beaches) और पक्षी दर्शन (Bird watching) के लिए प्रसिद्ध होने के कारण यहाँ पर्यटन विदेशी मुद्रा का बड़ा स्रोत है।

गांबिया अपनी सुंदर तटरेखाओं और उभरती अर्थव्यवस्था के कारण पर्यटकों और निवेशकों दोनों के लिए आकर्षण का केंद्र बनता जा रहा है। कोलोली और कोटू जैसे प्रमुख बीच (Kololi & Kotu Beach) गांबिया के सबसे प्रसिद्ध समुद्र तट हैं। यहाँ की सफेद रेत और ताड़ के पेड़ पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। यहाँ कई लग्जरी रिसॉर्ट्स और स्थानीय हस्तशिल्प बाज़ार हैं। यहां का ​कुंटा किन्ते द्वीप (Kunta Kinteh Island) एक UNESCO विश्व धरोहर स्थल है। यह प्रसिद्ध उपन्यास और टीवी सीरीज़ 'रूट्स' (Roots) से जुड़ा है और दास व्यापार के इतिहास की मार्मिक झलक पेश करता है। ​अबूको नेचर रिजर्व (Abuko Nature Reserve) पार्क वन्यजीव प्रेमियों और पक्षी विशेषज्ञों (Bird watchers) के लिए स्वर्ग के समान है। यहाँ बंदरों, मगरमच्छों और सैकड़ों प्रजातियों के पक्षियों को देखा जा सकता है। ​काचिकाली क्रोकोडाइल पूल (Kachikally Crocodile Pool) बाकाऊ में स्थित है और यह एक पवित्र स्थान माना जाता है, जहाँ आप पालतू मगरमच्छों को छू सकते हैं और उनके साथ फोटो खिंचवा सकते हैं। ​वासु स्टोन सर्कल्स (Wassu Stone Circles) एक और UNESCO धरोहर स्थल है, जो रहस्यमयी प्राचीन पत्थर के घेरों के लिए जाना जाता है। इन्हें अफ्रीका के 'स्टोनहेंज' के रूप में देखा जाता है। इसके अलावा राजधानी बांजुल का अल्बर्ट मुख्य बाज़ार जहाँ आप अफ्रीकी संस्कृति, कपड़े, मसालों और शोर-शराबे वाली स्थानीय जिंदगी का अनुभव कर सकते हैं।

मुस्लिम बहुल (90%) 24 लाख आबादी वाले इस देश की आधिकारिक भाषा अंग्रेजी है, लेकिन स्थानीय स्तर पर मंडिंका (Mandinka), वोलोफ (Wolof) और फुला (Fula) जैसी भाषाएँ प्रमुखता से बोली जाती हैं। बड़े संयुक्त परिवारों (Compounds) में रहने वाले यहां के लोग मिलनसार और मेहमाननवाज होते हैं।

वर्तमान में ऊर्जा, कृषि, प्रसंस्करण,डिजिटलाइजेशन, फिशरीज और किफायती आवास और व्यावसायिक भवनों के निर्माण के क्षेत्रों में आगे बढ़ते हुए

गांबिया अपनी 'उदार बाजार व्यवस्था' और 'वेस्ट अफ्रीकी बाज़ार' (ECOWAS) के प्रवेश द्वार के रूप में निवेशकों को आकर्षित कर रहा है। पर्यटन (Tourism) के क्षेत्र में  यहाँ इको-टूरिज्म, बुटीक होटल और क्रूज़ सेवाओं में निवेश की बहुत संभावना है। सरकार पर्यटन के बुनियादी ढांचे को आधुनिक बनाने पर ध्यान दे रही है।


ब्रजेश कानूनगो







 

Saturday, 31 January 2026

घाना के बाजार : महिला ही नहीं बाजार सशक्तिकरण की मिसाल

घाना के बाजार : महिला ही नहीं बाजार सशक्तिकरण की मिसाल

विश्वभर में कई समुदायों में मातृसत्तात्मक (Matriarchal) व्यवस्था प्रचलित है, जहाँ वंश, संपत्ति और निर्णय लेने का अधिकार महिलाओं के पास होता है। प्रमुख रूप से जिनमें इंडोनेशिया के मिनांगकाबाऊ, चीन के मोसुओ जनजाति, और भारत के मेघालय की खासी जनजाति भी शामिल हैं। इन समाजों में महिलाएँ परिवार की मुखिया और उत्तराधिकारी होती हैं। 

जुटाई जानकारी के अनुसार मिनांगकाबाऊ समाज इंडोनेशिया में है जो  दुनिया का सबसे बड़ा मातृसत्तात्मक समाज माना जाता है, जहाँ संपत्ति महिलाओं द्वारा हस्तांतरित होती है। मोसुओ, चीन (यूनान और सिचुआन) के मोसुओ समाज  को "महिलाओं का साम्राज्य" कहा जाता है। यहाँ 'वॉकिंग मैरिज' (walking marriage) की परंपरा है। भारत के मेघालय की खासी और गारो  जनजातियों में वंशावली माँ के नाम से चलती है और सबसे छोटी बेटी (खतदुह) को संपत्ति विरासत में मिलती है। कोस्टा रिका की ब्रिब्री स्वदेशी जनजाति में महिलाएं भूमि की मालकिन होती हैं और कबीले के प्रमुख का पद महिलाओं के माध्यम से चलता है। नासो समुदाय जो पनामा और कोस्टा रिका में है वह भी खुद को मातृसत्तात्मक बताता है। घाना (अफ्रीका) का आसानते भी एक प्रमुख मातृवंशीय समूह है। घाना गणराज्य पश्चिम अफ्रीका में स्थित एक देश है, जो पूर्व में टोगो, पश्चिम में कोटे डी आइवर, उत्तर में बुरकिना फासो, और दक्षिण में गिनी की खाड़ी से घिरा हुआ है। घाना की राजधानी अकरा है, और यह देश की सबसे बड़ा शहर भी है।

पिछले दिनों हमने यूट्यूब पर एक ट्रैवलर के वीडियो में घाना के एक ऐसे बाजार को नजदीक से देखा जहां बाजार की सारी बागडोर महिलाओं के हाथ में थी। जिन्हें वहां मार्केट क्वीन कहा जाता है।  मातृसत्तात्मक समाजों की प्रमुख विशेषता यह होती है कि विवाह के बाद पति पत्नी के घर जाकर रहता है (matrilocal) और बच्चों का वंश माँ के परिवार से पहचाना जाता है। लेकिन घाना के मातृसत्तात्मक बाजार की मार्केट क्वीन का इनसे बड़ा महत्वपूर्ण अंतर है। मातृसत्तात्मक समाजों में, महिलाएं परिवार और समुदाय के निर्णयों में भूमिका निभाती हैं और संपत्ति की उत्तराधिकारिता भी महिलाओं के माध्यम से होती है। उदाहरण के लिए, भारत की खासी जनजाति और घाना के अकरन समुदाय में महिलाएं परिवार और समुदाय के निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। जबकि घाना की मार्केट क्वीन महिलाएं  ' बाजार ' में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, यह उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति को दर्शाता है, न कि मातृसत्तात्मक समाज की विशेषता। ये महिलाएं बाजार में अपनी शक्ति और प्रभाव का उपयोग करती हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं है कि वे परिवार और समुदाय के निर्णयों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएं।

घाना में 'मार्केट क्वींस' (Market Queens) उन वरिष्ठ और प्रभावशाली महिला व्यापारियों को कहा जाता है, जो बाजारों में विभिन्न कमोडिटी समूहों (जैसे टमाटर, मक्का, या याम) का नेतृत्व करती हैं। इन्हें स्थानीय भाषा में 'ओहेम्मा' (ohemma) भी कहा जाता है। 

वे बहुत कुशलता से बाज़ार के विशिष्ट अनुभागों का प्रबंधन करती हैं और व्यापारियों के बीच विवादों को सुलझाती हैं। बाज़ार में आपूर्ति और कीमतों को नियंत्रित करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसके साथ ग्रामीण उत्पादकों (किसानों) को शहरी बाज़ारों से जोड़ने के उपाय करती हैं, जिससे खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होती है। ये महिलाएं अक्सर एक अनौपचारिक बैंकिंग प्रणाली के रूप में काम करती हैं, जो छोटे व्यापारियों को ऋण और सहायता प्रदान करती हैं। इस तरह ये महिलाएँ घाना के अनौपचारिक (informal) आर्थिक क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं और पारंपरिक रूप से व्यापार को सुचारू रूप से चलाने की जिम्मेदारी निभाती हैं। स्थानीय प्रशासन और नगर पालिका के साथ बातचीत कर बाजार की सुविधाओं (साफ-सफाई, टैक्स आदि) का प्रबंधन करती हैं।

घाना की अर्थव्यवस्था और वहां के बाजारों की संरचना दुनिया के सबसे दिलचस्प उदाहरणों में से एक है। यहाँ महिलाओं का वर्चस्व है, यहां तक कि बाजार में सिर पर माल ढोने वाली श्रमिक महिलाएं भी बाजार में अपना पसीना बहाते जुटी होती हैं। इन्हें स्थानीय स्तर पर 'कायायेई' (Kayayei) कहा जाता है। 'काया' का अर्थ है 'सामान' और 'येई' का अर्थ है 'महिलाएं'। ये ज्यादातर उत्तरी घाना के गरीब इलाकों से बेहतर जीवन की तलाश में दक्षिण के बड़े शहरों (जैसे अकरा और कुमासी) में आती हैं। ये महिलाएं अपने सिर पर बड़े एल्यूमीनियम के परातों (Pans) में भारी सामान, अनाज की बोरियां और खरीदे गए कपड़े लेकर चलती हैं। इनका जीवन अत्यंत कठिन होता है। वे बहुत ही कम मजदूरी पर काम करती हैं और अक्सर बाजारों के पास खुले में या झोपड़ियों में रहती हैं।

​घाना की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था (Informal Economy) में इन महिलाओं का योगदान अतुलनीय है। मार्केट क्वींस घाना के व्यापार की रणनीतिकार हैं, तो कायायेई उस व्यवस्था की मांसपेशियां । इन दोनों के बिना घाना की रोजमर्रा की अर्थव्यवस्था का चलना लगभग असंभव है। घाना की सामाजिक और आर्थिक संरचना में वहां की मातृसत्तात्मक (Matriarchal/Matrilineal) व्यवस्था का बड़ा महत्व हो जाता है। यह व्यवस्था न केवल परिवारों को चलाती है, बल्कि वहां के विशाल बाजारों के स्वरूप को भी निर्धारित करती है।


घाना की सरकार और विभिन्न गैर-सरकारी संगठन इन महिलाओं, विशेषकर 'कायायेई' (Kayayei) की स्थिति सुधारने के लिए कई मोर्चों पर काम कर रहे हैं। चूंकि मार्केट क्वींस पहले से ही प्रभावशाली और आर्थिक रूप से मजबूत हैं, इसलिए सरकारी प्रयासों का मुख्य केंद्र बोझ ढोने वाली श्रमिक महिलाएं ही होती हैं।

कौशल विकास और प्रशिक्षण (Kayayei Empowerment Programme) ​के अंतर्गत  इन महिलाओं को केवल शारीरिक श्रम पर निर्भर रहने से बचाने के लिए 'कायायेई एम्पावरमेंट प्रोग्राम' शुरू किया है। ​इसमें उन्हें सिलाई, साबुन बनाना, बेकिंग और कंप्यूटर जैसे तकनीकी कौशल सिखाए जाते हैं। ​ताकि वे बाजारों से निकलकर सम्मानजनक और कम जोखिम वाले व्यवसायों में जा सकें। ​कायायेई अक्सर खुले आसमान के नीचे या असुरक्षित बस्तियों में सोती हैं। इसे देखते हुए सरकार ने अकरा और कुमासी जैसे बड़े शहरों में इनके लिए विशेष हॉस्टल का निर्माण शुरू किया है। यहाँ उन्हें सुरक्षित रहने की जगह, पानी और स्वच्छता की सुविधाएं प्रदान की जाती हैं। सरकार इन महिलाओं का 'नेशनल हेल्थ इंश्योरेंस स्कीम' (NHIS) में मुफ्त या रियायती दरों पर पंजीकरण कराती है ताकि बीमारी की स्थिति में उनका इलाज हो सके। अनौपचारिक क्षेत्र से जुड़ी इन महिलाओं को मुख्यधारा की बैंकिंग से जोड़ने के लिए मोबाइल मनी और छोटे बचत खाते खोलने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। ​2017 में घाना सरकार ने एक बड़ा कदम उठाते हुए कायायेई पर लगने वाले 'मार्केट टोल' (प्रतिदिन का कर) को खत्म कर दिया था। इससे उनकी दैनिक आय में थोड़ी बढ़ोतरी हुई, क्योंकि पहले उन्हें अपनी मामूली कमाई का एक हिस्सा नगर पालिका को देना पड़ता था। ​बाजारों में काम करने वाली महिलाओं के बच्चों के लिए 'डे-केयर सेंटर' और स्कूलों में नामांकन की सुविधाएं दी जा रही हैं, ताकि उनकी अगली पीढ़ी को इस कठिन श्रम चक्र से बाहर निकाला जा सके। घाना में अब कई महिलाएं 'मार्केट क्वींस' के नेतृत्व में डिजिटल साक्षरता भी सीख रही हैं ताकि वे व्हाट्सएप और अन्य ऐप्स के जरिए अपने माल का ऑर्डर ले सकें।

घाना के प्रसिद्ध बाजारों (जैसे कि अकरा का मकोला मार्केट) में महिलाओं का वर्चस्व इतना अधिक है कि इसे अक्सर 'मातृसत्तात्मक' आर्थिक व्यवस्था के रूप में देखा जाता है। वहां "मार्केट क्वींस" (Ohemmaa) न केवल व्यापार बल्कि सामाजिक नियमों को भी नियंत्रित करती हैं। ऐसे में पुरुषों की भूमिका पूरी तरह से खत्म नहीं होती, बल्कि वह मुख्य रूप से लॉजिस्टिक्स, भारी श्रम और थोक आपूर्ति तक सीमित होती है। घाना के बाजार में एक अनकहा नियम है: "महिलाएं व्यापार का चेहरा हैं, और पुरुष उसकी मांसपेशियों (शक्ति) का काम करते हैं।" वहां पैसा और बाजार की राजनीति महिलाओं के हाथ में होती है, जबकि पुरुष उन सेवाओं को प्रदान करते हैं जिनके बिना बाजार चल नहीं सकता।

घाना में बाजार केवल व्यापार का केंद्र नहीं, बल्कि महिला सशक्तिकरण की एक जीवित प्रयोगशाला है, जहाँ मातृसत्तात्मक मूल्यों ने महिलाओं को 'शक्ति' (Power) और 'पूंजी' (Capital) दोनों दी हैं।

ब्रजेश कानूनगो 

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Saturday, 24 January 2026

निर्विवाद है द्वीप समूहों की प्राकृतिक सुंदरता !

निर्विवाद है द्वीप समूहों की प्राकृतिक सुंदरता !

पर्यटन (Tourism) के लिए विश्व के अनेक द्वीप समूह न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध हैं, बल्कि वे विशिष्ट सांस्कृतिक और भौगोलिक पहचान भी रखते हैं। कई बार बहुत से द्वीप विवादों के चलते खबरों की सुर्खियों में आकर हमारा ध्यान खींच लेते हैं।  मॉरीशस और ब्रिटेन के बीच विवाद  के कारण हिन्द महासागर में स्थित चागोस द्वीप समूह भी फिलहाल चर्चा में बना हुआ है। 

विश्व में ऐसे ही कई द्वीप सामरिक, आर्थिक (तेल/गैस) और संप्रभुता के कारणों से प्रमुख विवादित क्षेत्र बने हुए हैं। प्रमुख विवादित द्वीपों में से कुछ प्रमुख हैं, स्प्रैटली और पैरासेल द्वीप समूह (दक्षिण चीन सागर)  पर चीन, वियतनाम, फिलीपींस, मलेशिया, ब्रुनेई और ताइवान अपना दावा करते हैं। यह क्षेत्र प्राकृतिक तेल, गैस और समुद्री मार्गों के लिए विवादित हैं।सेनकाकू/डियाओयू द्वीप (पूर्व चीन सागर) चीन और जापान के बीच विवादित हैं।  ये निर्जन द्वीप सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।कुरील द्वीप समूह (रूस-जापान) रूस के कब्जे वाले इन द्वीपों पर जापान अपना दावा करता है। यह विवाद द्वितीय विश्व युद्ध के समय से चल रहा है। फॉकलैंड द्वीप (दक्षिण अटलांटिक महासागर) इस द्वीप के स्वामित्व को लेकर ब्रिटेन और अर्जेंटीना के बीच 1982 में युद्ध भी हो चुका है, जो अब भी विवाद का विषय है।कच्चातिवू द्वीप (पाक जलडमरूमध्य) भारत और श्रीलंका के बीच का यह छोटा द्वीप, जो अब श्रीलंका के अंतर्गत है, मछुआरों के अधिकारों को लेकर अक्सर चर्चा में रहता है।

वर्तमान में चर्चित चाग़ोस द्वीपसमूह (Chagos Archipelago) हिंद महासागर के बीचों-बीच स्थित रणनीतिक रूप से एक अत्यंत महत्वपूर्ण द्वीप समूह है जो यह पिछले कई दशकों से ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच एक गंभीर राजनयिक विवाद का केंद्र रहा है। दरअसल,​औपनिवेशिक काल में 18वीं शताब्दी में चाग़ोस फ्रांस के अधीन था और मॉरीशस का हिस्सा माना जाता था। 1814 में पेरिस की संधि के बाद इसे ब्रिटेन को सौंप दिया गया। ​विवाद की शुरुआत मॉरीशस की आजादी (1968) से ठीक पहले, 1965 में ब्रिटेन ने चाग़ोस को मॉरीशस से अलग कर दिया और इसे 'ब्रिटिश हिंद महासागर क्षेत्र' (BIOT) घोषित कर दिया। ​1967 से 1973 के बीच, ब्रिटेन ने अमेरिका को डिएगो गार्सिया पर सैन्य अड्डा बनाने की अनुमति देने के लिए वहाँ के मूल निवासियों (चाग़ोसियनों) को जबरन बाहर निकाल दिया गया।  उन्हें मॉरीशस और सेशेल्स भेज दिया गया, जहाँ उन्होंने दशकों तक संघर्षपूर्ण जीवन बिताया। ​

बाद में2019 मेंअंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने अपने परामर्श में कहा कि ब्रिटेन ने अवैध रूप से चाग़ोस पर कब्जा किया हुआ है और उसे जल्द से जल्द इन द्वीपों को मॉरीशस को सौंप देना चाहिए। इसके बाद अक्टूबर 2024 में  हुए​ऐतिहासिक समझौते के तहत हाल ही में ब्रिटेन ने आधिकारिक तौर पर चाग़ोस द्वीपसमूह की संप्रभुता मॉरीशस को सौंपने का निर्णय लिया। जिसमें ​डिएगो गार्सिया की लीज के तहत मॉरीशस को संप्रभुता मिलने के बावजूद डिएगो गार्सिया द्वीप पर स्थित सैन्य अड्डा अगले 99 वर्षों तक ब्रिटेन और अमेरिका के पास रहेगा।इसके बदले में ब्रिटेन मॉरीशस को वार्षिक वित्तीय सहायता प्रदान करेगा।​जनवरी 2026 में ताज़ा खबरों के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते की आलोचना की है और इसे "कमजोरी" बताया है। इस दबाव के चलते ब्रिटेन की वर्तमान सरकार ने इस समझौते से जुड़े बिल को फिलहाल अपनी संसद के एजेंडे से हटा लिया है, जिससे यह विवाद फिर से अनिश्चितता में घिर गया है। विवाद अपनी जगह बनते बिगड़ते रहेंगे किंतु  इन द्वीप समूहों के बारे में हम लोगों को जानना बहुत रोचक है।

चाग़ोस द्वीपसमूह मालदीव से लगभग 500 किमी दक्षिण में और मॉरीशस से करीब 2,200 किमी उत्तर-पूर्व में स्थित है। इसमें 58 छोटे प्रवाल द्वीप (atolls) शामिल हैं। ​डिएगो गार्सिया (Diego Garcia)  इस समूह का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण द्वीप है। यह रणनीतिक रूप से इतना महत्वपूर्ण है कि यहाँ से अमेरिका और ब्रिटेन हिंद महासागर, मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया में अपनी सैन्य गतिविधियों को नियंत्रित करते हैं। यह क्षेत्र अपनी जैव विविधता, दुर्लभ समुद्री जीवों और कोरल रीफ (मूंगा चट्टानों) के लिए जाना जाता है।

पर्यटकों और घुमक्कड़ों के लिए खूबसूरत और प्राकृतिक सौंदर्य से भरे इन द्वीप समूहों की सैर अपनी आकांक्षाओं की प्राथमिकता में रहती हैं।खासतौर से ​इंडोनेशिया  बाली, सुमात्रा और अन्य  द्वीपों के साथ (Bali & others) दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप समूह वाला देश है। इसमें लगभग 17,000 से अधिक द्वीप हैं। बाली यहाँ का सबसे प्रमुख पर्यटन केंद्र है।

​कैरिबियन द्वीप समूह (West Indies) के  क्यूबा, जमैका, बहामास जैसे कई देश शामिल हैं। यह अपने नीले पानी और क्रूज पर्यटन के लिए विश्व भर में विख्यात है। प्रशांत महासागर में स्थित जापानी द्वीप समूह  मुख्य रूप से चार बड़े द्वीपों (होन्शु, होक्काइडो, क्यूशू, शिकोकू) से बना है, जो अपनी तकनीक और संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है। इसके साथ साथ हिन्द महासागर में स्थित मालदीव अपने स्वच्छ पारदर्शी जल और ओवर वाटर विला के लिए प्रसिद्ध है।  प्रशांत महासागर में स्थित हवाई द्वीप ज्वाला मुखी पर्वतों

सर्फिंग और प्राकृतिक विविधता के लिए मशहूर है। अपने कोरल रीफ (मूंगा चट्टान) और शांत समुद्री तटों के लिए अरब सागर में स्थित लक्ष्य द्वीप और बंगाल की खाड़ी में स्थित भारत का अंडमान निकोबार द्वीप समूह बहुत लोकप्रिय है।

इक्वाडोर का कैनरी द्वीप (Canary Islands) अद्वितीय वन्यजीवों और चार्ल्स डार्विन के शोध के लिए प्रसिद्ध है। स्पेन साल भर खुशनुमा मौसम और रेतीले टीलों के लिए लोकप्रिय है।

सीशेल्स (Seychelles) अफ्रीका के पास स्थित है जो अपने ग्रेनाइट चट्टानों वाले बीच के लिए मशहूर है। फ्रेंच पोलिनेशिया (फ्रांस) में बोरा-बोरा जैसे अति सुंदर हनीमून डेस्टिनेशन यहाँ स्थित हैं।

इन खूबसूरत द्वीप समूहों पर लाखों पर्यटक अपने सामर्थ्य और शक्ति के अनुसार प्रति वर्ष पहुंचकर आनंदित होते रहते हैं। यूट्यूब पर पर्यटकों और घुमक्कड़ों के ट्रेवल वीडियो भी घर बैठे यहां की आभासी यात्रा का सुख कुछ हद तक तो दे ही जाते हैं। 


ब्रजेश कानूनगो


Thursday, 22 January 2026

ग्रीनलैंड : प्रकृति के सौंदर्य कि मनोहारी खिड़की

ग्रीनलैंड : प्रकृति के सौंदर्य कि मनोहारी खिड़की

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ग्रीनलैंड को प्राप्त करने की इच्छा के कारण हाल ही में ग्रीनलैंड ने विश्व का ध्यान अपनी ओर खींचा है।   ग्रीनलैंड में बड़ी मात्रा में खनिज, तेल और  प्राकृतिक संसाधन हैं, जो इसके महत्व को बड़ा देते हैं। ग्रीनलैंड अपनी आंतरिक सरकार और संसद के साथ एक स्वायत्त राज्य है। ग्रीनलैंड की अपनी सरकार और संसद स्थानीय मामलों का प्रबंधन करती है, जबकि डेनमार्क सरकार ग्रीनलैंड के विदेशी मामलों, रक्षा, और नागरिकता जैसे क्षेत्रों के लिए जिम्मेदार होती है।

ग्रीनलैंड  महाद्वीप नहीं है किंतु दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है।  ग्रीनलैंड का क्षेत्रफल लगभग 2,166,086 वर्ग किलोमीटर है, जबकि भारत का क्षेत्रफल लगभग 3,166,414 वर्ग किलोमीटर है। इस प्रकार, ग्रीनलैंड भारत से लगभग 1.5 गुना छोटा है। छोटा होने के बावजूद मर्केटर प्रोजेक्शन के कारण जिसमें जो देश भूमध्य रेखा से जितना दूर होता है, मानचित्र में वह उतना बड़ा दिखाई देता है, ग्रीनलैंड भारत की तुलना में भूमध्य रेखा से अधिक दूर है इसलिए वह विश्व मानचित्र में भारत से बड़ा दिखाई देता है।

यह दुनिया का सबसे विरल जनसंख्या वाला देश है, जिसकी आबादी लगभग 56,500 है, जिनमें से 88% ग्रीनलैंडिक इनुइट है। ग्रीनलैंड आर्कटिक महासागर में स्थित है, जो उत्तर में आर्कटिक महासागर, पूर्व में ग्रीनलैंड सागर, दक्षिण-पूर्व में उत्तरी अटलांटिक महासागर, दक्षिण-पश्चिम में डेविस स्ट्रेट, पश्चिम में बाफिन बे, और उत्तर-पश्चिम में नारेस स्ट्रेट और लिन्कन सागर से घिरा हुआ है।

ग्रीनलैंड की संस्कृति में इनुइट परंपराओं और स्कैंडिनेवियन प्रभावों का मिश्रण है। यहां के लोग मुख्य रूप से ग्रीनलैंडिक इनुइट हैं, जो अपनी भाषा, कला, और परंपराओं को संरक्षित रखते हैं। यहां की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से मछली पकड़ने और खनन पर आधारित है। मछली प्रसंस्करण, खनन के अलावा पर्यटन भी ग्रीनलैंड की अर्थव्यवस्था का आधार बना है। एक ट्रेवल ब्लॉगर नवांकुर चौधरी जो यात्री डॉक्टर के नाम से यूट्यूब चैनल चलाते हैं उनके वीडियोस के जरिए हमने ग्रीनलैंड की आभासी सैर की और बहुत सी जानकारियां भी जुटाईं।

ग्रीनलैंड में पर्यटन एक बढ़ता हुआ उद्योग है, जो मुख्य रूप से गर्मियों के मौसम में चलता है। यहां के मुख्य पर्यटन स्थलों में नुुक, इलुलिस्साट, और कांगेरलुसुआक शामिल हैं। पर्यटक यहां के प्राकृतिक सौंदर्य, इनुइट संस्कृति और अद्वितीय अनुभवों का आनंद लेते हैं।

आर्कटिक क्षेत्र में स्थित होने के कारण ग्रीनलैंड का मौसम बहुत ठंडा और शुष्क है। ग्रीनलैंड में मौसम के चार चरण होते हैं, शीतकाल जो दिसंबर से फरवरी तक रहता है और सबसे ठंडा होता है, जब तापमान -50°C से -60°C तक गिर जाता है। मार्च से मई तक वसंत में मौसम गर्म होने लगता है, जब तापमान 0°C से 10°C तक रहता है। जून से अगस्त तक के  ग्रीष्मकाल में मौसम गर्म हो जाता है  जब तापमान 10°C से 20°C तक रहता है। हमारे देश की तुलना में तो वह बहुत ही कम है। शरद काल जो सितंबर से नवंबर तक माना गया है तब मौसम ठंडा होने लगता है और तापमान 0°C से -10°C तक पहुंचने लगता है।

ग्रीनलैंड में दिन और रात की अवधि मौसम के अनुसार बदलती रहती है। गर्मियों में, जब सूर्य उत्तर ध्रुव के ऊपर रहता है, तो यहां 24 घंटे दिन रहता है, जिसे "मिडनाइट सन" कहा जाता है। सर्दियों में, जब सूर्य दक्षिण ध्रुव के नीचे रहता है, तो यहां 24 घंटे रात रहती है, जिसे "पोलर नाइट" कहा जाता है। ट्रैवलर के वीडियो में हमने न समाप्त होने वाले एक पूरे दिन में वहां के खूबसूरत नजारों को देखा।

ग्रीनलैंड में कई रोमांचक पर्यटन गतिविधियाँ की जा सकती हैं।  इलुलिस्साट आइसफजॉर्ड  एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है, जहां के ग्लेशियर और आइसबर्ग  मन मोह लेते हैं। यहां के सुंदर प्राकृतिक दृश्य एक अलग ही स्वप्निल संसार में ले जाते हैं।  ग्रीनलैंड में डॉग स्लेडिंग एक लोकप्रिय गतिविधि है, जिसमें पर्यटक हुस्की के साथ बर्फ पर चल सकते हैं। ग्रीनलैंड के फजॉर्ड्स में कायाकिंग करना एक अनोखा अनुभव है। ग्रीनलैंड में कई हाइकिंग ट्रेल्स हैं, जिनमें प्रकृति का आनंद उठाते पर्यटकों देखा जा सकता है। यहां आकाश में नॉर्दर्न लाइट्स देखना भी एक रोमांचक अनुभव होता है।

इस देश में यातायात व्यवस्था मुख्य रूप से हवाई और जल परिवहन पर आधारित है।  ग्रीनलैंड में 25 हवाई अड्डे हैं, जिनमें से अधिकांश छोटे हैं। तटीय क्षेत्रों  के लिए फेरी सेवाएं उपलब्ध रहतीं हैं। में चलती है। छोटे गांवों तक पहुंचने के लिए  हेलीकॉप्टर का उपयोग किया जाता है। कुछ खास जगहों पर डॉग स्लेड और स्नोमोबाइल भी यातायात के साधन होते हैं।

ग्रीनलैंड में प्राकृतिक संसाधनों की बहुतायत है, जिनमें रेअर अर्थ एलिमेंट्स, यूरेनियम, सोना, और तेल शामिल हैं। इसके अलावा, ग्रीनलैंड का स्थान अमेरिका और यूरोप के बीच एक महत्वपूर्ण मार्ग है,जो व्यापार और सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि अमेरिका ग्रीनलैंड को प्राप्त करना चाहता है क्योंकि यह एक रणनीतिक स्थान है जो आर्कटिक क्षेत्र में उसके हितों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। वर्तमान विवाद और संदर्भों से अलग हटकर ग्रीनलैंड की बात करें तो वह इस पृथ्वी के सौंदर्य की एक ऐसी अनोखी खिड़की है जहां से प्रकृति के सुंदर नजारे आम लोगों और पर्यटकों को आनंदित कर देते हैं।

ब्रजेश कानूनगो


Monday, 19 January 2026

बर्फ से ढका मनुष्य का जीवन संघर्ष

बर्फ से ढका मनुष्य का जीवन संघर्ष 


दुनिया भर में ग्लोबल वार्मिंग के कारण पर्यावरण संतुलन इस कदर गड़बड़ा गया है कि वर्ष 2026 की जनवरी के आधे बीतते बीतते रूस के कामचटका क्षेत्र में भीषण बर्फबारी ने पूरे इलाके को सफेद चादर में लपेट दिया। इससे जन-जीवन बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। लोगों के घर और वाहन बर्फबारी के नीचे दफन हो गए।बर्फ ने पूरे शहर को जकड़ लिया।  हालत यह हुई कि रिहायशी इमारतें 3 से 4 मंजिल तक बर्फ में दब गईं। सड़कों से लेकर घरों की छत तक हर तरफ सफेद चादर बिछ गई। सोशल मीडिया पर देखे वीडियो में हमने वहां के निवासियों को अस्तित्व के लिए संघर्ष करते देखा।
इसके पूर्व कई घुमक्कड़ों के अनेक ट्रैवल वीडियोस में विश्व के सबसे ठंडे और बर्फीले शहरों और गांवों में उन्हें घूमते और वहां के लोगों के जीवन की कठिनाइयों को भी उनकी प्रस्तुतियों से जानते समझते रहे हैं। 

विश्व के सबसे ठंडे आबाद शहरों पर नजर डालें तो पता चलता है कि मुख्य रूप से इनमें रूस के याकुत्स्क (Yakutsk) और साइबेरिया का ओयम्याकोन (Oymyakon) शामिल हैं, जहाँ तापमान अक्सर -40°C से -60°C तक गिर जाता है, जबकि कनाडा का येलोनाइफ (Yellowknife) और कज़ाकिस्तान का अस्ताना (Astana) भी सबसे ठंडे आबाद स्थानों में गिने जाते हैं, जहाँ लोगों को अत्यधिक ठंड का सामना करना पड़ता है. 
रूस का याकुत्स्क (Yakutsk) दुनिया का सबसे ठंडा बड़ा शहर माना जाता है, जहाँ लाखों लोग रहते हैं और सर्दियों में तापमान -50°C से नीचे चला जाता है। रूस का ही ओयम्याकोन (Oymyakon) दुनिया का सबसे ठंडा स्थायी रूप से बसा हुआ स्थान है, जहाँ का तापमान अक्सर -50°C से -60°C तक पहुँच जाता है और कई बार -70°C तक गिरता है। कनाडा का येलोनाइफ (Yellowknife) दुनिया के उत्तरी हिस्सों में स्थित एक बड़ा शहर है, जहाँ सर्दियों में सूरज की रोशनी बहुत कम पहुँचती है और कड़ाके की ठंड पड़ती है। इसी तरह कजाकिस्तान का अस्ताना (Astana) समुद्र से दूर स्थित है और यहाँ का तापमान कभी-कभी -51.5°C तक गिर जाता है, जिससे यह दुनिया के सबसे ठंडे स्थानों में से एक बन जाता है। यूएसए का अलास्का में उत्कियाग्विक (Utqiagvik) सबसे उत्तरी शहर है जो आर्कटिक सर्कल के ऊपर स्थित है और अत्यधिक ठंड के लिए जाना जाता है। मंगोलिया की राजधानी उलानबटार शहर  (Ulaanbaatar) सबसे ठंडा राजधानी शहर है, जहाँ जनवरी में औसत तापमान -44°C तक गिर जाता है। 


रूस का सबसे ठंडा आबाद गांव वर्खोयांस्क है, जो साइबेरिया में स्थित है। यहां का तापमान शीतकाल में -50°C से -67°C तक गिर जाता है, जो इसे दुनिया के सबसे ठंडे आबाद शहरों में से एक बनाता है। वर्खोयांस्क की आबादी लगभग 1,200 लोगों की है, जो मुख्य रूप से याकूत और रूसी समुदायों से संबंधित हैं। हम एक ट्रैवल ब्लॉगर के वीडियो के जरिए ऐसे कई गांवों कस्बों के जीवन को आभासी रूप से देखने की कोशिश की है। वर्खोयांस्क के लोगों का जीवन बहुत कठिन है, क्योंकि यहां की जलवायु बहुत ठंडी और शुष्क है। यहां के लोग मुख्य रूप से शिकार, मछली पकड़ने और पशुपालन से अपना जीवन चलाते हैं। यहां के मुख्य पशु रेनडियर, हिरण और घोड़े हैं। पीने के पानी की व्यवस्था ठंडे शहरों के लोगों के लिए एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि यहां के जल स्रोत अक्सर जम जाते हैं। यहां के लोग बर्फ को पिघलाकर पानी बनाते हैं और इसे पीने के लिए उपयोग करते हैं। अन्य जरूरी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए, यहां के लोग स्थानीय बाजारों और सरकारी दुकानों पर निर्भर हैं, जहां से वे आवश्यक वस्तुएं खरीदते हैं।

हमने देखा कि रूस के ठंडे शहरों में पानी की पाइप लाइनों का रखरखाव एक बड़ी चुनौती है। यहां की अत्यधिक ठंड के कारण पाइप लाइनें अक्सर जम जाती हैं और टूट जाती हैं, जिससे पानी की आपूर्ति प्रभावित होती है। इस समस्या से निपटने के लिए, रूस में पानी की पाइप लाइनों को विशेष रूप से डिज़ाइन किया जाता है, जैसे कि उन्हें जमीन के नीचे गहराई में बिछाया जाता है या उन्हें गर्म रखने के लिए विशेष इन्सुलेशन का उपयोग किया जाता है। पाइपलाइनों को जमने से बचाने के लिए इन्सुलेटेड पाइपलाइनों का उपयोग किया जाता है।कुछ शहरों में, हॉट वॉटर सर्कुलेशन सिस्टम का उपयोग किया जाता है, जिसमें गर्म पानी को पाइपलाइनों में सर्कुलेट किया जाता है ताकि वे जम न जाएं। कुछ शहरों में, बर्फ पिघलाने वाले सिस्टम का उपयोग किया जाता है, जिसमें बर्फ को पिघलाकर पानी बनाया जाता है। कई जगहअंडरग्राउंड वॉटर टैंक का उपयोग किया जाता है, जो पानी को जमने से बचाते हैं।

वर्खोयांस्क जैसे ठंडे शहरों में, लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था बहुत महत्वपूर्ण है। यहां के लोग मुख्य रूप से मांसाहारी भोजन करते हैं, जैसे कि कच्चा मांस, घोड़े का लीवर, रेनडियर, खरगोश और मछली। यहां के लोग स्ट्रोगनिना नामक एक विशेष व्यंजन भी खाते हैं, जिसमें मछली को जमाकर पतले टुकड़ों में काटा जाता है और उसे कच्चा ही खाया जाता है। कपड़ों की बात करें, तो यहां के लोग गर्म और मोटे कपड़े पहनते हैं, खासतौर से रेनडियर और खरगोश की खाल से बने कोट और बूट। कई परतों में कपड़े पहन कर वे अपने शरीर को गर्म बनाए रखने का प्रयास करते हैं। यहां के लोग वेलेंकी नामक एक विशेष प्रकार के जूते पहनते हैं, जो फील्ट से बने होते हैं और पैरों को गर्म रखते हैं। यहां के लोग गैलोशी नामक एक विशेष प्रकार के रबर के जूते भी पहनते हैं जो वेलेंकी के ऊपर पहने जाते हैं।

बर्फ और ठंड का आनंद लेने के लिए जहां हम हिमालयीन क्षेत्र के शहरों के पर्यटन के लिए निकलते हैं, वहीं विश्व के अनेक ऐसे ठंडे शहरों में आफत की बारिश होती है, बर्फीले मौसम और जमें हुए शहरों में अपने जीवन के लिए लोग भारी कष्टों के बीच संघर्ष को विवश होते हैं। 

ब्रजेश कानूनगो 


 


 

Tuesday, 13 January 2026

जैव विविधता के संरक्षण की चिंताओं के प्रतीक शुभंकर

जैव विविधता के संरक्षण की चिंताओं के प्रतीक शुभंकर

शुभंकर को अंग्रेजी में Mascot (मैस्कॉट) कहते हैं, जिसका मतलब है, ऐसा एक प्रतीक चिन्ह जिसमे कोई जानवर या कोई व्यक्ति चित्रित या प्रदर्शित होता है जो किसी संगठन, टीम या इवेंट के लिए सौभाग्य या पहचान माना जाता है और उनका प्रतिनिधित्व करता है।

खेल आयोजनों में शुभंकर रखने की परंपरा 1968 में ग्रेनोबल, फ्रांस में आयोजित शीतकालीन ओलंपिक से शुरू हुई, जब शुस नामक एक छोटा सा स्कीयर शुभंकर बनाया गया था। इसके बाद, 1972 में म्यूनिख में आयोजित ओलंपिक में वाल्डी नामक एक डैचशंड को शुभंकर बनाया गया, जो ओलंपिक के पहले आधिकारिक शुभंकर थे। स्कीयर शुभंकर शुस एक छोटा सा स्कीयर था, जो एक मानव जैसा प्राणी था, न कि कोई जानवर। यह 1968 में ग्रेनोबल, फ्रांस में आयोजित शीतकालीन ओलंपिक के लिए बनाया गया था। जबकि वाल्डी एक डैचशंड था, जो एक प्रकार का कुत्ता है। यह 1972 में म्यूनिख में आयोजित ओलंपिक के लिए बनाया गया आधिकारिक शुभंकर था।

शुभंकर का उद्देश्य खेल आयोजनों को अधिक आकर्षक और मनोरंजक बनाना होता है, साथ ही साथ आयोजकों को अपनी ब्रांडिंग और प्रचार के लिए एक मंच भी प्रदान करता है। शुभंकर अक्सर स्थानीय संस्कृति और परंपराओं को दर्शाते हैं और आयोजनों के लिए अनोखे और यादगार अनुभव प्रदान करते हैं।

भारत में शुभंकरों का उपयोग विभिन्न खेल आयोजनों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में किया जाता रहा है।  शुभंकरों को अक्सर टीम की भावना और ऊर्जा को दर्शाने के लिए डिज़ाइन किया जाता है।

शुभंकरों के डिज़ाइन में आमतौर पर उनकी आँखें बड़ी और आकर्षक बनाने से उन्हें जीवंत और मित्रवत बनाया जाता है। इन्हें चमकदार और आकर्षक रंग प्रदानकर और अधिक मनभावक भी बनाया जाता है। शुभंकरों का आकार अक्सर बड़ा और आकर्षक होता है, जिससे वे दूर से ही दिखाई दें। इनका व्यक्तित्व कुछ इस तरह निर्मित किया जाता है कि वे टीम या आयोजन की भावना को प्रकट कर सकें।

बहुत लोगों को अब भी याद होगा कि भारत में संपन्न 1982 के नई दिल्ली एशियाई खेलों का शुभंकर अप्पू (Appu) नामक एक युवा,चंचल हाथी था, जो एशियाई खेलों के इतिहास का पहला शुभंकर बना और शक्ति, बुद्धि तथा भारत की संस्कृति का प्रतीक बन गया था। भारतीय संस्कृति में हाथी को बहुत श्रद्धा भाव से देखा जाता है, अप्पू को उसी प्रतिरूप जो भारत की समृद्ध विरासत, शक्ति और बुद्धि का प्रतिनिधित्व करता था, साथ ही खेलों में युवाओं के उत्साह और भागीदारी को दर्शाता था। 'अप्पू' जैसे प्यारे नाम भी भारत में हाथियों के लिए इस्तेमाल होने वाला वाला एक सामान्य नाम है, जो हिंदी शब्द 'आहनाप' (हाथी) से लिया गया। आयोजन के दौरान अप्पू इतना लोकप्रिय हुआ कि उसे प्रचार सामग्री, व्यापारिक वस्तुओं और समारोहों में दिखाया जाता रहा। जिससे खेलों के लिए एक उत्सवपूर्ण माहौल भी बना। इस संदर्भ में यह भी दिलचस्प है कि शुभंकर के प्रतीक के अलावा, एक वास्तविक जीवित हाथी (जिसका नाम कुट्टिनारायणन था) भी इस आयोजन का हिस्सा था रहा था।  बताया जाता है कि एक टैंक में गिरने के बाद वह घायल हो गया था और बाद में उसकी मृत्यु हो गई। 

दुनियाभर में होने वाले प्रमुख खेलों के वन्य जीवों एवं अन्य प्राणियों पर आधारित शुभंकरों की जानकारी जुटाते हैं तो पता चलता है कि 1980 में रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) में मॉस्को ग्रीष्मकालीन ओलंपिक का शुभंकर भालू 'मिशा' ((Brown Bear)) था, जो ओलंपिक इतिहास के सबसे प्रसिद्ध शुभंकरों में से एक है। भालू रूस के राष्ट्रीय गौरव और शक्ति का प्रतीक है। इसे बहुत ही प्यारा और मिलनसार दिखाया गया था, जिसने दुनिया भर के लोगों का दिल जीत लिया था।

वर्ष 2000 के खेलों में सिडनी (ऑस्ट्रेलिया) में ऑस्ट्रेलिया के तीन अनोखे जीवों को शुभंकर बनाया गया। प्लैटिपस (Platypus), कूकाबुरा (Kookaburra) और इकिडना (Echidna)।  ​सिड (प्लैटिपस) पानी में रहने वाला जीव, ​ओली (कूकाबुरा) ऑस्ट्रेलिया का प्रसिद्ध पक्षी और ​मिली (इकिडना) एक चींटीखोर जैसा दिखने वाला कांटेदार जीव होता है।​ ये तीनों क्रमश: पानी, हवा और धरती का प्रतिनिधित्व करते थे।

​2008 के बीजिंग ओलंपिक में पांच शुभंकर थे, जिनमें 'जिंगजिंग' (विशाल पांडा) मुख्य था। पांडा चीन में राष्ट्रीय महत्व का प्राणी है। इसके अलावा इसमें एक तिब्बती मृग (यिंगयिंग) और एक निगल पक्षी (निनि) भी शामिल थे। ये सुख, स्वास्थ्य और सौभाग्य के प्रतीक माने जाते हैं।

2016 में ब्राजील में आयोजित रियो ओलंपिक खेलो का शुभंकर 'विनिसियस' एक मिश्रित वन्यजीव (Hybrid Animal) था, यह कोई एक जानवर नहीं था, बल्कि ब्राजील के विभिन्न जानवरों (बिल्ली, बंदर और पक्षियों) का एक मिश्रण था। यह ब्राजील की जैव-विविधता और उनकी चपलता का प्रतीक था।

​कतर में 2022 के फीफा विश्व कप में 'लाएब'  शुभंकर बना, हालांकि यह जानवर नहीं था (यह एक पारंपरिक अरबी हेडड्रेस 'कुफिया' जैसा था), लेकिन फीफा के इतिहास में 'विली' (शेर) को याद करना जरूरी है। 1966 (इंग्लैंड) में 'विली' विश्व कप का पहला शुभंकर था, जो एक ब्रिटिश शेर था।

शुभंकर के लिए प्राणियों को चुनने के पीछे भी बहुत सोचे समझे कारण होते हैं। जिनमें क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान, खेल भावना के हार्दिक प्रदर्शन के साथ साथ लुप्तप्राय प्रजातियों को शुभंकर बनाकर उनके संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाना भी उद्देश्य होते हैं। 

हमारे देश में खेलो इंडिया अभियान के शुभंकर हर संस्करण के साथ बदलते रहते हैं; हाल ही में, खेलो इंडिया यूथ गेम्स 2025 के लिए गजसिंह (हाथी और शेर का मिश्रण) था, जबकि खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स 2025 के लिए खम्मा और घनी (ऊँट) थे, और खेलो इंडिया पैरा गेम्स 2023 के लिए उज्ज्वला (गौरैया) थी। हमारी धरती पर जैव विविधता और पर्यावरणीय संतुलन के प्रति ऐसा रचनात्मक दृष्टिकोण बहुत आश्वस्त करता है।


ब्रजेश कानूनगो


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Monday, 12 January 2026

एलिफेंट सफारी : हाथी पर सवार होकर अभ्यारण्यों की सैर

एलिफेंट सफारी : हाथी पर सवार होकर अभ्यारण्यों की सैर

अभ्यारण्यों में वन्य प्राणियों के बीच स्वयं पहुंचकर उन्हें और उनकी गतिविधियों को नजदीक से देखना पर्यटकों और घुमक्कड़ों के लिए हमेशा से आकर्षण की बात रही है। सामान्यतः पर्यटक विशेष और सुरक्षित वाहनों में जंगलों और वन्य जीवों के बीच ले जाए जाते हैं। इस तरीके को आम भाषा में जीप जंगल सफारी पुकारा जाता है, लेकिन कुछ खास अभ्यारण्यों में प्रशिक्षित हाथियों पर सवार होकर जंगली प्राणियों के बीच जाकर उन्हें देख पाना ज्यादा कारगर होता है। एलिफेंट सफारी की बात करने से पहले हम थोड़ा हाथियों के बारे में भी जानेंगे तो शायद बेहतर होगा।

हाथी विश्व के सबसे बड़े और सबसे आकर्षक जीवों में से एक हैं। इनकी तीन मुख्य प्रजातियाँ होती हैं,अफ्रीकी बुश हाथी, अफ्रीकी वन हाथी और एशियाई हाथी। अफ्रीकी बुश हाथी उप-सहारा अफ्रीकी क्षेत्र में रहते हैं और बोत्सवाना, नामीबिया, ज़िम्बाब्वे और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में पाए जाते हैं। ये हाथी बड़े आकार के होते हैं और इनके कान बड़े और त्रिभुजाकार होते हैं।अफ्रीकी वन हाथी कांगो, लाइबेरिया, घाना और गैबॉन जैसे देशों में पाए जाते हैं। ये हाथी छोटे आकार के होते हैं और इनके कान छोटे और गोलाकार होते हैं ।

तीसरी प्रजाति याने एशियाई हाथी भारत, बांग्लादेश, चीन, नेपाल, थाईलैंड और वियतनाम जैसे देशों में पाए जाते हैं। ये हाथी छोटे आकार के होते हैं और इनके कान छोटे और त्रिभुजाकार होते हैं। हाथियों का आचरण बहुत ही दिलचस्प होता है। ये जीव सामाजिक होते हैं और समूहों में रहते हैं। इनके समूह में एक मातृसत्तात्मक व्यवस्था होती है, जिसमें सबसे बड़ी और अनुभवी मादा हाथी समूह का नेतृत्व करती है ।

कई बार हम अखबारों और समाचारों में हाथियों के उत्पात के समाचार पढ़ते रहते हैं। वर्ष 2014 एक हाथी ने मुंबई के एक पार्क में कई लोगों पर हमला किया , जिसमें 3 लोगों की मौत हो गई। वर्ष 2019 एक हाथी ने केरल के एक गांव में कई लोगों पर हमला किया, जिसमें 5 लोगों की मौत हो गई। 2020 में एक हाथी ने श्रीलंका के एक गांव में कई लोगों पर हमला किया, जिसमें 2 लोगों की मौत हो गई थी। ऐसी कई घटनाएं होती रहीं है जब हाथियों के आतंक से जान माल का नुकसान हुआ। 

हाल के वर्षों में, विशेष रूप से 2025 और 2026 की शुरुआत में, जंगली हाथियों और मनुष्यों के बीच संघर्ष की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। हाथियों का आक्रामक होना केवल एक संयोग नहीं, बल्कि बिगड़ते पर्यावरण का संकेत है। जंगलों की कटाई और शहरीकरण के कारण हाथियों के पास रहने की जगह कम हो रही है, जिससे वे भोजन की तलाश में बस्तियों का रुख करते हैं। हाथियों के पारंपरिक रास्तों पर सड़कों, रेल पटरियों और रिसॉर्ट्स के निर्माण ने उन्हें भ्रमित और क्रोधित कर दिया है। नर हाथियों में टेस्टोस्टेरोन का स्तर बढ़ने से वे अत्यधिक हिंसक हो जाते हैं। गन्ने और धान जैसी फसलों की खुशबू उन्हें खेतों की ओर खींचती है, जहाँ इंसानों से टकराव होता है। 

उग्र हाथियों का आतंक, खासकर झारखंड के चाईबासा क्षेत्र में, मानव-हाथी संघर्ष (Human-Elephant Conflict) एक गंभीर मुद्दा बना है, जहाँ जंगल कटने और आवास घटने से हाथी आबादी वाले इलाकों में घुस रहे हैं, जिससे हाल ही में कई लोगों की जानें गई हैं और ग्रामीणों में दहशत फैली है, जबकि वन विभाग द्वारा इन्हें नियंत्रित करने और मुआवजा देने के प्रयासों में जुटा है, लेकिन लोगों में असंतोष और विरोध बनता रहा है। 

हाथियों से इन सब खतरों के बावजूद कई मौकों पर एलिफेंट सफारी महत्वपूर्ण और उपयोगी हो जाती है। भारत में एलिफेंट सफारी के लिए खासतौर से काजीरंगा नेशनल पार्क(असम),जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क,कान्हा/बांधवगढ़ (मध्यप्रदेश),पेरियार नेशनल पार्क(केरल), मानस नेशनल पार्क (असम) काफी प्रसिद्ध हैं। इनमें खासतौर से एक सींग वाले गैंडा के लिए कांजीरंगा पार्क, बंगाल टाइगर के लिए जिम कार्बेट , बाघों के लिए कान्हा,बांधवगढ़, झील किनारे के वंयजीवों के लिए केरल का पेरियार पार्क तथा असम का मानस पार्क जंगली भैंसे और दुर्लभ प्रजातियों के लिए लोकप्रिय हैं। 

दरअसल, हाथी सफारी (Elephant Safari) वन्यजीवों को उनके प्राकृतिक आवास में देखने का एक पारंपरिक और रोमांचक तरीका है। यह न केवल रोमांच प्रदान करता है, बल्कि आपको जंगल के उन हिस्सों तक ले जाता है जहाँ जीप या अन्य वाहन नहीं पहुँच सकते। हाथी घने जंगलों, ऊँची घास (जैसे काजीरंगा की एलीफेंट ग्रास) और दलदली इलाकों में आसानी से चल सकते हैं, जहाँ गाड़ियाँ नहीं जा सकतीं। जीप के इंजन की आवाज़ वन्यजीवों को डरा सकती है, लेकिन हाथी की चाल शांत होती है, जिससे हम जानवरों (जैसे बाघ या गैंडा) के बहुत करीब जा सकते हैं। हाथी की पीठ पर बैठने से जंगल का 'बर्ड्स-आई व्यू' मिलता है, जिससे घनी झाड़ियों के बीच छिपे जानवरों को देखना आसान हो जाता है।

यह भी सच है कि मनुष्य ने अन्य सभी प्राणियों से संभावित खतरों से अपने आपको सुरक्षित रखने के पर्याप्त साधन और सावधानियां अपनाई हैं। यही वजह है कि लाखों पर्यटक और घुमक्कड़ हाथियों पर सवार होकर बेखौफ वनों में विचरण करते दुर्लभ प्राणियों को निहारने का शौक पूरा करने को सदैव आतुर रहते हैं। 

ब्रजेश कानूनगो 



 

Saturday, 10 January 2026

कंगारू के देश में ऊंटों का जलवा

 कंगारू के देश में ऊंटों का जलवा

जिस तरह अफ्रीका महाद्वीप की जेब्रा, जिराफ,चिंपाजी और शेर से, अंटार्कटिका की पेंग्वीन, शील,व्हेल से, उत्तरी ध्रुव प्रदेश की भालू से, अरब और रेगिस्तान क्षेत्र की ऊंटों से पहचान बनती है उसी तरह ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप की पहचान कंगारू से बनती है। कंगारू ऑस्ट्रेलिया का सबसे प्रतिष्ठित और राष्ट्रीय पशु है। यह अपने खास चलने के अंदाज और बच्चों को रखने वाली थैली के कारण पूरी दुनिया में जाना जाता है। प्राकृतिक रूप से कंगारू केवल ऑस्ट्रेलिया और न्यू गिनी के क्षेत्रों में ही पाए जाते हैं। यह दुनिया के अन्य किसी भी महाद्वीप (जैसे एशिया, अफ्रीका या अमेरिका) में प्राकृतिक रूप से नहीं मिलता। करोड़ों साल पहले जब ऑस्ट्रेलिया अन्य महाद्वीपों से अलग हुआ, तो यहाँ के जीव बाकी दुनिया से कट गए। कंगारू एक 'मार्सुपियल' (Marsupial) यानी धानीप्राणी है, और इस प्रजाति का विकास इसी भौगोलिक अलगाव के कारण ऑस्ट्रेलिया में हुआ।

कंगारू जैसे अपने इस विशिष्ट जीव की पहचान के बावजूद ऑस्ट्रेलिया अपने यहां के ऊंटों के कारण भी बहुत चर्चा में बना रहता है। ​शायद आपको जानकर हैरानी हो कि आज सऊदी अरब और कतर जैसे देश, जहाँ ऊंटों की बहुत अहमियत है, ऑस्ट्रेलिया से ऊंट आयात करते हैं। इसके दो मुख्य रूप से दो कारण  हैं पहला यह कि ऑस्ट्रेलिया के ऊंट रोग-मुक्त और पूरी तरह 'ऑर्गेनिक' होते हैं, इसलिए उनके मांस की मांग अरब देशों में बहुत है। दूसरा कारण है कि  आस्ट्रेलियाई ऊंटों की शुद्धता और मजबूती के कारण, इनका उपयोग वहां की नस्लों को बेहतर बनाने के लिए किया जा रहा है।

अरब और भारत के ऊंटों से इनके अलग होने के कुछ विशिष्ट कारण हैं। मध्य पूर्व और भारत के ऊंट अक्सर कई बीमारियों (जैसे 'सरा') से ग्रस्त रहते हैं, लेकिन ऑस्ट्रेलिया के ऊंट दुनिया के सबसे स्वस्थ ऊंट माने जाते हैं। इसका कारण यह है कि वे एक सदी से भी अधिक समय तक बाहरी दुनिया से अलग-थलग रहे, जिससे उन तक संक्रामक बीमारियाँ नहीं पहुँचीं। क्योंकि ये ऊंट जंगली हैं, इन्हें भोजन और पानी के लिए मीलों चलना पड़ता है। इस कारण ये पालतू ऊंटों की तुलना में अधिक मांसपेशी युक्त (Muscular) और ताकतवर होते हैं। आज ऑस्ट्रेलिया में दुनिया की सबसे शुद्ध 'ड्रोमेडरी' (एक कूबड़ वाली) नस्ल पाई जाती है, क्योंकि वहां इनका अन्य प्रजातियों के साथ संकरण (Cross-breeding) नहीं हुआ।

पालतू ऊंट आमतौर पर शांत होते हैं, लेकिन ऑस्ट्रेलिया के जंगली ऊंट इंसानों के प्रति बहुत सतर्क और कभी-कभी आक्रामक होते हैं। ये ऊंट बहुत बड़े झुंडों में रहते हैं (कभी-कभी सैकड़ों की संख्या में), जबकि पालतू ऊंटों को छोटी टोलियों में रखा जाता है। सूखे के समय ये हजारों की तादाद में एक साथ पानी की तलाश में निकलते हैं, जो एक डरावना दृश्य होता है।

ऑस्ट्रेलिया के कुछ इलाकों में पानी बहुत खारा होता है। यहाँ के ऊंटों ने उच्च लवणता (Salinity) वाला पानी पीने की क्षमता विकसित कर ली है, जो सामान्य पालतू ऊंटों के लिए घातक हो सकता है। ये ऊंट ऑस्ट्रेलिया की स्थानीय कँटीली झाड़ियों और उन पौधों को भी खा जाते हैं जिन्हें वहां के स्थानीय जानवर (जैसे कंगारू) नहीं खा सकते।

ऑस्ट्रेलिया में ऊंटों का इतिहास और वर्तमान स्थिति काफी अनोखी है। जहां दुनिया के कई हिस्सों में ऊंट पालतू जानवर के रूप में पाए जाते हैं, वहीं ऑस्ट्रेलिया में ये "जंगली" (Feral) हो चुके हैं और पर्यावरण के लिए एक बड़ी चुनौती बन गए हैं। ​ऑस्ट्रेलिया में ऊंट प्राकृतिक रूप से नहीं पाए जाते थे।  सबसे पहले 1840 में कैनरी आइलैंड्स से ऊंट ऑस्ट्रेलिया लाए गए। इसके बाद 1860 से 1907 के बीच भारत और अफगानिस्तान से हजारों ऊंट आयात किए गए।

विशाल रेगिस्तानी इलाकों की खोज, सामान ढोने, और रेलवे व टेलीग्राफ लाइनों के निर्माण के लिए ऊंट सबसे उपयुक्त थे क्योंकि वे घोड़ों से अधिक सहनशील थे। इनके साथ 'अफगान' ऊंट हांकने वाले लोग (Cameleers) भी आए। जब मोटर गाड़ियां और ट्रेनें आ गईं, तो ऊंटों की जरूरत खत्म हो गई। कई मालिकों ने इन्हें मारने के बजाय रेगिस्तान में खुला छोड़ दिया। अनुकूल वातावरण और शिकारियों की कमी के कारण इनकी आबादी तेजी से बढ़ी।

आज ऑस्ट्रेलिया में जंगली ऊंटों की संख्या 10 लाख से भी अधिक होने का अनुमान है, जो हर 8-9 साल में दोगुनी हो जाती है। इनके कारण अनेक समस्याएं पैदा हो रही हैं। ये ऊंट एक बार में सैकड़ों लीटर पानी पी सकते हैं। सूखे के दौरान, पानी की तलाश में आदिवासी बस्तियों में घुस जाते हैं, पाइपलाइन तोड़ देते हैं और एयर कंडीशनर तक से पानी निकालने की कोशिश करते हैं। ये मवेशियों के लिए लगाई गई बाड़ (fences) और पानी की टंकियों को भारी नुकसान पहुँचाते हैं। देशी वनस्पतियों को खा जाते हैं, जिससे मिट्टी का कटाव (Erosion) बढ़ता है। वे  शुद्ध जल स्रोतों (Waterholes) को भी गंदा कर देते हैं, जिससे स्थानीय जीव और पौधे मर जाते हैं। ऊंट बड़ी मात्रा में मीथेन गैस छोड़ते हैं, जो ग्रीनहाउस प्रभाव को बढ़ाती है, जो ग्लोबल वार्मिंग का एक कारण है।

ऑस्ट्रेलियाई सरकार और स्थानीय समुदाय ऊंटों की आबादी को नियंत्रित करने के लिए कई कड़े और विवादास्पद कदम उठाते हैं, जैसे हवाई शूटिंग (Aerial Culling) सबसे प्रमुख तरीका है। हेलीकॉप्टरों से पेशेवर निशानेबाज जंगली ऊंटों को मारते हैं ताकि उनकी संख्या कम की जा सके। एक जानकारी के अनुसार 2020 के भीषण सूखे के दौरान लगभग 10,000 ऊंटों को मारने का आदेश दिया गया था। कुछ ऊंटों को पकड़कर उनका मांस (Meat) निर्यात किया जाता है या उन्हें पालतू बनाकर पर्यटन (कैमल सफारी) में इस्तेमाल किया जाता है। ऑस्ट्रेलिया अब मध्य पूर्व के देशों को ऊंट निर्यात भी करता है, क्योंकि वहां ऊंटों की नस्ल और मांस की मांग है। इनके आतंक से बचने के लिए महत्वपूर्ण जल स्रोतों और संवेदनशील इलाकों के चारों ओर मजबूत बाड़ लगाई जाती है ताकि ऊंट वहां पहुंच कर नुकसान न पहुंचा सकें।

दरअसल, ऑस्ट्रेलिया के जंगली ऊंटों ने पिछले 100-150 वर्षों में खुद को वहां के वातावरण के अनुसार इस तरह ढाल लिया है कि वे अब अपने पूर्वजों (मध्य पूर्व और भारत के ऊंटों) से काफी अलग दिखाई और व्यवहार करते हैं। यह बात भी बहुत दिलचस्प है कि कंगारू प्रधान देश में ऊंटों की इतनी अधिक संख्या है कि वहां प्रतिवर्ष ऊंटों की दौड़ (Camel Racing) का आयोजन भी किया जाता है, जो काफी लोकप्रिय है।

ब्रजेश कानूनगो


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मनुष्य के लिए प्रेरक है पेंग्वीन का जीवन

 मनुष्य के लिए प्रेरक है पेंग्वीन का जीवन

दुनिया की सैर करने का एक लंबा इतिहास रहा है। अनेक पदयात्री एक देश से दूसरे देशों तक भ्रमण करते रहे हैं। कई यात्री,इतिहासकार, संत,धर्मप्रचारक दुनिया भर में पद यात्राएं करते हुए अपने अभियान को लक्ष्य तक ले जाने में सफल हुए हैं। समुद्रों को लांघते हुए भी अनेक जहाजियों और सौदागरों ने लंबी यात्राएं की हैं और अनेक अंजान द्वीपों और महाद्वीपों की खोज की।  और अब तो वायुमार्ग ने सैलानियों और घुमक्कड़ों के लिए दुनिया के दुर्गम स्थलों को भी आसान बना दिया है। पर्यटन का एक बड़ा उद्योग और व्यवसाय अस्तित्व में आया है जिसने घुमक्कड़ों और पर्यटकों के लिए काफी सुविधाएं प्रदान कर दी है।


आज के समय में भी अनेक घुमक्कड़ घर से निकलने के बाद लगातार दुनिया का भ्रमण करते रहते हैं। वे न सिर्फ यात्रा करते हैं बल्कि अपने ट्रैवलॉग वीडियो के माध्यम से आम लोगों को भी उस अनुभूति का आस्वाद लेने का अवसर प्रदान कर देते हैं।  ऐसे ही हरियाणा के डॉ राज हैं जो लगभग दस वर्षों से दुनिया का कोना कोना छान आने में संलग्न है। खास बात यह कि उन्होंने लगभग 160 से अधिक देशों की यात्रा अपनी साइकिल धन्नो पर सवारी करते हुए पूरी की है। साइकिल बाबा के नाम से ये विश्व यात्री पोल टू पोल अभियान के तहत अंटार्कटिका महाद्वीप अपनी धन्नो के साथ क्रूज से यात्रा करते हुए पहुंचे और अपने यूट्यूब ट्रेवल वीडियो के माध्यम से इस सफेद महाद्वीप के सौंदर्य और विशेषताओं से रूबरू करवाया।

उनके बनाए जीवंत वीडियोस और अपने अध्ययन से यहां अंटार्कटिका के विशेष जीवों के बारे में जानना भी दिलचस्प होगा जो इस क्षेत्र की विशेष पहचान और प्रतीक बने हैं।


अंटार्कटिका, जिसे 'श्वेत महाद्वीप' और 'ठंडा रेगिस्तान' भी कहा जाता है, पृथ्वी का सबसे दुर्गम स्थान है। यहाँ की अत्यधिक ठंड, बर्फीली हवाओं और शुष्क वातावरण में जीवित रहने के लिए यहाँ के जीवों ने अद्भुत विकासवादी बदलाव (adaptations) किए हैं।


पेंगुइन (Penguins) अंटार्कटिका के सबसे प्रसिद्ध निवासी हैं। यहाँ मुख्य रूप से एम्परर (Emperor) और एडली (Adélie) पेंगुइन पाए जाते हैं। इनके शरीर पर वसा की एक मोटी परत (Blubber) होती है जो इन्हें गर्म रखती है। इनके पंख छोटे और मजबूत होते हैं, जो तैरने में पतवार की तरह काम करते हैं। एम्परर पेंगुइन भीषण सर्दियों में भी अंडे देते हैं। नर पेंगुइन अंडे को अपने पैरों पर रखकर दो महीने तक भूखे रहकर उसे गर्म रखता है, जबकि मादा शिकार के लिए समुद्र में जाती है।

एक अन्य महत्वपूर्ण प्राणी है सील (Seals)।वेडेल सील, लेपर्ड सील और एलीफेंट सील जैसी इनकी प्रजातियाँ होती हैं। वेडेल सील बर्फ के नीचे 600 मीटर की गहराई तक गोता लगा सकती हैं और घंटों तक अपनी सांस रोक सकती हैं। लेपर्ड सील यहाँ की एक खतरनाक शिकारी है। ये जीव अपना अधिकांश समय पानी में बिताते हैं, लेकिन आराम करने और बच्चों को जन्म देने के लिए बर्फ की चट्टानों (Ice floes) पर आते हैं।


​व्हेल (Whales) प्राणी ​अंटार्कटिका के ठंडे समुद्र में ब्लू व्हेल, किलर व्हेल (Orca) और हम्पबैक व्हेल बहुतायत में पाई जाती हैं। ये दुनिया के सबसे बड़े स्तनधारी जीव हैं। ये मुख्य रूप से सूक्ष्म जीवों और 'क्रिल' को खाकर जीवित रहते हैं। सर्दियों में ये गर्म समुद्रों की ओर प्रवास (migration) कर जाती हैं और गर्मियों में भोजन के लिए वापस अंटार्कटिका आती हैं।19वीं और 20 वीं सदी में, अंटार्कटिका के आसपास व्हेल और सील का शिकार उनके बहुमूल्य तेल (जलाने और स्नेहक के लिए) और वसा (खाद्य) के लिए होता था, जिससे उनकी संख्या बहुत कम हो गई थी।  अब यह प्रतिबंधित हो गया है।  साइकिल बाबा के वीडियो में हमने कुछ ऐसे भी स्थल देखे जहां इन जीवों के शिकार और तेल निकाले जाने के संयंत्र के अवशेष और जमा हुआ रक्त और पिंजर भी  दिखाई देते हैं। हालांकि अब, व्हेल और सील की आबादी इन ऐतिहासिक शिकार से उबर रही है, लेकिन जलवायु परिवर्तन उनके पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक नया खतरा अवश्य है।

अंटार्कटिक क्रिल (Antarctic Krill) अंटार्कटिका के पारिस्थितिकी तंत्र की 'आधारशिला' है। यह झींगे जैसा दिखने वाला एक छोटा जीव है। अंटार्कटिका के लगभग सभी बड़े जीव (व्हेल, पेंगुइन, सील) प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भोजन के लिए क्रिल पर निर्भर हैं।

​अंटार्कटिका जैसे बेहद ठंडे क्षेत्र के जीव अपने विशेष तरीकों से जीवित रह पाते हैं। यहाँ की कुछ मछलियों (जैसे आइसफिश) के खून में खास प्रोटीन होता है जो उनके रक्त को जमने नहीं देता। पेंगुइन कड़ाके की ठंड से बचने के लिए एक-दूसरे से चिपककर (Huddling) खड़े होते हैं, जिससे शरीर की गर्मी बनी रहती है। 'स्नो पेट्रल' जैसे पक्षियों का रंग बिल्कुल सफेद होता है, जिससे वे बर्फ में छिप जाते हैं और शिकारियों से बचे रहते हैं।

अब यदि अंटार्कटिका की पहचान पेंग्विन की बात करें विशेष रूप से एम्परर पेंग्विन, का जीवन केवल जीवित रहने का संघर्ष नहीं है, बल्कि यह मानवीय जीवन के लिए भी कई गहरे सबक देता है। एक मनुष्य पेंग्विन से अनेक बातें सीख सकता है।


​पेंग्विन हमें टीम वर्क और निस्वार्थ सहयोग (Huddling)  का पाठ पढ़ाते हैं कि कठिन समय में साथ रहना ही बचने का एकमात्र तरीका है। जब वे कड़ाके की ठंड में 'हडल' (झुंड) बनाते हैं, तो केंद्र में मौजूद पेंग्विन सबसे ज्यादा सुरक्षित और गर्म होते हैं। लेकिन वे वहां हमेशा नहीं रहते; वे बारी-बारी से बाहर की ठंडी परिधि पर जाते हैं ताकि बाहर वालों को अंदर आने का मौका मिले।

स्पष्ट संदेश है कि सफलता और सुरक्षा साझा होनी चाहिए। समाज में दूसरों के हितों का ध्यान रखना अंततः सबके हित में होता है।

​पेंग्विन के जोड़े में काम का बंटवारा अद्भुत होता है। जब मादा भोजन की तलाश में जाती है, तो नर अंडे की पूरी जिम्मेदारी संभालता है। वे एक-दूसरे पर अटूट भरोसा करते हैं। उनकी लैंगिक समानता और साझेदारी हमे सिखाती है कि परिवार और समाज की जिम्मेदारी किसी एक लिंग (Gender) की नहीं है। आपसी सहयोग और बराबरी से ही बड़े लक्ष्यों को हासिल किया जा सकता है।

​नर एम्परर पेंग्विन बिना कुछ खाए-पिए, महीनों तक बर्फीले तूफानों के बीच खड़े रहकर अंडे की रक्षा करते हैं। वे विपरीत परिस्थितियों में भी अपना संयम नहीं खोते। उनका अत्यधिक धैर्य और सहनशीलता (Resilience) प्रेरित करती है। जीवन में आने वाली मुश्किलों और 'प्रतीक्षा के समय' को धैर्य के साथ काटना चाहिए। कठिन समय हमेशा के लिए नहीं रहता।

​पेंग्विन बर्फ पर चलने के बजाय अपने पेट के बल फिसलते हैं (टोबोगनिंग) ताकि उनकी ऊर्जा बची रहे। वे अनावश्यक ऊर्जा बर्बाद नहीं करते।संसाधनों का कुशलता से उपयोग (Energy Conservation) करते हैं। कुशलता (Efficiency) का अर्थ है कम संसाधनों और ऊर्जा में बेहतर परिणाम पाना। सीख मिलती है हमें कि जीवन में व्यर्थ के तनाव और संघर्ष से बचकर अपनी ऊर्जा सही दिशा में लगानी चाहिए।

​पेंग्विन मूल रूप से पक्षी हैं, लेकिन उन्होंने उड़ने के बजाय पानी में तैरने की कला सीखी क्योंकि उनके वातावरण की यही मांग थी। उन्होंने अपनी कमजोरी (न उड़ पाना) को अपनी ताकत (बेहतरीन तैराक) में बदल दिया। उनकी अनुकूलन क्षमता (Adaptability) सचमुच अनुकरणीय है। स्थितियां बदलने पर खुद को बदलना जरूरी है। जो समय के साथ खुद को ढाल लेता है, वही आगे बढ़ता है।

​पेंग्विन का पूरा जीवन एक चक्र और अनुशासन में बंधा होता है। भोजन खोजने से लेकर बच्चों की परवरिश तक, वे हर काम एक निश्चित लय में करते हैं। जीवन में अनुशासन होने से बड़े से बड़े संकट को भी व्यवस्थित तरीके से पार किया जा सकता है।

पेंग्विन यह भी सिखाते हैं कि बाहरी दुनिया चाहे कितनी भी ठंडी या कठोर क्यों न हो, यदि आपके भीतर अपनों के प्रति प्रेम की गर्माहट और साथ निभाने का जज्बा है, तो आप जीवित रह सकते हैं।


ब्रजेश कानूनगो





 


Friday, 2 January 2026

अस्तित्व के लिए जूझ रहे गंगा डेल्टा के द्वीप

अस्तित्व के लिए जूझ रहे  गंगा डेल्टा के द्वीप 

पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले में गंगा नदी के मुहाने पर  स्थित गंगासागर द्वीप एक ऐसा महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक स्थल है जहां मकर संक्रांति के दिन इसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है। इस दिन गंगा नदी का पानी कुछ घंटों के लिए हट जाता है, जिससे द्वीप का अधिकांश हिस्सा दिखाई देने लगता है। यह घटना ज्वार-भाटा के कारण होती है, जब चंद्रमा और सूर्य की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण समुद्र का पानी नीचे चला जाता है । इसी कारण तीर्थाटन के लिए निकले यात्रियों और पर्यटकों की जुबान से निकल ही पड़ता है, सारे तीरथ बारम्बार गंगासागर एक बार!

इस दिन लाखों लोग गंगासागर द्वीप पर आते हैं और गंगा स्नान करते हैं। यह एक महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजन है, जिसे मकर संक्रांति के रूप में मनाया जाता है। गंगासागर द्वीप का इतिहास और संस्कृति बहुत पुरानी और समृद्ध है। यह द्वीप हिंदू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यहां कपिल मुनि का आश्रम है, जो भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं। कपिल मुनि ने यहां तपस्या की थी और भगवान विष्णु ने उन्हें आत्मज्ञान प्रदान किया था। यहां के लोग मुख्य रूप से बंगाली भाषा बोलते हैं और उनकी जीवनशैली में हिंदू धर्म की बहुत बड़ी भूमिका है। द्वीप पर कई मंदिर और आश्रम स्थित हैं।

यहां धार्मिक आस्था के एक प्रमुख तीर्थ के भौगोलिक, पर्यावरणीय, सामाजिक, आर्थिक पक्ष और जनजीवन को एक घुमक्कड़ी दृष्टि से समझने का प्रयास दिलचस्प होगा। इस द्वीप का क्षेत्रफल लगभग 300 वर्ग किलोमीटर है और यह कोलकाता से लगभग 150 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। यह द्वीप गंगा डेल्टा का एक हिस्सा है और यहां मैंग्रोव के जंगल, जलमार्ग और छोटी नदियां हैं। द्वीप का जलवायु उष्णकटिबंधीय है और यहां औसत तापमान 26 डिग्री सेल्सियस रहता है। द्वीप पर मैंग्रोव के जंगल यहां के पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

दरअसल, गंगासागर भूकटाव और प्राकृतिक खतरों से लगातार प्रभावित हो रहा है। 1969 में इस द्वीप का क्षेत्रफल लगभग 255 वर्ग किलोमीटर था, जो अब कम होकर 224.3 वर्ग किलोमीटर हो गया है। यह लगभग 31 वर्ग किलोमीटर की कमी है।  समुद्र का बढ़ता जलस्तर, तटीय कटाव, चक्रवाती तूफान, ज्वारीय लहरें तथा मानव गतिविधियों से होने वाले पर्यावरण परिवर्तन के कारण होने वाला यह कटाव इस द्वीप के अस्तित्व के लिए गंभीर चिंता की वजह बना हुआ है।  द्वीप का क्षेत्रफल लगातार कम हो रहा है, जिससे स्थानीय लोगों की जीवनशैली और जीविका प्रभावित हो रही है। इसके अलावा, द्वीप के मैंग्रोव जंगलों का विनाश हो रहा है, जिससे जैव विविधता पर भी खतरा मंडरा रहा है।

पिछले दिनों हमने पश्चिम बंगाल की यात्रा पर निकले ट्रेवलर ब्लॉगर नोमेडिक इंडियन के दीपांशु सांगवान के कई यूट्यूब वीडियो देखे। यात्रा के दौरान उन्होंने न सिर्फ गंगासागर बल्कि डेल्टा क्षेत्र के अन्य द्वीपों की यात्रा की और वीडियो और ब्लॉग बनाए। वे घोरमारा द्वीप में भी गए। 

सुंदरबन डेल्टा में स्थित घोरमारा द्वीप (Ghoramara Island) आज दुनिया के उन हिस्सों में से एक है जो जलवायु परिवर्तन और समुद्र के बढ़ते जलस्तर की मार सबसे पहले और सबसे बुरी तरह झेल रहे हैं। कोलकाता से लगभग 92 किलोमीटर दूर स्थित यह द्वीप धीरे-धीरे नदी और समुद्र में समा रहा है।

ट्रेवलर के वीडियो में देखकर और अध्ययन से यहां के जनजीवन और भविष्य की स्थिति को सहजता से  समझा जा सकता है। इसका भूगोल सिकुड़ता जा रहा है   पिछले 40-50 वर्षों में इस द्वीप ने अपने क्षेत्रफल का लगभग 50% से अधिक हिस्सा खो दिया है। एक समय यह द्वीप करीब 26 वर्ग किलोमीटर में फैला था, जो अब घटकर 4-5 वर्ग किलोमीटर के आसपास रह गया है। हुगली और मुरीगंगा नदियों के संगम पर स्थित होने के कारण यहाँ मिट्टी का कटाव (Erosion) बहुत तीव्र है। हर पूर्णिमा और अमावस्या के ज्वार के साथ घोरमारा द्वीप का कुछ हिस्सा बह जाता है।

यहां के निवासियों का जीवन भी बहुत चुनौतीपूर्ण  है। जनजीवन में यहाँ के लोगों का मुख्य पेशा खेती (विशेषकर पान की खेती और चावल) और मछली पकड़ना था। लेकिन समुद्र का खारा पानी खेतों में घुसने से जमीन बंजर हो रही है। द्वीप पर पक्की सड़कों और बिजली का अभाव है। लोग मुख्य रूप से सोलर पैनल और केरोसिन पर निर्भर हैं। यहाँ केवल कुछ ही स्कूल और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बचे हैं। कुछ ई रिक्शा द्वीप में परिवहन के साधन बने हैं। द्वीप के डूबने के डर से लोग यहाँ अपनी बेटियों की शादी करने से कतराते हैं। यहाँ के पुरुषों को काम की तलाश में दक्षिण भारत या कोलकाता पलायन करना पड़ता है। घोरमारा के हजारों लोग पहले ही पास के सागर द्वीप या मुख्य भूमि पर शरण ले चुके हैं। जो लोग अब भी वहाँ रह रहे हैं, वे या तो बहुत गरीब हैं या उनके पास कहीं और जाने का साधन नहीं है। इन्हें अक्सर 'भारत के पहले जलवायु शरणार्थी' कहा जाता है। घोरमारा द्वीप पर तूफान के समय लोगों के बचाव के लिए विशेष सेंटर बनाए गए हैं, जिन्हें शेल्टर होम कहा जाता है। ये शेल्टर होम 350 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से आने वाली हवाओं को भी झेल सकते हैं और लोगों को सुरक्षित रखने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं। इन शेल्टर होम्स में 2000 से 3000 लोगों को रखा जा सकता है ।

घोरमारा द्वीप के पहले इसी डेल्टा क्षेत्र का लोहाचारा द्वीप समाप्त हो गया था। यह द्वीप भी सुंदरबन डेल्टा में स्थित था और जलवायु परिवर्तन, समुद्र के बढ़ते जलस्तर और तटीय कटाव के कारण पूरी तरह से डूब गया था। 1980 के दशक तक यह द्वीप बसा हुआ था, लेकिन 1990 के दशक तक यह पूरी तरह से पानी में डूब गया था। लोहाचारा द्वीप को दुनिया का पहला ऐसा बसा हुआ द्वीप माना जाता है जो जलवायु परिवर्तन के कारण पूरी तरह से समुद्र में डूब गया है। डेल्टा क्षेत्र के अन्य डूबते द्वीपों की तरह गंगासागर के क्षरण को लेकर सरकारों की चिंता का अपना बड़ा महत्व हो जाता है। किन उपायों और परियोजनाओं को प्राथमिकता से लागू किया जाता है, यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए। 

गंगासागर द्वीप के संरक्षण के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं। सरकार ने नदियों के प्रदूषण को कम करने और जल गुणवत्ता में सुधार करने के लिए गंगा एक्शन प्लान शुरू किया है। इसके तहत सीवेज ट्रीटमेंट प्लेंट्स, नदी के किनारे बागवानी, और सार्वजनिक जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। इसके अलावा, सरकार ने द्वीप के आसपास के क्षेत्रों में मैंग्रोव वृक्षारोपण करने की योजना बनाई है, जो तटीय कटाव को रोकने में मदद करेगा । यहां एक गहरे पानी का बंदरगाह बनाने की योजना है, जो यहां के आर्थिक विकास को बढ़ावा देगा। सरकार ने तटीय क्षेत्रों में ऐसे कई शेल्टर होम बनाए हैं, जो तूफान और बाढ़ के समय लोगों को सुरक्षित रखने के लिए उपयोग किए जाते हैं। इन शेल्टर होम्स में लोगों को भोजन, पानी, चिकित्सा सुविधा और अन्य आवश्यक सेवाएं प्रदान की जाती हैं ।इसके अलावा, सरकार यहां के पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए भी काम कर रही है।

ब्रजेश कानूनगो 


 




 


वेनेजुएला : तेल ही नहीं सबसे ऊंचे जलप्रपात के लिए भी प्रसिद्ध है

वेनेजुएला : तेल ही नहीं सबसे ऊंचे जलप्रपात के लिए भी प्रसिद्ध है  हाल ही में भारत से बहुप्रतीक्षित अमेरिका से सशर्त ट्रेड डील हो जाने का समा...