Sunday, 22 March 2026

बोझिल भविष्य में सुख देंगी कलाएं

बोझिल भविष्य में सुख देंगी कलाएं

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और प्रौद्योगिकी में हम जिस तेजी से आगे बढ़ रहे हैं इससे लगता है कि दुनिया भर के,हर क्षेत्र और हर विषय के ज्ञान से हम कुछ समय बाद लबालब भरे होंगे। बल्कि हमारा ज्ञान छलक छलक कर बाहर आने को बेताब होगा। यह एक नई ऊब हमारे जीवन मे ला सकती है। कुछ पाने के लिए हमारे पास करने को कुछ नहीं होगा जिससे जीवन मे प्रवाह,उमंग और उत्साह बढ़ता रहे। ऐसे में मुझे लगता है हमारे संतोष और खुशी मे केवल उन कलाओं की भूमिका ही रह जाएगी जो हमारी आदिम सभ्यता का हिस्सा रहीं हैं। जो हमारे मनुष्य होने से संभव हुईं हैं।  जिन्हें हम प्रदर्शन कलाओं और ललित कलाओं के नाम से पुकारते हैं।

ललित कला (Fine Arts) और प्रदर्शन कला  (Performing Arts) मानवीय अभिव्यक्ति के दो सबसे सुंदर स्तंभ हैं। जहाँ ललित कला को हम देख और महसूस कर सकते हैं, वहीं प्रदर्शन कला (परफॉर्मिंग आर्ट) को समय और गति के माध्यम से जिया जाता है। ललित कला का मुख्य उद्देश्य सौंदर्य और दृश्य आनंद पैदा करना है। यह अक्सर "स्थिर" होती है और इसे भौतिक माध्यमों (जैसे रंग, मिट्टी या पत्थर) से बनाया जाता है। जैसे चित्रकला,मूर्तिकला,वास्तुकला,,रेखांकन आदि जिनमें कलाकार स्वयं रचनात्मक रूप से सक्रिय रहता है। वहीं प्रदर्शन कला (परफॉर्मिंग आर्ट) में कलाकार अपने शरीर, आवाज और चेहरे के हाव-भाव का उपयोग करके कला का प्रदर्शन करते हैं। यह 'क्षणभंगुर' होती है—यानी यह प्रदर्शन के साथ ही घटित होती है और समाप्त हो जाती है। इन कलाओं में संगीत, नृत्य, नाटक और कुछ हद तक मार्शल आर्ट को शामिल किया जा सकता है।

जब मनुष्य के पास सब कुछ होगा तो वह अपनी खुशी के लिए चित्र बनाएगा, धातुओं,काष्ठ में मूर्ति या चट्टानों में शिल्प गढ़ेगा या फिर गाने, बजाने और शारीरिक प्रस्तुतियों से खुद को और समाज को आनंदित होने का अवसर देगा। नृत्य करेगा, अभिनय के माध्यम से लोक कथाएं या कहानियां देखी सुनी जाएंगी। दरअसल, एक ट्रैवल वीडियो में  पश्चिम अफ्रीका के आइवरी कोस्ट (Ivory Coast) के गौरो (Guro) समुदाय के प्रसिद्ध 'ज़ौली' (Zaouli) नृत्य को देखते हुए जो खुशी और आनंद की अनुभूति हुई उसने हमारा विश्वास दृढ़ किया कि चाहे जितना हम विकास कर लें, प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बौद्धिकता से सब कुछ पा लें लेकिन हमारी प्राचीन कलाएं सदैव हमारे साथ बनी रहेंगीं। हमारे जीवन में रस घोलती रहेंगी।

ज़ौली' (Zaouli) नृत्य अपनी अविश्वसनीय गति और जटिल फुटवर्क के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। ज़ौली (Zaouli) नृत्य की सबसे बड़ी विशेषता इसकी लय और ताल है, जिसे विशिष्ट पारंपरिक वाद्ययंत्रों के माध्यम से जीवंत किया जाता है। संगीत और नर्तक के पैरों की गति के बीच का तालमेल ही इस प्रदर्शन को जादुई बनाता है। ज़ौली में संगीत केवल बैकग्राउंड में नहीं बजता, बल्कि यह नर्तक के लिए एक 'चुनौती' की तरह होता है। ड्रमर एक जटिल ताल बजाता है, और नर्तक को अपने पैरों से ठीक उसी ताल को दोहराना होता है। जैसे-जैसे ड्रम की गति बढ़ती है, नर्तक को अपनी शारीरिक क्षमता की सीमाओं को पार करते हुए और भी तेज़ी से थिरकना पड़ता है। संगीत में अचानक आने वाले ठहराव (Breaks) पर नर्तक को बिल्कुल स्थिर हो जाना पड़ता है, जो दर्शकों के लिए सबसे रोमांचक क्षण होता है।

इस नृत्य की शुरुआत 1950 के दशक में हुई थी। माना जाता है कि यह एक सुंदर लड़की 'ज़ौली' (Zaouli) से प्रेरित है। यह नृत्य स्त्री सौंदर्य और अनुग्रह (Grace) का सम्मान करने के लिए किया जाता है, हालांकि इसे पारंपरिक रूप से पुरुषों द्वारा ही प्रदर्शित किया जाता है। 2017 में, इस नृत्य को इसकी सांस्कृतिक विशिष्टता के कारण यूनेस्को (UNESCO) की 'अमूर्त सांस्कृतिक विरासत' (Intangible Cultural Heritage) की सूची में शामिल किया गया था।  हमने वीडियो के जरिए आभासी आनंद लेते हुए देखा कि इसमें नर्तक एक चमकीले रंग का लकड़ी का मुखौटा पहनता है, जो अक्सर किसी जानवर या सुंदर महिला के चेहरे को दर्शाता है। यह मुखौटा गौरो शिल्पकारों की बेहतरीन कला का नमूना होता है। नर्तक शरीर पर रंगीन बुने हुए कपड़े और पैरों में घंटियाँ पहनता है। हाथों में अक्सर पूंछ के बालों से बने 'फ्लाइविस्क' (Fly-whisks) होते हैं, जो नृत्य के दौरान हवा में लहराते हैं। यह नृत्य दुनिया के सबसे चुनौतीपूर्ण नृत्यों में से एक माना जाता है क्योंकि नर्तक के पैर इतनी तेज़ी से चलते हैं कि वे आंखों से धुंधले दिखने लगते हैं। यह शरीर के ऊपरी हिस्से को स्थिर रखते हुए किया जाता है। नृत्य पूरी तरह से ड्रम और बांसुरी की थाप पर आधारित होता है। नर्तक और ड्रमर के बीच एक गहरा संवाद होता है; हर कदम ड्रम की एक विशिष्ट बीट के साथ मेल खाता है। यह शारीरिक रूप से बहुत थका देने वाला होता है, इसलिए एक प्रदर्शन के लिए नर्तक को बहुत अभ्यास और ताकत की आवश्यकता होती है। ट्रैवलर को स्थानीय निवासी बताते हैं कि यह नृत्य केवल मनोरंजन नहीं है, बल्कि यह गांवों के बीच एकता का प्रतीक भी है। इसे शादी, उत्सवों और कभी-कभी अंतिम संस्कार के समय भी प्रदर्शित किया जाता है ताकि समुदाय के बीच भाईचारा बढ़े।

यदि अपने देश के संदर्भ में बात करें तो भारत में शास्त्रीय नृत्य कलाएं और लोक नृत्य कलाएं दोनों ही अपनी अनूठी शैली और सांस्कृतिक महत्व के लिए प्रसिद्ध हैं।तमिलनाडु का भरतनाट्यम नृत्य अपनी भावपूर्ण भंगिमाओं और जटिल पदचाप के लिए जाना जाता है।उत्तर प्रदेश का कथक नृत्य तेज़ ताल और पैरों की जटिल तकनीक के लिए प्रसिद्ध है। केरलम का कथकली नृत्य रंगीन मेकअप, वेशभूषा और नाटकीय अभिव्यक्ति के लिए प्रसिद्ध है। आंध्र प्रदेश का कुचिपुड़ी नृत्य नाटक और नृत्य का सुंदर संगम है। मणिपुर का मणिपुरी नृत्य अपनी कोमलता और लयबद्धता के लिए जाना जाता है। केरलम का मोहिनीअट्टम नृत्य स्त्रीत्व और लालित्य का प्रतीक है। ओडिशा का ओडिसी नृत्य मंदिरों से जुड़ा है और भक्ति भावनाओं से ओतप्रोत है। असम का सत्रिया नृत्य अपनी अनूठी शैली और सांस्कृतिक महत्व के लिए जाना जाता है। इन शास्त्रीय नृत्यों के अलावा हमारे देश में अनेक लोक नृत्य कलाएं भी बहुत प्रसिद्ध और लोकप्रिय हैं असम का बिहू अपनी ऊर्जा और उत्साह के लिए जाना जाता है। पंजाब का भांगड़ा अपनी जोशीली और उत्साही शैली के लिए प्रसिद्ध है। गुजरात का गरबा अपनी अनूठी शैली और सांस्कृतिक महत्व के लिए जाना जाता है। महाराष्ट्र की लावणी अपनी भावपूर्ण और आकर्षक शैली के लिए प्रसिद्ध है। राजस्थान का घूमर नृत्य अपनी अनूठी शैली और सांस्कृतिक महत्व के लिए जाना जाता है।

इन विविध नृत्य कलाओं से समृद्ध देश होने के कारण हम आश्वस्त हो सकते हैं कि भविष्य में सब कुछ पा लेने के भारी बोझ के बीच भी हमारे लिए अपने आनंद की राह निकाल लेना कठिन नहीं होगा।

ब्रजेश कानूनगो









Tuesday, 17 March 2026

ग्रामीणों के लिए पेड़ों के आबंटन की व्यवस्था कुछ दिनों पूर्व हमने एक विश्व यात्री और यूट्यूबर

ग्रामीणों के लिए पेड़ों के आबंटन की व्यवस्था

कुछ दिनों पूर्व हमने एक विश्व यात्री और यूट्यूबर के जरिए रूस के एक गांव की आभासी सैर की थी। हमने देखा कि प्रत्येक घर के परिसर में एक ऐसा स्टोरेज था जिसमें कटी हुई लकड़ियों के गुल्ले बड़ी व्यवस्थित रूप से जमाकर रखे हुए थे। निश्चित रूप से ये उस घर में रहने वाले परिवार की ऊर्जा का इंतजाम था और वह उनको सालभर आग और गर्मी का प्रबंध करने के लिए काम आने वाली थी।

जब ट्रैवलर ने अपने होस्ट से इस बारे में जानकारी मांगी तो उसने बताया कि वहां का प्रशासन गांव के हर परिवार को इस हेतु एक वृक्ष का आबंटन करता है, उसी की लकड़ियां काट कर सालभर की जरूरत के लिए सहेज कर रखी जाती हैं। हमारे लिए खासकर मेरे लिए यह बहुत न सिर्फ चौंकाने वाली बात थी बल्कि एक नई जिज्ञासा भी पैदा कर दी। साथ ही कुछ और जानकारी जुटाने के लिए प्रेरित किया। 

दरअसल, रूस के ग्रामीण क्षेत्रों में लकड़ी (wood) का आवंटन वहां की संस्कृति और कानून की एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात है जो  "रूसी वन संहिता" (Forest Code of the Russian Federation) के तहत मिलने वाली सुविधाओं को उपलब्ध कराती है। रूस में आज भी करोड़ों लोग लकड़ी के चूल्हों और 'बन्या' (पारंपरिक रूसी सौना) पर निर्भर हैं, इसलिए सरकार वहां के नागरिकों को मुफ्त या बहुत ही मामूली दाम पर लकड़ी काटने का अधिकार देती है।

रूसी कानून के अनुसार, हर नागरिक को अपनी व्यक्तिगत जरूरतों के लिए "मुफ्त" (या बहुत कम प्रशासनिक शुल्क पर) लकड़ी प्राप्त करने का अधिकार है। इस अधिकार के तहत सर्दियों में अपने ​घर को गर्म करने के लिए जलावन या हीटिंगअलाव के लिए हर साल एक निश्चित मात्रा दी जाती है। नया घर बनाने या पुराने की मरम्मत के लिए आमतौर पर हर 10-25 साल में एक बार लकड़ी का एक बड़ा हिस्सा आवंटित किया जाता है। प्रशासन पेड़ों को ऐसे ही नहीं काटने देता, इसके पीछे एक व्यवस्थित प्रक्रिया होती है। पहले ग्रामीण व्यक्ति स्थानीय वन विभाग (Lesnichestvo) में आवेदन करता है। वन अधिकारी जंगल के एक विशेष हिस्से में जाते हैं और उन पेड़ों पर निशान (Marking) लगाते हैं जिन्हें काटा जा सकता है। अक्सर ये वो पेड़ होते हैं जो बूढ़े हो गए हैं या जिन्हें हटाने से जंगल का स्वास्थ्य बेहतर हो सकता है। सरकार केवल पेड़ की 'लकड़ी' आवंटित करती है, उसे काटने और घर तक लाने की जिम्मेदारी ग्रामीण की होती है। उन्हें खुद आरी (Chainsaw) और ट्रैक्टर या घोड़ों का इंतजाम करना पड़ता है। सबसे चुनौतीपूर्ण यही काम होता है। लकड़ी की मात्रा क्षेत्र (Region) और जरूरत के आधार पर अलग-अलग होती है। जैसे ​साइबेरिया जैसे ठंडे इलाकों में जलावन के लिए प्रति परिवार सालाना 15 से 30 क्यूबिक मीटर तक लकड़ी मिल सकती है। ​घर बनाने के लिए यह मात्रा 50 से 100 क्यूबिक मीटर तक हो सकती है। ग्रामीण इस लकड़ी को बेच नहीं सकते। अगर कोई इस आवंटित लकड़ी को बेचते हुए पकड़ा जाता है, तो उसे भारी जुर्माना भरना पड़ता है। रूस का एक बड़ा हिस्सा गैस पाइपलाइनों से नहीं जुड़ा है, और वहां की सर्दियां -30°C से -50°C तक जा सकती हैं। ऐसे में लकड़ी ही जीवन बचाने का एकमात्र साधन है। यह परंपरा सदियों पुरानी है और आज भी वहां के ग्रामीण जीवन का आधार है।

रूस जैसी व्यवस्था दुनिया के कई अन्य देशों और भारत में भी मौजूद है, हालांकि इनके नियम और उद्देश्य स्थानीय जरूरतों और जलवायु के हिसाब से अलग-अलग हैं। रूस में मुख्य जोर "सर्दियों में बचने (Heating)" पर है, जबकि अन्य देशों में यह "आजीविका और पारंपरिक अधिकारों" से अधिक जुड़ा है। स्कैंडिनेवियाई देशो में (जैसे फिनलैंड, स्वीडन और नॉर्वे) रूस जैसी ही ठंड पड़ती है, इसलिए यहाँ "Everyman's Right" (सबका अधिकार) जैसा कानून है। ​यहाँ कोई भी व्यक्ति जंगल से सूखी लकड़ी इकट्ठा कर सकता है। ​हालांकि, अगर किसी को निर्माण के लिए जीवित पेड़ काटना है, तो उसे 'वन प्रबंधन योजना' के तहत अनुमति लेनी पड़ती है। यहाँ के लोग अक्सर निजी वनों के मालिक होते हैं, लेकिन उन पर भी नए पेड़ लगाने की सख्त कानूनी जिम्मेदारी होती है। इसके अलावा कनाडा में स्वदेशी समुदायों (First Nations) के पास पारंपरिक भूमि पर लकड़ी काटने के विशेष अधिकार हैं। वे अपनी सांस्कृतिक जरूरतों और घरों के निर्माण के लिए लकड़ी ले सकते हैं।अलास्का (यूएसए) जैसे क्षेत्रों में आम नागरिकों को "Personal Use Timber Permit" दिया जाता है, जिससे वे अपने घर के उपयोग के लिए एक निश्चित मात्रा में पेड़ काट सकते हैं।

​भारत में भी वनाधिकार अधिनियम (FRA) और 'निस्तार' अधिकार के तहत ग्रामीण और आदिवासी समुदायों के लिए जंगलों से संसाधन प्राप्त करने के कानूनी अधिकार हैं। ​वनाधिकार अधिनियम, 2006 (Forest Rights Act) कानून उन लोगों को अधिकार देता है जो पीढ़ियों से जंगलों में रह रहे हैं। इसके तहत ग्रामीण "लघु वन उपज" (Minor Forest Produce) जैसे बांस, जलावन लकड़ी और फल इकट्ठा कर सकते हैं। निस्तार (Nistar) अधिकार के रूप में भारत के कई राज्यों (जैसे मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़) में 'निस्तार' की पुरानी व्यवस्था है। इसके तहत ग्रामीणों को घर बनाने, खेती के औजार बनाने या अंतिम संस्कार के लिए रियायती दरों पर या मुफ्त में सरकारी डिपो से लकड़ी (Timber) आवंटित की जाती रही है। भारतीय वन अधिनियम के तहत कुछ जंगलों को "ग्राम वन" घोषित किया जाता है, जिनका प्रबंधन ग्राम सभा करती है। यहाँ ग्रामीण अपनी सामूहिक जरूरतों के लिए लकड़ी काट सकते हैं।

यह देखना भी गौरतलब होगा कि पेड़ और वनों से निकलने वाली लकड़ी के युक्तियुक्त प्रबंधन से ग्रामीणों और वहां के निवासियों को इन नीतियों का कितना लाभ मिलता है। निश्चित ही अध्ययन का यह एक अलग विषय हो सकता है।


ब्रजेश कानूनगो 

 

Monday, 16 March 2026

किराए पर पेड़ : पसीना नहीं पैसा मिठास घर तक पहुंचाता है

किराए पर पेड़  : पसीना नहीं पैसा मिठास घर तक पहुंचाता  है

खेती में बटाईदार किसान (Sharecropper) वह व्यक्ति होता है जो किसी दूसरे व्यक्ति की जमीन पर खेती करता है और फसल तैयार होने पर उसका एक निश्चित हिस्सा (बटाई) जमीन के मालिक को देता है। यह व्यवस्था भारत के ग्रामीण इलाकों में सदियों से चली आ रही है लेकिन इन दिनों फलों की फसल के लिए पेड़ किराए पर लेने का नया चलन काफी लोकप्रिय हो रहा है। इसे आमतौर पर 'ट्री एडॉप्शन' (Tree Adoption) या 'पेड़ लीज पर लेना' कहा जाता है। इसमें आप एक निश्चित समय या एक सीजन के लिए पेड़ का किराया देते हैं और उस पेड़ पर लगने वाले सभी फल आपके होते हैं।

परम्परागत बटाईदारी में आमतौर पर जमीन मालिक का निवेश (बीज, खाद) और किसान की मेहनत का एक तालमेल होता है।एक बटाईदार की प्राथमिक जिम्मेदारी जमीन की उत्पादकता बनाए रखना और फसल की सुरक्षा करना होती है।​खेती का सारा प्रबंधन याने जुताई, बुवाई, सिंचाई और निराई-गुड़ाई का पूरा जिम्मा बटाईदार का होता है। लागत की भी बटाई होती है।  क्षेत्र के रिवाजों के अनुसार, बीज, खाद और कीटनाशकों का खर्च या तो बटाईदार उठाता है या मालिक के साथ आधा-आधा बांटता है।​फसल की सुरक्षा हेतु आवारा पशुओं या चोरी से फसल को बचाना बटाईदार का कर्तव्य है। ईमानदारी पूर्ण बंटवारा करना जरूरी होता है।  फसल कटने के बाद तय समझौते (जैसे आधा-आधा या एक-तिहाई) के अनुसार बटाईदार को मालिक का हिस्सा सौंपना होता है।

इसके अलावा कानूनी और सामाजिक रूप से बटाईदारों के कुछ महत्वपूर्ण अधिकार होते हैं, हालांकि ये अलग-अलग राज्यों के भूमि सुधार कानूनों (Land Reform Laws) पर निर्भर करते हैं। ​फसल पर अधिकार के तहत तैयार फसल का एक बड़ा हिस्सा (समझौते के अनुसार) बटाईदार का होता है। मालिक उसे पूरी फसल से बेदखल नहीं कर सकता। उसे ​खेती का अधिकार होता है, यदि कोई लिखित या मौखिक समझौता है, तो मालिक बीच सीजन में किसान को खेत से नहीं हटा सकता। कई राज्यों में 'बटाईदार पंजीकरण' की सुविधा है, जिससे उन्हें किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) या फसल बीमा का लाभ मिल सकता है। यदि फसल खराब होती है, तो बटाईदार को यह अधिकार है कि वह नुकसान के आधार पर मालिक से लगान या हिस्सेदारी में छूट की बात करे।

हाल ही की एक खबर के अनुसार पेड़ किराए पर लेकर हम कम से कम 81% सस्ते ताजा अलफांसो आम प्राप्त कर सकते हैं। यह सेवा किराए पर एक पेड़ (Rent a Tree) नामक एक कृषि-स्टार्टअप द्वारा प्रदान की जा रही है, जो कोची में स्थित है। वे महाराष्ट्र, तमिलनाडु और केरल में 250 एकड़ अलफांसो आम के बागानों का प्रबंधन करते हैं और देश भर में 160 से अधिक ग्राहकों को सेवा प्रदान करते हैं। योजना में अपनी पसंद के अनुसार पेड़ चुन सकते हैं। योजना में तीन श्रेणियों में पेड़ उपलब्ध हैं, जिनकी कीमतें 10,300 रुपये से शुरू होती है। यह सेवा उन लोगों के लिए उपयुक्त है जो आम का आनंद लेना चाहते हैं लेकिन पेड़ की देखभाल करने में असमर्थ हैं। किराए पर एक पेड़( Rent a Tree) संस्थान पेड़ की देखभाल और आम की कटाई का काम संभालता है, जिससे ग्राहकों को ताजा और स्वादिष्ट आम मिलता है ।

दरअसल फलों की फसल के लिए पेड़ या बगीचा किराए पर लेने का चलन हमारे यहां रहा है। इसे आमतौर 'पेड़ लीज पर लेना' कहा जाता है। इसमें आप एक निश्चित समय या एक सीजन के लिए पेड़ या बाग का किराया देते हैं और पेड़ों पर लगने वाले सभी फल आपके होते हैं। ऐसे अनेक फल हैं जिनके पेड़ आमतौर पर  किराए पर मिल जाते हैं। मैंगो याने आम भारत में यह सबसे लोकप्रिय फल है। उत्तर प्रदेश (मलीहाबाद), महाराष्ट्र (रत्नागिरी) और गुजरात के कई बागान मालिक सीजन की शुरुआत में ही पेड़ों की नीलामी करते हैं या उन्हें किराए पर देते हैं। आप एक पेड़ चुन सकते हैं और सीजन खत्म होने तक उसके सारे फल आपके होंगे। ​हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में कई 'ऑर्किड' (फलों के बाग) पर्यटकों और स्थानीय लोगों को सेब के पेड़ किराए पर देते हैं। आप साल भर के लिए पेड़ गोद ले सकते हैं और फसल तैयार होने पर खुद जाकर तोड़ सकते हैं या उन्हें पैक करवाकर मंगवा सकते हैं। महाराष्ट्र और गुजरात के तटीय इलाकों में चीकू और नारियल के बागान अक्सर लंबी अवधि के लिए किराए पर दिए जाते हैं। नागपुर और राजस्थान के कुछ हिस्सों में संतरे के पेड़ों को कॉन्ट्रैक्ट पर लिया जा सकता है। इसमें अक्सर व्यापारी पूरे बाग का ठेका लेते हैं, लेकिन अब व्यक्तिगत स्तर पर भी एक-दो पेड़ किराए पर लेने की सुविधा कुछ फार्महाउस देने लगे हैं। बिहार (मुजफ्फरपुर) और उत्तराखंड में लीची के सीजन (मई-जून) के दौरान पेड़ों को किराए पर लेने का काफी चलन है।

​इस प्रक्रिया में एक ​समझौता (Agreement) किया जाता है जिसमें मालिक को एक निश्चित राशि (Rent) देना होती है। आमतौर पर पेड़ की देखभाल, खाद और पानी की जिम्मेदारी बागान मालिक की ही होती है, लेकिन अनुबंध के आधार पर यह बदल भी सकता है। लीज होल्डर को शुद्ध और ऑर्गेनिक फल मिलते हैं, और यदि अच्छा उत्पादन हो तो अक्सर यह बाजार भाव से सस्ता पड़ता है।  यदि प्राकृतिक आपदा (जैसे ओले या भारी बारिश) से फसल खराब होती है, तो नुकसान किराएदार का होता है।

आम खाने से मतलब जैसी संकुचित बातें भूलकर अब वह समय आ गया है जब हम फलों के उत्पादन, खेती, किसानी, बागवानी और उसके व्यवसाय के बारे में भी थोड़ी सी जानकारी प्राप्त कर उनकी मिठास को और अधिक संतुष्टिदायक बना लें तो कुछ गलत नहीं होगा।


ब्रजेश कानूनगो




Thursday, 12 March 2026

हॉर्मुज जैसे संकरे जलमार्ग सुरक्षित रहना जरूरी

 हॉर्मुज जैसे संकरे जलमार्ग सुरक्षित रहना जरूरी


विश्व में कई महत्वपूर्ण जलडमरूमध्य (Straits) हैं, जो न केवल भौगोलिक दृष्टि से बल्कि सामरिक और व्यापारिक दृष्टिकोण से भी अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। जलडमरूमध्य पानी का वह संकरा मार्ग होता है जो दो बड़े जल निकायों (जैसे समुद्र या महासागर) को जोड़ता है और दो भू-भागों को अलग करता है। जलडमरूमध्यों का विश्व की अर्थ व्यवस्था, यातायात, माल परिवहन, ऊर्जा सुरक्षा और सामरिक दृष्टि से बहुत महत्व होता है।  ये मार्ग वैश्विक समुद्री व्यापार के लिए 'शॉर्टकट' का काम करते हैं। उदाहरण के लिए, मलक्का जलसंधि के बिना जहाजों को हजारों मील का अतिरिक्त चक्कर लगाना पड़ेगा।  हॉर्मुज जैसे जलडमरूमध्य से दुनिया का लगभग 20-30% कच्चा तेल गुजरता है। इनका बंद होना वैश्विक तेल कीमतों में भारी उछाल ला सकता है।  युद्ध की स्थिति में इन संकरे रास्तों पर नियंत्रण रखने वाला देश दुश्मन की आपूर्ति लाइन को काट सकता है। इन्हें वैश्विक अर्थव्यवस्था के 'गले' की तरह देखा जाता है; यहाँ छोटी सी रुकावट भी पूरी दुनिया में मंदी ला सकती है।


इन दिनों ऐसा ही एक जलडमरूमध्य (Straits) हॉर्मुज जलडमरूमध्य वर्तमान में एक बड़े भू-राजनीतिक तनाव के संदर्भ में बहुत चर्चित हुआ है। मार्च 2026 की खबरों के अनुसार, ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने इस मार्ग को असुरक्षित बना दिया है। ईरान ने स्पष्ट किया  कि इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों को ईरानी नौसेना के साथ समन्वय (coordination) करना होगा। ईरान ने अमेरिका और इजरायल समर्थित जहाजों को रोकने या उन पर कड़ी निगरानी रखने की चेतावनी दी है। इसके जवाब में अमेरिका ने इस क्षेत्र में अपने सैन्य अभियान तेज कर दिए हैं।  भारत के लिए भी यह मार्ग अत्यंत संवेदनशील है क्योंकि भारत का अधिकांश तेल आयात यहीं से होता है। हाल ही में भारत सरकार और ईरान के बीच बातचीत हुई है ताकि वहां फंसे भारतीय तेल टैंकरों को सुरक्षित निकाला जा सके। हॉर्मुज से भारत के पश्चिमी तट (जैसे मुंबई या कांडला) तक पहुँचने में जहाजों को औसतन 2 से 3 दिन का समय लगता है। इस विवाद के कारण कच्चे तेल की कीमतें अंतर्राष्ट्रीय बाजार में 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुँच गई , जिसका लाभ रूस जैसे वैकल्पिक निर्यातकों को मिल रहा है।


दरअसल,विश्व के महत्वपूर्ण जलडमरूमध्य (Straits) संकरे समुद्री मार्गों में से मलक्का, हॉर्मुज, बाब-अल-मंडेब और जिब्राल्टर सबसे प्रमुख हैं। ये वैश्विक तेल और वस्तु व्यापार (लगभग 25% मलक्का से) को नियंत्रित करते हैं और समुद्री यात्रा का समय कम करते हैं। भारत के लिए अन्य वैकल्पिक समुद्री मार्गों की बात करें तो मलक्का जलडमरूमध्य इंडोनेशिया और मलेशिया के बीच स्थित है, जो अंडमान सागर और दक्षिण चीन सागर को जोड़ता है। यह दुनिया के सबसे व्यस्त शिपिंग मार्गों में से एक है, जहां से लगभग 25% अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार होता है। सुएज नहर जलमार्ग मिस्र में स्थित है, जो भूमध्य सागर और हिंद महासागर को जोड़ता है। यह भारत के लिए एक महत्वपूर्ण जलमार्ग है, खासकर यूरोप और मध्य पूर्व के साथ व्यापार के लिए। केप ऑफ गुड होप जलमार्ग दक्षिण अफ्रीका में स्थित है, जो अटलांटिक महासागर और हिंद महासागर को जोड़ता है। यह जलमार्ग हार्मुज के अलावा एक वैकल्पिक मार्ग है, लेकिन यह अधिक लंबा और महंगा है। लोम्बोक जलडमरूमध्य इंडोनेशिया में स्थित है, जो जावा सागर और हिंद महासागर को जोड़ता है। यह जलमार्ग मलक्का जलडमरूमध्य के अलावा एक वैकल्पिक मार्ग है। लागत की दृष्टि से ये जलमार्ग हार्मुज की तुलना में अत्यंत महंगे और अधिक दूरी और लंबी यात्रा वाले हैं।


व्यापार और परिवहन के लिए हमेशा छोटे जलमार्ग सुविधाजनक और सस्ते रहते आए हैं। लंबी यात्राओं में समय और दुर्घटनाओं का खतरा हमेशा बना रहता है। मनुष्य ने अपने संघर्षों से इन प्राकृतिक जलडमरूमध्य मार्गों के अलावा पनामा नहर जैसे नए मनुष्य निर्मित जलडमरूमध्य मार्गों का निर्माण किया है। पनामा नहर दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण जलमार्गों में से एक है, जो अटलांटिक महासागर और प्रशांत महासागर को जोड़ती है। यह नहर पनामा देश में स्थित है।  पनामा नहर के निर्माण से पहले, पोत परिवहन में कई दिक्कतें आती थीं। अटलांटिक महासागर से प्रशांत महासागर तक जाने के लिए जहाजों को दक्षिण अमेरिका के दक्षिणी सिरे के चारों ओर जाना पड़ता था, जिसे केप हॉर्न कहा जाता है। यह रास्ता बहुत लंबा और खतरनाक था। इस लंबे रास्ते के कारण, जहाजों को अधिक समय और ईंधन की आवश्यकता होती थी, जिससे परिवहन की लागत बढ़ जाती थी। केप हॉर्न के आसपास का समुद्र बहुत अशांत और खतरनाक था, जिससे जहाजों को दुर्घटना का खतरा रहता था। पनामा नहर बन जाने से अमेरिका के पूर्वी और पश्चिमी तटों के बीच की दूरी इस नहर से होकर गुजरने पर तकरीबन 8000 मील (12,875 कि॰मी॰) घट जाती है क्योंकि इसके न होने की स्थिति में जलपोतों को दक्षिण अमेरिका के हॉर्न अंतरीप से होकर चक्कर लगाते हुए जाना पड़ता था। पनामा नहर को पार करने में जलयानों को अब 8 घंटे का समय लगता है। नहर के माध्यम से जहाजों की आवाजाही से समय और ईंधन की बचत होती है, जिससे परिवहन की लागत कम हो जाती है। जहाजों की आवाजाही अधिक सुरक्षित हुई है, क्योंकि यह रास्ता खतरनाक समुद्रों की हलचलों से भी बचाता है। इसके साथ ही जहाजों की जल्दी आवाजाही से व्यापार और वाणिज्य में वृद्धि हुई है, क्योंकि यह माध्यम दुनिया के विभिन्न हिस्सों के बीच कम समय में सीधा संपर्क प्रदान करता है।


वर्तमान परिस्थितियों में हमारे देश के संदर्भ में हॉर्मुज जलडमरू मध्य जलमार्ग का तेल, गैस आपूर्ति और क्रूड ऑयल आयात में महत्व बहुत बढ़ गया है। खाड़ी देशों  की अशांति न सिर्फ उनके लिए बल्कि संपूर्ण विश्व की अर्थव्यवस्था और आम जनजीवन के लिए चिंताजनक है। 


ब्रजेश कानूनगो


Wednesday, 11 March 2026

जापान की शिंकानसेन और समुद्री सुरंग की सैर

जापान की शिंकानसेन और समुद्री सुरंग की सैर

दुनियाभर की सैर करने वाले घुमक्कड़ जब जापान जाते हैं तो उनके लिए वहां की रेलों के संचालन को देखने,समझने और उनमें यात्रा करने का भी एक बड़ा आकर्षण होता है। खासतौर से जापान की शिंकानसेन (Shinkansen), जिसे दुनिया 'बुलेट ट्रेन' के नाम से जानती है जो केवल अपनी गति के लिए नहीं बल्कि अपनी सुरक्षा और समय की पाबंदी (Punctuality) के लिए भी प्रसिद्ध है, इसमें यात्रा करने का सुख अद्भुत होता है। अनेक यूट्यूबर अपने ट्रेवल वीडियोस में इन पर अपनी बात कहते हुए हमे भी रोमांचित कर देते हैं। 

शिंकानसेन याने बुलेट ट्रेन का चलना विज्ञान और इंजीनियरिंग के कई उन्नत सिद्धांतों पर आधारित है। ​इसकी डिजाइन खास एयरोडायनामिक (Aerodynamics) के अनुसार विकसित की गई है। सामने का हिस्सा (Nose) बहुत लंबा और नुकीला होता है। यह केवल स्टाइल के लिए नहीं है, बल्कि 'पिस्टन इफेक्ट' को कम करने के लिए है। जब ट्रेन संकरी सुरंगों में तेज गति से प्रवेश करती है, तो हवा का दबाव एक तेज़ धमाका (Sonic Boom) पैदा कर सकता है। यह लंबा नाक वाला डिजाइन उस हवा को चीर देता है और शोर को कम करता है। इस ट्रेन से जापान की अंडरवाटर टनल से होकर यात्रा करते हुए किसी भी व्यक्ति का चकित हो जाना स्वाभाविक है। जापान जाने वाले हर ट्रैवलर की विश लिस्ट में यह टनल प्राथमिकता में होती है। दरअसल,जापान की सेइकान टनल (Seikan Tunnel) दुनिया की सबसे गहरी और सबसे लंबी अंडरवाटर रेल सुरंगों में से एक है। यह केवल इंजीनियरिंग का चमत्कार नहीं है, बल्कि इसके पीछे मानवीय संकल्प, बलिदान और विज्ञान की एक अद्भुत गाथा छिपी है।

​1950 के दशक तक, जापान के मुख्य द्वीप होंशू (Honshu) और उत्तरी द्वीप होक्काइडो (Hokkaido) के बीच यात्रा का एकमात्र साधन समुद्री जहाज (Ferry) थे। वर्ष 1954 की एक त्रासदी में 'टोया मारू' (Toya Maru) नाम का एक समुद्री जहाज तूफान में फंसकर डूब गया, जिसमें 1,400 से अधिक लोगों की जान चली गई। इस बड़ी दुर्घटना ने जापानी सरकार को एक ऐसे विकल्प पर विचार करने के लिए मजबूर किया जो मौसम की मार से सुरक्षित हो। इसी के बाद समुद्र के नीचे सुरंग बनाने की योजना ने जन्म लिया। कठिन श्रम और संघर्ष से भरे संकल्प से सेइकान टनल का निर्माण 1964 में शुरू हुआ और इसे पूरा होने में लगभग 24 साल लगे। ​निर्माण के दौरान कठिन परिस्थितियाँ आईं।  खुदाई के दौरान इंजीनियरों को ऐसी चट्टानों का सामना करना पड़ा जो ज्वालामुखी से बनी थीं और बहुत ही अस्थिर थीं। भीतर काम करते हुए समुद्र के पानी का रिसाव एक निरंतर खतरा बना रहता था। इसके बावजूद इस प्रोजेक्ट में हजारों मजदूरों और इंजीनियरों ने दिन-रात काम किया। निर्माण के दौरान कठिन परिस्थितियों और दुर्घटनाओं के कारण 34 श्रमिकों को अपनी जान भी गंवानी पड़ी। अंत में जापानियों ने अपने संकल्प को पूरा कर लिया। 

समुद्र के नीचे ट्रेन चलाना कोई साधारण बात नहीं थी। इसके लिए उस समय की सबसे उन्नत तकनीक का उपयोग किया गया जो इस सुरंग की विशेषताओं के रूप में रिकॉर्ड हो गईं।सुरंग की कुल लंबाई 53.85 किमी है, जिसमें से 23.3 किमी का हिस्सा समुद्र तल के नीचे है। यह समुद्र की सतह से लगभग 240 मीटर नीचे स्थित है। शॉट्रीट तकनीक (Shotcrete) से पानी के रिसाव को रोका गया है, दीवारों पर भारी दबाव के साथ कंक्रीट का छिड़काव किया गया है। जापान एक भूकंप संभावित क्षेत्र है। सुरंग को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह बड़े झटकों को सहन कर सके और पानी का दबाव दीवार को नुकसान न पहुँचाए।

इस सुरंग में 'शिंकानसेन' (बुलेट ट्रेन) और मालगाड़ी दोनों के लिए ट्रैक बिछाए गए हैं। सुरंग के अंदर दो विशेष स्टेशन (तप्पी-कैतेई और योशिओका-कैतेई) बनाए गए हैं। ये स्टेशन यात्रियों के सुरक्षित निकलने के लिए दुनिया के पहले अंडरवाटर स्टेशन रहे। सुरंग के अंदर आर्द्रता और तापमान को नियंत्रित करने के लिए विशाल वेंटिलेशन सिस्टम लगाया गया है। आज यह टनल जापान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। यह होंशू और होक्काइडो के बीच निर्बाध परिवहन सुनिश्चित करती है, जिससे व्यापार और पर्यटन को बढ़ावा मिलता है। 1988 में इसके उद्घाटन के बाद से, इसने जापानी रेलवे को एक नई पहचान दी है। शिंकानसेन सामान्य ट्रेनों के साथ ट्रैक साझा नहीं करती। इसके लिए स्टैंडर्ड गेज (1435 mm) के अलग ट्रैक होते हैं। पटरियों के बीच कोई गैप नहीं होता, जिससे कंपन (Vibration) कम होता है और ट्रेन बिना शोर के 320 किमी/घंटा की रफ्तार पकड़ पाती है। मोड़ों पर पटरियों को एक तरफ थोड़ा झुकाया जाता है (Banking), ताकि ट्रेन बिना गति कम किए सुरक्षित रूप से मुड़ सके। ट्रेन को 25,000 वोल्ट की ओवरहेड लाइनों से बिजली मिलती है। जब ड्राइवर ब्रेक लगाता है, तो मोटरें जनरेटर की तरह काम करने लगती हैं और बिजली पैदा करती हैं, जो वापस ग्रिड में भेज दी जाती है। जापान में भूकंप का खतरा हमेशा रहता है। शिंकानसेन में एक विशेष सेंसर सिस्टम लगा है जो भूकंप के शुरुआती झटकों (P-waves) को महसूस करते ही पूरी बिजली काट देता है और ट्रेनों में ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेक लगा देता है।

एक जानकारी के अनुसार निर्माणाधीन ​भारत का मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल (MAHSR) प्रोजेक्ट काफी हद तक जापान की शिंकानसेन तकनीक पर ही आधारित है।भारत इस प्रोजेक्ट के लिए जापान की 'E5 सीरीज' शिंकानसेन तकनीक का उपयोग कर रहा है। भारत में भी वही भूकंप सुरक्षा और ऑटोमैटिक ट्रेन कंट्रोल सिस्टम (ATC) लागू किया जा रहा है जो जापान में है।ट्रेनों का लुक और उनकी आंतरिक संरचना लगभग जापान की बुलेट ट्रेनों जैसी ही होगी। भारत के इस 508 किमी लंबे रूट में ठाणे के पास समुद्र के नीचे 21 किमी लंबी सुरंग बनाई जा रही है, जो जापान की सेइकान टनल जैसी इंजीनियरिंग का उदाहरण होगी। भारत में पहली बार 'जे-स्लैब' (J-Slab) ट्रैक सिस्टम का उपयोग हो रहा है, जिसमें पत्थर (Ballast) नहीं होते, बल्कि कंक्रीट के स्लैब पर पटरी बिछाई जाती है। भारत की गर्मी और धूल भरी परिस्थितियों को देखते हुए  तदनुसार ट्रेनों के एयर कंडीशनिंग और वेंटिलेशन सिस्टम में भी विशेष बदलाव किए जा रहे हैं।

बुलेट ट्रेन तकनीक को अपनाने के साथ संकल्पों को पूरा करने में जापानियों के संघर्ष, लगन और जुझारूपन को भी निश्चित ही आत्मसात करना हमारे लिए कम महत्वपूर्ण नहीं होगा। 


ब्रजेश कानूनगो 




Monday, 9 March 2026

डीसैलिनेशन प्लांट : जो समुद्र के पानी को पेयजल में बदलते हैं

डीसैलिनेशन प्लांट : जो समुद्र के पानी को पेयजल में बदलते हैं

जब ईरान के खिलाफ इजरायल और अमेरिका की जंग लगातार बढ़ती गई तो दोनों ही खेमों का निशाना तेल और मिसाइल से आगे बढ़कर पानी तक पहुंच गया। ऐसे में डीसैलिनेशन प्लांट  (विलवणीकरण संयंत्र) यानी जल शुद्धिकरण संयंत्र को टार्गेट किया जाने लगा तो हमारा ध्यान इस बात की ओर गया कि विश्व के अनेक देशों में जहां शुद्ध पेयजल की कमी है वहां बड़े पैमाने पर समुद्र के खारे जल को परिष्कृत करने के लिए पीने के पानी में बदला जा रहा है।

समुद्र के खारे पानी को पीने योग्य बनाना (Desalination) आज के समय में जल संकट से निपटने का एक क्रांतिकारी तरीका बन गया है। दुनिया के कई देश अपनी पानी की जरूरत का एक बड़ा हिस्सा इसी तकनीक से पूरा कर रहे हैं। वर्तमान में दुनिया भर में हजारों डिसेलिनेशन प्लांट काम कर रहे हैं। कुछ प्रमुख देशों ने बड़े पैमाने पर यह तकनीक अपनाई है। सऊदी अरब दुनिया का सबसे बड़ा समुद्री जल शोधक देश है। यहाँ के पानी की लगभग 50% से अधिक आपूर्ति इसी माध्यम से होती है। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के दुबई और अबू धाबी जैसे शहर लगभग पूरी तरह से शोधित समुद्री पानी पर निर्भर हैं। ​इजराइल अपनी उन्नत तकनीक के कारण इजराइल अपनी घरेलू पानी की जरूरत का करीब 75% हिस्सा समुद्र से प्राप्त करता है। कुवैत, कतर, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका (विशेषकर कैलिफोर्निया) और भारत (चेन्नई और गुजरात में कुछ बड़े प्लांट) भी इस तकनीक का बड़े पैमाने पर उपयोग कर रहे हैं।

एक खबर के अनुसार युद्ध के दौरान अमेरिका ने ईरान के केश्म द्वीप के वॉटर प्लांट पर हमला करके उसके 30 गांवों को प्यासा कर दिया। जवाब में ईरान ने भी टार्गेट बदलते हुए बहरीन में वॉटर डिसेलिनेशन प्लांट को निशाना बनाया। विशेषज्ञों और समाजशास्त्रियों का  मानना है कि ये प्लांट्स यहां के जनजीवन के लिए सर्वोच्च महत्व के संयंत्र हैं।  इनके ऊपर हमला होना इस पूरे क्षेत्र के जीवन के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। अगर इन प्लांट्स पर आगे भी हमला जारी रहे या साइबर अटैक हो या पानी दूषित कर दिया जाए तो यह सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं होगा बल्कि इससे पूरे खाड़ी क्षेत्र में मानव सुरक्षा का गंभीर संकट संभावित हो सकता है। इसका मतलब है कि अगर इन प्लांट्स को नुकसान हुआ तो शहरों की रोजमर्रा की जिंदगी तुरंत ठप हो सकती है।

बहरहाल, अब समझते हैं कि वाटर डीसैलिनेशन प्लांट कैसे काम करते हैं। दरअसल ​समुद्र के पानी से नमक अलग करने की मुख्य रूप से दो वैज्ञानिक विधियां सबसे अधिक प्रचलित हैं। जिनमें से पहली है रिवर्स ऑस्मोसिस (Reverse Osmosis - RO) जो सबसे आधुनिक और ऊर्जा-कुशल तकनीक है। इसमें समुद्र के पानी को बहुत उच्च दबाव (High Pressure) पर एक 'अर्ध-पारगम्य झिल्ली' (Semi-permeable Membrane) से गुजारा जाता है। यह झिल्ली इतनी सूक्ष्म होती है कि इसमें से पानी के अणु तो निकल जाते हैं, लेकिन नमक और अन्य अशुद्धियाँ पीछे रह जाती हैं।

डिसेलिनेशन की दूसरी विधि है थर्मल डिसेलिनेशन (Thermal Desalination) ​इसमें 'वाष्पीकरण' (Evaporation) के सिद्धांत पर काम होता है। पानी को गर्म करके भाप बनाई जाती है, जिससे नमक नीचे बैठ जाता है। फिर उस भाप को ठंडा (Condensation) करके शुद्ध पानी के रूप में इकट्ठा कर लिया जाता है। मध्य पूर्व के देशों में, जहाँ ऊर्जा सस्ती है, वहां इस तकनीक का काफी उपयोग होता है।

​डीसैलिनेशन प्रक्रिया केवल नमक हटाने तक सीमित नहीं है, इसमें कई महत्वपूर्ण चरण होते हैं। ​प्री-ट्रीटमेंट (Pre-treatment) के तहत समुद्र से लिए गए पानी से पहले कचरा, रेत और शैवाल (Algae) को छाना जाता है ताकि मुख्य झिल्ली (Membrane) खराब न हो। फिर होता है ​डिसेलिनेशन (Desalination) जिसके अंतर्गत  RO या थर्मल तकनीक के जरिए नमक को अलग किया जाता है। बाद में ​पोस्ट-ट्रीटमेंट (Post-treatment) में शुद्ध किए गए पानी का स्वाद बेहतर करने और उसे स्वास्थ्यवर्धक बनाने के लिए इसमें जरूरी खनिज (Minerals) जैसे कैल्शियम और मैग्नीशियम मिलाए जाते हैं। तत्पश्चात ​अपशिष्ट निपटान (Brine Disposal) के दौरान बचा हुआ अत्यधिक खारा पानी (Brine) वापस समुद्र में सावधानीपूर्वक विसर्जित किया जाता है।

एक भारतीय व्यक्ति होने के नाते आम जिज्ञासा सहज है कि अपने देश में समुद्र के पानी से पेय जल बनाने की दिशा में क्या कुछ कार्य किया गया है। ​भारत में मुख्य रूप से तमिलनाडु और गुजरात में सबसे बड़े और प्रभावी प्लांट स्थित हैं। यहाँ के पानी का उपयोग और वितरण (Usage and Distribution) मुख्य रूप से दो श्रेणियों में किया जाता है।  घरेलू और औद्योगिक क्षेत्रों के लिए।  चेन्नई में CMWSSB(Metrowatrer) पाइपलाइनों के माध्यम से इस पानी को घरों तक पहुँचाता है।  दक्षिण और उत्तर चेन्नई के लगभग 30-40 लाख लोग अपनी दैनिक जरूरतों के लिए इसी पर निर्भर हैं। भविष्य में 'पेरूर प्लांट' के पूरा होने पर यह संख्या और बढ़ जाएगी। ​लक्षद्वीप में छोटे LTTD (Low Temperature Thermal Desalination) प्लांट लगे हैं, जो द्वीपों पर रहने वाले समुदायों को मीठा पानी प्रदान करते हैं।

औद्योगिक उपयोग (Industrial Water) के अंतर्गत ​गुजरात के दहेज (Dahej) और जामनगर जैसे क्षेत्रों में पानी का उपयोग बड़ी कंपनियों द्वारा किया जाता है।  गुजरात औद्योगिक विकास निगम (GIDC) दहेज में स्थित पेट्रोलियम और केमिकल कंपनियों को पानी की आपूर्ति करता है। यह बहुत महत्वपूर्ण पक्ष है कि उद्योगों को समुद्र का पानी देने से खेती और पीने के लिए इस्तेमाल होने वाले ताजे पानी यानि नदियों के पानी की  बचत होती है।

डीसैलिनेशन प्रक्रिया को भारत के राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान (NIOT) ने भी विकसित किया है। यह तकनीक समुद्र की सतह और गहराई के पानी के तापमान के अंतर का उपयोग करती है। यह लक्षद्वीप के लिए वरदान साबित हुई है।

भारत जैसे देश के लिए  डीसैलिनेशन  के क्षेत्र में ​कुछ चुनौतियां भी हैं इस प्रक्रिया में मसलन इसकी लागत बहुत अधिक होती है, पाइपलाइन से आने वाले साधारण पानी की तुलना में डिसेलिनेशन का पानी 3 से 4 गुना महंगा हो जाता है।

इसके अलावा पर्यावरणीय दृष्टि से समुद्र से पानी निकालने के बाद बचा हुआ ब्राइन (अत्यधिक खारा घोल) वापस समुद्र में डालने से समुद्री जीवों को नुकसान पहुँच सकता है, जिसे कम करने के लिए भारत में 'मल्टी-डिस्कस' तकनीक पर काम किया जा रहा है। ​महाराष्ट्र (मुंबई के मनोरी में प्रस्तावित) और आंध्र प्रदेश जैसे राज्य भी अब इस दिशा में बड़े कदम उठा रहे हैं।

ब्रजेश कानूनगो 


Monday, 23 February 2026

चिचेन इत्ज़ा : जहाँ माया सभ्यता का पक्षी चहचहाता है

चिचेन इत्ज़ा : जहाँ माया सभ्यता का पक्षी चहचहाता है

वर्ष 2007 में जब आधुनिक विश्व के 7 अजूबे (New 7 Wonders) चुने गए, उनमें चीन की महान दीवार, पेट्रा (जॉर्डन), कोलोसियम (इटली), चिचेन इत्ज़ा (मेक्सिको), माचू पिचू (पेरू), ताजमहल (भारत) और क्राइस्ट द रिडीमर (ब्राजील) शामिल किया गया। ये अद्भुत संरचनाएं मानव कला और इतिहास का समुचित प्रतिनिधित्व करती हैं।

दुनिया घूमने निकले हर घुमक्कड़ की यह ख्वाहिश होती है कि वह इन अद्भुत स्थलों और धरोहरों की सैर करके कीर्तिमान बनाए और गौरवान्वित हो सके। हमने भी दुनिया की आभासी सैर के क्रम में कई ट्रेवलरों के वीडियोस में इन स्थलों के नजारे देखे हैं और उन संरचनाओं के इतिहास, समाज और इनके पीछे के विज्ञान को समझने की कोशिश की है। 

पिछले दिनों हमने इंडोट्रेकर यूट्यूब चैनल के कैलाश मीणा के साथ मेक्सिको के इन क्षेत्रों की आभासी यात्रा की और चिचेन इत्ज़ा को नजदीक से देखा समझा। एल कास्टिलो (कुल्कुलकन का पिरामिड)  चिचेन इत्ज़ा की सबसे प्रसिद्ध संरचना है। यह एक विशाल सीढ़ीदार पिरामिड है जो माया सभ्यता के देवता 'कुल्कुलकन' (पंखों वाले सांप) को समर्पित है। यह स्थापत्य  ​गणित के एक चमत्कार जैसा है। पिरामिड के चारों तरफ 91 सीढ़ियाँ हैं। अगर हम चारों तरफ की सीढ़ियों को जोड़ें और ऊपर के चबूतरे को मिलाएँ, तो कुल 365 का योग होता है। जो एक सौर वर्ष के बराबर हो जाता है। हर साल वसंत (March) और शरद (September) के दौरान, डूबते सूरज की रोशनी पिरामिड की सीढ़ियों पर एक ऐसी छाया बनाती है जो नीचे की ओर रेंगते हुए सांप जैसी दिखती है। यह अद्भुत  छाया का खेल (Equinox) माया लोगों के सटीक खगोल विज्ञान का प्रमाण है।

सबसे मजेदार बात हमने यह देखी कि चिचेन इत्ज़ा के कुकुलकन पिरामिड (El Castillo) के सामने खड़े होकर ताली बजाने पर 'क्विज़टल' (Quetzal) पक्षी जैसी चहचहाहट की आवाज आती है। इसके पीछे का वैज्ञानिक कारण समझने पर पता चलता है कि ध्वनि विवर्तन (Sound Diffraction) और प्रतिध्वनि (Echoes) के कारण ऐसा होता है। पिरामिड की 91 सीढ़ियों की ज्यामिति के कारण ताली की ध्वनि अलग-अलग समय पर परावर्तित होकर एक उच्च-आवृत्ति (high-frequency) चहचहाहट में बदल जाती है। 

दरअसल, पिरामिड की सीढ़ियाँ एक विवर्तन ग्रेटिंग की तरह काम करती हैं, जो ध्वनि तरंगों को फैलाती हैं, जब ताली बजाई जाती है, तो ध्वनि की लहरें हर सीढ़ी से टकराकर वापस आती हैं। चूँकि सीढ़ियाँ नीचे से ऊपर की ओर समान दूरी पर हैं, इसलिए ध्वनि तरंगों को वापस लौटने में थोड़ा अलग समय लगता है, जिससे यह एक चहचहाहट की तरह सुनाई देती है। यह गूंज माया सभ्यता के पवित्र 'क्विज़टल' पक्षी की आवाज से मिलती-जुलती है, जो शायद माया इंजीनियरों द्वारा जानबूझकर बनाई गई थी।यद्यपि पर्यटकों को सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर जाने की इजाजत नहीं है लेकिन बताया जाता है कि सीढ़ियों पर चढ़ने से होने वाली आवाज पानी से भरी बाल्टी में बारिश की बूंदें गिरने जैसी सुनाई देती है। यह कोई जादुई घटना नहीं, बल्कि प्राचीन माया सभ्यता की उन्नत इंजीनियरिंग और ध्वनि विज्ञान (Acoustics) का एक अद्भुत उदाहरण है। 

​​माया सभ्यता केवल एक साम्राज्य नहीं थी, बल्कि स्वतंत्र नगर-राज्यों का एक समूह थी जो मुख्य रूप से दक्षिणी मेक्सिको, ग्वाटेमाला और बेलीज के क्षेत्रों में फैली हुई थी। सभ्यता के ​स्वर्ण युग (250 ईस्वी - 900 ईस्वी) के दौरान माया लोगों ने गणित, खगोल विज्ञान और वास्तुकला में महारत हासिल कर ली थी ।  कहा जाता है कि अंक गणित में शून्य का आविष्कार भारत में हुआ,  5 वीं शताब्दी में महान भारतीय गणितज्ञ आर्यभट्ट ने इसका उपयोग किया और 7 वीं शताब्दी में ब्रह्मगुप्त ने इसे एक संख्या के रूप में परिभाषित किया।  बाद में शून्य की अवधारणा भारत से अरब और फिर यूरोप तक फैलती गई। माया सभ्यता ने भी स्वतंत्र रूप से शून्य को एक स्थान-धारक (placeholder) के रूप में प्रयोग किया था, लेकिन उनका उपयोग मुख्य रूप से कैलेंडर और ज्योतिष के लिए था, न कि आधुनिक अंकगणित के लिए।  माया लोगों ने इस पर आधारित एक सटीक कैलेंडर भी बनाया। 10 वीं शताब्दी के आसपास, माया लोगों ने अपने बड़े शहरों (जैसे टिकल और पलाेंके) को छोड़ दिया। इसके पीछे सूखे, युद्ध या संसाधनों की कमी जैसे कारण माने जाते हैं।  16वीं शताब्दी में स्पेनिश आक्रमणकारियों के आने से मेक्सिको के इतिहास का रुख बदल गया, जिससे स्वदेशी और यूरोपीय संस्कृतियों का मिश्रण हुआ।

​माया लोगों की जीवनशैली प्रकृति और आध्यात्मिकता से गहराई से जुड़ी थी। मक्का (Corn) उनकी जीवनरेखा थी। वे मानते थे कि देवताओं ने मनुष्य को मक्के से बनाया है। टॉरटिला, बीन्स, मिर्च और चॉकलेट (जिसे वे 'देवताओं का पेय' मानते थे) आज भी मेक्सिको के मुख्य भोजन हैं।

माया लोग कुशल खगोलशास्त्री थे। उनके मंदिर और पिरामिड सितारों और ग्रहों की स्थिति के अनुसार बनाए गए थे। उनकी बुनाई की कला (Huipil), मिट्टी के बर्तन और पत्थर की नक्काशी आज भी मेक्सिको के बाजारों में खूब देखी जा सकती है।

​पर्यटन की दृष्टि से, मेक्सिको "टाइम ट्रैवल" जैसा अनुभव देता है। प्राचीन समय के जीवन दर्शन और इतिहास की खुशबू यहाँ महसूस की जा सकती है। चिचेन इत्ज़ा (Chichen Itza) के पिरामिड के अलावा  ​ग्रेट बॉल कोर्ट (The Great Ball Court) प्राचीन मेसोअमेरिका का सबसे बड़ा खेल का मैदान है। यहाँ 'पोक-ता-पोक' (Pok-ta-pok) खेल खेला जाता था। आश्चर्य की बात यह है कि यहाँ की ध्वनिकी (Acoustics) इतनी सटीक है कि कोर्ट के एक छोर पर की गई फुसफुसाहट दूसरे छोर पर साफ सुनी जा सकती है।​ एल काराकोल (The Observatory), गोल गुंबद वाली वेधशाला है, माया खगोल शास्त्री यहाँ से शुक्र और चंद्रमा की गति पर नज़र रखते थे।​ योद्धाओं का मंदिर (Temple of the Warriors) में सैकड़ों स्तंभ हैं जिन पर योद्धाओं की नक्काशी की गई है।  पवित्र सेनोट (Sacred Cenote) ​चिचेन इत्ज़ा के पास एक विशाल प्राकृतिक चूना पत्थर का जलकुंड है। माया लोग इसे वर्षा के देवता 'चाक' (Chaac) का निवास स्थान मानते थे। सूखे के समय यहाँ देवताओं को खुश करने के लिए कीमती वस्तुओं (सोना, जेड) और कभी-कभी प्राणियों की बलि भी भेंट दी जाती थी।

मेक्सिको का इतिहास और माया सभ्यता (Maya Civilization) दुनिया की सबसे समृद्ध और रहस्यमयी विरासतों में से एक है। यह केवल प्राचीन खंडहरों के बारे में नहीं है, बल्कि एक जीवित संस्कृति है जो आज भी आधुनिक मेक्सिको की धड़कन में महसूस की जा सकती है।


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Wednesday, 18 February 2026

बादलों की तरह आकृतियां बनाती चोटियाँ

बादलों की तरह आकृतियां बनाती चोटियाँ

बचपन के दिनों में गर्मियों की रात को जब हम खुली छत पर सोने जाते तो दिन अस्त होने के पहले आकाश में छाए बादलों में अनेक आकृतियों की कल्पना करके असीम आनंद से भर जाते थे। बादलों में कभी कोई पक्षी दिखता तो कभी हाथी, बंदर या मनुष्य की छवि नजर आती थी। हम सब के लिए यह बहुत रोमांच और कुतुहल के दृश्य होते थे। ऐसी ही कुछ अनुभूति अफ्रीका के बुर्किना फासो के लेराबा प्रांत में स्थित सिंदौ की चोटियाँ (Peaks of Sindou) देखकर होने लगती है। ट्रैवलर दाऊद अखुनजादा के वीडियो के जरिए हमने इस इलाके की आभासी सैर करते हुए महसूस किया कि ​देखने में ये किसी "पत्थरों के जंगल" या किसी काल्पनिक शहर की मीनारों जैसी लगती हैं। किंतु जब हम इन चोटियों को देखने में अपनी कल्पनाशीलता को भी जोड़ लेते हैं तो इनमें कई मानव आकृतियां दिखाई देने लगती हैं। किसी चोटी में हैट लगाए कोई पुरुष दिखता है तो किसी में शिशु को उठाए कोई माँ दिखाई देने लगती है। 

सिंदौ की चोटियाँ (Peaks of Sindou) दुनिया के सबसे अद्भुत और सुंदर भूवैज्ञानिक संरचनाओं में से एक हैं। यह स्थान न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इसका सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व भी बहुत गहरा है।ये चोटियाँ मुख्य रूप से बलुआ पत्थर (Sandstone) से बनी हैं। लाखों वर्षों तक हवा और बारिश के कारण हुए कटाव (Erosion) ने इन चट्टानों को नुकीले स्तंभों, गुंबदों और अजीबोगरीब आकृतियों में बदल दिया है।​ इनका रंग समय और धूप के अनुसार बदलता रहता है, जिससे भिन्न समय में भिन्न कोण से इनका अलग सौंदर्य नजर आने लगता है। 

दरअसल ,प्रकृति एक अद्भुत कलाकार है, जो हवा, पानी और समय के मेल से पत्थरों को तराश कर ऐसी कृतियाँ बना देती है जिन्हें देखकर मानवीय वास्तुकला भी फीकी लगने लगती है। भौगोलिक रूप से इस प्रक्रिया को अपक्षय (Weathering) और अपरदन (Erosion) कहा जाता है। दुनिया में ऐसी कुछ प्रमुख  संरचनाओं पर नजर डालें तो इनमें अमेरिका के एरिजोना (संयुक्त राज्य अमेरिका)  में ग्रैंड कैनयन, नदी द्वारा किए गए कटाव का सबसे भव्य उदाहरण है। करोड़ों वर्षों तक कोलोराडो नदी के बहाव ने चट्टानों को काटकर इस दर्शनीय और अद्भुत विशाल घाटी का निर्माण किया है। यहाँ की चट्टानें पृथ्वी के भूगर्भीय इतिहास के लगभग 2 अरब साल पुराने रहस्यों को संजोए हुए हैं। इसकी गहराई 1.8 किमी तक है। यह अपनी अद्भुत लाल परतों और विशालता के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ हाइकिंग और रिवर राफ्टिंग काफी लोकप्रिय है। इसी तरह तुर्की के  अनातोलिया स्थित कप्पाडोसिया(Cappadocia) के अजीबोगरीब 'फेयरी चिमनी' (Fairy Chimneys) और गुफाएँ ज्वालामुखी विस्फोट के बाद हवा और बारिश के कटाव से बनी हैं। यहाँ की नरम 'टफ' चट्टानें आसानी से कट जाती हैं।यह ज्वालामुखी राख (Soft Tuff) और ऊपर की कठोर चट्टानों के असमान कटाव का परिणाम है।यह जगह अपने हॉट एयर बैलून राइड और जमीन के नीचे बसे प्राचीन शहरों के लिए मशहूर है। एरिजोना-यूटा सीमा, अमेरिका में  द वेव (The Wave) लहरों के आकार की अद्भुत चट्टानी संरचना है जो सैंडस्टोन (बलुआ पत्थर) पर हवा के कटाव (Wind Erosion) के कारण बनी है। यहाँ की धारियां जुरासिक काल के दौरान रेत के टीलों के जमा होने और फिर हवा द्वारा उन्हें तराशने से बनी हैं।इसकी संवेदनशीलता के कारण यहाँ जाने के लिए लॉटरी सिस्टम से बहुत कम परमिट दिए जाते हैं। चीन के हुनान प्रांत में स्थित जांगजियाजी नेशनल फॉरेस्ट पार्क (Zhangjiajie) जिससे ​प्रसिद्ध फिल्म 'अवतार' के पहाड़ों की प्रेरणा से ली गई है। ये ऊंचे स्तंभ जैसे पहाड़ पानी के कटाव और पौधों की जड़ों के फैलाव के कारण बने हैं। ये क्वार्ट्ज सैंडस्टोन के स्तंभ लाखों वर्षों के भौतिक कटाव का परिणाम हैं। यहाँ दुनिया का सबसे ऊंचा आउटडोर लिफ्ट और कांच का पुल सैलानियों के आकर्षण का केंद्र है। उत्तरी आयरलैंड में जाइंट्स कॉजवे (Giant's Causeway) पर ​समुद्र की लहरों और ज्वालामुखी क्रिया के मेल से यहाँ लगभग 40,000 षट्कोणीय (Hexagonal) बेसाल्ट स्तंभ बने हैं। यह ज्वालामुखी फटने के बाद लावा के तेजी से ठंडा होकर सिकुड़ने से बनी अनोखी ज्यामितीय संरचनाएं हैं।इसे यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा प्राप्त है और यह अपनी रहस्यमयी सुंदरता के लिए जाना जाता है।

इन्हीं अनोखी प्राकृतिक संरचनाओं के क्रम में ​सिंदौ की चोटियाँ भी अपना बहुत महत्व रखती हैं। बुर्किना फासो के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से यह एक है। ​स्थानीय सेनुफो (Senufo) लोगों के लिए यह स्थान अत्यंत पवित्र है। प्राचीन काल में, ये ऊँची और टेढ़ी-मेढ़ी चोटियाँ आक्रमणकारियों से बचने के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा दीवार का काम करती थीं।आज भी, स्थानीय लोग यहाँ अपने पूर्वजों का सम्मान करने और विशेष धार्मिक अनुष्ठान करने के लिए आते हैं। गाँव के कुछ हिस्से पर्यटकों के लिए प्रतिबंधित हैं क्योंकि वे पवित्र माने जाते हैं। 

बुर्किना फासो के सिंदौ शहर के बहुत करीब और 'बन्फोरा' (Banfora) शहर से लगभग 50 किमी की दूरी पर स्थित  इस जगह पर्यटकों के लिए पैदल चलने के रास्ते बने हुए हैं। ट्रैवलर के वीडियो में हमने देखा कि चोटियों के बीच से गुजरना एक भूलभुलैया में चलने जैसा अनुभव देता है। यहाँ से सूर्यास्त का नजारा अद्भुत होता है, जब ढलती धूप चट्टानों को सुनहरा और नारंगी रंग देती है।  स्थानीय कहानियों के अनुसार, ये चट्टानें आज भी "जीवित" मानी जाती हैं और विश्वास किया जाता है कि ये अनोखी चोटियाँ गांव की रक्षा करती हैं। ये ऐसी रोमांचक और अद्भुत चट्टाने हैं जिन्हें देखकर बादलों की तरह ही भिन्न आकृतियां इनमें खोजी जा सकती हैं। 

ब्रजेश कानूनगो 





Tuesday, 17 February 2026

कम कर सकते हैं इलेक्ट्रॉनिक कचरे का उत्पादन

 कम कर सकते हैं इलेक्ट्रॉनिक कचरे का उत्पादन 

दुनिया भर में इस वक्त इलेक्ट्रॉनिक कचरा (ई-वेस्ट) एक बहुत बड़ी पर्यावरणीय समस्या बन चुकी है। इस कचरे में पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जैसे मोबाइल फोन, कंप्यूटर, टीवी, फ्रिज और आधुनिक मोटर बाइक और कारों में प्रयुक्त इलेक्ट्रॉनिक प्रिंटेड बोर्ड और वायर आदि शामिल हैं। 

यूट्यूब पर एक ट्रैवलर ब्लॉगर के वीडियो में घाना की ऐसी बस्तियों को हमने नजदीक से देखा जहाँ बेहद प्रदूषित वातावरण में उनका जीवन गुजरता है। वहीं पर नदी के दूसरे किनारे पर कचरे के पहाड़ के पास ई-वेस्ट रिसाइक्लिंग की प्रक्रिया में इलेक्ट्रॉनिक कचरे को जलाकर मजदूरों द्वारा तांबा निकाला जा रहा था।

इस प्रक्रिया में पहले ई-वेस्ट को इकट्ठा किया जाता है और उसे जलाने के लिए तैयार किया जाता है। वेस्ट को टुकड़ों में काटकर, छांटकर अलग अलग किया जाता है फिर खुली आग में जलाया जाता है, जिससे तांबा और अन्य धातुएं पिघल जाती हैं। प्लास्टिक आदि जल जाते हैं और तांबा व अन्य धातु अलग हो जाते हैं। ई-वेस्ट में सोना, चांदी, तांबा और पैलेडियम जैसी कीमती धातु होती हैं। इनकी वैल्यू मार्केट में बहुत ज्यादा होती है। पिघली हुई धातुओं को ठंडा किया जाता है। तांबा को फिर से उपयोग करने के लिए पिघलाया जाता है। लेकिन इस प्रक्रिया में प्रदूषण बहुत तीव्रता से पर्यावरण में घुल मिल जाता है। 

जलने की प्रक्रिया से जहरीले धुएं और गैसें निकलती हैं, जो वायु प्रदूषण का कारण बनती हैं। प्रक्रिया से निकलने वाले रसायन जल स्रोतों में मिल जाते हैं, जिससे जल प्रदूषित होता है।  निकलने वाले रसायन मृदा याने मिट्टी में भी मिल जाते हैं, जिससे मिट्टी प्रदूषित होती है तथा भूमि की उर्वरता खत्म हो जाती है। ज्वलन और रसायनों से निकलने वाले धुएं और गैसें मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती हैं, जिससे श्वसन समस्याएं, कैंसर आदि के खतरे पैदा हो सकते हैं। 

भारत में भी ई-वेस्ट की मात्रा तेजी से बढ़ रही है, ऐसे में इसका उचित रिसाइक्लिंग करना बहुत जरूरी हो जाता है। एक जानकारी के अनुसार 2023-24 में भारत में 17.78 लाख मीट्रिक टन ई-वेस्ट उत्पन्न हुआ, जो 2017-18 की तुलना में 151.03% अधिक रहा है। 2023-24 में केवल 43% ई-वेस्ट का पुनर्चक्रण हुआ, जबकि 57% अनौपचारिक क्षेत्र में पहुंच गया। मुंबई, दिल्ली, बैंगलोर, चेन्नई और कोलकाता जैसे 65 शहरों से देश का 60% ई-वेस्ट निकलता है। 

इलेक्ट्रॉनिक कचरे के पुनर्चक्रण हेतु सरकारों द्वारा कुछ नियम और प्रक्रिया निर्धारित अवश्य की है लेकिन कचरे का लगभग आधा हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्रों में पहुंचना चिंता की बात होना चाहिए। दरअसल, ई-वेस्ट का सुरक्षित रिसाइक्लिंग करना जरूरी है, जिसमें जलने की प्रक्रिया का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। लोगों को ई-वेस्ट के खतरों के बारे में शिक्षित करना और सुरक्षित रिसाइक्लिंग के तरीकों के बारे में प्रशिक्षण देना भी बहुत जरूरी होगा। 

यद्यपि सरकार ने ई-वेस्ट रीसाइक्लिंग के लिए  ई-वेस्ट रीसाइक्लिंग पार्क और ई-वेस्ट मैनेजमेंट सेंटर जैसी कई योजनाएं अपनाई हैं, साथ ही ई-वेस्ट के निष्पादन के लिए कई जागरूकता अभियान भी चलाए हैं। ई-वेस्ट (मैनेजमेंट) नियम, 2022 के तहत, उत्पादकों, आयातकों और ब्रांड मालिकों को अपने उत्पादों के जीवन-चक्र के अंत में उत्पन्न कचरे के प्रबंधन की जिम्मेदारी दी गई है तथापि ई-वेस्ट रिसाइक्लिंग के लिए मात्र नियमन और कानून बना देने से ज्यादा जरूरी है कि सुरक्षित रिसाइक्लिंग को बढ़ावा दिया जाए।

इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट (E-waste) का कारोबार आज के डिजिटल युग में 'सोने की खान' और 'पर्यावरण की चुनौती' दोनों है। जैसे-जैसे हम पुराने फोन और लैपटॉप बदलकर नए गैजेट्स अपना रहे हैं, ई-वेस्ट का मैनेजमेंट भी एक बड़ा बिजनेस सेक्टर बन चुका है। लेकिन हमारा उद्देश्य तो यही होना चाहिए कि कम से कम मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक कचरा हमारे घर से निकले। इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट (E-waste) को कम करना न केवल पर्यावरण के लिए जरूरी है, बल्कि यह हमारी जेब के लिए भी फायदेमंद है। इसे कम करने के लिए हम '3R' (Reduce, Reuse, Recycle) के सिद्धांत को अपना सकते हैं।

​ई-वेस्ट पर रोकथाम के लिए सबसे पहला कदम खरीदारी के समय ही उठाया जा सकता है, नया गैजेट खरीदने से पहले खुद से पूछें, "क्या मुझे वाकई इसकी जरूरत है?" सिर्फ ट्रेंडी दिखने के लिए नया फोन लेना कचरा बढ़ाता है। ऐसी कंपनियाँ और उत्पाद चुनें जो अपनी लंबी उम्र और मजबूती के लिए जाने जाते हैं। एनर्जी स्टार (Energy Star) रेटिंग वाले या रिसाइकिल किए गए मटेरियल से बने उपकरणों को प्राथमिकता दें। ​जितना लंबा आप एक डिवाइस का उपयोग करेंगे, उतना ही कम ई-वेस्ट पैदा होगा,अगर लैपटॉप धीमा हो गया है, तो उसे फेंकने के बजाय RAM अपग्रेड करें या बैटरी बदलें। "Right to Repair" का समर्थन करें। गैजेट्स को साफ रखें, ओवरचार्जिंग से बचें और उन्हें अत्यधिक गर्मी से बचाएं। पुराने हार्डवेयर पर हल्का सॉफ्टवेयर इस्तेमाल करें ताकि वह लंबे समय तक काम कर सके। ​जो डिवाइस आपके काम का नहीं है, वह किसी और के लिए कीमती हो सकता है, उसे उपयुक्त व्यक्ति या संस्था को दान करने का प्रयास करें। पुराने कंप्यूटर या गैजेट्स स्कूलों, एनजीओ (NGOs) या उन लोगों को दें जिन्हें उनकी जरूरत है। मुफ़्त नहीं देना चाहते तो पुराने फोन या टैबलेट को रिसेल प्लेटफॉर्म्स (जैसे OLX, Cashify) पर बेच दें।

पुराने स्मार्टफोन को 'सिक्योरिटी कैमरा', 'म्यूजिक प्लेयर' या 'डिजिटल फोटो फ्रेम' के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। जब कोई उपकरण बिल्कुल खराब हो जाए, तो उसे साधारण कचरे में न  फेंकते हुए​ अपने शहर के अधिकृत ई-वेस्ट सेंटर्स का पता लगाएं। वहां कचरा देने पर पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुँचता। कई कंपनियाँ (जैसे Apple, Samsung, Dell) पुराने डिवाइस के बदले नए पर डिस्काउंट देती हैं। कचरे के उत्पादन को समाप्त करना भले ही हमारे बस में नहीं है लेकिन अपने विवेक और कुछ उपायों से इसकी वृद्धि को नियंत्रित करके हम पर्यावरण और समूचे प्राणियों के स्वास्थ्य की रक्षा अवश्य कर सकते हैं। 


ब्रजेश कानूनगो




 





Sunday, 15 February 2026

आत्मीय और आस्था के पात्र खतरनाक मगरमच्छ

आत्मीय और आस्था के पात्र  खतरनाक मगरमच्छ

हम लोग इतना अवश्य जानते हैं कि मगरमच्छ जैसे खरनाक प्राणी की त्वचा (स्किन) मुख्य रूप से महंगे हैंडबैग, जूते, बेल्ट, वॉलेट और फर्नीचर जैसे लक्ज़री सामान बनाने के लिए उपयोग की जाती है। इनकी त्वचा बेहद टिकाऊ और कीमती होती है।  मगरमच्छ के शरीर के अन्य अंगों (दांत, हड्डी) का उपयोग पारंपरिक वस्तुओं में किया जाता है। लेकिन  कुछ दिनों पहले जब हमने घुमक्कड़ और हमारे प्रिय यूट्यूबर दावूद अखुंदाज़ा के साथ पश्चिम अफ्रीका के बर्किना फासो देश के वीडियो को देखा तो मालूम हुआ कि जहां के लोग खतरनाक मगरमच्छों के साथ बहुत मित्रवत व्यवहार करते हैं। 

यहाँ के लोग मगरमच्छों के साथ तालाब में नहाते हैं और बच्चे उनकी पीठ पर बैठते हैं। ट्रैवलर जब स्थानीय नागरिकों से उनके इस रिश्ते के बारे में पूछते हैं तो वे बताते हैं कि यहां के ग्रामीणों का मानना है कि मगरमच्छ उनके पूर्वजों की आत्माएं हैं और गाँव की रक्षा करते हैं। जब किसी मगरमच्छ की मृत्यु होती है, तो उसे इंसानों की तरह सम्मान के साथ दफनाया जाता है। खासतौर से पश्चिम अफ्रीका के इस देश में साबू (Sabou) और बाज़ौले (Bazoulé) नामक गाँवों में यह दृश्य सहजता से देखा जा सकता है।

आइए पहले थोड़ा इस खतरनाक प्राणी के बारे में जानलें। मगरमच्छ बड़े, अर्द्ध-जलीय सरीसृप हैं जो मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों की नदियों और झीलों में पाए जाते हैं। ये मांसाहारी होते हैं और इनका काटना सबसे मजबूत होता है। खारे पानी के मगरमच्छ सबसे बड़े होते हैं, जो 7 मीटर से अधिक लंबे हो सकते हैं। ये ठंडे खून वाले, अत्यधिक  शिकारी होते हैं जो डायनासोर के करीबी रिश्तेदार माने जा सकते हैं। 
मगरमच्छ अधिकतर उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं, जहां ये पानी में रहने के साथ-साथ धूप सेंकने के लिए किनारे पर भी आते हैं। इनके पास मोटी, पपड़ीदार त्वचा, शक्तिशाली जबड़े और 60-100 से अधिक शंक्वाकार दांत होते हैं। ये कुशल शिकारी होते हैं जो मछली, स्तनधारी, पक्षी और कछुए खाते हैं। पानी में अपने शिकार को घेरकर या छिपकर घात लगाकर हमला करते हैं। मादा मगरमच्छ छेद या टीलों में अंडे देती हैं। बच्चों के निकलने के बाद, वे लगभग एक साल तक उनकी रक्षा करती हैं। मगरमच्छों की लगभग 20 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं। सबसे बड़ा 'खारे पानी का मगरमच्छ' है, जबकि 'बौना मगरमच्छ' सबसे छोटा होता है। ये लगभग 50-80 वर्ष तक जीवित रह सकते हैं। यह माना जाता है कि ये पूर्व-ऐतिहासिक काल के डायनासोरनुमा प्राणियों की अंतिम जीवित कड़ी हैं, जिन्हें "जीवित जीवाश्म" भी कहा जाता है। 

घाना और बुर्किना फासो सहित मगरमच्छ को दुनिया के कई हिस्सों में केवल एक खतरनाक शिकारी ही नहीं, बल्कि शक्ति, उर्वरता और सुरक्षा का प्रतीक माना गया है। प्राचीन सभ्यताओं से लेकर आज के कुछ आधुनिक समुदायों तक, इसकी पूजा की परंपरा रही है। विश्व में मगरमच्छ की पूजा को लेकर बहुत सारे तथ्य और  दिलचस्प जानकारियां मिलती हैं।
प्राचीन मिस्रवासी 'सोबेक' नामक देवता की पूजा करते थे, जिनका सिर मगरमच्छ का और शरीर इंसान का था।उन्हें नील नदी का रक्षक और प्रजनन क्षमता (Fertility) का देवता माना जाता था। कोम ओम्बो (Kom Ombo) में सोबेक का एक विशाल मंदिर है। वहाँ मगरमच्छों को पालतू बनाकर रखा जाता था और उनकी मृत्यु के बाद उन्हें ममी बनाकर सम्मान के साथ दफनाया जाता था। ​भारत के कुछ हिस्सों में मगरमच्छों के गहरे धार्मिक जुड़ाव के बारे में भी संदर्भ मिलते हैं। गुजरात के कई समुदायों में 'खोदियार माता' की पूजा होती है, जिनका वाहन मगरमच्छ है। वहाँ मगरमच्छ को पवित्र माना जाता है और उसे नुकसान पहुँचाना पाप माना है। पाकिस्तान और भारत सीमा पर कराची (पाकिस्तान) में 'मगर पीर' नाम की एक दरगाह है जहाँ मगरमच्छों को सूफी संत का आशीर्वाद प्राप्त माना जाता है। श्रद्धालु उन्हें बड़े चाव से खाना खिलाते हैं।केरल के 'अन्नतपुरा झील मंदिर' में 'बब्बरिया' नाम का एक शाकाहारी मगरमच्छ प्रसिद्ध था (जिसकी हाल ही में मृत्यु हुई), जिसे मंदिर का रक्षक माना जाता था। पापुआ न्यू गिनी (Papua New Guinea) की सेपिक नदी (Sepik River) के किनारे रहने वाली जनजातियों में मगरमच्छ का स्थान सर्वोपरि है। यहाँ के लोग मानते हैं कि उनके पूर्वज पुरुष मगरमच्छ थे। युवाओं के शरीर पर विशेष रूप से पीठ पर ऐसे निशान (Scarification) बनाए जाते हैं जो मगरमच्छ की खाल जैसे दिखें। यह उनके वयस्क होने की एक महत्वपूर्ण और पवित्र रस्म है।​माया और एज़्टेक सभ्यता (मेक्सिको) की प्राचीन सभ्यताओं में मगरमच्छ को 'पृथ्वी का आधार' माना जाता था। उनके कैलेंडर और निर्माण की कहानियों में मगरमच्छ का विशेष महत्व है।​  तिमोर-लेस्ते (Timor-Leste) देश के लोग अपने द्वीप के आकार को एक सोए हुए मगरमच्छ जैसा मानते हैं और उसे 'दादा' (Grandfather) कहकर पुकारते हैं।

मगरमच्छों की पूजा करने का तरीका भले ही अलग अलग समुदायों में भिन्न हो किंतु यह अवश्य है कि उनके प्रति बहुत से समुदायों में बहुत सम्मान व्यक्त किया जाता है।  कुछ लोग मंदिर बनाकर या मूर्तियों के रूप में पूजा करते हैं। कुछ समुदायों में जीवित मगरमच्छों को पवित्र मानकर उन्हें विशेष भोजन (मांस, मुर्गे आदि) अर्पित किया जाता है। ​टोटम (Totem) जैसी कई जनजातियाँ इसे अपना कुल-देवता मानती हैं और मगरमच्छों का शिकार वर्जित होता है। ये संस्कृतियाँ मगरमच्छों को उनके खतरों के बावजूद सम्मानित करती हैं, जिससे उनके प्रति डर को आस्था में बदला जा सके। 

ब्रजेश कानूनगो

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Monday, 9 February 2026

प्राचीन शैलकृत वास्तुकला और धर्मराजेश्वर मंदिर

प्राचीन शैलकृत वास्तुकला और धर्मराजेश्वर मंदिर

कुछ दिन पहले सैर सपाटे के दौरान हमने मंदसौर जिले में स्थित धर्मराजेश्वर मंदिर और बौद्ध गुफाओं का अवलोकन किया। सचमुच ये न सिर्फ दर्शनीय और आस्था के केंद्र हैं बल्कि प्राचीन भारतीय वास्तुकला के अनूठे संगम हैं। घने वन क्षेत्र में चट्टानों को काट कर बनाए गये मंदिरों और शिल्प की तत्कालीन इंजीनियरिंग और शिल्पकारों के लंबे परिश्रम के बेमिसाल प्रमाण हैं। इसके साथ ही इतिहास और कला के प्रेमियों के लिए भी एक खुला संग्रहालय है।

भारत में कई प्रमुख रॉक कट मंदिर हैं, जो अपनी अद्वितीय वास्तुकला और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध हैं। इनमें से कुछ प्रमुख रॉक कट मंदिर पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहे हैं। हिमाचल प्रदेश का मसरूर रॉक कट मंदिर, मंदिर 8वीं शताब्दी में बनाया गया था और हिमालयन पिरामिड के नाम से भी जाना जाता है। एलोरा महाराष्ट्र का प्रसिद्ध कैलाशनाथ मंदिर भी 8वीं शताब्दी में राष्ट्रकूट शासकों द्वारा बनाया गया था और आज यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों में शामिल है। तमिलनाडु के महाबलीपुरम का रॉक कट मंदिर पंचरथ 7वीं शताब्दी में पल्लव राजाओं द्वारा बनाए गए थे और ये भी  यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है।

कर्नाटक में बादामी गुफा मंदिर 6वीं शताब्दी में चालुक्य राजाओं द्वारा बनाए गए थे। विरुपाक्ष मंदिर हम्पी कर्नाटक में है जो 14वीं शताब्दी में विजयनगर राजाओं द्वारा बनाया गया था। उदयगिरि गुफाएं मध्य प्रदेश में 5वीं शताब्दी में गुप्त राजाओं द्वारा बनाई गई थीं।

रॉक कट मंदिरों की श्रृंखला में मध्यप्रदेश का धर्मराजेश्वर मंदिर (Dharmarajeshwar Temple) मंदसौर जिले की शामगढ़ तहसील से लगभग 22 किमी दूर स्थित है।  शांत और प्रकृति की गोद में स्थित इस स्थल की पत्थर की नक्काशी और वातावरण  फोटोग्राफी के शौकीनों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है।  यहाँ की सैर के लिए सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च के बीच होता है। महाशिवरात्रि के दौरान यहाँ विशाल मेला लगता है। धर्मराजेश्वर को आमतौर पर मध्य प्रदेश के एलोरा की तरह माना जाता है क्योंकि इसकी निर्माण तकनीक एलोरा के प्रसिद्ध कैलाश मंदिर से काफी मिलती-जुलती है। उत्तर भारत के सबसे महत्वपूर्ण और दुर्लभ मंदिरों में से एक इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे एलोरा के कैलाश मंदिर की तरह एक ही विशाल चट्टान को काटकर (Monolithic) बनाया गया है। यह मंदिर 9वीं शताब्दी का माना जाता है तथा उत्तर भारतीय "नागर शैली" में निर्मित है। इसे ऊपर से नीचे की ओर तराशा गया है। मुख्य मंदिर के चारों ओर सात छोटे मंदिर बने हुए हैं। मंदिर की नक्काशी और इसके शिखर की बनावट अद्भुत है। और यह सारी संरचनाएं आसपास के धरातल से नीचे स्थित है। चट्टानों में खुदे इसके परिसर प्रांगण में एक छोटी सी सजल कुइया (कुँआ) और तुलसी के पौधे की घनी पत्तियां अचरज में डाल देती हैं।

मुख्य मंदिर में एक शिवलिंग और भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित है, जो शैव और वैष्णव मतों के समन्वय को दर्शाता है। इसे 'धर्मराजेश्वर' इसलिए कहा जाता है क्योंकि पांडव पुत्र युधिष्ठिर (धर्मराज) से इसकी कई दंत कथाएं प्रचलित रही हैं।

​मंदिर के ठीक पास ही अनेक बौद्ध गुफाएं स्थित हैं, जो इस क्षेत्र की प्राचीन धार्मिक विविधता को दर्शाती हैं। ये गुफाएं मंदिर से भी पुरानी हैं, जिनका निर्माण लगभग 7वीं-8वीं शताब्दी के आसपास माना जाता है। इन गुफाओं में 'विहार' (भिक्षुओं के रहने का स्थान) और 'चैत्य' (प्रार्थना कक्ष) शामिल हैं। यहाँ भगवान बुद्ध की विशाल मूर्तियाँ और स्तूप खुदे हुए हैं। एक गुफा में भगवान बुद्ध की महापरिनिर्वाण मुद्रा (लेटी हुई प्रतिमा) विशेष रूप से दर्शनीय है।

​यद्यपि ​इन स्मारकों की खोज को लेकर कोई एक निश्चित खोजकर्ता का नाम चर्चित नहीं है, क्योंकि ये स्थानीय रूप से हमेशा ज्ञात थे। हालांकि, पुरातात्विक दृष्टि से इनका दस्तावेजीकरण और संरक्षण ​19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ब्रिटिश पुरातत्वविदों द्वारा किया गया था। ​जेम्स बर्गेस जैसे विद्वानों ने इन गुफाओं और मंदिर की वास्तुकला पर विस्तृत शोध कार्य किया, जिसके बाद ये विश्व पटल पर आए। ​वर्तमान में यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अधीन एक संरक्षित स्मारक है।

बौद्ध गुफाओं के निर्माण को लेकर आज के इस आधुनिक और उन्नत तकनीक में सक्षम समय में  हमारे मन में सहज ही जिज्ञासा और कुतुहल पैदा हो जाते हैं। दरअसल, ​बौद्ध गुफाओं (जिन्हें 'शैलकृत वास्तुकला' या Rock-cut Architecture कहा जाता है) का निर्माण केवल कला प्रदर्शन के लिए नहीं, बल्कि एक गहरी आध्यात्मिक और व्यावहारिक आवश्यकता के कारण हुआ था।

बौद्ध धर्म में गुफाओं का निर्माण दो मुख्य उद्देश्यों के लिए किया जाता था, विहार और चैत्य। ​विहार (Viharas) बौद्ध भिक्षुओं के रहने के स्थान या आवास थे जिन्हें वर्षा ऋतु के दौरान (जिसे 'वस्सवास' कहा जाता है), जब भिक्षु यात्रा नहीं कर सकते थे, तब वे यहाँ शरण लेते थे। ​चैत्य (Chaityas), प्रार्थना कक्ष या उपासना स्थल होते थे। इनके केंद्र में एक स्तूप होता था, जिसकी परिक्रमा करके भिक्षु ध्यान और पूजा करते थे। बौद्ध गुफाएं (जैसे अजंता, एलोरा, या मंदसौर की गुफाएं) प्रायः एकांत और प्राकृतिक स्थानों पर मिलने के पीछे ठोस तर्क थे।  बौद्ध धर्म में 'निर्वाण' की प्राप्ति के लिए गहन ध्यान (Meditation) आवश्यक है। शहर के शोर-शराबे से दूर घने जंगल और पहाड़ मानसिक शांति के लिए ये आदर्श थे। एक रोचक तथ्य यह भी है कि ये गुफाएं जंगल में तो थीं, लेकिन अक्सर प्रमुख व्यापारिक मार्गों के पास स्थित थीं। इससे भिक्षुओं को व्यापारियों से भिक्षा आसानी से मिल जाती थी और व्यापारियों को आराम करने के लिए सुरक्षित स्थान मिल जाता था। पहाड़ों को काटकर बनाई गई गुफाएं स्थायी होती थीं। ये भीषण गर्मी, बारिश और जंगली जानवरों से सुरक्षा प्रदान करती थीं। पत्थर की दीवारें तापमान को भी नियंत्रित रखती थीं।

​इन गुफाओं का निर्माण कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक पूरा समुदाय मिलकर करता था।  राजाओं (जैसे सातवाहन, वाकाटक, गुप्त शासक) के अलावा, धनी व्यापारियों, शाही महिलाओं और कारीगरों की श्रेणियों (Guilds) ने इनके निर्माण के लिए दान दिया जाता था। गुफाओं के शिलालेखों पर कहीं कहीं अक्सर दानदाताओं के नाम खुदे मिलते हैं। उस समय के कुशल शिल्पी और पत्थर तराशने वाले (Stone Carvers) ऊपर से नीचे की ओर (Top-down approach) पहाड़ को तराशते थे। यह काम इतना सटीक होता था कि एक भी गलती पूरे निर्माण को खराब कर सकती थी। भारत में बौद्ध गुफाओं का निर्माण ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से शुरू होकर 10वीं शताब्दी तक चला। जैसे-जैसे बौद्ध धर्म का विस्तार हुआ, भिक्षुओं की संख्या बढ़ी। मौर्य काल (अशोक के समय) के बाद पत्थर को तराशने की कला चरम पर पहुँची, जिससे लकड़ी के ढांचों के स्थान पर स्थायी पत्थर की गुफाएं बनने लगीं। कालांतर में ये गुफाएं केवल रहने की जगह नहीं रहीं, बल्कि विश्वविद्यालयों के रूप में विकसित हुईं, जहाँ दर्शन, कला और धर्म की शिक्षा दी जाती थी।

धर्मराजेश्वर मंदिर और बौद्ध गुफाओं जैसे स्थलों को देखकर हमारे भीतर तत्कालीन लोगों की  वैचारिक, आध्यात्मिक चेतना के साथ मनुष्य के तकनीकी कौशल, उसके धैर्य और निरंतर श्रम और जुझारूपन के प्रति असीम सम्मान की भावना जाग जाना स्वाभाविक है।

ब्रजेश कानूनगो






 


Saturday, 7 February 2026

टमाटर हो या टेसू, रंग तो मस्ती का होता है

टमाटर हो या टेसू, रंग तो मस्ती का होता है 

होली का पर्व हमारे तन मन को उमंग और उत्साह से भर देता है। हमारे देश के विभिन्न अंचलों में रंगों का यह त्योहार लगभग पंद्रह दिनों तक मनाया जाता है। होलिका दहन के बाद दूसरे दिन धुलेंडी, पांचवे दिन रंग पंचमी और तेरहवें दिन रंग तेरस या नहान के दिन इस पर्व पर अलग ही जोश और रंग बिखर जाते हैं। वैसे समूचे विश्व में इसी तरह के रंगभीगे त्योहार अलग अलग दिनों में मनाए जाने की परंपरा रही है।

घुम tvक्कड़ों के ट्रैवल वीडियो देखते रहने के क्रम में हमने नोमेडिक शुभम चैनल के ख्यात भारतीय यूट्यूबर शुभम् के साथ स्पेन के वेलेंसिया शहर के पास स्थित बुनयोल गांव की आभासी यात्रा की। यह गांव टमाटरों के साथ खेले जाने वाले सबसे प्रसिद्ध उत्सव 'ला टोमाटिना' (La Tomatina)  के लिए प्रसिद्ध है। यह दुनिया की सबसे बड़ी 'फूड फाइट' मानी जाती है। इस दिलचस्प और लाल-रंग के उत्सव को स्पेन के वैलेंसिया शहर के पास स्थित बुनयोल (Buñol) नाम के गाँव में  हर साल अगस्त के आखिरी बुधवार को मनाए जाने की शुरुआत 1945 में हुई थी। कहा जाता है कि एक परेड के दौरान कुछ युवाओं के बीच झगड़ा हो गया और पास में टमाटर की रेहड़ी देखकर उन्होंने एक-दूसरे पर टमाटर फेंकने शुरू कर दिए। अगले साल फिर उन्हीं युवाओं ने घर से टमाटर लाकर लड़ाई की, और धीरे-धीरे यह एक परंपरा बन गई।

वीडियो में ट्रैवलर शुभम और उनके साथियों ने अपने यहां की होली जैसा भरपूर मजा लिया और टमाटरों से सराबोर होते गए। स्थानीय नागरिकों के साथ साथ उनका आनंद और उल्लास भी देखने लायक था। टमाटरों से खेली जाने वाली इस होली के कुछ खास नियम भी होते हैं मसलन ​टमाटर फेंकने से पहले उन्हें हाथ से कुचलना जरूरी है ताकि किसी को चोट न लगे। ​केवल टमाटर ही फेंके जा सकते हैं। ​उत्सव शुरू होने और खत्म होने की सूचना एक खास 'पटाखे' (Carcasa) से दी जाती है।

उत्सव की शुरुआत 'पालो जाबोन' (Palo Jabón) से होती है, जिसमें एक चिकने खंभे के ऊपर रखे 'हैम' (Ham) को उतारने की कोशिश की जाती है। जैसे ही कोई उसे उतार लेता है, टमाटर की जंग शुरू हो जाती है।

​स्पेन की लोकप्रियता को देखते हुए दुनिया के कई अन्य देशों ने भी अपने यहाँ 'टोमाटिना' जैसे उत्सव शुरू किए हैं। कोलंबिया के सुतामार्चन (Sutamarchán) में जून के महीने में टमाटर उत्सव मनाया जाता है। यहाँ टमाटर की अधिक पैदावार का जश्न मनाने के लिए लोग सड़कों पर उतरते हैं। 

कोस्टा रिका (La Tomatina in Costa Rica) के वल्र्वर्डे वेगा (Valverde Vega) क्षेत्र में फसल उत्सव के दौरान टमाटर की लड़ाई आयोजित की जाती है। चीन के ग्वांगडोंग प्रांत में भी स्पेन की तर्ज पर टमाटर उत्सव आयोजित किया गया है, हालांकि यह मुख्य रूप से पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए है। यद्यपि भारत में भी बैंगलोर और दिल्ली जैसे शहरों में 'ला टोमाटिना' आयोजित करने की कोशिश की गई थी, लेकिन भोजन की बर्बादी को लेकर होने वाले विरोध और सामाजिक संवेदनशीलता के कारण इसे बड़े स्तर पर बढ़ावा नहीं मिल सका।

उल्लेखनीय है कि उत्सव खत्म होने के एक घंटे के भीतर, दमकल की गाड़ियाँ सड़कों को धो देती हैं। टमाटर में मौजूद सिट्रिक एसिड (Citric Acid) सड़कों की सफाई के लिए एक प्राकृतिक क्लीनर का काम करता है, जिससे सड़कें पहले से कहीं ज्यादा चमक उठती हैं। अनेकों घुमक्कड़ और पर्यटक विश्वभर के देशों से इसमें शामिल होने आते हैं और अपने कैमरों से यहां के इस उत्सव को सहेज लेते हैं।

स्पेन के इस उत्सव को देखकर हमारे जैसे ठेठ मालवी व्यक्ति के मन में मध्यप्रदेश के इंदौर की रंगपंचमी जैसे रंगारंग उत्सव का चित्र उभर आना स्वाभाविक है। इन्दौर की रंगपंचमी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि इस शहर की धड़कन और पहचान है। होली के पांच दिन बाद चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की पंचमी को मनाई जाने वाली यह परंपरा आज एक वैश्विक आयोजन का रूप ले चुकी है।

​इन्दौर की रंगपंचमी का इतिहास लगभग 300 साल पुराना है, जिसकी जड़ें होल्कर राजवंश से जुड़ी हैं।  होल्कर राजाओं के समय इसकी शुरुआत हुई थी। उस दौर में राजा स्वयं अपनी प्रजा के साथ होली खेलने के लिए निकलते थे। पुराने समय में बैलगाड़ियों में फूलों से बने प्राकृतिक रंग और टेसू के फूलों का पानी भरा जाता था। राजपरिवार के सदस्य जनता पर रंग छिड़कते थे, जिससे ऊंच-नीच का भेद मिट जाता था।

​रंगपंचमी पर निकलने वाले जुलूस को स्थानीय भाषा में 'गेर' कहा जाता है। यह इन्दौर की सबसे बड़ी विशेषता है।  शहर के राजवाड़ा क्षेत्र से विभिन्न संस्थाओं द्वारा गेर निकाली जाती है। इसमें बड़े-बड़े मिसाइल नुमा पंपों से हवा में 50-60 फीट की ऊंचाई तक गुलाल और रंगीन पानी उछाला जाता है। पूरा आसमान रंगों से ढक जाता है। लोग ढोल-ताशों की थाप पर नाचते हुए चलते हैं।

​इन्दौर की रंगपंचमी की सबसे खास बात इसकी सामूहिकता है।  राजवाड़ा के आसपास के 3/4 किलोमीटर के दायरे में एक साथ 5 से 7 लाख लोग जमा होते हैं। इसमें अमीर-गरीब, जाति-धर्म का कोई बंधन नहीं होता। हर कोई रंगों में सराबोर होकर 'इन्दौरी मस्ती' में डूबा रहता है। इतनी विशाल भीड़ होने के बावजूद इन्दौर के लोग अनुशासित रहते हैं, जो यहाँ की नागरिक चेतना को दर्शाता है।

​इन्दौर की रंगपंचमी अब केवल मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं है।  इन्दौर की गेर को यूनेस्को की सांस्कृतिक विरासत सूची (Intangible Cultural Heritage) में शामिल करने के प्रयास किए गए हैं, जिससे इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है।  अब विदेशों से भी फोटोग्राफर्स और पर्यटक विशेष रूप से इस नजारे को देखने और कैद करने इन्दौर आते हैं। 

स्पेन की टमाटर वाली लाल रंगी होली से बहुत सारी समानता के बावजूद कुछ तो अलग है जो इंदौर की रंगपंचमी को खास बनाता है। इन्दौर की रंगपंचमी "अतिथि देवो भव:" और "मिलनसारिता" का जीवंत उदाहरण है। यहाँ की हवा में उड़ने वाला गुलाल प्रेम और भाईचारे का संदेश देता है। यहां की मस्ती में संस्कृति और आध्यात्म की बांसुरी सुनाई देती है।


ब्रजेश कानूनगो 















Monday, 2 February 2026

वेनेजुएला : तेल ही नहीं सबसे ऊंचे जलप्रपात के लिए भी प्रसिद्ध है

वेनेजुएला : तेल ही नहीं सबसे ऊंचे जलप्रपात के लिए भी प्रसिद्ध है 

हाल ही में भारत से बहुप्रतीक्षित अमेरिका से सशर्त ट्रेड डील हो जाने का समाचार आया है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कथित रूप से दावा किया है कि भारत रूस की बजाए अब वेनेजुएला से कच्चा तेल लेगा। 

वेनेजुएला, दक्षिण अमेरिका के उत्तरी तट पर स्थित एक ऐसा देश है जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता और विशाल तेल भंडार के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। वर्तमान में (फरवरी 2026), यह देश एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील ऐतिहासिक मोड़ से गुजर रहा है। जनवरी 2026 में, अमेरिकी सैन्य अभियान "ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व" के तहत राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हिरासत में लेकर अमेरिका ले जाया गया । वर्तमान में देश एक संक्रमणकालीन दौर में है। डेल्सी रोड्रिगेज ने कुछ समय के लिए जिम्मेदारी संभाली है, लेकिन राजनीतिक अस्थिरता बनी हुई है। देश में लंबे समय से "बोलिवेरियन क्रांति" (समाजवाद) और विपक्षी ताकतों के बीच संघर्ष रहा है।

राजनीतिक संदर्भों और आग्रहों से अलग हटकर देखें तो जानने को मिलता है कि वेनेजुएला का तेल और रूस या अरब देशों का तेल रासायनिक रूप से एक-दूसरे से काफी अलग होते हैं। इसे समझने के लिए हमें तेल की "क्वालिटी" (Quality) और "निकालने की प्रक्रिया" (Extraction) पर ध्यान देना होगा।

वेनेजुएला में मुख्य रूप से 'अति-भारी कच्चा तेल' (Extra-Heavy Crude) पाया जाता है। यह कोलतार (tar) जैसा गाढ़ा और चिपचिपा होता है। इसे पाइपलाइनों में बहाने के लिए इसमें हल्का तेल या केमिकल मिलाना पड़ता है। जबकि ​रूस/सऊदी अरब का तेल आमतौर पर 'हल्का' (Light) या 'मीडियम' (Medium) होता है। यह पानी की तरह पतला होता है और इसे आसानी से निकाला और ट्रांसपोर्ट किया जा सकता है। ​वेनेजुएला का तेल 'सोर' (Sour) होता है, जिसका अर्थ है कि इसमें सल्फर (गंधक) की मात्रा बहुत अधिक होती है। इसे रिफाइन करना कठिन और महंगा होता है क्योंकि सल्फर निकालने के लिए जटिल तकनीक चाहिए। ​रूस (Urals): रूस का तेल 'मीडियम सोर' होता है। ​सऊदी अरब  का तेल काफी हद तक 'स्वीट' (Sweet) होता है, जिसमें सल्फर कम होता है और इसे रिफाइन करना सबसे आसान होता है।

​वेनेजुएला के भारी तेल से डीजल या गैसोलीन बनाने के लिए बहुत ही आधुनिक और विशेष 'कॉम्प्लेक्स रिफाइनरीज' की आवश्यकता होती है। दुनिया की बहुत कम रिफाइनरियाँ ही (मुख्यतः अमेरिका और भारत में) इसे कुशलता से प्रोसेस कर सकती हैं। जबकि​रूस या अरब देशों के तेल को साधारण रिफाइनरियों में भी आसानी से प्रोसेस किया जा सकता है। 

दरअसल वेनेजुएला का तेल "मात्रा" में तो सबसे ज्यादा है, लेकिन "गुणवत्ता" के मामले में यह रूस और सऊदी अरब के मुकाबले काफी कठिन और महंगा हो जाता है। यही कारण है कि भारी तेल होने के बावजूद वेनेजुएला अपनी अर्थव्यवस्था को उतनी तेजी से नहीं संभाल पाया, क्योंकि इसे बेचने के लिए उसे विदेशी तकनीक और विशेष रिफाइनरियों पर निर्भर रहना पड़ता है।

वेनेजुएला की तेल प्रधान देश होने जैसी विशेषता के अलावा इसका पर्यटनीय महत्व भी कम नहीं है। वेनेजुएला को "लैंड ऑफ ग्रेस" कहा जाता है। यहाँ एंडीज पर्वत, अमेज़न वर्षावन, विशाल घास के मैदान (Llanos) और कैरेबियन तट रेखा का अनूठा संगम मिलता है। दुनिया का सबसे ऊँचा निर्बाध जलप्रपात 'एंजेल फॉल्स' स्थित है, जिसकी ऊँचाई लगभग 979 मीटर है। ​लेक मार्काइबो दक्षिण अमेरिका की सबसे बड़ी और दुनिया की सबसे पुरानी झीलों में से एक है, जिसके नीचे तेल के विशाल भंडार हैं। यहाँ मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय (Tropical) जलवायु रहती है, लेकिन ऊँचाई के साथ तापमान में बदलाव आता है। यद्यपि फिलहाल यहां की यात्राओं के लिए विशेष एडवाइजरी जारी की गई है तथापि वेनेजुएला के प्राकृतिक दृश्यों और जनजीवन ने पर्यटकों और घुमक्कड़ों को सदैव आकर्षित किया है।

ब्रजेश कानूनगो 


गाम्बिया : जहाँ पत्थरों से मतदान होता है

गाम्बिया : जहाँ पत्थरों से मतदान होता है

दुनिया के अधिकांश देशों में चुनाव या तो इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन से करवाए जाते हैं या फिर बेलेट पेपर याने मतपत्र द्वारा नागरिक अपने नेतृत्व या सरकार को चुनते रहे हैं। जिस दौर में हमारे यहां ईवीएम को लेकर कई सवाल खड़े होते रहे हैं और चुनावों में कागजी मतपत्रों के उपयोग की ओर लौटने की आवाजें सुनाई दे रहीं हैं उसी समय एक गणराज्य ऐसा भी है जहाँ अब तक पत्थरों द्वारा अपने नेतृत्व और सरकार को चुना जाता रहा है। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं अफ्रीका के गाम्बिया देश की ।

गांबिया (The Gambia) पश्चिम अफ्रीका में स्थित एक छोटा लेकिन सांस्कृतिक रूप से समृद्ध देश है।  इसके दोस्ताना लोगों और भौगोलिक बनावट के कारण  इसे "The Smiling Coast of Africa" कहा जाता है।  गांबिया एक बहुदलीय लोकतांत्रिक गणराज्य (Democratic Republic) है। यहाँ राष्ट्रपति शासन प्रणाली है, जहाँ राष्ट्रपति ही राष्ट्र और सरकार दोनों का प्रमुख होता है। बांजुल (Banjul) यहाँ की राजधानी है, जबकि सेरीकुंडा (Serrekunda) सबसे बड़ा शहर और आर्थिक केंद्र है। गाम्बिया 18 फरवरी 1965 को ब्रिटेन से स्वतंत्र हुआ था। 2017 में लंबे समय तक रहे तानाशाह याह्या जाम्मेह के शासन के अंत के बाद यहाँ लोकतंत्र मज़बूत हुआ है।

गांबिया (The Gambia) दुनिया का संभवतः इकलौता ऐसा देश है जहाँ चुनावों में कागजी मतपत्रों (ballots) के बजाय पत्थरों या कंचों (marbles) का उपयोग किया जाता है। यह व्यवस्था काफी अनोखी है और इसके पीछे कुछ दिलचस्प कारण हैं।  हर पोलिंग बूथ पर उम्मीदवारों के नाम और फोटो वाले अलग-अलग रंग के लोहे के ड्रम (Ballot Boxes) रखे होते हैं। मतदाता को मतपत्र की जगह एक पारदर्शी कांच का कंचा या पत्थर जैसा गोला दिया जाता है। वह अपनी पसंद के उम्मीदवार के ड्रम में उसे डाल देता है। ड्रम के अंदर एक धातु की नली लगी होती है। जब कंचा उसमें गिरता है, तो साइकिल की घंटी जैसी आवाज आती है। इससे चुनाव अधिकारियों को पता चल जाता है कि मतदाता ने वोट डाल दिया है और यह भी सुनिश्चित होता है कि किसी ने एक बार में एक से ज्यादा कंचे तो नहीं डाले।

​दरअसल जब यह सिस्टम 1960 के दशक में शुरू किया गया था, तब गांबिया में साक्षरता दर बहुत कम थी। कंचों और रंगों वाले ड्रमों की मदद से उन लोगों के लिए भी वोट देना आसान हो गया जो पढ़-लिख नहीं सकते थे। ​इस प्रक्रिया में धोखाधड़ी की संभावना कम हो जाती है, ड्रमों को सील कर दिया जाता है और कंचों को गिनना काफी पारदर्शी प्रक्रिया मानी जाती है।

​इसके अलावा यह भी माना गया है कि कागजी मतपत्रों की छपाई और उन्हें सुरक्षित रखने के मुकाबले यह व्यवस्था काफी सस्ती पड़ती है क्योंकि ड्रम और कंचों का दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। यह प्रक्रिया पर्यावरण अनुकूल है क्योंकि मार्बल और ड्रम को कई बार इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे कागज की भी बचत होती है।

​हाल के वर्षों में गांबिया में इस सिस्टम को बदलने और आधुनिक पेपर बैलेट लाने पर चर्चा हुई है, क्योंकि उम्मीदवारों की संख्या बढ़ने पर इतने सारे ड्रम रखना मुश्किल हो जाता है। हालांकि, 2021 के राष्ट्रपति चुनाव में भी इसी 'कंचा पद्धति' का इस्तेमाल किया गया था क्योंकि जनता इस पर बहुत भरोसा करती है। अब गांबिया ने 2026 के राष्ट्रपति चुनाव से पेपर बैलेट सिस्टम अपनाने का फैसला किया है, क्योंकि मार्बल सिस्टम अब संभवतः लंबे समय तक नहीं चलाया जा सकता। 

​इस लोकतांत्रिक देश की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से तीन स्तंभों पर टिकी है कृषि,पुनर्नियात व्यापार और पर्यटन। लगभग 75% आबादी कृषि पर निर्भर है। मूंगफली (Peanuts) यहाँ की मुख्य नकदी फसल है और निर्यात का बड़ा हिस्सा है। समुद्र तट पर स्थित होने के कारण यह पड़ोसी देशों के लिए एक व्यापारिक केंद्र के रूप में कार्य करता है।अपने खूबसूरत समुद्र तटों (Beaches) और पक्षी दर्शन (Bird watching) के लिए प्रसिद्ध होने के कारण यहाँ पर्यटन विदेशी मुद्रा का बड़ा स्रोत है।

गांबिया अपनी सुंदर तटरेखाओं और उभरती अर्थव्यवस्था के कारण पर्यटकों और निवेशकों दोनों के लिए आकर्षण का केंद्र बनता जा रहा है। कोलोली और कोटू जैसे प्रमुख बीच (Kololi & Kotu Beach) गांबिया के सबसे प्रसिद्ध समुद्र तट हैं। यहाँ की सफेद रेत और ताड़ के पेड़ पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। यहाँ कई लग्जरी रिसॉर्ट्स और स्थानीय हस्तशिल्प बाज़ार हैं। यहां का ​कुंटा किन्ते द्वीप (Kunta Kinteh Island) एक UNESCO विश्व धरोहर स्थल है। यह प्रसिद्ध उपन्यास और टीवी सीरीज़ 'रूट्स' (Roots) से जुड़ा है और दास व्यापार के इतिहास की मार्मिक झलक पेश करता है। ​अबूको नेचर रिजर्व (Abuko Nature Reserve) पार्क वन्यजीव प्रेमियों और पक्षी विशेषज्ञों (Bird watchers) के लिए स्वर्ग के समान है। यहाँ बंदरों, मगरमच्छों और सैकड़ों प्रजातियों के पक्षियों को देखा जा सकता है। ​काचिकाली क्रोकोडाइल पूल (Kachikally Crocodile Pool) बाकाऊ में स्थित है और यह एक पवित्र स्थान माना जाता है, जहाँ आप पालतू मगरमच्छों को छू सकते हैं और उनके साथ फोटो खिंचवा सकते हैं। ​वासु स्टोन सर्कल्स (Wassu Stone Circles) एक और UNESCO धरोहर स्थल है, जो रहस्यमयी प्राचीन पत्थर के घेरों के लिए जाना जाता है। इन्हें अफ्रीका के 'स्टोनहेंज' के रूप में देखा जाता है। इसके अलावा राजधानी बांजुल का अल्बर्ट मुख्य बाज़ार जहाँ आप अफ्रीकी संस्कृति, कपड़े, मसालों और शोर-शराबे वाली स्थानीय जिंदगी का अनुभव कर सकते हैं।

मुस्लिम बहुल (90%) 24 लाख आबादी वाले इस देश की आधिकारिक भाषा अंग्रेजी है, लेकिन स्थानीय स्तर पर मंडिंका (Mandinka), वोलोफ (Wolof) और फुला (Fula) जैसी भाषाएँ प्रमुखता से बोली जाती हैं। बड़े संयुक्त परिवारों (Compounds) में रहने वाले यहां के लोग मिलनसार और मेहमाननवाज होते हैं।

वर्तमान में ऊर्जा, कृषि, प्रसंस्करण,डिजिटलाइजेशन, फिशरीज और किफायती आवास और व्यावसायिक भवनों के निर्माण के क्षेत्रों में आगे बढ़ते हुए

गांबिया अपनी 'उदार बाजार व्यवस्था' और 'वेस्ट अफ्रीकी बाज़ार' (ECOWAS) के प्रवेश द्वार के रूप में निवेशकों को आकर्षित कर रहा है। पर्यटन (Tourism) के क्षेत्र में  यहाँ इको-टूरिज्म, बुटीक होटल और क्रूज़ सेवाओं में निवेश की बहुत संभावना है। सरकार पर्यटन के बुनियादी ढांचे को आधुनिक बनाने पर ध्यान दे रही है।


ब्रजेश कानूनगो







 

Saturday, 31 January 2026

घाना के बाजार : महिला ही नहीं बाजार सशक्तिकरण की मिसाल

घाना के बाजार : महिला ही नहीं बाजार सशक्तिकरण की मिसाल

विश्वभर में कई समुदायों में मातृसत्तात्मक (Matriarchal) व्यवस्था प्रचलित है, जहाँ वंश, संपत्ति और निर्णय लेने का अधिकार महिलाओं के पास होता है। प्रमुख रूप से जिनमें इंडोनेशिया के मिनांगकाबाऊ, चीन के मोसुओ जनजाति, और भारत के मेघालय की खासी जनजाति भी शामिल हैं। इन समाजों में महिलाएँ परिवार की मुखिया और उत्तराधिकारी होती हैं। 

जुटाई जानकारी के अनुसार मिनांगकाबाऊ समाज इंडोनेशिया में है जो  दुनिया का सबसे बड़ा मातृसत्तात्मक समाज माना जाता है, जहाँ संपत्ति महिलाओं द्वारा हस्तांतरित होती है। मोसुओ, चीन (यूनान और सिचुआन) के मोसुओ समाज  को "महिलाओं का साम्राज्य" कहा जाता है। यहाँ 'वॉकिंग मैरिज' (walking marriage) की परंपरा है। भारत के मेघालय की खासी और गारो  जनजातियों में वंशावली माँ के नाम से चलती है और सबसे छोटी बेटी (खतदुह) को संपत्ति विरासत में मिलती है। कोस्टा रिका की ब्रिब्री स्वदेशी जनजाति में महिलाएं भूमि की मालकिन होती हैं और कबीले के प्रमुख का पद महिलाओं के माध्यम से चलता है। नासो समुदाय जो पनामा और कोस्टा रिका में है वह भी खुद को मातृसत्तात्मक बताता है। घाना (अफ्रीका) का आसानते भी एक प्रमुख मातृवंशीय समूह है। घाना गणराज्य पश्चिम अफ्रीका में स्थित एक देश है, जो पूर्व में टोगो, पश्चिम में कोटे डी आइवर, उत्तर में बुरकिना फासो, और दक्षिण में गिनी की खाड़ी से घिरा हुआ है। घाना की राजधानी अकरा है, और यह देश की सबसे बड़ा शहर भी है।

पिछले दिनों हमने यूट्यूब पर एक ट्रैवलर के वीडियो में घाना के एक ऐसे बाजार को नजदीक से देखा जहां बाजार की सारी बागडोर महिलाओं के हाथ में थी। जिन्हें वहां मार्केट क्वीन कहा जाता है।  मातृसत्तात्मक समाजों की प्रमुख विशेषता यह होती है कि विवाह के बाद पति पत्नी के घर जाकर रहता है (matrilocal) और बच्चों का वंश माँ के परिवार से पहचाना जाता है। लेकिन घाना के मातृसत्तात्मक बाजार की मार्केट क्वीन का इनसे बड़ा महत्वपूर्ण अंतर है। मातृसत्तात्मक समाजों में, महिलाएं परिवार और समुदाय के निर्णयों में भूमिका निभाती हैं और संपत्ति की उत्तराधिकारिता भी महिलाओं के माध्यम से होती है। उदाहरण के लिए, भारत की खासी जनजाति और घाना के अकरन समुदाय में महिलाएं परिवार और समुदाय के निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। जबकि घाना की मार्केट क्वीन महिलाएं  ' बाजार ' में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, यह उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति को दर्शाता है, न कि मातृसत्तात्मक समाज की विशेषता। ये महिलाएं बाजार में अपनी शक्ति और प्रभाव का उपयोग करती हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं है कि वे परिवार और समुदाय के निर्णयों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएं।

घाना में 'मार्केट क्वींस' (Market Queens) उन वरिष्ठ और प्रभावशाली महिला व्यापारियों को कहा जाता है, जो बाजारों में विभिन्न कमोडिटी समूहों (जैसे टमाटर, मक्का, या याम) का नेतृत्व करती हैं। इन्हें स्थानीय भाषा में 'ओहेम्मा' (ohemma) भी कहा जाता है। 

वे बहुत कुशलता से बाज़ार के विशिष्ट अनुभागों का प्रबंधन करती हैं और व्यापारियों के बीच विवादों को सुलझाती हैं। बाज़ार में आपूर्ति और कीमतों को नियंत्रित करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसके साथ ग्रामीण उत्पादकों (किसानों) को शहरी बाज़ारों से जोड़ने के उपाय करती हैं, जिससे खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होती है। ये महिलाएं अक्सर एक अनौपचारिक बैंकिंग प्रणाली के रूप में काम करती हैं, जो छोटे व्यापारियों को ऋण और सहायता प्रदान करती हैं। इस तरह ये महिलाएँ घाना के अनौपचारिक (informal) आर्थिक क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं और पारंपरिक रूप से व्यापार को सुचारू रूप से चलाने की जिम्मेदारी निभाती हैं। स्थानीय प्रशासन और नगर पालिका के साथ बातचीत कर बाजार की सुविधाओं (साफ-सफाई, टैक्स आदि) का प्रबंधन करती हैं।

घाना की अर्थव्यवस्था और वहां के बाजारों की संरचना दुनिया के सबसे दिलचस्प उदाहरणों में से एक है। यहाँ महिलाओं का वर्चस्व है, यहां तक कि बाजार में सिर पर माल ढोने वाली श्रमिक महिलाएं भी बाजार में अपना पसीना बहाते जुटी होती हैं। इन्हें स्थानीय स्तर पर 'कायायेई' (Kayayei) कहा जाता है। 'काया' का अर्थ है 'सामान' और 'येई' का अर्थ है 'महिलाएं'। ये ज्यादातर उत्तरी घाना के गरीब इलाकों से बेहतर जीवन की तलाश में दक्षिण के बड़े शहरों (जैसे अकरा और कुमासी) में आती हैं। ये महिलाएं अपने सिर पर बड़े एल्यूमीनियम के परातों (Pans) में भारी सामान, अनाज की बोरियां और खरीदे गए कपड़े लेकर चलती हैं। इनका जीवन अत्यंत कठिन होता है। वे बहुत ही कम मजदूरी पर काम करती हैं और अक्सर बाजारों के पास खुले में या झोपड़ियों में रहती हैं।

​घाना की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था (Informal Economy) में इन महिलाओं का योगदान अतुलनीय है। मार्केट क्वींस घाना के व्यापार की रणनीतिकार हैं, तो कायायेई उस व्यवस्था की मांसपेशियां । इन दोनों के बिना घाना की रोजमर्रा की अर्थव्यवस्था का चलना लगभग असंभव है। घाना की सामाजिक और आर्थिक संरचना में वहां की मातृसत्तात्मक (Matriarchal/Matrilineal) व्यवस्था का बड़ा महत्व हो जाता है। यह व्यवस्था न केवल परिवारों को चलाती है, बल्कि वहां के विशाल बाजारों के स्वरूप को भी निर्धारित करती है।


घाना की सरकार और विभिन्न गैर-सरकारी संगठन इन महिलाओं, विशेषकर 'कायायेई' (Kayayei) की स्थिति सुधारने के लिए कई मोर्चों पर काम कर रहे हैं। चूंकि मार्केट क्वींस पहले से ही प्रभावशाली और आर्थिक रूप से मजबूत हैं, इसलिए सरकारी प्रयासों का मुख्य केंद्र बोझ ढोने वाली श्रमिक महिलाएं ही होती हैं।

कौशल विकास और प्रशिक्षण (Kayayei Empowerment Programme) ​के अंतर्गत  इन महिलाओं को केवल शारीरिक श्रम पर निर्भर रहने से बचाने के लिए 'कायायेई एम्पावरमेंट प्रोग्राम' शुरू किया है। ​इसमें उन्हें सिलाई, साबुन बनाना, बेकिंग और कंप्यूटर जैसे तकनीकी कौशल सिखाए जाते हैं। ​ताकि वे बाजारों से निकलकर सम्मानजनक और कम जोखिम वाले व्यवसायों में जा सकें। ​कायायेई अक्सर खुले आसमान के नीचे या असुरक्षित बस्तियों में सोती हैं। इसे देखते हुए सरकार ने अकरा और कुमासी जैसे बड़े शहरों में इनके लिए विशेष हॉस्टल का निर्माण शुरू किया है। यहाँ उन्हें सुरक्षित रहने की जगह, पानी और स्वच्छता की सुविधाएं प्रदान की जाती हैं। सरकार इन महिलाओं का 'नेशनल हेल्थ इंश्योरेंस स्कीम' (NHIS) में मुफ्त या रियायती दरों पर पंजीकरण कराती है ताकि बीमारी की स्थिति में उनका इलाज हो सके। अनौपचारिक क्षेत्र से जुड़ी इन महिलाओं को मुख्यधारा की बैंकिंग से जोड़ने के लिए मोबाइल मनी और छोटे बचत खाते खोलने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। ​2017 में घाना सरकार ने एक बड़ा कदम उठाते हुए कायायेई पर लगने वाले 'मार्केट टोल' (प्रतिदिन का कर) को खत्म कर दिया था। इससे उनकी दैनिक आय में थोड़ी बढ़ोतरी हुई, क्योंकि पहले उन्हें अपनी मामूली कमाई का एक हिस्सा नगर पालिका को देना पड़ता था। ​बाजारों में काम करने वाली महिलाओं के बच्चों के लिए 'डे-केयर सेंटर' और स्कूलों में नामांकन की सुविधाएं दी जा रही हैं, ताकि उनकी अगली पीढ़ी को इस कठिन श्रम चक्र से बाहर निकाला जा सके। घाना में अब कई महिलाएं 'मार्केट क्वींस' के नेतृत्व में डिजिटल साक्षरता भी सीख रही हैं ताकि वे व्हाट्सएप और अन्य ऐप्स के जरिए अपने माल का ऑर्डर ले सकें।

घाना के प्रसिद्ध बाजारों (जैसे कि अकरा का मकोला मार्केट) में महिलाओं का वर्चस्व इतना अधिक है कि इसे अक्सर 'मातृसत्तात्मक' आर्थिक व्यवस्था के रूप में देखा जाता है। वहां "मार्केट क्वींस" (Ohemmaa) न केवल व्यापार बल्कि सामाजिक नियमों को भी नियंत्रित करती हैं। ऐसे में पुरुषों की भूमिका पूरी तरह से खत्म नहीं होती, बल्कि वह मुख्य रूप से लॉजिस्टिक्स, भारी श्रम और थोक आपूर्ति तक सीमित होती है। घाना के बाजार में एक अनकहा नियम है: "महिलाएं व्यापार का चेहरा हैं, और पुरुष उसकी मांसपेशियों (शक्ति) का काम करते हैं।" वहां पैसा और बाजार की राजनीति महिलाओं के हाथ में होती है, जबकि पुरुष उन सेवाओं को प्रदान करते हैं जिनके बिना बाजार चल नहीं सकता।

घाना में बाजार केवल व्यापार का केंद्र नहीं, बल्कि महिला सशक्तिकरण की एक जीवित प्रयोगशाला है, जहाँ मातृसत्तात्मक मूल्यों ने महिलाओं को 'शक्ति' (Power) और 'पूंजी' (Capital) दोनों दी हैं।

ब्रजेश कानूनगो 

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Saturday, 24 January 2026

निर्विवाद है द्वीप समूहों की प्राकृतिक सुंदरता !

निर्विवाद है द्वीप समूहों की प्राकृतिक सुंदरता !

पर्यटन (Tourism) के लिए विश्व के अनेक द्वीप समूह न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध हैं, बल्कि वे विशिष्ट सांस्कृतिक और भौगोलिक पहचान भी रखते हैं। कई बार बहुत से द्वीप विवादों के चलते खबरों की सुर्खियों में आकर हमारा ध्यान खींच लेते हैं।  मॉरीशस और ब्रिटेन के बीच विवाद  के कारण हिन्द महासागर में स्थित चागोस द्वीप समूह भी फिलहाल चर्चा में बना हुआ है। 

विश्व में ऐसे ही कई द्वीप सामरिक, आर्थिक (तेल/गैस) और संप्रभुता के कारणों से प्रमुख विवादित क्षेत्र बने हुए हैं। प्रमुख विवादित द्वीपों में से कुछ प्रमुख हैं, स्प्रैटली और पैरासेल द्वीप समूह (दक्षिण चीन सागर)  पर चीन, वियतनाम, फिलीपींस, मलेशिया, ब्रुनेई और ताइवान अपना दावा करते हैं। यह क्षेत्र प्राकृतिक तेल, गैस और समुद्री मार्गों के लिए विवादित हैं।सेनकाकू/डियाओयू द्वीप (पूर्व चीन सागर) चीन और जापान के बीच विवादित हैं।  ये निर्जन द्वीप सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।कुरील द्वीप समूह (रूस-जापान) रूस के कब्जे वाले इन द्वीपों पर जापान अपना दावा करता है। यह विवाद द्वितीय विश्व युद्ध के समय से चल रहा है। फॉकलैंड द्वीप (दक्षिण अटलांटिक महासागर) इस द्वीप के स्वामित्व को लेकर ब्रिटेन और अर्जेंटीना के बीच 1982 में युद्ध भी हो चुका है, जो अब भी विवाद का विषय है।कच्चातिवू द्वीप (पाक जलडमरूमध्य) भारत और श्रीलंका के बीच का यह छोटा द्वीप, जो अब श्रीलंका के अंतर्गत है, मछुआरों के अधिकारों को लेकर अक्सर चर्चा में रहता है।

वर्तमान में चर्चित चाग़ोस द्वीपसमूह (Chagos Archipelago) हिंद महासागर के बीचों-बीच स्थित रणनीतिक रूप से एक अत्यंत महत्वपूर्ण द्वीप समूह है जो यह पिछले कई दशकों से ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच एक गंभीर राजनयिक विवाद का केंद्र रहा है। दरअसल,​औपनिवेशिक काल में 18वीं शताब्दी में चाग़ोस फ्रांस के अधीन था और मॉरीशस का हिस्सा माना जाता था। 1814 में पेरिस की संधि के बाद इसे ब्रिटेन को सौंप दिया गया। ​विवाद की शुरुआत मॉरीशस की आजादी (1968) से ठीक पहले, 1965 में ब्रिटेन ने चाग़ोस को मॉरीशस से अलग कर दिया और इसे 'ब्रिटिश हिंद महासागर क्षेत्र' (BIOT) घोषित कर दिया। ​1967 से 1973 के बीच, ब्रिटेन ने अमेरिका को डिएगो गार्सिया पर सैन्य अड्डा बनाने की अनुमति देने के लिए वहाँ के मूल निवासियों (चाग़ोसियनों) को जबरन बाहर निकाल दिया गया।  उन्हें मॉरीशस और सेशेल्स भेज दिया गया, जहाँ उन्होंने दशकों तक संघर्षपूर्ण जीवन बिताया। ​

बाद में2019 मेंअंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने अपने परामर्श में कहा कि ब्रिटेन ने अवैध रूप से चाग़ोस पर कब्जा किया हुआ है और उसे जल्द से जल्द इन द्वीपों को मॉरीशस को सौंप देना चाहिए। इसके बाद अक्टूबर 2024 में  हुए​ऐतिहासिक समझौते के तहत हाल ही में ब्रिटेन ने आधिकारिक तौर पर चाग़ोस द्वीपसमूह की संप्रभुता मॉरीशस को सौंपने का निर्णय लिया। जिसमें ​डिएगो गार्सिया की लीज के तहत मॉरीशस को संप्रभुता मिलने के बावजूद डिएगो गार्सिया द्वीप पर स्थित सैन्य अड्डा अगले 99 वर्षों तक ब्रिटेन और अमेरिका के पास रहेगा।इसके बदले में ब्रिटेन मॉरीशस को वार्षिक वित्तीय सहायता प्रदान करेगा।​जनवरी 2026 में ताज़ा खबरों के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते की आलोचना की है और इसे "कमजोरी" बताया है। इस दबाव के चलते ब्रिटेन की वर्तमान सरकार ने इस समझौते से जुड़े बिल को फिलहाल अपनी संसद के एजेंडे से हटा लिया है, जिससे यह विवाद फिर से अनिश्चितता में घिर गया है। विवाद अपनी जगह बनते बिगड़ते रहेंगे किंतु  इन द्वीप समूहों के बारे में हम लोगों को जानना बहुत रोचक है।

चाग़ोस द्वीपसमूह मालदीव से लगभग 500 किमी दक्षिण में और मॉरीशस से करीब 2,200 किमी उत्तर-पूर्व में स्थित है। इसमें 58 छोटे प्रवाल द्वीप (atolls) शामिल हैं। ​डिएगो गार्सिया (Diego Garcia)  इस समूह का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण द्वीप है। यह रणनीतिक रूप से इतना महत्वपूर्ण है कि यहाँ से अमेरिका और ब्रिटेन हिंद महासागर, मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया में अपनी सैन्य गतिविधियों को नियंत्रित करते हैं। यह क्षेत्र अपनी जैव विविधता, दुर्लभ समुद्री जीवों और कोरल रीफ (मूंगा चट्टानों) के लिए जाना जाता है।

पर्यटकों और घुमक्कड़ों के लिए खूबसूरत और प्राकृतिक सौंदर्य से भरे इन द्वीप समूहों की सैर अपनी आकांक्षाओं की प्राथमिकता में रहती हैं।खासतौर से ​इंडोनेशिया  बाली, सुमात्रा और अन्य  द्वीपों के साथ (Bali & others) दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप समूह वाला देश है। इसमें लगभग 17,000 से अधिक द्वीप हैं। बाली यहाँ का सबसे प्रमुख पर्यटन केंद्र है।

​कैरिबियन द्वीप समूह (West Indies) के  क्यूबा, जमैका, बहामास जैसे कई देश शामिल हैं। यह अपने नीले पानी और क्रूज पर्यटन के लिए विश्व भर में विख्यात है। प्रशांत महासागर में स्थित जापानी द्वीप समूह  मुख्य रूप से चार बड़े द्वीपों (होन्शु, होक्काइडो, क्यूशू, शिकोकू) से बना है, जो अपनी तकनीक और संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है। इसके साथ साथ हिन्द महासागर में स्थित मालदीव अपने स्वच्छ पारदर्शी जल और ओवर वाटर विला के लिए प्रसिद्ध है।  प्रशांत महासागर में स्थित हवाई द्वीप ज्वाला मुखी पर्वतों

सर्फिंग और प्राकृतिक विविधता के लिए मशहूर है। अपने कोरल रीफ (मूंगा चट्टान) और शांत समुद्री तटों के लिए अरब सागर में स्थित लक्ष्य द्वीप और बंगाल की खाड़ी में स्थित भारत का अंडमान निकोबार द्वीप समूह बहुत लोकप्रिय है।

इक्वाडोर का कैनरी द्वीप (Canary Islands) अद्वितीय वन्यजीवों और चार्ल्स डार्विन के शोध के लिए प्रसिद्ध है। स्पेन साल भर खुशनुमा मौसम और रेतीले टीलों के लिए लोकप्रिय है।

सीशेल्स (Seychelles) अफ्रीका के पास स्थित है जो अपने ग्रेनाइट चट्टानों वाले बीच के लिए मशहूर है। फ्रेंच पोलिनेशिया (फ्रांस) में बोरा-बोरा जैसे अति सुंदर हनीमून डेस्टिनेशन यहाँ स्थित हैं।

इन खूबसूरत द्वीप समूहों पर लाखों पर्यटक अपने सामर्थ्य और शक्ति के अनुसार प्रति वर्ष पहुंचकर आनंदित होते रहते हैं। यूट्यूब पर पर्यटकों और घुमक्कड़ों के ट्रेवल वीडियो भी घर बैठे यहां की आभासी यात्रा का सुख कुछ हद तक तो दे ही जाते हैं। 


ब्रजेश कानूनगो


Thursday, 22 January 2026

ग्रीनलैंड : प्रकृति के सौंदर्य कि मनोहारी खिड़की

ग्रीनलैंड : प्रकृति के सौंदर्य कि मनोहारी खिड़की

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ग्रीनलैंड को प्राप्त करने की इच्छा के कारण हाल ही में ग्रीनलैंड ने विश्व का ध्यान अपनी ओर खींचा है।   ग्रीनलैंड में बड़ी मात्रा में खनिज, तेल और  प्राकृतिक संसाधन हैं, जो इसके महत्व को बड़ा देते हैं। ग्रीनलैंड अपनी आंतरिक सरकार और संसद के साथ एक स्वायत्त राज्य है। ग्रीनलैंड की अपनी सरकार और संसद स्थानीय मामलों का प्रबंधन करती है, जबकि डेनमार्क सरकार ग्रीनलैंड के विदेशी मामलों, रक्षा, और नागरिकता जैसे क्षेत्रों के लिए जिम्मेदार होती है।

ग्रीनलैंड  महाद्वीप नहीं है किंतु दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है।  ग्रीनलैंड का क्षेत्रफल लगभग 2,166,086 वर्ग किलोमीटर है, जबकि भारत का क्षेत्रफल लगभग 3,166,414 वर्ग किलोमीटर है। इस प्रकार, ग्रीनलैंड भारत से लगभग 1.5 गुना छोटा है। छोटा होने के बावजूद मर्केटर प्रोजेक्शन के कारण जिसमें जो देश भूमध्य रेखा से जितना दूर होता है, मानचित्र में वह उतना बड़ा दिखाई देता है, ग्रीनलैंड भारत की तुलना में भूमध्य रेखा से अधिक दूर है इसलिए वह विश्व मानचित्र में भारत से बड़ा दिखाई देता है।

यह दुनिया का सबसे विरल जनसंख्या वाला देश है, जिसकी आबादी लगभग 56,500 है, जिनमें से 88% ग्रीनलैंडिक इनुइट है। ग्रीनलैंड आर्कटिक महासागर में स्थित है, जो उत्तर में आर्कटिक महासागर, पूर्व में ग्रीनलैंड सागर, दक्षिण-पूर्व में उत्तरी अटलांटिक महासागर, दक्षिण-पश्चिम में डेविस स्ट्रेट, पश्चिम में बाफिन बे, और उत्तर-पश्चिम में नारेस स्ट्रेट और लिन्कन सागर से घिरा हुआ है।

ग्रीनलैंड की संस्कृति में इनुइट परंपराओं और स्कैंडिनेवियन प्रभावों का मिश्रण है। यहां के लोग मुख्य रूप से ग्रीनलैंडिक इनुइट हैं, जो अपनी भाषा, कला, और परंपराओं को संरक्षित रखते हैं। यहां की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से मछली पकड़ने और खनन पर आधारित है। मछली प्रसंस्करण, खनन के अलावा पर्यटन भी ग्रीनलैंड की अर्थव्यवस्था का आधार बना है। एक ट्रेवल ब्लॉगर नवांकुर चौधरी जो यात्री डॉक्टर के नाम से यूट्यूब चैनल चलाते हैं उनके वीडियोस के जरिए हमने ग्रीनलैंड की आभासी सैर की और बहुत सी जानकारियां भी जुटाईं।

ग्रीनलैंड में पर्यटन एक बढ़ता हुआ उद्योग है, जो मुख्य रूप से गर्मियों के मौसम में चलता है। यहां के मुख्य पर्यटन स्थलों में नुुक, इलुलिस्साट, और कांगेरलुसुआक शामिल हैं। पर्यटक यहां के प्राकृतिक सौंदर्य, इनुइट संस्कृति और अद्वितीय अनुभवों का आनंद लेते हैं।

आर्कटिक क्षेत्र में स्थित होने के कारण ग्रीनलैंड का मौसम बहुत ठंडा और शुष्क है। ग्रीनलैंड में मौसम के चार चरण होते हैं, शीतकाल जो दिसंबर से फरवरी तक रहता है और सबसे ठंडा होता है, जब तापमान -50°C से -60°C तक गिर जाता है। मार्च से मई तक वसंत में मौसम गर्म होने लगता है, जब तापमान 0°C से 10°C तक रहता है। जून से अगस्त तक के  ग्रीष्मकाल में मौसम गर्म हो जाता है  जब तापमान 10°C से 20°C तक रहता है। हमारे देश की तुलना में तो वह बहुत ही कम है। शरद काल जो सितंबर से नवंबर तक माना गया है तब मौसम ठंडा होने लगता है और तापमान 0°C से -10°C तक पहुंचने लगता है।

ग्रीनलैंड में दिन और रात की अवधि मौसम के अनुसार बदलती रहती है। गर्मियों में, जब सूर्य उत्तर ध्रुव के ऊपर रहता है, तो यहां 24 घंटे दिन रहता है, जिसे "मिडनाइट सन" कहा जाता है। सर्दियों में, जब सूर्य दक्षिण ध्रुव के नीचे रहता है, तो यहां 24 घंटे रात रहती है, जिसे "पोलर नाइट" कहा जाता है। ट्रैवलर के वीडियो में हमने न समाप्त होने वाले एक पूरे दिन में वहां के खूबसूरत नजारों को देखा।

ग्रीनलैंड में कई रोमांचक पर्यटन गतिविधियाँ की जा सकती हैं।  इलुलिस्साट आइसफजॉर्ड  एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है, जहां के ग्लेशियर और आइसबर्ग  मन मोह लेते हैं। यहां के सुंदर प्राकृतिक दृश्य एक अलग ही स्वप्निल संसार में ले जाते हैं।  ग्रीनलैंड में डॉग स्लेडिंग एक लोकप्रिय गतिविधि है, जिसमें पर्यटक हुस्की के साथ बर्फ पर चल सकते हैं। ग्रीनलैंड के फजॉर्ड्स में कायाकिंग करना एक अनोखा अनुभव है। ग्रीनलैंड में कई हाइकिंग ट्रेल्स हैं, जिनमें प्रकृति का आनंद उठाते पर्यटकों देखा जा सकता है। यहां आकाश में नॉर्दर्न लाइट्स देखना भी एक रोमांचक अनुभव होता है।

इस देश में यातायात व्यवस्था मुख्य रूप से हवाई और जल परिवहन पर आधारित है।  ग्रीनलैंड में 25 हवाई अड्डे हैं, जिनमें से अधिकांश छोटे हैं। तटीय क्षेत्रों  के लिए फेरी सेवाएं उपलब्ध रहतीं हैं। में चलती है। छोटे गांवों तक पहुंचने के लिए  हेलीकॉप्टर का उपयोग किया जाता है। कुछ खास जगहों पर डॉग स्लेड और स्नोमोबाइल भी यातायात के साधन होते हैं।

ग्रीनलैंड में प्राकृतिक संसाधनों की बहुतायत है, जिनमें रेअर अर्थ एलिमेंट्स, यूरेनियम, सोना, और तेल शामिल हैं। इसके अलावा, ग्रीनलैंड का स्थान अमेरिका और यूरोप के बीच एक महत्वपूर्ण मार्ग है,जो व्यापार और सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि अमेरिका ग्रीनलैंड को प्राप्त करना चाहता है क्योंकि यह एक रणनीतिक स्थान है जो आर्कटिक क्षेत्र में उसके हितों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। वर्तमान विवाद और संदर्भों से अलग हटकर ग्रीनलैंड की बात करें तो वह इस पृथ्वी के सौंदर्य की एक ऐसी अनोखी खिड़की है जहां से प्रकृति के सुंदर नजारे आम लोगों और पर्यटकों को आनंदित कर देते हैं।

ब्रजेश कानूनगो


Monday, 19 January 2026

बर्फ से ढका मनुष्य का जीवन संघर्ष

बर्फ से ढका मनुष्य का जीवन संघर्ष 


दुनिया भर में ग्लोबल वार्मिंग के कारण पर्यावरण संतुलन इस कदर गड़बड़ा गया है कि वर्ष 2026 की जनवरी के आधे बीतते बीतते रूस के कामचटका क्षेत्र में भीषण बर्फबारी ने पूरे इलाके को सफेद चादर में लपेट दिया। इससे जन-जीवन बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। लोगों के घर और वाहन बर्फबारी के नीचे दफन हो गए।बर्फ ने पूरे शहर को जकड़ लिया।  हालत यह हुई कि रिहायशी इमारतें 3 से 4 मंजिल तक बर्फ में दब गईं। सड़कों से लेकर घरों की छत तक हर तरफ सफेद चादर बिछ गई। सोशल मीडिया पर देखे वीडियो में हमने वहां के निवासियों को अस्तित्व के लिए संघर्ष करते देखा।
इसके पूर्व कई घुमक्कड़ों के अनेक ट्रैवल वीडियोस में विश्व के सबसे ठंडे और बर्फीले शहरों और गांवों में उन्हें घूमते और वहां के लोगों के जीवन की कठिनाइयों को भी उनकी प्रस्तुतियों से जानते समझते रहे हैं। 

विश्व के सबसे ठंडे आबाद शहरों पर नजर डालें तो पता चलता है कि मुख्य रूप से इनमें रूस के याकुत्स्क (Yakutsk) और साइबेरिया का ओयम्याकोन (Oymyakon) शामिल हैं, जहाँ तापमान अक्सर -40°C से -60°C तक गिर जाता है, जबकि कनाडा का येलोनाइफ (Yellowknife) और कज़ाकिस्तान का अस्ताना (Astana) भी सबसे ठंडे आबाद स्थानों में गिने जाते हैं, जहाँ लोगों को अत्यधिक ठंड का सामना करना पड़ता है. 
रूस का याकुत्स्क (Yakutsk) दुनिया का सबसे ठंडा बड़ा शहर माना जाता है, जहाँ लाखों लोग रहते हैं और सर्दियों में तापमान -50°C से नीचे चला जाता है। रूस का ही ओयम्याकोन (Oymyakon) दुनिया का सबसे ठंडा स्थायी रूप से बसा हुआ स्थान है, जहाँ का तापमान अक्सर -50°C से -60°C तक पहुँच जाता है और कई बार -70°C तक गिरता है। कनाडा का येलोनाइफ (Yellowknife) दुनिया के उत्तरी हिस्सों में स्थित एक बड़ा शहर है, जहाँ सर्दियों में सूरज की रोशनी बहुत कम पहुँचती है और कड़ाके की ठंड पड़ती है। इसी तरह कजाकिस्तान का अस्ताना (Astana) समुद्र से दूर स्थित है और यहाँ का तापमान कभी-कभी -51.5°C तक गिर जाता है, जिससे यह दुनिया के सबसे ठंडे स्थानों में से एक बन जाता है। यूएसए का अलास्का में उत्कियाग्विक (Utqiagvik) सबसे उत्तरी शहर है जो आर्कटिक सर्कल के ऊपर स्थित है और अत्यधिक ठंड के लिए जाना जाता है। मंगोलिया की राजधानी उलानबटार शहर  (Ulaanbaatar) सबसे ठंडा राजधानी शहर है, जहाँ जनवरी में औसत तापमान -44°C तक गिर जाता है। 


रूस का सबसे ठंडा आबाद गांव वर्खोयांस्क है, जो साइबेरिया में स्थित है। यहां का तापमान शीतकाल में -50°C से -67°C तक गिर जाता है, जो इसे दुनिया के सबसे ठंडे आबाद शहरों में से एक बनाता है। वर्खोयांस्क की आबादी लगभग 1,200 लोगों की है, जो मुख्य रूप से याकूत और रूसी समुदायों से संबंधित हैं। हम एक ट्रैवल ब्लॉगर के वीडियो के जरिए ऐसे कई गांवों कस्बों के जीवन को आभासी रूप से देखने की कोशिश की है। वर्खोयांस्क के लोगों का जीवन बहुत कठिन है, क्योंकि यहां की जलवायु बहुत ठंडी और शुष्क है। यहां के लोग मुख्य रूप से शिकार, मछली पकड़ने और पशुपालन से अपना जीवन चलाते हैं। यहां के मुख्य पशु रेनडियर, हिरण और घोड़े हैं। पीने के पानी की व्यवस्था ठंडे शहरों के लोगों के लिए एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि यहां के जल स्रोत अक्सर जम जाते हैं। यहां के लोग बर्फ को पिघलाकर पानी बनाते हैं और इसे पीने के लिए उपयोग करते हैं। अन्य जरूरी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए, यहां के लोग स्थानीय बाजारों और सरकारी दुकानों पर निर्भर हैं, जहां से वे आवश्यक वस्तुएं खरीदते हैं।

हमने देखा कि रूस के ठंडे शहरों में पानी की पाइप लाइनों का रखरखाव एक बड़ी चुनौती है। यहां की अत्यधिक ठंड के कारण पाइप लाइनें अक्सर जम जाती हैं और टूट जाती हैं, जिससे पानी की आपूर्ति प्रभावित होती है। इस समस्या से निपटने के लिए, रूस में पानी की पाइप लाइनों को विशेष रूप से डिज़ाइन किया जाता है, जैसे कि उन्हें जमीन के नीचे गहराई में बिछाया जाता है या उन्हें गर्म रखने के लिए विशेष इन्सुलेशन का उपयोग किया जाता है। पाइपलाइनों को जमने से बचाने के लिए इन्सुलेटेड पाइपलाइनों का उपयोग किया जाता है।कुछ शहरों में, हॉट वॉटर सर्कुलेशन सिस्टम का उपयोग किया जाता है, जिसमें गर्म पानी को पाइपलाइनों में सर्कुलेट किया जाता है ताकि वे जम न जाएं। कुछ शहरों में, बर्फ पिघलाने वाले सिस्टम का उपयोग किया जाता है, जिसमें बर्फ को पिघलाकर पानी बनाया जाता है। कई जगहअंडरग्राउंड वॉटर टैंक का उपयोग किया जाता है, जो पानी को जमने से बचाते हैं।

वर्खोयांस्क जैसे ठंडे शहरों में, लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था बहुत महत्वपूर्ण है। यहां के लोग मुख्य रूप से मांसाहारी भोजन करते हैं, जैसे कि कच्चा मांस, घोड़े का लीवर, रेनडियर, खरगोश और मछली। यहां के लोग स्ट्रोगनिना नामक एक विशेष व्यंजन भी खाते हैं, जिसमें मछली को जमाकर पतले टुकड़ों में काटा जाता है और उसे कच्चा ही खाया जाता है। कपड़ों की बात करें, तो यहां के लोग गर्म और मोटे कपड़े पहनते हैं, खासतौर से रेनडियर और खरगोश की खाल से बने कोट और बूट। कई परतों में कपड़े पहन कर वे अपने शरीर को गर्म बनाए रखने का प्रयास करते हैं। यहां के लोग वेलेंकी नामक एक विशेष प्रकार के जूते पहनते हैं, जो फील्ट से बने होते हैं और पैरों को गर्म रखते हैं। यहां के लोग गैलोशी नामक एक विशेष प्रकार के रबर के जूते भी पहनते हैं जो वेलेंकी के ऊपर पहने जाते हैं।

बर्फ और ठंड का आनंद लेने के लिए जहां हम हिमालयीन क्षेत्र के शहरों के पर्यटन के लिए निकलते हैं, वहीं विश्व के अनेक ऐसे ठंडे शहरों में आफत की बारिश होती है, बर्फीले मौसम और जमें हुए शहरों में अपने जीवन के लिए लोग भारी कष्टों के बीच संघर्ष को विवश होते हैं। 

ब्रजेश कानूनगो 


 


 

Tuesday, 13 January 2026

जैव विविधता के संरक्षण की चिंताओं के प्रतीक शुभंकर

जैव विविधता के संरक्षण की चिंताओं के प्रतीक शुभंकर

शुभंकर को अंग्रेजी में Mascot (मैस्कॉट) कहते हैं, जिसका मतलब है, ऐसा एक प्रतीक चिन्ह जिसमे कोई जानवर या कोई व्यक्ति चित्रित या प्रदर्शित होता है जो किसी संगठन, टीम या इवेंट के लिए सौभाग्य या पहचान माना जाता है और उनका प्रतिनिधित्व करता है।

खेल आयोजनों में शुभंकर रखने की परंपरा 1968 में ग्रेनोबल, फ्रांस में आयोजित शीतकालीन ओलंपिक से शुरू हुई, जब शुस नामक एक छोटा सा स्कीयर शुभंकर बनाया गया था। इसके बाद, 1972 में म्यूनिख में आयोजित ओलंपिक में वाल्डी नामक एक डैचशंड को शुभंकर बनाया गया, जो ओलंपिक के पहले आधिकारिक शुभंकर थे। स्कीयर शुभंकर शुस एक छोटा सा स्कीयर था, जो एक मानव जैसा प्राणी था, न कि कोई जानवर। यह 1968 में ग्रेनोबल, फ्रांस में आयोजित शीतकालीन ओलंपिक के लिए बनाया गया था। जबकि वाल्डी एक डैचशंड था, जो एक प्रकार का कुत्ता है। यह 1972 में म्यूनिख में आयोजित ओलंपिक के लिए बनाया गया आधिकारिक शुभंकर था।

शुभंकर का उद्देश्य खेल आयोजनों को अधिक आकर्षक और मनोरंजक बनाना होता है, साथ ही साथ आयोजकों को अपनी ब्रांडिंग और प्रचार के लिए एक मंच भी प्रदान करता है। शुभंकर अक्सर स्थानीय संस्कृति और परंपराओं को दर्शाते हैं और आयोजनों के लिए अनोखे और यादगार अनुभव प्रदान करते हैं।

भारत में शुभंकरों का उपयोग विभिन्न खेल आयोजनों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में किया जाता रहा है।  शुभंकरों को अक्सर टीम की भावना और ऊर्जा को दर्शाने के लिए डिज़ाइन किया जाता है।

शुभंकरों के डिज़ाइन में आमतौर पर उनकी आँखें बड़ी और आकर्षक बनाने से उन्हें जीवंत और मित्रवत बनाया जाता है। इन्हें चमकदार और आकर्षक रंग प्रदानकर और अधिक मनभावक भी बनाया जाता है। शुभंकरों का आकार अक्सर बड़ा और आकर्षक होता है, जिससे वे दूर से ही दिखाई दें। इनका व्यक्तित्व कुछ इस तरह निर्मित किया जाता है कि वे टीम या आयोजन की भावना को प्रकट कर सकें।

बहुत लोगों को अब भी याद होगा कि भारत में संपन्न 1982 के नई दिल्ली एशियाई खेलों का शुभंकर अप्पू (Appu) नामक एक युवा,चंचल हाथी था, जो एशियाई खेलों के इतिहास का पहला शुभंकर बना और शक्ति, बुद्धि तथा भारत की संस्कृति का प्रतीक बन गया था। भारतीय संस्कृति में हाथी को बहुत श्रद्धा भाव से देखा जाता है, अप्पू को उसी प्रतिरूप जो भारत की समृद्ध विरासत, शक्ति और बुद्धि का प्रतिनिधित्व करता था, साथ ही खेलों में युवाओं के उत्साह और भागीदारी को दर्शाता था। 'अप्पू' जैसे प्यारे नाम भी भारत में हाथियों के लिए इस्तेमाल होने वाला वाला एक सामान्य नाम है, जो हिंदी शब्द 'आहनाप' (हाथी) से लिया गया। आयोजन के दौरान अप्पू इतना लोकप्रिय हुआ कि उसे प्रचार सामग्री, व्यापारिक वस्तुओं और समारोहों में दिखाया जाता रहा। जिससे खेलों के लिए एक उत्सवपूर्ण माहौल भी बना। इस संदर्भ में यह भी दिलचस्प है कि शुभंकर के प्रतीक के अलावा, एक वास्तविक जीवित हाथी (जिसका नाम कुट्टिनारायणन था) भी इस आयोजन का हिस्सा था रहा था।  बताया जाता है कि एक टैंक में गिरने के बाद वह घायल हो गया था और बाद में उसकी मृत्यु हो गई। 

दुनियाभर में होने वाले प्रमुख खेलों के वन्य जीवों एवं अन्य प्राणियों पर आधारित शुभंकरों की जानकारी जुटाते हैं तो पता चलता है कि 1980 में रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) में मॉस्को ग्रीष्मकालीन ओलंपिक का शुभंकर भालू 'मिशा' ((Brown Bear)) था, जो ओलंपिक इतिहास के सबसे प्रसिद्ध शुभंकरों में से एक है। भालू रूस के राष्ट्रीय गौरव और शक्ति का प्रतीक है। इसे बहुत ही प्यारा और मिलनसार दिखाया गया था, जिसने दुनिया भर के लोगों का दिल जीत लिया था।

वर्ष 2000 के खेलों में सिडनी (ऑस्ट्रेलिया) में ऑस्ट्रेलिया के तीन अनोखे जीवों को शुभंकर बनाया गया। प्लैटिपस (Platypus), कूकाबुरा (Kookaburra) और इकिडना (Echidna)।  ​सिड (प्लैटिपस) पानी में रहने वाला जीव, ​ओली (कूकाबुरा) ऑस्ट्रेलिया का प्रसिद्ध पक्षी और ​मिली (इकिडना) एक चींटीखोर जैसा दिखने वाला कांटेदार जीव होता है।​ ये तीनों क्रमश: पानी, हवा और धरती का प्रतिनिधित्व करते थे।

​2008 के बीजिंग ओलंपिक में पांच शुभंकर थे, जिनमें 'जिंगजिंग' (विशाल पांडा) मुख्य था। पांडा चीन में राष्ट्रीय महत्व का प्राणी है। इसके अलावा इसमें एक तिब्बती मृग (यिंगयिंग) और एक निगल पक्षी (निनि) भी शामिल थे। ये सुख, स्वास्थ्य और सौभाग्य के प्रतीक माने जाते हैं।

2016 में ब्राजील में आयोजित रियो ओलंपिक खेलो का शुभंकर 'विनिसियस' एक मिश्रित वन्यजीव (Hybrid Animal) था, यह कोई एक जानवर नहीं था, बल्कि ब्राजील के विभिन्न जानवरों (बिल्ली, बंदर और पक्षियों) का एक मिश्रण था। यह ब्राजील की जैव-विविधता और उनकी चपलता का प्रतीक था।

​कतर में 2022 के फीफा विश्व कप में 'लाएब'  शुभंकर बना, हालांकि यह जानवर नहीं था (यह एक पारंपरिक अरबी हेडड्रेस 'कुफिया' जैसा था), लेकिन फीफा के इतिहास में 'विली' (शेर) को याद करना जरूरी है। 1966 (इंग्लैंड) में 'विली' विश्व कप का पहला शुभंकर था, जो एक ब्रिटिश शेर था।

शुभंकर के लिए प्राणियों को चुनने के पीछे भी बहुत सोचे समझे कारण होते हैं। जिनमें क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान, खेल भावना के हार्दिक प्रदर्शन के साथ साथ लुप्तप्राय प्रजातियों को शुभंकर बनाकर उनके संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाना भी उद्देश्य होते हैं। 

हमारे देश में खेलो इंडिया अभियान के शुभंकर हर संस्करण के साथ बदलते रहते हैं; हाल ही में, खेलो इंडिया यूथ गेम्स 2025 के लिए गजसिंह (हाथी और शेर का मिश्रण) था, जबकि खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स 2025 के लिए खम्मा और घनी (ऊँट) थे, और खेलो इंडिया पैरा गेम्स 2023 के लिए उज्ज्वला (गौरैया) थी। हमारी धरती पर जैव विविधता और पर्यावरणीय संतुलन के प्रति ऐसा रचनात्मक दृष्टिकोण बहुत आश्वस्त करता है।


ब्रजेश कानूनगो


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बोझिल भविष्य में सुख देंगी कलाएं

बोझिल भविष्य में सुख देंगी कलाएं कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और प्रौद्योगिकी में हम जिस तेजी से आगे बढ़ रहे हैं इससे लगता है कि दुनिया भर के,ह...